tag:blogger.com,1999:blog-32861265867682988512008-05-13T16:27:46.040+05:30दालानMUKHIYA JEEhttp://www.blogger.com/profile/03013961954702865267noreply@blogger.comBlogger74125tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-76891701853870700942008-05-13T15:47:00.003+05:302008-05-13T16:03:18.269+05:30बहुत दिनों बाद देस में<span class="">बहुत दिनों बाद देस में <a href="http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/s/surendranath_tiwari/index.htm">-सुरेंद्रनाथ तिवारी </a> </span><br /><span class=""></span><br /><span class=""><br />"क्या हुआ? एकदम आनन-फानन में गाँव जाने का डिसीजन ले लिया?" मेरे मित्र डॉ. दास ने पूछा।"हाँ, डॉ. साहब, कुछ बात ही ऐसी है, इस बार २००४ में ७-८ मार्च की होली है और इस बार केवल गाँव ही जाना है, वह भी बस होली के लिए।"<br />यह निर्णय सचमुच ही केवल गाँव में होली बिताने के लिए लिया गया था। इतने दिनों अमेरिका में रहने के बाद ऐसे लिए गए अचानक निर्णय पागलपन ही हैं, इसलिए दास साहब के इस प्रश्न से मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। योजना थी, जहाज़ से बनारस और फिर बनारस से ट्रेन से गाँव। मेरा गाँव चंपारण जिले के सेमरा स्टेशन के पास है। बनारस से ट्रेन से गाँव जाने का एक बड़ा फ़ायदा यह था कि यह पूरा रास्ता भोजपुरी-भाषी इलाके के बीच से होकर जाता है, और बहुत दिनों बाद यह इच्छा थी देखने की कि फागुन में यह इलाका सचमुच कितना सुंदर लगता है।<br />किशोरावस्था तक कई प्रयोजनों से मैं पूरे इलाके में घूम चुका था, एक बार फिर इच्छा थी उस सौंदर्य को निहारने की, ख़ास कर फागुन में। बनारस से उत्तर की तरफ़ गोरखपुर होते हुए अगर नेपाल की सीमा तक जाएँ और वहाँ से पूरब मुड़कर सीतामढ़ी, और फिर दक्षिण की तरफ़ मुजफ्फरपुर, वैशाली, फिर गंडकी का किनारा पकड़े पश्चिम में छपरा होते हुए, सोन नदी के साथ-साथ डिहरी-आन-सोन और फिर पश्चिम मुड़कर भभुआ के पहाड़ और कर्मनाशा पार कर बनारस के दक्षिण तक जो क्षेत्र बनता है, वह क्षेत्र मोटे तौर पर भोजपुरी-भाषी क्षेत्र कहा जाता हैं। भाषा एक होने के कारण दो प्रदेशों में होते हुए भी सांस्कृतिक एकता है।<br />इस प्रदेश ने महात्मा गांधी का पहला सत्याग्रह देखा था। इसने, भारत को पहला राष्ट्रपति (जीरादेई, सीवान के डा. राजेंद्र प्रसाद) और एक प्रधानमंत्री, बलिया के चंद्रशेखर, दिया है। यह इलाका लोकनायक जयप्रकाश का जन्मस्थल-कर्मस्थल है। संपूर्ण क्रांति का उद्घोष इसी मिट्टी से हुआ था। सासाराम के जगजीवन राम और रामसुभग सिंह नेहरू मंत्रीमंडल में मंत्री थे। अगर बनारस की साहित्यिक विभूतियों, जैसे प्रसाद जी, प्रेमचंद आदि छोड़ भी दें तो भी यह क्षेत्र हिंदी साहित्य का सारस्वत-संघ है। सर्वश्री रामबृक्ष बेनीपुरी, शिवपूजन सहाय, रामदयाल पांडेय, विवेकी राय, गोपालसिंह नेपाली, मनोरंजन प्रसाद सिंह, लोहा सिंह आदि इसी इलाके की देन हैं। राष्ट्रकवि दिनकर जी की कई सशक्त कविताएँ सासाराम में लिखी गईं थीं, जब वे यहाँ की शिक्षा-विभाग में थे।<br />इस क्षेत्र की एक दूसरी विशेषता यह है कि यहाँ के ही लोग गिरमिटिया मजदूरों के रूप में, ज़्यादा तादाद में, अंग्रेज़ों द्वारा फिजी, गयाना, मारिशस, ट्रिनीडाड आदि देशों में ले जाए गए थे। इसके कारण रहे होंगे, लोगों की सरलता और अशिक्षा, बेहद परिश्रम करने की शक्ति तथा गन्ना उपजाने का अनुभव।<br />गंगा जी के अलावा गंडक, सरयू, घाघरा, कर्मनाशा और कई छोटी सरिताओं से वलयित यह क्षेत्र समतल और बहुत ही उपजाऊ है। और इस उपजाऊ-पने के कारण मसुरी-खेसारी-मटर-अरहर जैसे दालों के फूलों से लेकर पूरे वर्ष कभी न कभी उडहल-बागनबेलिया-गुलाब-सेमर-गुलदाउदादी-गेंदा-जूही-रजनीगंधा आदि खिले मिल जाते हैं, बड़ी तादाद में, और सरसों-तीसी तथा सूरजमुखी का कहना ही क्या, जैसे किसी ने प्रकृति को पीली लाल चूनर पहना रखी हो। ऐसी प्राकृतिक संपदा से परिवेष्टित जीवन अगर अल्हड़ हो तो आश्चर्य क्या और यही अल्हड़ता भोजपुरी अंचल की विशेषता है।<br />बनारस में रात में अपने प्रिय मित्र प्रमोद जी के पास रहना था। शाम को भगवान विश्वनाथ जी के दर्शन कर निकलते ही भारी भीड़-भाड़ में देखा तो एक विक्षिप्त आदमी रास्ते में गा रहा था, शायद रंग और अबीर की दर्जनों दुकानों को देखकर :<br />"संउसे सहरिया रंग से भरी,<br />केकरा माथे ढ़ारूँ अबीर,<br /> होकेकरा माथे ढ़ारूँ अबीर?"<br /> यानी सारा शहर तो रंग से भरा है, किसके माथे अबीर ढ़ारूँ?<br />बनारस में लिच्छवी एक्सप्रेस लेट आई। बसंत के आगमन का आभास तो हमें पहले ही हो गया था- जब बनारस के म्युनिसिपल-पार्क में गदराई बागनबेलिया के रंग-बिरंगे फूलों के ऊपर सेमर का एक मात्र पेड़ अपनी लाल टेसुओं की पगड़ी बाँधे हँस रहा था। जैसे-जैसे ट्रेन पूरब की ओर बढ़ती गई, फागुन की धूप गुनगुनी आँच में सर्दी तपने लगी थी, हल्के कुहासे के पार, सरसों के खेतों की पीली चादर पर बिछी ओस, किरणों की ऊष्मा से पिघल रही थी, एक नए दिन की अगवानी में फ़ागुन का एक नया दिन घीरे-घीरे जग रहा था। ट्रेन के सामने से गुज़रते एक रेलवे-क्वार्टर में उड़हुल और जूही के पेड़ भी किरणों का स्पर्श पा अपने उनींदे फूलों को जगा रहे थे, और मुझे दिनकर जी की एक कविता याद आ रही थी,<br />मैं शिशिर शीर्णा चली, अब जाग री मधुमास-आली।<br />वर्ष की कविता सुनाने कूकते पिक मौन भोले,<br />स्पर्श कर द्रुत बौरने को आम्र आकुल, बाँह खोले,<br />पंथ में कोरकवती जूही खड़ी ले नम्र डाली।<br />मैं शिशिर शीर्णा चली, अब जाग री मधुमास-आली।<br />मेरी ट्रेन एक छोटे स्टेशन पर रुकी। सुबह की खुमारी ओस की तरह किरणों की आँच से उड़ रही थी, सामने की एक छोटी अमराई में 'भोली पिकी' आम के नए किसलयों में छिपी 'वर्ष की कविता' सुनाने को अकुला रही थी -- फागुन में खोया था।<br />छपरा पहुँचते-पहुँचते फागुन की वह गुनगुनी धूप जवान हो गई थी।अब हम सोनपुर में रुके हैं। सोनपुर में गंगा-गंडक के संगम पर पुराना और विशाल पुल है। यह गज-ग्राह की कहानी वाला स्थल है, जहाँ भगवान गज को ग्राह से बचाने आए थे। आज भी यहाँ का मेला, कुंभ के बाद शायद भारत का सबसे बड़ा मेला है। मैं ट्रेन की खिड़की से नीचे झाँकता हूँ - - गंगा से मिलने जा रही गंडकी के पश्चिमी किनारे पर दो लड़के अपनी भैसों को पानी पिला रहे हैं, नहला रहे हैं, मैं उनकी बातें तो नहीं सुन सकता पर एक लड़के की भंगिमा से लगता है वह हाथ उठाए होली या बिरहा गा रहा है। एक नाविक अपनी बाँस की पतवार थामे मस्त हो गा रहा है। गीत तो हर जगह जीवित है, बस गाने वाला चाहिए।<br />मेरी ट्रेन वैशाली जनपद में प्रवेश कर रही हैं, वैशाली - - संसार का पहला गणतंत्र, भगवान महावीर का जन्मस्थल, भगवान बुद्ध का विहार, सुंदरी आम्रपाली का जन्मस्थल, उसकी प्रणय-स्थली मुझे अपनी कविता की पंक्तियाँ याद आ रही हैं,<br />इन कुंजों में खेल खेलकर बड़ी हुई होगी अंबाली,<br />उसके अल्हड़पन से गुंजित अब भी उसकी डाली डाली।<br />आम्रपाली के प्रथम प्यार की साक्षी उसके गलियाँ आँगन,<br />उस अल्हड़ नूपुर की धुन को अब भी ढूँढ़ रही वैशाली।<br />बचपन में पढ़ी श्री रामवृक्ष बेनीपुरी की 'आम्रपाली' याद आती है, उतनी सुंदर आम्रपाली सचमुच किसी की नहीं - रचयिता अगर माटी में सन जाए तो रचना अद्वितीय होती है, बेनीपुरी जी स्वयं वैशाली के थे, आम्रपाली वैशाली की थी। हाजीपुर पहुँचते-पहुँचते रेलवे लाइन की दोनों तरफ़ खास कर गंगा जी की तरफ़ छोटे केले के पेड़ों का अतुल भंडार। गंगा जी तक फैला यह विस्तृत क्षेत्र ऐसे केलों के लिए भारत-प्रसिद्ध है।<br />हाजीपुर स्टेशन पर पंजाब से लौटते मजदूरों की कई टोलियाँ दीखती हैं जो होली में घर जा रही हैं। बिहार के बहुत से मजदूर बिहार की दु:स्थिति के कारण बाहर मजदूरी करने को मजबूर हैं। टोलियों में चर्चा के विषय दो हैं, 'अबकी गाँव में फगुआ कैसे होई' और 'तोहरा किहा फगुआ कहिया बा?' फगुआ याने होली। इस पर मुझे याद आता है कि इस बार होली के बारे में यह विवाद है कि वह सात मार्च को है या आठ मार्च को। मैं स्टेशन पर खड़े किसी युवक से पूछता हूँ, "कहिया बा फगुआ? सात के कि आठ के?"उसका तपाक उत्तर है, "जहिया मन करे, हमनी त दूनू दिन मनाईब।" यानी जिस दिन आपका दिल चाहे। हम लोग तो दोनों दिन मनाएँगे। और वह कृशकाय युवक ज़ोर से ठठाकर हँसता है।नवयुवकों से इसी उत्तर की आशा करनी चाहिए। उनके लिए तो फगुआ हर रोज़ है।<br />गाँव पहुँचकर इस बात की प्रबल इच्छा थी कि पिता जी के साथ में सरेह घूम आऊँ। सरेह यानी वह भूमि जिस पर लोग बसते न हो, जो कृषि मात्र के लिए है। सुबह तड़के उठकर हम सरेह चले, ओस अभी भी रबी की फ़सलों पर ऊँघ रही थी, मटर, बकला, आलू के नन्हें फूलों पर किरणें खेलने लगी थीं, गेहूँ अब फूटने लगा था। पहले गेहूँ के पौधे छोटे होते थे, अब वे बड़े दीखते हैं, शायद गेहूँ की दूसरी प्रजाति है। हम कई सरेह घूमते रहे। अब तो कई दशक हो गए, पर जिन खेतों में हमने मसूर बोया था, गेहूँ काटा था, उनके बोझे बनाए थे, उन बोझों को उठाकर खलिहान लाया था, आषाढ़ में जिन गन्ने के खेतों में हमने तीतर और पंडुक मारे थे, गन्ने चुराकर खाए थे, सब यथावत आँखों के सामने चित्र की तरह घूमने लगे थे। मुझे याद आ रहे थे, सिरिसिया सरेह में अगहन में धान काटने के बाद खेतों में धान के अकेले खूँट और उन्हें देखकर श्री रामदयाल पांडेय जी की कविता जो उन्होंने कटे खेतों को देखकर लिखी थी -<br />उजड़ दयार या चमन कहूँ?ओ बसुंधरे!<br /> इस परिवर्तन को,निधन कहूँ या सृजन कहूँ?<br />टोरांटो से अमेरिका जाते वक्त रास्ते में मकई के विशाल खेतों में पड़े, कटे खूँटों को देखकर, वह कविता अब भी मन में गूँजती है।हम घर लौटे तो दुपहरिया हो चुकी थी, कुछ किशोर लड़के मेरे दरवाज़े पर खड़े थे,"सम्मत में आइएगा न, पंडी जी?" याने रात में जो संवत जलता है, उसमें मुझे शरीक होना है। रात में कोई बारह बजे मेरे भाई साहब मुझे जगाते हैं, "भइया, लड़के आए हैं सम्मत जलाने के लिए। जाइएगा?"<br />मैं आधा ऊँघता जाने को उद्यत होता हूँ। सम्मत गाँव के छोर पर जलता है। वहाँ जाते-जाते मेरी नींद समाप्त हो जाती है। ढोलक की आवाज़ तेज़ होती जा रही है, जैसे लोगों को उठाकर बुला रही हो। कुछ लड़के होरी गा रहे हैं, ज़्यादा इस फिक्र में हैं कि सम्मत की लपटें दूसरे गाँव से ऊँची कैसे हो, इस प्रयत्न में बहुत सी चीज़ें आग की भेंट चढ़ती हैं, कभी-कभी उन पड़ोसियों की खाट-कुर्सी भी जिनसे इन अल्हड़ किशोरों की दुश्मनी हो। मैं अलग-थलग-सा हूँ, सोच नहीं पा रहा कैसे शरीक होऊँ, पर ढोलक की आवाज़ बुला रही है म़ैं भी अगल-बगल फैले, बटोरे गए झाड़-फूस को आग में झोंकता हूँ, पुराना वर्ष जल रहा है, कल नया वर्ष आएगा।<br />दूसरे दिन, कोई दस बजे होंगे। किशोरों का एक झुंड, धूल-कीचड़ से सजा, गाँव की पगडंडी पर हुड़दंग करता घूम रहा है। परंपरा यह है कि सुबह-सुबह धूल-कीचड़ से होली खेलकर, दोपहर में नहाकर रंग खेला जाए, फिर शाम को अबीर लगाकर हर दरवाज़े पर घूमके फगुआ गाया जाए। पर फगुआ और भांग की मस्ती में यह क्रम पूरी तरह बिसरा दिया जाता है। ये किशोर अपनी पूरी मस्ती में हैं, कुछ ने अवश्य पी भी रखी है, एक दूसरे पर धूल उछालते, ये गाँव के पुराने कुएँ पर स्र्कते हैं, फिर आगे बढ़ जाते हैं। कुएँ पर दो महिलाएँ पानी भर रही हैं, एक अधेड़ पुरुष बाल्टी से पानी निकाल नहा रहे हैं। एक लड़का अपनी भर्राई-लड़खड़ाती आवाज़ में गाने लगता है,<br />आ हो भौजी,<br />तोरा नइहरवा कुआँरी बहिनिया भौजी,<br />कह त गवना करा के ले आईं। </span><br /></span><span class="">दूसरा खिलखिलाकर हँसता है, उससे कहता है, "आरे बेकूफ, कुँआरी ना, कटारी, कटारी। गाने भी नहीं आता है।" और वह अपने बेसुरे स्वर में शुरू हो जाता है,"तोरा नइहरबा कटारी बहिनिया भौजी"<br />बाकी लड़के खिलखिलाते हैं और उनका समवेत स्वर गूँजता है :"आय हाय, कटारी बहिनियाँ। क्या गाना बनाया है।"मैं कटारी शब्द का हिंदी-अनुवाद सोचता हूँ, भावनाओं का अनुवाद नहीं होता। कटारी का मतलब हिंदी में शायद हो तीखे नाक-नक्श वाली।कुएँ वाली औरतें कुछ हंसती, शर्माती हैं, पुस्र्ष अपनी भद्रता में कहते हैं, "ये लड़के बिगड़ गए हैं।"मैं सोचता हूँ, बसंत आ गया है।दो बजने को आए हैं, दुपहरिया ढ़लने लगी हैं। मेरे दालान वाले चबूतरे पर कुछ लोग जमा हो गए हैं। मैं उनसे बातें करने में मशगूल हूँ, तब तक रंगों की एक पूरी बाल्टी मेरे दालान में खिड़की के पीछे से आकर बिख़र जाती है। चौकी, हमारे कपड़े, नीचे का कच्चा फ़र्श, सभी रंगों से भीग जाते हैं। यह अचानक हुआ हैं, मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, दरवाज़े के भीतर धोबी जाति की गाँव की एक अधेड़ महिला, जो मेरी भाभी लगती हैं, खड़ी खिलखिला रही हैं। साथ बैठे कुछ मित्र नाराज़ होते हैं, कुछ खुश। मुझे हँसी आती है। मस्ती में कह बैठता हूँ,"आई ना बाहरा, भीतरी का लुकाइल बानी? तनी हमहूँ त देखौं कि केतना निमन लाग तानीं।" यानी, बाहर आइए न, भीतरी क्या छुप रही हैं, ज़रा हम भी तो आपको ठीक से देखें कि आप कितनी खूबसूरत लग रही हैं।<br />वे भी चुहल में कम नहीं हैं।"मन बात भीतरी आँई, तब नू निमन से देखब।" यानी, मन है तो भीतर आइए, तब न ठीक से देख पाइएगा। लोग खिलखिलाते हैं।<br />कई किशोरियाँ रंग की बाल्टी लिए, रंगों से सनी, बांस की पिचकारियाँ भरे, मेरे आँगन में चली जा रही हैं। अंत:पुर में स्त्रियों की खनखनाहट मुखर हो गई है, रंगों की छप-छप, पिचकारियों का शोर कुछ-कुछ सुनाई देता है। मैं सोचता हूँ, मेरा आँगन लाल-लाल हो गया होगा, तभी मेरे गांव के मोहन भैया कहते हैं, "हमरो घरे बोलाहट बा, फगुआ खेले खातिर, बहुत दिन से अइबे ना कइनी हैं रउआ। मेरी पत्नी ने भी बुला रखा है फगुआ खेलने के लिए, आप बहुत दिनों से गाँव आए ही नहीं।"<br />मैं कहता हूँ, "ओ! जाइल ज़रूरी बा? अब त सब लोग गावे खातिर आवे लागल बा।" यानी जाना ज़रूरी है क्या, अब तो सब लोग गाने के लिए जमने लगे हैं, देर हो जाएगी।"नाहीं, तुरते चलीं, चल आवल जाई, जले लोग आइहें।" जल्दी चलिए, जब तक लोग आएँगे, हम लोग चले आएँगे।<br />मेरे छोटे भाई बाल्टी में रंग लाते हैं और बाँस की पिचकारी। मैं कुछ घर छोड़ मोहन भैया के घर पहुँचता हूँ। उनकी बिटिया, जिसकी शादी उन्होंने पिछले साल की थी, अपने नैहर आई है। वह आगे बढ़कर मेरा पाँव छूती है, मैं आशीर्वाद देता हूँ 'खुश रह।' मोहन भैया की पत्नी अपने कमरे में अंदर लजाती खड़ी है, घंूघट काढ़े। कोई दस वर्षों से मैंने उन्हें नहीं देखा है, मोहन सिंह ने कोई पैंतीस साल पहले कलकत्ते के जूट मिल में मजदूर की नौकरी कर ली थी तब से उसी नौकरी में रहे, कभी-कभी गाँव आते।<br />मोहन भैया मौन तोड़ते हैं, भोजपुरी मिश्रित हिंदी में,"अब क्या लजाती हैं, सुरेंदर जी आए हैं नू, बहुत रंग लगाने को कहती थीं, अब लगाइए ना।"<br />भाभी का मौन टूटता है, लज्जा मुखर होकर पिचकारी में बदल जाती हैं, और मैं सराबोर हो जाता हूँ, रंगों में। रंग तो मुझे भी लगाना है म़ैं सारी बाल्टी उठाकर उनपर उझल देता हूँ। उनका बदन सिहरता है। साड़ी भींग जाती है।उनकी बिटिया हम अधेड़ लोगों की यह रास-लीला देख हँसती है,"ठीक कइनी ह चाचा, कहिया से कहत रहली ह कि रउआ आइब त अबकी फगुआ ज़रूर खेलब।" यानी, चाचा आपने ठीक किया, कब से कह रहीं थीं कि आप आइएगा तो फगुआ ज़रूर खेलेंगी।<br />और उसके बाद कई घर, अधेड़-बूढ़ी होती भाभियाँ, रास्ते में मिली रंगों से भरी लड़कों, लड़कियों की टोली ग़लियों की धूल रंगों से भर गई हैं, हर आँगन में, दालान में माटी रंग गई है। मुझे बनारस का वह विक्षिप्त आदमी याद आता है, उसका वह गीत :संऊसे सहरिया रंग से भरीं।<br />मोहन भैया के दालान से परंपरागत रूप से होली शुरू होती है। वहाँ जमघट होने लगी है। तासा, ढ़ोलक, झाल और मजीरे की आवाज़ें आने लगी हैं।लोगों की, किशोर, युवा, अल्हड़, बूढ़े, सबकी लरजती आवाज़ फगुनी बयार पर चढ़कर वातावरण में तैर रही है। मेरे दालान में आकर वह टोली जमा हुई हैं। मेरे पिताजी अबीर की थाल आँगन से मँगवाते हैं, सबो को अबीर लगता है, मैं थोड़ी अबीर पिता जी को लगा, उनके चरण छूता हूँ।<br />ढोलक, झाल के स्वर धीरे-धीरे उपर उठ रहे हैं, एक लड़का शुरू करता है :"शिव बबा, रउरी लाल धजा, देखि हुलसे ला हमरो शरीर आहो शिव बबा।"यह भगवान शंकर की प्रार्थना है, शुभ काम ईश्वर की प्रार्थना से ही शुरू होता है, हे शिव बाबा, आपकी लाल ध्वजा देख मेरा शरीर हुलस रहा है। एक समवेत स्वर उठता है:</span><br />"हो हो शिव, आ हो शिव।<br />आ हो शिव बबा,<br />रउरी लाल धजा देखि हुलसे ला हमरो शरीर,<br />हो देखि हुलसे ला हमरो शरीर<br /><span class="">आ हो लाला हुलसे ला हमरो शरीर..."<br />गीत की रफ़्तार तेज होती जा रही है और आवाज़ ऊँची ढोल, तासे की आवाज़ों में सभी झूम रहे हैं, तासा वाला लड़का खड़ा होकर नाचने लगा है, तासा ज़ोर-ज़ोर से पीट रहा है। सभी लोग घुटनों पर खड़े हो, उसकी तरफ़ मुख़ातिब हो, हाथ भाँजकर गा रहे हैं :</span><br /><span class="">"रउरी लाल धजा, रउरी लाल धजा, देखि हुलसे ला हमरो शरीर..."<br />लगता है एक तरह का नशा छाया है सबों पर। ऊपर उठते, नीचे उतरते स्वर, ज़ोर-ज़ोर से, झाल, मजीरे की आवाज़ें, तासा पीटने की आवाज़ और फिर समापन।<br />दूसरे गीत से पहले, जगत भैया सबों को डाँटते हुए कहते हैं, "ए, तासा ठीक से नइखे उठत," यानी तासा की आवाज़ सही तरीके से ज़ोर से ऊपर नहीं उठ रही है। मुझे याद आता है, बचपन में जगत सिंह और भृगुनाथ सिंह दो भाई फगुआ गाने के लिए प्रसिद्ध थे, उनके बिना फगुआ पूरा नहीं होता था, उसी तरह कैलाश काका और कपिलदेव भैया। अब कोई नहीं रहे। केवल लखदेव काका हैं, कोई पचासी के आसपास के अवश्य होंगे, लाठी टेकते आ रहे हैं, इस उम्र में भी फगुआ के ढोल की पुकार वे अनसुनी नहीं कर पाए। मैं उन्हें सादर पकड़ कर दालान की सीढ़ियों पर चढाता हूँ, वे कहते हैं, "गोड़ लागीले महराजी।" यानी पंडित जी प्रणाम। मैं संकुचित हूँ, सोचता हूँ, मैं उन्हें क्या आशीर्वाद दूँ, मैं कहता हूँ, "काहाँ रह गइनी ह? हमनी राह देखत रहनी ह?" वे मेरे पिता जी के पास जाकर दीवार से सटकर बैठ जाते हैं।<br />जगत भैया फिर कहते हैं, तासा ठीक से नहीं बज रहा है, अब मेरे हाथों में वह शक्ति नहीं है, कोई अच्छा बजाने वाला नहीं है क्या? भोला हजरा, जो जाति से दुसाध हैं और मेरे बचपन के मित्र हैं, दीनानाथ सिंह की और मुखातिब होकर कहते हैं, "का हो दीनानाथ, बेइजती करईब?" उनका कहना है कि दीनानाथ, तुम हम लोगों की बेइज्जति करवाओगे क्या, अरे तासा सँभालो, और ज़रा फगुआ जमाओ। दीनानाथ आगे आते हैं, तीस पैंतीस के आसपास के युवा, और उनके तासा की आवाज़ और नेतृत्व पर पूरी टोली झूमने लगती है। दर्जनों गीतों पर दीनानाथ हम सबों का नेतृत्व कर रहे हैं, शुरुआत सबों की बैठकर होती है, पर जब स्वर उठने लगता है तो कोई भी बैठा नहीं रह पाता, समापन खड़े होकर ही होता है। दीनानाथ स्वर उठाते हैं:<br />घरहीं कोशिला मैया करेली सगुनवा,</span><br />बने बने राम जी का बीतेला फगुनवा।<br /><span class="">यानी माँ कौशल्या इधर घर में सगुन करवा रही हैं कि रामचंद्र कब आएँगे और उधर श्री राम बन-बन में अपना फागुन व्यतीत करने को विवश हैं।<br />मुझे याद है, यह मेरी माँ का प्रिय फगुआ था। जब मैं सेना में था और कभी होली में घर नहीं जा पाता था तो वह अवश्य गाती थी।ऐसे ही कितने गीत, भक्ति के, रास के, जीवन के, कछ बानगी देखें :"हाथ लिए बेलपत्र के दौरा,मन से महादेव पूजेली गौरा"यानी हाथ में बेलपत्र की टोकरी लिए, गौरा-पार्वती महादेव शिव की पूजा मन से कर रही हैं।<br />राम खेले होरी, लछुमन खेले होरी,</span><br />लंका में राजा रावण खेले होरी,<br /><span class="">अजोधा में भाई भरत खेले होरी।<br /></span><br />हंसेला जनकपुर के लोग सभी<br />होलइका राम धनुष कैसे तुरिहें?<br /><span class="">यानी जनकपुर के सभी लोग हँस रहे हैं कि राम तो अभी बच्चे हैं, धनुष कैसे तोड़ पाएँगे?<br />राधे घोर ना अबीर,</span><br /> राधे घोर ना अबीर,<br />मंड़वा में अइलें कन्हइया।<br /><span class="">यानी राधा, अबीर घोलो न, कन्हैया मंडप में आ गए हैं।<br />उठ सइयाँ लीख पांती,</span><br /> भेज नइहरवा,<br /><span class="">झूमक मोरा छूटे हो हो कोहबरवा।<br />यानी सइयाँ (पति के लिए भोजपुरी संबोधन), मेरे नैहर एक पत्र लिख दो, मेरा झूमक कोहबर वाले कमरे में छूट गया है। (झूमक, यानी कान की बाली और कोहबर उस कमरे को कहते हैं जहाँ शादी के बाद पति-पत्नी एक दूसरे से पहली बार मिलते हैं।)<br />नथिया में गुँजवा, लगा द सइयाँ हो,</span><br />मोरा नइहरवा अनारी सोनार-वा।<br /><span class="">यानी सइयाँ मेरी नथिया में तुम्ही उसकी गूँज लगा दो, यानी कस दो, मेरे नैहर का सोनार अनाड़ी है।<br />और ऐसे दर्जनों गीत, भक्ति के, रास-रंग के!<br />चैत का पहला दिन, साल का पहला दिन, इसी भक्ति और रास-रंग में बीत गया है, हम दरवाज़े घूम कर फगुआ गाते रहे हैं, फगुआ अपनी भरी जवानी पर है, रात भी।अब रात भी काफी हो चुकी है। मेरा बदन अब काफी थक चुका है, मैं लौटता हूँ, लड़के अभी भी मस्त हैं।<br />दूसरे दिन मुझे लौटना है पटना। सुबह ही, कुछ मित्रों के आग्रह पर मुझे अपने विधायक जी से मिलने जाना पड़ा। पिछले साल की बाढ़ से बड़ी तबाही हुई है। गन्ने का उद्योग, जो मेरे इलाके के लोगों के लिए एकमात्र आधार था नगद पैसों का, पूरी तरह ठप है। बिहार की अराजकता अपनी चरम सीमा पर है। हमारे विधायक वर्तमान सरकार में मंत्री भी हैं, अत: उनसे मिलना, मिलकर इन समस्याओं का निदान निकालना ज़्यादा सार्थक हो, यही मित्रों की आशा है। मुझे ऐसी कोई आशा नहीं है, पर प्रयत्न आवश्यक है।<br />हम मंत्री जी के घर पहुँचते हैं, छपवा चौक। रास्ता पक्की सड़क होकर ही है, जिसपर रक्सौल-काठमांडू-भैंसालोटन जाने वाला पूरा ट्रैफिक दिनरात दौड़ता है। सुबह में रास्ते में देखता हूँ, मेरे गाँव की कच्ची सड़क जहाँ पक्की सड़क से मिलती है, वहाँ देवी का एक छोटा मंदिर है। पर चूँकि ट्रैफिक बहुत है, सड़क की दोनों तरफ़ कई दुकानें उग आई हैं। दुकानों में अलग-अलग रंगों के अबीर के ढेर बिक रहे हैं, रंगों का मेला, सुबह की धूप में चमक रहा है। 'छपवा और मेरे गाँव के बीच दो और गाँव हैं, दोनों गाँवों में सड़क की काली पीठ पर बरन-बरन के रंगों का कोलाज, घरों के बीच सड़क पूरी तरह रंगों से भरी पड़ी है। रात में खूब फगुआ हुआ होगा।<br />हम मंत्री जी के घर के बरामदे में इंतज़ार करते हैं। मंत्री जी तैयार हो रहे हैं। थोड़ी देर के बाद मंत्री जी खादी के नए धुले सफ़ेद धोती-कुर्ते में बरामदे में आते हैं। हमारी बातचीत होती है, बाढ़ के पानी की निकासी के प्रयत्नों, गन्ने के लिए विदेशी निवेश आदि पर कोई आधे घंटे बातचीत होती है। मुझे मंत्री जी की मिलनसारिता, आम लोगों की उन तक पहुँच, समस्याओं के बारे में उनके कुछ मूल विचार अच्छे लगते हैं।<br />तभी सामने कोई एक दर्जन लोग बाल्टी में रंग लिए आते हैं, कुछ रंगों से भीगे कपड़ों में हैं, कुछ की नंगी पीठ पर ही रंग बिखरे पड़े हैं। मंत्री जी भाँप जाते हैं कि ये लोग रंग खेलने आए हैं, लोगों से मिन्नत करते हुए कहते हैं, उन्हें आज ही पटना जाना है, अत: वे पूरी तरह तैयार होकर जाने के लिए निकले हैं, कृपया उन्हें रंग न लगाया जाए। अपने इस विनय में वे मुझे भी ढाल के रूप में प्रयोग करते हैं, "आ हई पंडी जी अमेरिका से आइल बानी, ई लोग उहाँ रंग-वोंग ना खेले। रहे दीं सभे, काल्ह फगुआ हो गइल नू।" यानी, देखिए, ये पंडित जी अमेरिका से आए हैं, ये लोग वहाँ रंग-वंग नहीं खेलते हैं। आप लोग रहने दीजिए, अरे कल फगुआ हो गया न।"<br />लेकिन उनकी यह दलील, उनकी मिन्नत कोई सुनने वाला नहीं है। एक आदमी, आधी फटी बनियान पहने, रंगों से ढँके चेहरे पर लाल अबीर लगाए, सामने आते हैं, कहते हैं, </span><br />"मंत्री जी आज अमिरका ना, सर्गा से केहू आवे, फगुआ त खेलहीं के बा।<br /> आ रउआ पटना चल जायेब, अबहीं त बेरा बा।"<br /><span class="">उनकी बात मुझे अच्छी लगती हैं, मंत्री जी आज अमेरिका ही नहीं, स्वर्ग से भी कोई आए, फगुआ तो खेलना ही है। और आप पटना चले जाइएगा, अभी तो पूरा दिन पड़ा है।<br />और हम पर बाल्टियाँ उझल दी जाती हैं आज कोई मंत्री नहीं, कोई मजदूर नहीं। फगुआ के रंग से सबों को नहाना है, 'संउसे सहर' को। मंत्री जी खाने का आग्रह करते हैं, "पूआ बनल बा पंडी जी, मगावतानी।" यानी पूआ बना है, मँगवाता हूँ। ह़मारी परंपरा है होली के दिन पुआ खाने की। मैं नकार जाता हूँ, लौटना है। मेरी लौटती यात्रा है, पटना से दिल्ली का जहाज़, चैत का झक-झक दिन, दाहिनी तरफ़ गंगा जी दीखती हैं, सोन पार करने के बाद, कोइलवर पुल के उस तरफ़ आरा जिला आएगा अपनी अक्खड़ता तथा स्वतंत्रता-सेनानी बाबू कुँअर सिंह के लिए प्रसिद्ध, उनकी वीरता की प्रशंसा में लोग होली गाते हैं,</span><br /> "बाबू कुँअर सिंग तेगवा वहादुर,<br /> बंगला में उड़ेला अबीर,<br /><span class="">आ हो लाला बंगला में उड़ेला अबीर।"<br />मैं गुनगुनाता, गुनता चुपचाप बैठा हूँ, सोचता अभी बनारस आएगा, मुझे याद आता है श्री विश्वनाथ गली का वह विक्षिप्त आदमी और उसका फगुआ संउसे सहरिया रंग से भरी<br />कहाँ जा रहा हूँ मैं यह रंग-भरा शहर छोड़कर - </span><br /><span class=""></span><br />रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडाMUKHIYA JEEhttp://www.blogger.com/profile/03013961954702865267noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-44243683458501427472008-04-22T14:49:00.006+05:302008-04-22T15:15:00.364+05:30दिल मे छुपे बात और दर्द भी<a href="http://bp0.blogger.com/_fabeCWoNzTg/SA2uQdPQXAI/AAAAAAAAAXM/-XCk5gI7sTU/s1600-h/watch.jpg"><img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5191997543177804802" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 422px; CURSOR: hand; HEIGHT: 372px; TEXT-ALIGN: center" height="335" alt="" src="http://bp0.blogger.com/_fabeCWoNzTg/SA2uQdPQXAI/AAAAAAAAAXM/-XCk5gI7sTU/s400/watch.jpg" width="460" border="0" /></a><br /><div>शायद ऐसे कई दर्द और राज आपके दिल मे छुपे हों ! अमेरिका मे एक ऐसा ही मुहीम चल रहा है ! जहाँ लोग अपने घर मे बने हुए पोस्ट कार्ड से अपने दिल मे छुपे दर्द और कई बातों का इज़हार करते हैं ! ज्यादा के लिए आप <a href="http://postsecret.blogspot.com/">http://postsecret.blogspot.com/</a> को देख सकते हैं !<br /><br /><div>रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडा</div></div>MUKHIYA JEEhttp://www.blogger.com/profile/03013961954702865267noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-83518918824566299892008-04-09T11:16:00.003+05:302008-04-09T11:21:48.940+05:30भारतीयता कोई बिहार से सीखे !नवभारत टाइम्स<br /><a href="http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/msid-2871864,prtpage-1.cms">सुधांशु रंजन लिखते हैं :- </a><br /><br /><div align="justify">महाराष्ट्र की घटनाओं से बिहार के लोगों को गहरी तकलीफ पहुंची है। कुछ अरसा पहले बिहार विधानमंडल के साझा सम्मेलन में कुछ विधायकों ने 'मराठी राज्यपाल वापस जाओ' के नारे लगाए। बिहार के लोगों की पीड़ा को समझा जा सकता है, लेकिन यह कार्रवाई बिहार की परंपरा और संस्कृति के अनुरूप नहीं थी। बिहार की अपनी खामियां हैं, लेकिन भारतीयता के पैमाने पर उसने जो मिसाल कायम की है, वह काबिलेतारीफ है। इस पर चलकर ही यह देश खुश रह सकता है। बिहार को कई बातों के लिए नीची नजर से देखा जाता है। उसकी गरीबी और पिछड़ेपन का मजाक उड़ाया जाता है। उसके जातिवाद को बुराई की मिसाल बताया जाता है। लेकिन सच यह भी है कि प्रांतवाद या क्षेत्रवाद के कीटाणु इस राज्य में कभी घुस नहीं पाए। बिहारी अस्मिता हमेशा राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ी रही। हजार बरसों तक पाटलिपुत्र इस भूभाग की राजधानी रहा और पाटलिपुत्र का इतिहास ही देश का इतिहास बन गया। राजा जनक, दानी कर्ण, भगवान महावीर, भगवान बुद्ध, राजनयिक चाणक्य, सम्राट चंदगुप्त मौर्य, अजातशत्रु, अशोक महान, सेनापति पुष्यमित्र शुंग, दार्शनिक अश्वघोष, रसायन शास्त्र के जनक नागार्जुन, चिकित्सक जीवक और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट जैसे महापुरुष इस धरती पर हुए, जिनसे भारत को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। इस परंपरा पर कौन गर्व नहीं करता? क्या इसे बिहारी परंपरा कहा जाएगा? भारतीय राष्ट्रवाद की परंपरा बिहार में आधुनिक समय में भी जारी रही। आजादी के बाद कोयले और लोहे पर मालभाड़ा समानीकरण की नीति को बिहार ने बिना किसी ऐतराज के स्वीकार कर लिया। इस कदम से बिहार की इकॉनमी की कमर टूट गई। समान खर्च पर लोहे और कोयले की दूसरों राज्यों तक ढुलाई की सुविधा का असर यह हुआ कि उद्योगों को बिहार आने की जरूरत नहीं पड़ी। वे दूसरे राज्यों में लगते गए। बिहार के संसाधन खुद उसके काम नहीं आए। गौरतलब है कि कॉटन के लिए यह नीति लागू नहीं की गई। एक और उदाहरण लीजिए। दिसंबर 1947 में बिहार विधानसभा में इस मुद्दे पर बहस चल रही थी कि दामोदर घाटी परियोजना में बिहार को शामिल होना चाहिए या नहीं। एक-एक कर कई सदस्यों ने कहा कि इस परियोजना से बाढ़ बचाव और बिजली उत्पादन का फायदा पूरा का पूरा बंगाल को मिलेगा, जबकि डूब और विस्थापन का खतरा बिहार को उठाना पड़ेगा। इस तर्क का जवाब सरकारी पक्ष के पास नहीं था। सिंचाई मंत्री को जवाब देना था, लेकिन उनकी जगह चीफ मिनिस्टर श्रीकृष्ण सिन्हा खड़े हुए। उन्होंने कहा, अभी 15 अगस्त को देश आजाद हुआ है, हम सबने अखंड भारत के प्रति वफादारी की कसम खाई है, लेकिन उसे हम इतनी जल्द भूल गए। अगर इस परियोजना से बंगाल के लोगों को फायदा पहुंच रहा है, तो क्या गलत है? वे भी उतने ही भारतीय हैं, जितने कि बिहार के लोग। बिहार ने अगर खुद को भारतीय अस्मिता के साथ एक न कर दिया होता, तो क्या वहां से इतनी बड़ी तादाद में गैर-बिहारी सांसद बनते? आजादी की लड़ाई के दौरान 1922 में परिषद के चुनाव लड़ने के मुद्दे पर कांग्रेस बंट गई थी। गया अधिवेशन में भाग लेने आए जयकर और नटराजन जैसे नेता जब अपने राज्यों से कांग्रेस कमिटी के प्रतिनिधि नहीं चुने जा सके, तो बाबू राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें बिहार से निर्वाचित कराया। यह सिलसिला चलता रहा। संविधान सभा में सरोजिनी नायडू बिहार से चुनी गईं। आजादी के बाद जे।बी। कृपलानी, मीनू मसानी, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नान्डिस, रवींद्र वर्मा, मोहन सिंह ओबेरॉय आदि को बिहार ने अपना नुमाइंदा चुना। इंद्रकुमार गुजराल भी यहीं से राज्यसभा में पहुंचे। </div><blockquote><p align="justify">क्या बिहार में प्रांतवाद इसलिए नहीं है कि उसका सारा ध्यान जातिवाद में लगा रहता है? कुछ लोग ऐसा तर्क दे सकते हैं, लेकिन ऐसा कहना बिहार के साथ अन्याय होगा। अखिल भारतीय सेवाओं के जो अफसर बिहार में तैनात हैं, वे मानते हैं कि उनके साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाता। एक मायने में बाहरी होना उनके पक्ष में जाता है, क्योंकि वे जातिगत समीकरणों से अलग रह पाते हैं।</p></blockquote><div align="justify">खुद महाराष्ट्र की परंपरा भी ओछे प्रांतवाद के खिलाफ है। यह राज्य समाज सुधारकों, संतों और समाजवादियों का गढ़ रहा है। बाल गंगाधर तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले जैसे महान नेताओं ने राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाया। तिलक ने पूरे देश से धन इकट्ठा कर डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी की 1884 में स्थापना की। तब से आज तक सोसाइटी के पैम्फलेट के कवर पर यह साफ लिखा होता है कि जाति, धर्म, भाषा या प्रांत के नाम पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। सोसाइटी की स्थापना में उन्हें गोखले और गोपाल गणेश आगरकर का सक्रिय समर्थन मिला। महर्षि कर्वे जैसे शिक्षाविद् भी इससे जुडे़। पुणे का मशहूर फर्गुसन कॉलेज उसी सोसाइटी की देन है। गोखले ने ही गांधी से कहा था कि देश में कुछ करना चाहते हो तो देश को समझो और देश को समझना चाहते हो तो देश में घूमो। बहरहाल, ये मिसालें पेश करने का मकसद यह है कि हम क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद को समझें। याद कीजिए कि ब्रिटेन की प्राइम मिनिस्टर मार्गरेट थैचर और रूस के प्रेजिडेंट मिखाइल गोर्बाचेव ने भारत से सबक लेने को कहा था, जहां इतनी विभिन्नता के बीच लोग साथ-साथ रहते आए हैं। अब अगर हम इस बात को भूलकर राज्यों के बीच फर्क देखने लगें, तो भारत का क्या होगा? हमें भारतीय राष्ट्रवाद से अपने टूटते तारों को फिर जोड़ना होगा। इस देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद सदियों से रहा है, भले ही राजनीतिक राष्ट्रवाद हाल की बात हो। हमारे यहां सात नदियों को पूजने की परंपरा रही है। ये नदियां सारे देश में फैली थीं। शंकराचार्य ने देश के चारों कोनों में पीठों की स्थापना की थी। आधुनिक समय में राजनीतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा पैदा हुई, जिसके तहत हमने आजादी की लड़ाई लड़ी। हमारी खुशकिस्मती है कि सांस्कृतिक और राजनीतिक भारत का नक्शा लगभग एक जैसा है। भाषाई आधार पर प्रांतों का गठन काफी बाद की घटना है, लेकिन हमने इसे इतना तूल दे दिया है कि यह हमारे राष्ट्रवाद पर भारी पड़ रही है। इस ट्रेंड से बाहर निकलने के लिए हमें क्या करना चाहिए, इस पर सभी को विचार करना होगा। ( लेखक सीनियर जर्नलिस्ट हैं) </div><div align="justify"> </div><div align="justify"> </div><br /><span class=""></span><br />रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडाMUKHIYA JEEhttp://www.blogger.com/profile/03013961954702865267noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-13591242350884046282008-04-08T15:20:00.002+05:302008-04-08T15:51:29.451+05:30इस हमाम मे आप भी "नंगे" हो गए ! दुःख है !<div align="justify"><span class="">मुझे यह नही पता नही था या इसका यह अहसास नही था की यह "ब्लॉग" की चर्चा मे पुरा देश लपेट मे आ जाएगा ! अखबार मे पहले पृष्ठ पर "जाति गत" गमले देख मैं स्तब्ध रह गया ! <br />मैं शर्मिंदा हूँ अपने उन पाठकों से - अपने बचपन के दोस्तों से और अपने साथ वालों से की जति के जहर पर चर्चा ने सब के मुह को बेस्वाद किया ! हम सभी पत्रकार नही है - हमारी आवाज़ "हिंदुस्तान दैनिक" मे नही उठ सकती है - हमारे पीछे कोई राज नेता नही है ! और न ही हम सभी कोई दवा कम्पनी के "दलाल" हैं ! न ही किसी राजनेता के इशारे पर कर रहे हैं और न ही किसी "दवा कम्पनी " से उगाही का इरादा है !<br />दुःख सिर्फ़ यह हुआ की "दवा के व्यापार " को जति से जोड़ दिया गया ! ठीक कुछ महीनों पहले उक्त 'कथित पत्रकार' ने एक रिपोर्ट मे आईडिया कम्पनी के प्रचार को जोर शोर से दिखाया - वह वही प्रचार था जिसमे एक खास जति को लड़ते हुए दिखाया गया ! ये वही कथित पत्रकार है - जिनके रिपोर्ट से बाकी दुनिया जानी ! उसके पहले "कथित पत्रकार" ने उपन्यास लिखने के दौरान लगातार एक खास जाती को निशाना बनते चले गए ! उसी दौरान - बिहार के एक बाहुबली विधायक पर न्यूज़ रूम से लेकर कैमेरामन तक एक साजिश रची और फलस्वरूप खुलेआम न्यूज़ रूम से खास जाति को बाहुबली विधायक से जोड़ दिया गया ! किसी भी ब्रह्मण के लिए यह कितना कष्ट दायक होगा जब हम यहाँ दिल्ली मे बैठे - यह घोषित कर देन की बिहार के सबसे कुख्यात अपराधी "सतीश पण्डे" को पूरे ब्रह्मण समाज का आशीर्वाद प्राप्त है - यह सरासर अन्याय होगा ! जबकि पुरा बिहार जनता है की सतीश पण्डे एक खास जाति के खून के प्यासे हैं और वह जितने खुद कर चुके है - उसमे अधिकतर एक खास जाती के ही निर्दोष लोग हैं ! अगर "जातिये दुराग्रह " पर आधारित ऐसे आरोप भारत के प्रतिभाओं को गाली देना होगा ! देश मे आज भी कई एक से बढ़ कर एक प्रतिभावान "ब्रह्मण" हैं ! कहाँ भी जाता है - देश को तीन ब्रह्मण चला रहे हैं - तमिल ब्रह्मण , कश्मीरी ब्रह्मण और मैथिल ब्रह्मण ! क्योंकि इनसे तेज कोई जाति नही है ! पर सतीश पांडे जैसे अपराधी को भारत के समस्त ब्राहमणों से जोड़ कर देखना कितना उचित होगा ? ठीक उसी तरह किसी दवा व्यापारी को , किसी बाहुबली विधायक को या किसी पत्रकार को जाति की नज़रों से देखना किसी भी पढे लिखे इंसान को शोभा नही देता है ! </span></div><div align="justify"><span class=""></span> </div>आप बड़े हैं - आप आदरनिये हैं - आप समाज मे अपनी एक पहचान रखते हैं - आपको जातिगत निगाह से किसी ख़ास जाति को अपने तीर से लगातार निशाना बनाना शोभा नही देता ! इस तरह के हथकंडों से आपकी गरिमा नीचे गिरती है !<br /><span class=""></span><br /><div align="justify"><span class="">आज के दौर मे जाति कहीं से भी ना तो आपकी पहचान है और न ही मेरी ! हमारा ब्लॉग गाओं मे बैठा कोई नही पढ़ रहा है - जिसके बदौलत मुझे कोई राजनीती करनी है - और ना ही आपको - फ़िर यह जाति का जहर क्यों ? क्या आप डाक्टर के यहाँ जाति देख कर इलाज कराने जाते हैं ? क्या दवा कम्पनी की जात देख कर दवा खरीदते हैं ? या फ़िर आप नया इतिहास लिखेंगे ?<br />इस हमाम आप बिल्कुल नंगे खड़े हैं ! जातिये दुराग्रह छोडिये और उपन्यास लिखिए !</span></div><div align="justify"><blockquote><span class="">"बिहार" जैसे प्रान्त को सपूत की जरूरत है यह ना की अपनी माँ के फटे आँचल को दुनिए के सामने बेचने वालों की !<br />मैं उन सभी लोगों से क्षमा प्रार्थी हूँ जिन्हें मेरे लेख से दुःख हुआ होगा ! व्यक्तिगत हमलों के दौरान शायद हम सभी ने जातिये हमले भी किए होंगे - जिसका इरादा और सोच बिलकूल नही थी ! </span></blockquote></div><div align="justify"><blockquote><span class=""></span></blockquote></div>रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडाMUKHIYA JEEhttp://www.blogger.com/profile/03013961954702865267noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-32767591730689494562008-04-05T15:19:00.002+05:302008-04-05T15:23:41.332+05:30कम्बल ओढ़ के हम घी पी रहें है या पानी ?<div align="justify">मैं बिहार मे पैदा हुआ दिल्ली मे प्रगतिशील पत्रकार कहलाता हूँ . सर नेम को झटक कर जाति से अपने परहेज की मात्रा मापी जाने लायक बना लिया है . शुरू से ही दुबे ,चौबे, झा ,मिश्रा ,तिवारी ,त्रिपाठी , सिंह , शर्मा , चौहान जैसे सरनेम नेम से विलीन हो गुप्त आचरण मे समाहित हो , चाहता रहा .और मिलीमीटर से भी कोई मेरे ब्रह्मनत्व को माप न पाये इसके लिए मैं सरनेम पासवान, राम , बाल्मीकि, बैठा , प्रसाद ,मंडल, महतो आदि सरनेम नेम से न जुदा हो , इसका हिमायती रहा हूँ. खोज-खोजकर इनको दोस्त बनाता हूँ सो स्वाभाविक क्रिया के तहत साथ उठना बैठना खाना पीना सब चलता रहता है . इनकी आवाज़ उठाते रहने से ताली , खाली नही जाती.और अपनी धर्मनिरपेक्षता का क्या कहना ? हम तो अपने पत्रकारिता धर्म को भी ठेंगा दिखाते रहते हैं , क्या मजाल की इंसानियत का धर्म मेरे से नज़र मिलाये . ब्राह्मण और हिंदू होने के वावजूद मैंने जनेऊ से लेकर 'शिखा 'तक उखाड़ लेने का पक्षधर रहा . शंकर महादेव को "शंकर महादेवेन " से ज्यादा भाव कभी न दिया . अयोध्या के बानर सेना वाले सीताराम को ४ विदेशी कुत्ता पालनहार श्री सीताराम येचुरी से अधिक महत्व न देने का प्रमाण पत्र मेरी जेब मे ही रहता है . हिंदू पूजा पद्धति के ख़िलाफ़ समूचा देश मे, पर बंगाल के ज्योति बाबू की काली पूजा को मुस्लिम के नवाज के समकक्ष ही रखा . <br /> मेरे टाइप के लोगों को "मोदी" मे "मद" और "बुद्धदेव" मे "मध"[शहद ] नज़र आता है .प्रगतिशीलता के नए मापदंड [-अपने "शील" को प्रगति देकर यानी चलायमान रख कर विरोधियों की प्रगति को येन केन प्रकारेण "सील" करना ] पर बिल्कुल खरा उतरने को आतुर एक पत्रकार ही तो हूँ . " रेड लेबल " के पत्रकार कहलाने के लिए क्या-क्या न किया कथित उच्चे कुल मे जन्म लेकर , अपने कुल सहित समस्त उच्चे कुल को गालियों और गोलियों से रौदता रहा रौदवाता रहा .इस तरह सामाजिक न्याय दिलाने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया .पत्रकार की कोई जाति नही होती ,धर्म नही होता उपर्युक्त बातों से साफ हो गया होगा . अब पत्रकारिता की कोई सीमा नही होती इसको भी साफ कर ही दूँ .मैं बिहारी बिहार से चला .मात्र १८-२० घंटे की यात्रा ने बिहार को भुला देने मे मेरी मदद की . दिल्ली से दूर तक देख पाने की शक्ति मिली . नक्शे पर समूचा हिंदुस्तान क्या चीन, रूस देखता रहा .चीनी रूसी लेखक के अलावा अपने टाईप के धर्मनिरपेक्ष के धर्म गुरुओं का किताब चाटते रहे .अध्ययनशील रहने की बीमारी से ग्रषित हो जाने के कारण आंखों की नजदीकी नजर जाती रही दुरी का विस्तार मेरी सीमा का विस्तार करता गया . बंगाल की करतूत हमे तबतक नही दिखाई देती जबतक की वहाँ कांग्रेस या भाजपा न आए . मोदी को देख सकता हूँ पर उसकी अच्छाई धुधला दिखता है , और उसकी बुराई थोड़ा सा भी दिखे तो परिमार्जन विद्या से पहाड़ मे परिणत कर देने मे ज्यादा टाइम नही लगाता . और बिहार का क्या जहाँ सांप्रदायिक ताकत से मिलकर सरकार चलाने वाला नीतिश को पहले सड़कछाप मुख्यमंत्री बता दिया गया है . बाढ़, सूखा ,अतिवृष्टि का दंश झेलता चार बीघे जमीन वाले को माओवादी के धमकी भरे पत्र को प्रेम-पत्र से ज्यादा कुछ मैं नही समझता . जातिवाद का जहर कम न पड़े इसका प्रयास हमे जारी रखना है अपनी खोजी पत्रकारिता के तहत .क्योंकि इधर मैंने देखा है उच्च जाति ने छुआछूत को छू भी नही रहा . पढे लिखे साफ सुथरे दलित ,अर्धदलित के साथ आम सवर्ण भी घुलनशील होता जा रहा है , ठीक मेरी तरह . ये सर्वाधिक चिंता का विषय है मेरी और मेरी विचारधाराओं के लिये . ख़ुद को मैंने कई बार मार कर खबरों का खुदा बनने की कोशिश की .गिनिए कितनी मौत मरा हूँ ,कितनी बार अपने आपको मिटाया हूँ . अपने सरनेम को मिटाया , अपनी जाति मिटाई , अपना हिंदू धर्म मिटाया , अपना प्रान्तवाद मिटाया . फ़िर ये कुछ सामंतवादी लोग मेरे धर्म और निरपेक्षता मे फासला कायम करना चाहते हैं .कितनी ग़लत बात है ? है कि नही ? अरे साहेब इसीलिय सलमा आगा के दुःख के बराबर मेरा भी दुःख है ."ख़ुद को भी हमने मिटा डाला मगर , फांसले जो दरमिया से रह गए ." खैर कम्बल ओढ़ के हम घी पी रहें है या पानी ? ये हमारे साथी को पता चलेगा तभिये न दुरी बढायेगा .अभिये से बुरबक की तरह तनावोचित बिहेवियर सर्वथा अनुचित है . <br /> </div>Sanjay Sharmahttp://www.blogger.com/profile/06139162130626806160noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-1415597781900791992008-04-04T09:30:00.004+05:302008-04-04T10:06:35.468+05:30कमाल के हैं - "कमाल खान " !<div align="justify"><span class=""> प्रणव राय के न्यूज़ चैनल मे "कमाल खान " एक रिपोर्टर हैं - आप इनके रिपोर्टिंग को देखें - मंत्र - मुग्ध हो जायेंगे ! बिल्कुल सरल और साफ पानी की तरह ! एक दिशा मे बिना किसी विद्वेष और "दुराग्रह" के ! रमजान के महीने मे इन्होने मक्का - मदीना के बारे एक रिपोर्टिंग की ! शायद "वाह ! जनाब और लाजबाब " जैसे शब्द भी कम पड़ जायेंगे ! दुःख है की यह कोई "ब्लॉग" नही लिखते हैं और दिल्ली मे इनका कोई हितैषी भी नही है ! मैंने पूछा - आप दिल्ली क्यों नही आ जाते ! मुस्कुरा दिए ! मैं समझ गया - यहाँ कई "नाग" बैठे हैं - जो पल भर मे इनके "पत्रकार" जीवन को <span class="">डस - सदा के लिए सुला देंगे ! "कमाल खान को सिर्फ़ उर्दू ही नही आती है - यह संस्कृत के श्लोक भी धारा प्रवाह बोलते हैं ! यह किसी पर दुराग्रह से प्रभावित कोई हमला नही करते हैं - पर अपने "कॉम" की सुंदर तस्वीर देने से जिझाकते भी नही हैं ! </span></span></div><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify"><span class="">" कमाल , तुझे मेरा सलाम " ! </span></div><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify"><span class="">इलेक्ट्रोनिक मीडिया इतनी गंदी और गुटबाजी की शिकार हो गयी है की कहना मुश्किल है की किसका चेहरा बेदाग है ! "पुण्य प्रसून" जैसे वक्ता को भी नही बख्शा जाता है ! कुछ लोग पत्रकारिता को बाप-दादा की जमींदारी समझ लिए हैं - जमींदारी छीन जाने के डर ने इनको आक्रामक बना दिया है - इनके आक्रमण के शिकार कई भले मानुष हो जाते हैं - वह बेचारे कुछ बोल नही पाते हैं - पिछले साल इलेक्ट्रोनिक मीडिया मी कई "चाल" चले गए - शायद आप सभी को पता ही होगा ! </span></div><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify"><span class="">कभी कभी यह पत्रकार वर्ग ख़ुद को इतना मजबूत पता है की सता को गिराने का ठेका भी ले लेते हैं ! पिछले साल पटना के एक बाहुबली विधायक पर हमला और फ़िर उसकी पोल खोल ने जग जाहिर कर दिया की - दिल्ली के न्यूज़ रूम से लेकर पटना के कैमरा मन तक सभी के सभी इस गंदी राजनीती के हिस्सा थे ! अब ये उस प्रकरण पर कुछ भी नही बोलते ! </span></div><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify"><span class="">एक अजीब सा वातावरण बना दिया जता है - पिछले साल राम नाथ गोएंका अवार्ड के असली विजेता और सही रूप मी पत्रकारिता का काम कर रहे लोगों की चर्चा किसी ने नही की - बल्की क्षेत्रिये पुरस्कार के विजेता को कंधे पर बैठा लिया गया - क्योंकी यह पत्रकार - दिल्ली मे बैठा अपने जाती के पत्रकारों का "अर्जुन" है ! </span></div><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify">इस अर्जुन- द्रोणाचार्य के गठजोड़ मे कई एकलव्य बरबाद कर दिए गए और किए जा रहे हैं ! यह अंतहीन "तमाशा" कब तक चलेगा - पता नही ! - </div><span class=""></span><br />रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडाMUKHIYA JEEhttp://www.blogger.com/profile/03013961954702865267noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-13352922945062267542008-04-03T11:52:00.003+05:302008-04-03T13:09:05.149+05:30रवीश का जात पात पर दुराग्रह<span class=""><span style="font-family:courier new;">श्री रवीश कुमार बिहार से आते हैं और दिल्ली मे प्रणव रे के यहाँ नौकरी करते हैं - पेशा है - लच्छेदार भाषा मे किसी भी रेओप्र्ट को पेश करना - मैं उनके इस लच्छेदार भाषा का एक प्रशंशक रह चुका हूँ - पर मुह बहुत कड़वा हुआ जब वह लगातार एक खास जाति को निशाना बनते हुए - कई लेख और रिपोर्टिंग कर चुके हैं - लीजिए - उनका एक और आतंकित करता हुआ - <a href="http://naisadak.blogspot.com/">लेख</a> -</span> </span><br /><span class=""></span><br /><div align="justify"><span class="">रवीश , पूरे "बहस" को सच्चाई के साथ नही करना चाहते हैं - दवा के व्यापर मे अधिकतर विदेश की कम्पनी हैं - भारत की प्रथम दस दवा कम्पनी मे २ या ३ "बिहारी" लोगों की है - फ़िर इसको "बिहार गौरव" के रूप मे न देख - ख़ास जाती से जोड़ कर देखना "पूर्व-ग्रह" नही है तो क्या है ? 1980 मे INFOSYS की शुरुआत हुई तो उसके सभी ६ निदेशक "ब्राह्मण" जति के थे - जिनको अमेरिका मे बसे और स्थापित उच्च पदों पर आसीन "ब्रह्मण - वर्ग" का आशीर्वाद प्राप्त था - लेकिन मुझे आज INFOSYS पर गर्व है - शायद सभी भारतीयों को गर्व होना चाहिए ! पर अमरीका मे बैठे - कोई Infosys को जात पात की नज़र से देखे तो - उसको "पूर्वाग्रह" ही कहा जाएगा ! कुछ ऐसा ही आप कर रहे हैं - बिहार के सबसे बड़े ज़मींदार घराना - "दरभंगा राज " ( जिनकी हैशियत भारत के कई राज घराने से भी ज्यादा थी ) ने पत्रकारिता मे कदम रखते हुए - "आर्याव्रत" और "The Indian Nation " को चालू किया ! जग जाहिर है और होना भी चाहिए - अब "दरभंगा महाराज " ने लगभग सभी पदों पर मैथिल ब्राह्मण को बैठा कर कोई पाप नही किया - यह उनका "राज धर्मं" था ! अधिकतर "मैथिल ब्रह्मण" विद्वान् थे - अब इन विद्वानों को "राजा" शुशोभित नही करेगा तो कौन करेगा ? क्या गुनाह किया "दरभंगा-राज" ने ? </span></div><div align="justify"><span class=""></span></div><div align="justify">ठीक उसी तरह " फनीश्मुर्ति " को नारायणमूर्ति ने सबसे ज्यादा तनखाह देकर कोई गलते नही की थी ! आज "फनेश्मुर्ति" की खुद की एक कम्पनी है और लोग कहते हैं की - कोम्पनी खोलने का "धन" नारायणमूर्ति ने ही दिया ! </div><div align="justify"><blockquote><p>मुझे इसमे कुछ ग़लत नज़र नही आ रहा है - "आर्याव्रत" और "The Indian Nation" की देन है की बिहार के पत्रकारिता मे मैथिल ब्राहमणों का बोल बाला रहा - होना भी चाहिए ! अब इनकी अगली पीढी भी "पत्रकारिता" को पेशा की तौर पर स्वीकार कर ली - कौन गुनाह हो गया ? इसकी चर्चा कभी किसी ने नही की - क्योंकी यह एक स्वाभविक प्रक्रिया है ! </p><p><span class=""></span>यह देखा गया है और बोला भी गया है की - "टाटा" समूह मे टाटा से संबंधित ही कोई न कोई बड़ा अधिकारी बनता है - क्या गुनाह हो गया ? पूर्व प्रधानमंत्री वाजपयी और ब्रजेश मिश्रा के संबंधों को दो विद्वानों का दोस्ती न कह - जाति के नज़र से देखना - "दुराग्रह" नही होगा तो क्या होगा ? </p><p>लालू के ज़माने मे उनके एक "राजगुरु" होते थे जो ठीक लालू -राबड़ी के राज दरबार के बगल मे रहते थे - "राजगुरु" के यहाँ सुबह मे दरबार लगता था - जहाँ लालू भी होते थे और पूरे राज्य की दिशा तय होती थी - और कैसे एक ख़ास जात को मटिया मेट कर देना है - है ? या फ़िर फलाना - फलना जाति के अधिकारी को किस तरह तबाह करना है इत्यादी इत्यादी - पर यह समाचार मे कभी नही आया - क्या यह मान लेना चाहिए की लालू के राजगुरु को उनके क्षेत्र और जाति से निकले नौजवान "पत्रकार" लोगों का वरदान मिला था ? </p><p>लालू - राबडी के १५ साल के दौर मे एक ख़ास जाति को ही निशाना बना लिया गया - राजगुरु की मौत हुई - और लालू-राबडी का बिहार से पलायन - उस वक्त सभी लोगों ने मान लिया था की - उस ख़ास जाति का बिहार से खात्मा हो चुका है - पर नीतिश के आने से मृत घोषित उस खास जाति के कुछ अच्छे लोगों को शुशोभित किया गया - अब हमारे पत्रकारों को वह भी बर्दास्त नही हुआ - नतीजा यह हुआ की - "नीतिश राज " मे भी शांती पूर्वक राज्य प्रयोजीत हिंसा हुई - जिसका सब से बड़ा उदाहरण "पटना जिला " है ! पर कभी किसी पत्रकार ने इसको उजागर नही किया - उलटा "सुपर ३० " जैसे संस्थान को बाँध करवाने का पुरजोर कोशिश हुई ! </p><p><span class="">पत्रकारों द्वारा जातिगत हमला - यह कोई नया नही है - ६० और ७० के दसक मे बिहार के कई हस्ती वाले पत्रकार यह काम कर चुके हैं - नतीजा यह निकलता है की आप जिस कॉम / जाति पर "दुराग्रह" से प्रभावित हमला करते हैं - वह और मजबूत हो कर निकलता है ! </p><blockquote><span class=""></span></blockquote><blockquote>फ़िर से लौटें - रवीश कुमार के "दुराग्रह" पर - कोई दवा कम्पनी जात पात की बदौलत भारत की प्रथम दस कम्पनी मे कैसे शामिल हो सकती है - वह भी तब जब उसकी जाति अल्पसंख्यक हो ? कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक क्या सिर्फ़ और सिर्फ़ "जात" के नाम पर ही दवा बिकती है ? अगर दवा विश्व स्तर का हो और अमेरिकी कम्पनी से लोहा ले रहा हो फ़िर उक्त दवा कम्पनी पर जात पात का मोहर लगाना "दुराग्रह" नही तो क्या है ? </blockquote></span></blockquote></div><div align="justify"><span class="">जब राष्ट्रिये स्तर का भी पत्रकार किसी जाति को अपना "निशाना" बना ले फ़िर उस जाति का मालिक भगवान् ही है - कलम को ये के - ४७ बनाना बहुत दुःख का बात है ! कोई बड़ा टैब ही है जब वह "देस और काल" की सीमा को लाँघ अपनी पहचान बनाये ! पर , ऐसे पत्रकार अवसरवादिता के उदाहरण ज्यादा और प्रतिभा के कम नज़र आते हैं ! </span></div><div align="justify"><span class=""></span></div><span class=""></span><br />रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडाMUKHIYA JEEhttp://www.blogger.com/profile/03013961954702865267noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-32254743614026306352008-03-26T11:39:00.002+05:302008-03-26T12:14:50.476+05:30मार्च का महीना और बहुत कुछ ! भाग - १<div align="justify"><span class=""> मार्च का महीना "गजब" का महीना होता है ! मुझे लगता है यह महीना बाकी सभी महीनों मे सबसे महताव्पूर्ण होता है ! बिहार और देश भर मे इस महीना मे "मैट्रिक" का परीक्षा होता है ! बिहारी लोग इस परीक्षा को एक "पर्व" की तरह मानते हैं ! घर मे जो परीक्षार्थी होता है - उसको वरती के रूप मे मान लिया जाता है ! एक जमाना था जब पूरे गाँव के हर घर से एक दू वरती होता था ! माँ और बेटी दोनों एक साथ परीक्षा देते हुए देखा गया है ! एक साल पहले से "वरती या परीक्षार्थी" को लोग टोकना शुरू कर देते हैं - " तब , इस बार है , नु " ! मामा - मामी , चाची- चाचा , फुआ - फूफा - बड़ा भाई - छोटा भाई - घर परिवार , आस पड़ोस , पट्टीदार - गोतिया , सभी के सभी आपको ध्यान मे लाते हैं - कभी कभी थोडा बहुत पढे लिखे नौकर भी टोक दिया करते हैं ! </span></div><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify"><span class="">मैट्रिक का परीक्षा अपने आप मे एक "प्रोजेक्ट होता है ! कहीं कहीं यह देखा गया है की - जिस शिक्षक से बाप ने पढ़ा - बेटा का मार्ग-दर्शन भी वही शिक्षक करते हैं ! प्रे बोर्ड के बाद - गेस पेपर खरीदना से लेकर - चिट पुर्जा के तकनीक - यह सभी " परीक्षार्थी" की कुशल प्रबंधन और स्टेटस को बताते हैं ! घर परिवार मी कुछ लोग कुशल मैट्रिक परीक्षा प्रबंधक होते हैं - उन लोगों विशेष रूप से बुलाया जाता है ! जहाँ परीक्षा केन्द्र बना हैवहाँ कोई चित परिचित खोजा जाता है - कभी कभार या अधिकतर जगहों पर देखा गया है की परीक्षा केन्द्र के "चपरासी" जितना काम कर जाते हैं - उतना बड़ा से बड़ा अधिकारी भी नही ! परीक्षा केन्द्र पर एक अलग नजारा होता है - बिल्कुल मेला की तरह - होम <span class="">गार्ड के जवानों के पास साल भर मी कमाने का पहला और अन्तिम मौका होता है ! परीक्षा ख़त्म होते ही वही "चपरासी" बताता है की कॉपी कहाँ कहाँ गयी है ! फ़िर शुरू होता है - जांच केन्द्रों मी अपने आदमीओं की खोज ! </span></span></div><div align="justify"><span class="">आने वालों सालों मे यह एक मील का पत्थर होता है - लोग बात चिट मे कहते हैं - फलाना के बेटा के मैट्रिक के परीक्षा मे मेरा "छाता " खो गया टू कोई कहता है की होम गार्ड के डंडा से मेरा कुर्ता फट गया ! </span></div><div align="justify"><span class="">वक्त बदल गया - आज २१ साल हो गए मुझे मैट्रिक पास किए हुए - सब कुछ आंखों के गुजर रहा है - जैसे कल की ही बात है ! </span></div><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify"><span class="">खैर ...... क्रमशः </span></div><div align="justify"><span class=""></span> </div><div align="justify"><span class=""></span> </div>रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडाMUKHIYA JEEhttp://www.blogger.com/profile/03013961954702865267noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-46582252980597587152008-03-25T10:29:00.003+05:302008-03-26T11:39:19.359+05:30वेतन आयोग !<div align="justify"><span class="">बाबु जी को ५०० मिलाता था ! एकदम मस्त जिंदगी था ! रिक्शा अपना सवारी था ! सप्ताह मे २ दिन आलू दम और दू दिन मीट - भात भी बन जाता था ! शाम को हम लोग खेल कूद भी कर लेते थे ! सैकील से स्कूल भी चले जाते थे ! मौका मिला त बाबु जी के "लेम्ब्रेटा" पर लटक भी जाते थे ! साल मे दू बार कपडा - लत्ता भी खरीदा जाता था ! पाकिट मे चार आना और गप्प हांकते स्कूल पहुँच जाते थे ! जो दोस्त यार सैकील या स्कूटर रखता था - वह अपना समाज से अलग हो जाता था ! लंच मे चार अन्ना मे आलू चौप वाला चाट खा कर जो आनंद मिलाता था वह शायद डोमिनो पिज्जा मे नही मिलाता है ! होली मे पटना के सब्जी बागः से रु ३५/- वाला कुरता मे जो मजा था वह मॉल से खरीदा हुआ दीजैनदार कुरता मे नही है ! </span></div><div align="justify"><span class=""></span></div><div align="justify"><span class="">सब कुछ , जी हाँ , सब कुछ बाबु जी के ५०० मे ही हो जाता था - वह भी मजे से ! अब त कुत्ता बिल्ली , गदहा - बैल सबको कई हज़ार मे वेतन मिलता है - फ़िर भी सब बेचैन है ! ई , आला दर्जा का "सरकारी बाबु " सब का माथा ख़राब हो जाएगा - इतना तनखाह मिलने के बाद - क्या ये लोग "घूस" कमाना बंद कर देगा ? हमको टू नही लगता है :( !</span></div><div align="justify"><span class=""></span></div><div align="justify"><span class="">साला समाज भी अजीब है - अगर आप "सरकरी बाबु " है और घूस के पैसा से पटना के पाटलिपुत्र मे एक कित्ता माकन नही है या फ़िर दिल्ली - नॉएडा मे २-३ थो फ्लैट नही है टू "समाज" से इज्जत की बात छोडिये - आपके बेटा - बेटी का बियाह होना मुश्किल हो जाएगा ! "बाबु" का मतलब ही लोग समझता है की - झाड़ के पैसा ! </span></div><div align="justify"><span class="">फ़िर दोषी कौन हुआ ? समाज जो आप पर दबाब बनाता है ! सरकारी नौकरी नही लगा त - प्राइवेट मी नौकरी कर ली - और प्राइवेट मी भी नही टीक पाये त बिजिनेस - अब बिजिनेस वाले को दोनों हाथ लूटते देख बेचारा सरकारी वाला क्या करेगा ?</span></div><div align="justify"><span class=""></span></div><div align="justify"><span class="">अब त खबरिया वालों को भी भरपूर पैसा मिलने लगा है - अधिकतर टू वही लोग है - जो पटना - भोपाल- बनारस से दिल्ली आए थे कलक्टर बनने के लिए और सरकारी मी चपरासी भी नही बन पाये - हिन्दी - अंग्रेज़ी थोड़े अछ्छी थी सो "पत्रकार" बन गए - अब हज़ार की कौन पूछे - लाख मी पैसा कमा रहे हैं - </span></div><div align="justify"><span class=""></span></div><div align="justify"><span class="">कहने का मतलब जब समाज का बौधिक रूप से कमज़ोर तबका भी लाख - करोड़ का बात कर रहा है टू सरकारी कर्मचारी को कुछ मिल ही गया टू इतना हंगामा क्यों ? </span></div><div align="justify"> </div><div align="justify">वैसे त आप लोग मुंशी प्रेमचंद की कहानी "नमक का दरोगा" टू पढ़ा ही होगा ! :) </div><div align="justify"><span class=""></span></div>रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडाMUKHIYA JEEhttp://www.blogger.com/profile/03013961954702865267noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-38534802895974316592008-03-15T10:28:00.002+05:302008-03-15T10:37:48.134+05:30झारखण्ड फ़िर एक बार और बिकेगा !<span class=""> कई साल पहले मई एक सरस्वती के आराध्य के घर गया पर आश्चार्य हुआ की उनके यहाँ "लक्ष्मी" की फोटो लगी थी - पूछने पर बताया गया की - सभी "रास्ते" यहीं आते हैं ! यह बात आज तक मेरे मानस पटल पर अंकित है लेकिन दिल मनाने को तैयार नही है ! पर कब , तक ? </span><br /><span class=""></span><br /><span class="">राज्यसभा चुनाव आते ही फ़िर से एक बार - वनवासियों का प्रदेश "झारखण्ड" बिकने को तैयार है ! मुकेश अम्बानी के दूत श्री परिमल नाथ्वानी जी निर्दालिये उम्मीदवार के रूप मे राज्य सभा के लिए तैयार है ! जीत स्वाभाविक है ! पर कई साल जमीन के धूल चाटने वाले राजनीतिक उम्मीदवारों का क्या होगा ? </span><br /><span class=""></span><br /><div align="justify"><span class="">पैसा मे बहुत दम है - यह मेरा ८ वर्षीय बेटा भी जानने लगा है ! शायद उसे एक शिक्षक पुत्र होने और महानगर की संसकृति की दबाब ने बहुत कम उमर मे "काफी परिपक्वा" बना दिया है ! उसे पता है - उसके पिता क्या खरीद सकते हैं और क्या नही - शायद यही "आभाव" उसके उज्जवल भविष्य को इंगित करता है ! </span></div><span class=""></span><br /><span class=""></span><br />रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडाMUKHIYA JEEhttp://www.blogger.com/profile/03013961954702865267noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-19895456120221278502008-03-11T15:30:00.011+05:302008-03-11T16:18:43.669+05:30होली आ रहा है - भाग १<div align="justify"><a href="http://bp0.blogger.com/_fabeCWoNzTg/R9ZbzYPrrRI/AAAAAAAAAVE/D9iniLyIdCk/s1600-h/holi.gif"></a> पेट भरुआ बिहारी लोग अगला सप्ताह से घर जाने का तैयारी कर रहा होगा ! लालू जी के ट्रेन से गाँव जाएगा ! इस मौसम मे ट्रेन मे सीट मिलाना किसी सौभाग्य से कम नही है ! सुना है नीतिश जी 'चका चक' बिहार बना रहे हैं ! तब तो जाना और जरुरी है ! देखेंगे - कुछ 'जुगाड़' होगा त वहीं रूक जायेंगे ! अब , ई रोज रोज का राज ठाकरे का गाली और तेजेंद्र खन्ना का लाठी कौन सहेगा ! हम त "पुण्य प्रसून " भैया को भी यही बोले थे ! कहाँ यहाँ २ का ४ के चक्कर मे फँसे हुए हैं ! "होली" के बहाने से चुपके से बिहार सरक लीजिए ! "पटना दरबार" मे गुन गान कीजियेगा - कुछ न कुछ जरूर ही मिल जाएगा - नही मिलेगा त मोतिहारी वाला दरबार चले जाईयेगा ! </div><div align="justify"> </div><div align="justify">मेरे जैसा पेट भरुआ लोग शायद नही जाए ! किसी के बेटा का "एक्साम" है तो किसी की बीबी का ! किसी को छुट्टी नही मिल रहा है तो किसी को टिकट ! वैसे नया नया जो दिल्ली आया है - वह तो ट्रेन मे लटक के ही जाएगा - जब तक वह लटक के नही जाएगा - उसको लगेगा ही नही की वह दिल्ली कमाने के लिए आया है - भाई , कुछ पसीना बहना चाहिए न ! </div><div align="justify"> </div><div align="justify">मेरे जैसा खबरिया चैनल देखने वाला - कौन कैसे "होली" मनाया मे बिजी रहेगा ! आडवाणी जी बाबा के यहाँ गए या यशवंत सिन्हा रवि शंकर प्रसाद के यहाँ ! कुछ लोग सुबह से ही तुन रहेगा ! एक दिन पहले से ही बिना नाम वाला मैसेज आने लगेगा - अप खुश होंगे फ़िर तबाह हो जायेंगे ! जिसको आप भेजेंगे वह आपको नही भेजेगा - कोई और जिसका नाम आपके फोन मे नही है ! तरह तरह का मैसेज आवेगा ! "होली" के दिन ऐसा आदमी के यहाँ जन पड़ता है जिसके घर आप दुबारा नही जायेंगे ! क्योंकि सब लोग तो