<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851</id><updated>2012-02-01T12:14:47.780+05:30</updated><category term='दक्षिण भारतीय'/><category term='देश द्रोही'/><category term='अपना देस'/><category term='यादें'/><category term='बकवास'/><category term='बाढ़'/><category term='भारी बकवास'/><category term='दिनकर'/><category term='आईएस'/><category term='रिटेल बूम'/><category term='काबिल अफसर'/><category term='श्रद्घांजलि'/><category term='खास पत्रकार'/><category term='अपने लोग'/><category term='देश प्रेम'/><category term='साहस'/><category term='चर्चा'/><category term='पड़ोस'/><category term='कुंठित पत्रकार'/><category term='लोक गीत'/><category term='दिल से'/><category term='संस्कृति'/><category term='ईमानदार'/><category term='मा'/><category term='बतकही'/><category term='हमारे सांसद'/><category term='बाहुबली और राजनेता'/><category term='सिनेमा'/><category term='सलाम इंडिया'/><category term='पैसा - पैसा'/><category term='केरल'/><category term='बिहार'/><category term='चुनाव'/><title type='text'>दालान</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>174</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-895874952039056151</id><published>2012-01-23T11:13:00.000+05:30</published><updated>2012-01-23T11:13:33.842+05:30</updated><title type='text'>दलाली कहाँ नहीं है - पार्ट वन</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दलाली कहाँ नहीं है ! किस धंधा - पेशा में नहीं है ! समाज ने इसको स्वीकार किया है ! हाँ , इस् दलाली में इतने जल्द पैसे बनते हैं - वो भी बहुत कम मेहनत में - जिसके कारण इसको इज्जत नहीं मिल पाती है ! चलिए ...कुछ कहानी सुनाता हूँ - आराम से पढियेगा - बिना किसी द्वेष के - मैंने भी दलाली दिया और कमाया है - सभी किस्से यहाँ मिलेंगे - :)&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दस साल पहले नोयडा आये थे - कुछ दिन बैचेलर दोस्तों के साथ रहते हुए - नौकरी करते हुए - किराया का मकान खोजने लगा - कॉलेज के आस पास ही ! एक दोस्त है - उनदिनो वो एक पब्लिक सेक्टर कंपनी में थी - कदमकुआं का खांटी पटनहिया ! कॉलेज में मेरा रूम पार्टनर भी होता था - उसका अपना फ़्लैट नॉएडा में था &amp;nbsp;- कार थी - पत्नी भी इंजिनियर ! सुखी संपन्न छोटा परिवार ! एक शाम उसके घर पहुंचे - बोले , भाई मेरे ..एक किराया का फ़्लैट खोज दो - अपने मोहल्ले में ही ! झल्ला गया - बोला , एक तुम ..ऊपर से भूमिहार ! हम रिस्क नहीं ले सकते .कब कहाँ 'मार्' करवा दोगे कोई ठीक नहीं - उसकी बातें सुन मुझे बहुत गुस्सा आया - पर् वो सही था ! फिर एक दूसरा दोस्त - बोला , काहे घबराता है - 'ब्रोकरेज दोगे ? तो एक चीफ इंजिनियर है - वो फ़्लैट के किराया का काम करते हैं - फलाना नंबर फ़्लैट में रहते हैं ! अंधा को और क्या चाहिए - मै भागा - भागा उस चीफ इंजिनियर के पास गया - उन्होंने मुझे एक फ़्लैट चार हज़ार &amp;nbsp;रुपैया महीना किराया पर् दिलवा दिया - रेंट अग्रीमेंट भी बनवा दिए - मै खुश था - अंत में उन्होंने मुझसे दो हज़ार रुपैये लिये ! मै हैरान और परेशान था ! चीफ इंजिनियर और किराया का काम और दलाली ! मैने तो पटना - कंकरबाग में कई चीफ इंजिनियर के मकान और गाड़ी देखे थे ! एक दोस्त जो उम्र में थोडा बड़ा था - बोला - नेता , पब्लिक सेक्टर का चीफ इंजिनियर है - बिहार सरकार का नहीं - और अगर वह ये सब नहीं करेगा तो ...फिर वो चुप हो गया ..मै समझ गया ! पर् मै आज तक उस चीफ इंजिनियर को शुक्रिया अदा करता हूँ !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;नॉएडा आने के पहले - पटना - कंकरबाग में खुद का एक छोटा कंप्यूटर सेंटर होता था - जिसको मेरी पत्नी 'पान के दूकान' से ज्यादा दर्जा नहीं देती थी :( खैर ...शुरुआत तो मैंने सॉफ्टवेयर डेवेलोपमेंट से की थी - पर् बाद में वो इंस्टीच्युट बन् गया ! इग्नू के विद्यार्थी आते थे ! एक दिन जान पहचान एक हम उम्र लडकी का फोन आया - हमारे बैच की सर्वोत्तम और भारत के सबसे बेहतरीन संस्था से इंजिनियर फिर एमबीए ! फोन की - आर् आर् , क्या कर रहे हो ? बड़ी मुद्दत बाद बात हो रही थी - हम बोले - क्या करेंगे - 'पान का दूकान' चला रहे हैं - वो हंसने लगी - बोली - मुझे अमरीका जाना है - 'जावा' सिखा दो - हम पूछे कब जा रही हो ? बोली - देखो ...एक ब्रोकर से बात चल रही है ! 'ब्रोकर' सुन मेरा कान खडा हुआ ...माथा धर लिये ...देश के बेहतरीन संस्था से पढ़ कर अमरीका में नौकरी के लिये - ब्रोकर ? :( फिर वो समझाई - आई आई टी के बूढ़े - बूढ़े अलुम्नी आज कल यही काम कर रहे हैं - इसको 'बौडी शौपिंग' कहा जाता है ! फिर मैंने उसको पटना के एक बढ़िया कंप्यूटर इन्स्टिच्युट का पता बता दिया - बात शायद 1999 की है ! वो अमरीका गयी - और विश्व के बेहतरीन स्कूल से एमबीए की दूसरी डिग्री भी ली ! पर् ..अमरीका जाने के लिये उसको 'बौडी शॉपर' (( बुढा आई आई टी अलुम्नी ) का ही सहारा लेना पड़ा था !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;नॉएडा में फ़्लैट लेने के एक महीना बाद मैंने परिवार को बुला लिया - जिस दिन मेरा परिवार नई दिल्ली स्टेशन पर् आया - सभी दोस्त वहाँ पहुंचे हुए थे - कॉलेज के दिनों में दोस्त' प्यार से मुझे 'नेता' कहते थे - &amp;nbsp;ठसक भी वही थी ! मैंने सभी फर्नीचर एक दिन में ही खरीद लिया ! पर् 'सोफा' पर् पत्नी से सहमती नहीं बन् &amp;nbsp;पाने के कारण - गुस्सा में प्लास्टिक की चार कुर्सीयां मैंने खरीद ली ! कुछ दिन बाद - मूड ठीक हुआ तो नॉएडा से ही एक ख़ूबसूरत सोफा खरीदा ! सर मुडाते - ओले पड़े ! सोफा खरीदने के कुछ दिन ही बाद - ससुराल से कुछ लोग आये - खांटी पटनहिया - सोफा पर् लेट कर ही 'टीवी' देखेंगे ! सोफा और सेंटर टेबल पर् ही खाना खायेंगे ! गेस्ट लोग चले गए ! एक दिन देखा तो - सोफा 'हिल' चूका था ! बहुत दुःख हुआ ! बजाज चेतक पर् सपरिवार दुकानदार के पास गए - क्या कहूँ ..गिडगिडा रहे थे ..पर् वो दुकानदार कुछ भी सुनने को तैयार नहीं ! मात्र एक महीना में सोफा 'हिल' गया था ! बहुत कष्ट से पैसा जमा किये थे फिर सोफा &amp;nbsp;ख़रीदे थे ! मुह लटका के घर वापस हो गए ! बिहारी होने पर् बहुत गुस्सा आ रहा था - क्या मजाल की पटना के नाला रोड वाला कोई दुकानदार ऐसा कर पाता - पूरा सैदपुर होस्टल मेरे पीछे खडा होता ! फिर थोडा गुस्सा ससुराल वाले गेस्ट लोगों पर् भी आ रहा था - पत्नी के सामने खखर कर बोंल तो पाता नहीं हूँ - शिकायत तो बहुत दूर की बात है ! इसी बीच ..पत्नी ने कहा ...रुकिए ..'झब्बू चाचा' को फोन करती हूँ ! हम बोले - ई 'झब्बू चाचा' कौन हैं ? पत्नी बोली ..चाचा लगते हैं ..क्या काम करते हैं ..पता नहीं पर् ..पर् बहुत बड़ा - बड़ा गाड़ी से घुमते हैं ! झब्बू चाचा को फोन लगाया गया - झब्बू चाचा बोले - दोदिन बाद 'सोफा दुकानदार खुद फोन करेगा - मेहमान , आप घबराईये मत ! सच में ऐसा ही हुआ ..दो दिन बाद सोफा दुकानदार खुद फोन किया !इस् बार हम लोग फिर से बजाज स्कूटर पर् सवार - पर् बहुत ही कनफिडेंस के साथ - सोफा दूकान गए ! अपने बजट में जो सबसे बढ़िया सोफा था - उससे अपना पुराना सोफा बदले ! पर् ..मै हैरान था ...'झब्बू चाचा' कौन हैं ? हिम्मत कर के खुद ही फोन लगाया ...प्रणाम और थैंक्स बोला ..वो उधर से बोले ..मेहमान ..ई हमलोग का कर्तव्य है ..जब तक दिल्ली में हूँ ..आप निश्चिन्त रहिए ! बड़ी हिम्मत कर के मैंने उनसे पूछा - आप करते क्या है ? वो बोले - कुछ खास नहीं - 'आई आर् एस ' अफसर लोग के साथ उठना - बैठना है ..बस - इनकम टैक्स - सेन्ट्रल टैक्स कमिश्नर लोगों के साथ - आगे का कहानी मै समझ गया ! एक दो बार झब्बू चाचा से मुलाकात हुई - एक दिन टीवी में उनको शरद यादव के बगल में खडा देखा - मैंने सोचा - झब्बू चाचा का प्रोमोशन हो गया है ! खैर ..वो जब भी मिलते हैं ..मै उनको &amp;nbsp; पैर छू कर ही प्रणाम करता हूँ !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ये तीनो कहानी सच है ...उम्र के साथ मेमोरी कमज़ोर होने लगी है ...कैसी लगी ..बताएँगे ....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हाँ , दिल्ली और आस-पास के आधे लोग दलाली करते हैं और आधे झूठ बोलते हैं ;)&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;क्रमशः ...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-895874952039056151?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/895874952039056151/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=895874952039056151' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/895874952039056151'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/895874952039056151'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='दलाली कहाँ नहीं है - पार्ट वन'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-1341917911661676330</id><published>2011-12-02T10:41:00.000+05:30</published><updated>2011-12-02T10:41:43.483+05:30</updated><title type='text'>मेरा गाँव - मेरा देस् - पत्र पत्रिका</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; text-align: justify;"&gt;मैंने शायद पहले भी लिखा है &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; text-align: justify;"&gt; रांची के डोरंडा मोहल्ले के &lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="text-align: justify;"&gt;‘&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; text-align: justify;"&gt;नेपाल हॉउस&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="text-align: justify;"&gt;’&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; text-align: justify;"&gt; में नाना जी रहते थे और करीब पांच बजे दिल्ली वाला &lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="text-align: justify;"&gt;‘&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; text-align: justify;"&gt;टाईम्स ऑफ इंडिया&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="text-align: justify;"&gt;’&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; text-align: justify;"&gt; आता था ! बरामदे में अखबार वाला अखबार को &lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="text-align: justify;"&gt;‘&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; text-align: justify;"&gt;सुतरी&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="text-align: justify;"&gt;’&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; text-align: justify;"&gt; से बाँध फेंक जाता था ! मै अखबार की तरफ दौड पड़ता ! आर् के लक्ष्मण के कार्टून को देखने के लिये ! अखबार से जुडी यह मेरी पहली याद है !&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;रांची प्रवास के दौरान ही &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; मौसी की पहली पोस्टिंग &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;इटकी&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; ( रांची के पास ) हुई थी ! एक ट्रक नुमा बस फिरायालाल से खुलती थी ! दो &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; तीन दिन इटकी में रहा फिर मौसी के साथ वापस ! वहीँ &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;फिरायालाल&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; के पास लौटते वक्त मौसी मेरे लिये &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;पराग&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; और &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;पौप्पिंस&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; खरीद देती थीं ! &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;पराग&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; मेरे उम्र के लिये नहीं था &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; मुझसे बड़े बच्चों के लिये था पर् पराग पढ़ने के बाद कुछ और पसंद नहीं आया ! चम्पक और चंदा मामा कभी नहीं पढ़ा ! और फिर पराग से सीधे &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;कादम्बिनी&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Wingdings; mso-ascii-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-char-type: symbol; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-symbol-font-family: Wingdings;"&gt;J&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; ! फिर नंदन ! फिर अमर चित्र कथा ! पागलों की तरह पढता था ! धर्मयुग ! पत्र &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; पत्रिका के चलते बहुत बचपन में ही बहुत कुछ बहुत जल्द समझ में आया गया जिसके कारण जीवन में बहुत चमकीली चीज़ें बहुत फीकी लगती थी ! खैर ..&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;मुजफ्फरपुर लौटा ! यहाँ दर्शन हुए आर्याव्रत और इन्डियन नेशन से ! बड़े बाबा मिजाज़ से बहुत रईस थे &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; ढेर सारे अखबार वो खरीदते थे &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; जाड़े के दिन में पूरा मोहल्ला दरवाजे पर् आ जाता था &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; अखबार पढ़ने के लिये &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; बदले में उनलोगों को बड़े बाबा का &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;गप्प&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; सुनना पड़ता था ! बड़ी दादी रोज अखबार वाले को धमकी देती थीं ! सर्च लाईट &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; प्रदीप ! &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;पिता जी जब पीजी में एडमिशन लिये तब हम सपरिवार मुजफ्फरपुर में ही दूसरे जगह शिफ्ट कर गए ! यहीं मुझे अमर चित्र कथा पढ़ने का मौका मिला ! इंद्रजाल कॉमिक्स &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; वेताल &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; बहादुर &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; फैंटम ! अमर चित्र कथा के माध्यम से ही मैंने भारत वर्ष को जाना ! फिर अचानक से &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;स्माल पॉकेट बुक्स&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; में &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;राजन इकबाल&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; सीरीज ! पागल की तरह ! एक अटैची भर गया &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; राजन &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; इकबाल से ! दोस्तों से एकदम सिनेमा माफिक सीधे &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;अटैची&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; का आदान &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; प्रदान ! एक दो साल खूब पढ़ा ! एक रविवार बाबु जी के पॉकेट से &amp;nbsp;मैंने पचास रुपैये भी चुराए &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;किंग कॉंग&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; खरीदने के लिये ! दो चटकन में मुह से सब चोरी निकल गया ! &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Wingdings; mso-ascii-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-char-type: symbol; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-symbol-font-family: Wingdings;"&gt;L&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; नंदन में राजा &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; राजकुमार की कहानी &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Wingdings; mso-ascii-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-char-type: symbol; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-symbol-font-family: Wingdings;"&gt;J&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;पिता जी का पीजी समाप्त हुआ और वो अचानक से सभी अखबार और पत्र &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; पत्रिकाएं खरीदने लगे ! देर शाम वो अपने लम्ब्रेटा के बास्केट में सभी अखबार और पत्र पत्रिकाएं ले आते थे ! मै किसी और को छूने नहीं देता ! &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;सारिका&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; से परिचय वहीँ हुआ ! इलस्ट्रेटेड वीकली , धर्मयुग , साप्ताहिक हिंदुस्तान ! तीनो काफी लंबे &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; चौड़े मैग्जीन होते थे ! करीब एक दो साल जम के &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;सारिका&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; पढ़ा ! हिन्दी साहित्य की समझ और समाज से परिचय हुआ ! तब तक मै हाई स्कूल भी नहीं गया था ! जितनी कम उम्र में जितना पढ़ा और समझ में आया &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; एक आश्चर्य है &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; मेरी हिन्दी उतनी ही कमज़ोर है &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Wingdings; mso-ascii-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-char-type: symbol; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-symbol-font-family: Wingdings;"&gt;L&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;भारत क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीता ! डा० नरोत्तम पूरी की &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;खेल भारती&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; से परिचय हुआ और और खेल भारती को तब तक पढ़ा &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; जब तक वो छपता रहा ! इसी टाईम में टीनएजर के लिये &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;सुमन सौरव&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; आया ! मै कभी नहीं पढ़ा &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; एक बार एक नज़र देखा और एक दोस्त के मुह पर् मारा &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; ई सब बउआ लोग के लिये है ! मुझे सारिका पढ़ने दो ! ;) &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;इसी दौरान &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;क्रिकेट सम्राट&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; आ गया ! उसमे किसी खिलाड़ी का पोस्टर होता था ! वो पोस्टर मेरे कमरे में चिपक जाता था ! &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;बाबा राजनीति में थे सो उनके अटैची में &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;माया&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; रखी होती थी ! चुप चाप माया को निकाल दिन भर पढ़ना ! दिनमान और रविवार भी बाबु जी खरीदते थे ! शायद दिनमान में पिता जी के एक सीनियर दोस्त के साले साहब काम करते थे ! &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;खैर , पटना आ गया ! मामा लोग इन्टेलेकचूयल टाइप थे ! इंडिया टूडे और रीडर्स डाईजेस्ट हाथ में लेकर घुमते थे ! इण्डिया टूडे को पीछे से पढ़ना &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Wingdings; mso-ascii-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-char-type: symbol; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-symbol-font-family: Wingdings;"&gt;J&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; तब वो पाक्षिक होती थी ! पटना आने पर् एक खुशी यह हुई की &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; यहाँ सुबह में ही अखबार मिलता था ! स्पोर्ट्स का पेज लेकर गायब &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Wingdings; mso-ascii-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-char-type: symbol; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-symbol-font-family: Wingdings;"&gt;J&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; किसी कोना में मैल्कम मार्शल के बारे में पढ़ रहा हूँ &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Wingdings; mso-ascii-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-char-type: symbol; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-symbol-font-family: Wingdings;"&gt;J&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; &amp;nbsp;क्रिकेट सम्राट चालू रहा ! पुरे कमरे में &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;वेस्ट इंडीज&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; के खिलाड़ी का पोस्टर ! एक बार गाँव से कोई आया &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; वो मेरे कमरे में ही ठहरे &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; एक सुबह सुबह बोले &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;भोरे भोरे ई करिया करिया सब का चेहरा देख &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; जतरा खराब हो जाता है&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; ;) &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;खैर ..पटना में &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;पाटलिपुत्रा टाइम्स&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; आज इत्यादी से परिचय हुआ ! मैट्रीक में रहा हूँगा &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; नव भारत टाईम्स और टाईम्स ऑफ इंडिया &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; पटना पहुँच गयी ! हाँ , आठवीं में ही &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; हर शाम &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; दिल्ली के अखबार मै अपने पॉकेट मनी से खरीदने लगा ! शाम पांच बजे तक &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; कंकडबाग में दिल्ली वाले मोटे &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; मोटे अखबार आने लगे ! &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;हम लोग पटना में किराया पर् थे &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; मकानमालिक के सीढ़ी घर में एक बड़ा ट्रंक होता था &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; हिन्दी साहित्य की सभी मशहूर किताबें ! आठवीं में सब पढ़ गया ! स्कूल से आने के बाद &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; सीढ़ी घर में &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; एक हाथ में अमरुद और एक हाथ में एक उपन्यास ! चुप चाप पढ़ना और फिर जहाँ से किताब निकाला वहीँ रख दिया ! &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;प्लस टू में गया तो रीडर्स डाईजेस्ट ! हर दूसरा अंक में &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; हाउ टू सेभ यूर मैरेज &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; हा हा हा हा ..तब नहीं बुझाता था &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; अब बुझा रहा है ;) &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;कॉलेज में हिंदू से परिचय हुआ ! फिर बंगलौर में नौकरी के दौरान &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; वहाँ से छपने वाली &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; लगभग सभी अंग्रेज़ी अखबार ! इतवार पूरा दिन रूम में बैठ कर अखबार पढ़ना ! बस ! &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;रांची में पीजी के दौरान &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; मेरे कमरे में लगभग सभी अंग्रेज़ी अखबार आते रहे ! इण्डिया टूडे और रीडर्स डाइजेस्ट लगभग पचीस साल से साथ में हैं ! नॉएडा &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; गाज़ियाबाद में दस साल से हूँ ! पुरे मोहल्ले में सबसे ज्यादा अखबार मेरे यहाँ ही आता है ! अब जब सुबह में समय नहीं है तो अखबार को देर रात पढता हूँ ! पेज थ्री नहीं पढता हूँ ! पत्नी पढ़ती हैं &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; कहाँ कहाँ डिस्काउंट लगा है &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; देखने के लिये &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Wingdings; mso-ascii-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-char-type: symbol; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;; mso-symbol-font-family: Wingdings;"&gt;J&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;और क्या लिखूं ..अखबार पढ़िए ! जरुर पढ़िए ! एक बढ़िया चाय और दो तीन अखबार के साथ सुबह हो &lt;/span&gt;–&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt; उसके आगे सब फेल है ! इंटरनेट कुछ ज्यादा समय ले रहा है ! टीवी - टावा कम देखता हूँ - बस न्यूज चैनल !&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;विश्वविद्यालय की सेमेस्टर एग्जाम शुरू हो चुका है ! ठण्ड भी बढ़ रही है ! ढेर सारे उपन्यास 'पाइप - लाईन' में हैं !&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-hansi-font-family: &amp;quot;Times New Roman&amp;quot;;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Mangal;"&gt;कुछ बढ़िया उपन्यास पढ़ कर - उनके बारे में यहाँ लिखना चाहता हूँ ! समय चाहिए !&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-1341917911661676330?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/1341917911661676330/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=1341917911661676330' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/1341917911661676330'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/1341917911661676330'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='मेरा गाँव - मेरा देस् - पत्र पत्रिका'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-2444901557932757353</id><published>2011-11-10T12:09:00.002+05:30</published><updated>2011-11-10T13:18:26.754+05:30</updated><title type='text'>बरतुहारी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;'बरतुहारी' एक बिहारी शब्द है ! यह एक क्रिया है - जिसका मतलब होता है - किसी कन्या के लिये योग्य वर् की तलाश ! 'बरतुहार' संज्ञा है - जिसमे उस कन्या के माता - पिता , सगे सम्बन्धी शामिल होते हैं ! इस् प्रक्रिया में हास्य - व्यंग और एक दर्द भी शामिल है ! मै किस पक्ष को रख पाता हूँ - अभी लेख के शुरुआत में मेरे लिये कुछ कहना मुश्किल है ! पढ़िए !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;घर परिवार , ननिहाल , सगे सम्बन्धी , दोस्त महिम सभी जगह कन्यायें होती हैं ! बाबा सामाजिक होते थे ! इस् मामले में मेरे पिता जी भी काफी सामाजिक हैं ! मै भी हूँ ! विशेष क्या कहूँ - बहुत यादें हैं ! कुछ मीठी - कुछ खट्टी और कुछ बहुत तीते !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम जिस दौर / जाति / समाज और आर्थिक स्थिती से आते हैं - वहाँ तीन चीज़ें महतवपूर्ण होती हैं - किसी भी शादी में !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;१. परिवार&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;२. पैसा&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;३. लड़का / लड़की&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पहले क्या था ? परबाबा की मृत्यु बहुत पहले हो चुकी थी ! बाबा दोनों भाई पर् अपनी बहन की शादी का जिम्मा था ! बाबा कहते हैं - एक आदमी बेडिंग और एक सूटकेस लेकर चलता था ! धान वाले देस में ! बहन की शादी - बिना धान वाले देस में कैसे कर दे ? क्या ज़माना था ! बाबा के दूर के फुफेरे भाई और काफी घनिष्ठ मित्र 'चम्पारण' के मदन मोहन बाबु ने बात बात में ही कह दिया - चलो मै तुम्हारी बहन की शादी अपने भांजे से तय करता हूँ - और शादी हो गयी ! क्या महत्व होता था - फूफा - मामा के शब्दों का ! लड़का का बाप - काट नहीं सकता ! सम्बन्ध की इज्जत होती थी !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पिता जी की शादी में भी ऐसा ही हुआ ! बाबा किसी फुटबॉल टूर्नामेंट में कहीं गए थे ! हाई कोर्ट के जज और बड़े बाबा के साले - राम रतन बाबु आ धमके गाँव - बड़े नाना जी को लेकर - फूलहा लोटा पर् फलदान पड़ गया ! ना तो बाबु जी को पता और ना ही मेरे बाबा को ! तिलक की बात को गोली मारिये ! मेरे ननिहाल वाले जितना सोच के आये थे - आधे में काम फरिया गया !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;विस्वास था - सम्बन्धी धोखा नहीं देगा !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वक़्त बदलने लगा ! सगे सम्बन्धी कहीं छुप गए ! परिवार गौण हो गया ! 'लईका - लईकी' और पैसा ही सब कुछ हो गया !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कई बरतुहारी में मै बचपन से जाने लगा - बिस्कुट खाने के लिये ;) धम्म से सोफा पर् बैठा - बिस्कुट खाया और चल दिया ! बड़े फूफा किसान होते हैं ! मुजफ्फरपुर शहर से बिलकुल सटे ही उनका गाँव है ! अच्छे किसान हैं ! बड़ी फुफेरी बहनों के बरतुहारी में घूमना शुरू किया ! अचानक से फूफा जी एक इंजिनियर लड़के के कहाँ गए ! खेत बारी ज्यादा नहीं था - पर् सरकारी नौकरी था ! मेरे गृह जिला में ! लडके के पिता जी ने मेरे फूफा जी को बोला - देखिये , मेरे इंजिनियर लडके की शादी में चेयरमैन साहब जहाँ कहेंगे - वहीँ होगा ! फूफा जी मुस्कुराने लगे - बोले - लडकी चेयरमैन साहब की अपनी बड़ी नतिनी ही है ! तिलक ? जो मिला वो लोग आशीर्वाद समझ ले लिये - तिलक से ज्यादा का सोना मड़वा पर् मेरी फुफेरी बहन को चढा दिए !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पर् सभी बरतुहारी इतने मीठे नहीं होते ! मै अपने दर्द को ब्यान नहीं कर सकता हूँ ! पर् इस् दर्द ने मुझमे एक संस्कार क जनम दिया - खासकर इस् विषय पर् !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एक बहुत ही नजदीकी कुटुंब की लडकी के लिये एक जगह एक प्रोफ़ेसर साहब के बेटा का &amp;nbsp;पता चला ! क्या नसीब था - प्रोफ़ेसर साहब का ! तीन बेटा - तीनो के तीन - आई आई टी से पास ! वाणी ऐसी की - लगे जैसे सरस्वती बैठी हो ! पिता जी और मेरे कुटुंब उनके यहाँ गए ! फोटो और बाओडाटा दे दिया गया ! जब काफी दिन हो गए - वहाँ से कोई बुलावा नहीं आया - पिता जी ने मेरे एक कजीन को बोला - जाओ ..प्रोफ़ेसर के यहाँ से बाओडाटा - फोटो मांग लाओ ! जब मेरा कजीन उनके यहाँ गया तो हैरान हो गया ! बोला - उनके यहाँ करीब दो सौ बाओडाटा और फोटो तहिया' के रखा हुआ था ! मन त किया की - प्रोफ़ेसरवा को दें - दू हाथ - घींच के ! दूकान खोल के रखे हुए था !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ये चेहरा हो चुका था - वैसे माँ बाप का - जिनकी औलाद सामाजिक पटल पर् कुछ सफल हो चुकी थी ! लोग पागल की तरह वर्ताव करना शुरू कर दिए ! एक बीपीएससी के मेंबर से मेरी गुफ्तगू हो रही थी - बोले - कई &amp;nbsp;लड़कों को डिप्टी कलक्टर बनवा दिया ! जब लडकी वाले आते थे - तो - मै उन लड़कों का पता दे दिया करता था - अब देखिये - लड़के का बाप बोलता था - लडकी वाले को - देखिये , महराज ...फलाना बाबु का पैरवी लेकर मत आयें ! हद्द हाल हो गया समाज का ! आँख की शर्म जाने लगी ! जिस व्यक्ती ने तुम्हारे बेटा को डीएसपी / डिप्टी कलक्टर बनाने में मदद की - अब तुम उसको ही पह्चानाने से इनकार करने लगे ! जियो ..सफल लड़का के बाप ..जियो !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दरवाजे पर् बड़े ठेकेदार / घूसखोर &amp;nbsp;इंजिनियर / एडीएम के गाड़ी रुकने लगे ! घर से चार कप चाय आया - चारों चार रंग के कप में ! भविष्य यहीं था ! लड़का के बाप को पता ही नहीं - कितना मांगे ? इसमे शादी बिगाड़ने वाले भी सक्रिय हो गए - आपके बेटा का कीमत ऐसा बोंल दिया - जो कोई और दे ही ना सके ! हुआ फेरा ! अब वो ऊँची कीमत लगाने वाला गायब ! अब आप इंतज़ार में ! हा हा हा हा !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लड़का ही सबकुछ हो गया ! पटना के एक जज साहब गए - बेटी की बरतुहारी में ! लड़का - आई आई टी , आई ये एस , फिर अमरीका में एम बी ए ! लड़का का बाप खोजा गया - पता चला - एक मडई में बाबा धाम वाला लाल गमछी पहन - मुह में जीवन जैसा बीडी दबाये - तीनतसिया ( ताश के पत्तों से जुआ ) खेल रहा था ! अब परिवार को कौन पूछता है ! लडकी को तो अमरीका में रहना है ! वाह भाई वाह ! जब लडकी को मानसिक प्रताडना और फिर फिजिकल प्रताडना शुरू हुआ ! पटना का एक खास तबका - एन आर् आई के लिये दरवाजे बंद कर दिया ! अब जज साहब कहते फिरते हैं -&amp;nbsp;अगर परिवार बढ़िया है-&amp;nbsp;लड़का बेरोजगार हो - पान गुटखा बेचता हो - गरीब हो - कर दीजिए ! लोग डर चुके थे ! सामाजिक उठा - पटक चल रही थी ! शिकार - बेचारी बेटी हो रही थी !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पटना विश्वविद्यालय के एक वीसी होते थे ! बहुत पहले ! एक वाइवा में मुजफ्फरपुर गए ! उनकी बेटी के लिये कुछ योग्य वर् का लिस्ट दिया गया ! कई होनहार के नाम वीसी साहब ने काट दिया ! एक प्रोफ़ेसर ने उन्हें टोका - सर , ई लईका का यू पी एस सी शिओर हैं ! वीसी साहब बोले - ठीक है , ईमानदार निकल गया तो ..टीवी , फ्रीज़ , जर जमीन खरीदने में ही जीवन गुजर जाएगा , मेरी बेटी का सुख कहाँ गया ? फिर वीसी साहब ने मुजफ्फरपुर के एक रईस के यहाँ अपना ओहदा भंजा कर बेटी का बियाह कर दिए !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दुनिया जो समझे - लेकिन इस् बरतुहारी में लडकी के पिता की जान निकल जाती थी ! रात का नींद गायब ! &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस् पूरी प्रक्रिया का सबसे घटिया पार्ट होता है - लडकी दिखाना ! आई जस्ट हेट दिस पार्ट ! पर् लडकी का बाप सबसे मजबूर होता है ! मुजफ्फरपुर के एम डी डी एम कॉलेज के गेट के सामने या किशोर कुनाल द्वारा बनाया हुआ पटना का &amp;nbsp;हनुमान मंदिर , या हथुआ महराज वाला 'हथुआ मार्केट' हो पटना मार्केट या फिर चाणक्य होटल , मौर्या ! देखो ..जितना देखना है देखो - पर् देख कर रिजेक्ट मत करो ! बाप रे ..सच में इससे घटिया कोई और काम नहीं है ! रेप से भी घटिया ! रिजेक्ट की हुई लडकी जब रोती है ..उसके आंसूं में तुम्हारा कई खानदान जल जायेगा !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लडकी देखे के जाएगा ? लडका की भाभी , बहन , चाची - जिससे भविष्य में उस लडकी का कभी भी बढ़िया सम्बन्ध नहीं रहेगा ! लेकिन , जायेगा - यही लोग !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस् तरह की घटना का मेरे ऊपर इतना जबरदस्त प्रभाव है - पूछिए मत ! अभी हम पढ़ ही रहे थे - बाबु जी समधी बनने के लिये हडबडाने लगे - कहने लगे - गाभीन गाय &amp;nbsp;के ज्यादा दाम मिलता है ! हम बोले - जे करना है - करिये ! पर् याद रखियेगा - किसी भी लडकी को शादी की नियत से देख लेने के बाद - ना , मत कीजियेगा - किसी भी हाल में ! मेरे नौकरी पकड़ते - पकड़ते में माँ- बाबु जी एक जगह हडबडा के देख लिये ! फिर ..डिसीजन बदलने लगे ! हमको अपने ही बाबु जी को हडकाना पड़ा - बोले ..चुप चाप फाईनल कीजिए ! माँ बोलने लगी - तुम भी देख लेते- अभी कैरियर बनाने का टाईम है &amp;nbsp;- हम बोले - रोज बंगलौर में तमिल ब्राह्मण की सुन्दर लडकी को देखता हूँ - सब एक जैसी हैं - कोई फर्क नहीं , कैरियर बनते रहता है - आप लोग डेट फायीनल कीजिए !&lt;b&gt; दरअसल , मेरे दिमाग में बैठा हुआ था - कुंवारी कन्या का श्राप नहीं लेना है और कोई भी लडकी वस्तु नहीं होती है !&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;समाज खुद अपनी दिशा तय करता है ! अब हमारी बेटी - बहन पढ़ने लगी ! उसकी पढ़ाई की इज्जत होने लगी ! पढ़ी - लिखी बेटी - बहनों का बियाह जल्द तय होने लगा ! समाज में एक सन्देश गया ! मिडिल क्लास आगे आया !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पिछले दस सालों में कई सैकडे लोग मुझसे सुयोग्य वर् का लिस्ट मांग चुके हैं ! फिर दुबारा नहीं आते ! बेटी जब फायीनल इयर में रहेगी तो फोन पर् जीना मुश्किल कर देंगे ! रँजन जी , आपका नेटवर्क बहुत लंबा - चौड़ा है - कुछ मदद कीजिए ! फिर अगला साल किसी दूसरे के मुह से सुनायी देता है - फलाना की बेटी का शादी हो गया ! लडकी के पिता - पान के दूकान पर् मिल जायेंगे ! समझाने लगेंगे - राजस्थान वाले हैं , लड़का वहीँ साथ में था - वो लोग भी ब्राह्मण हैं ..ब्ला ..बला ...ब्लाह ! अंत में हम बोलेंगे - अरे ..सर ..बहुत बढ़िया ..लडकी खुश है ..पढल - लिखल है ,,फिर हमको - आपको क्या सोचना ! लडकी के पिता के चेहरे पर् ..एक निश्चिन्त भाव आता है ! क्या करे ..वो बेचारा ! जेनेरेशन इतनी जल्दी बदलेगा - कोई सोचा नहीं होगा ! वो मुझसे इस् शादी का सर्टिफिकेट मांगता है ! मै कौन हूँ ! उसका चेहरा कहता है - समाज के आदमी हो - अप्रूव करो ! कर दिया ..भाई ..अप्रूव ! जाओ ..पति - पत्नी को खुश रहने दो !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;फुर्सत से केबिन में बैठा हूँ - कुछ कुछ लिख दिया हूँ ! कैसा लगा - कमेन्ट कीजियेगा !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-2444901557932757353?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/2444901557932757353/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=2444901557932757353' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/2444901557932757353'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/2444901557932757353'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='बरतुहारी'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-6172862564207246432</id><published>2011-10-25T00:55:00.000+05:30</published><updated>2011-10-25T00:55:07.789+05:30</updated><title type='text'>टीए - डीए का खेला ...</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बचपन याद है ! बाबा सहकारिता आंदोलन के अपने क्षेत्र के अग्रणी नेता थे - सो - बिहार स्तर के कई सहकारी संस्थाओं में प्रतिनिधि थे ! साल में दो तीन बार सबकी मीटिंग होती थी - बिस्कोमान , सहकारी बैंक , भूमि विकास बैक इत्यादी ! बाबा की लाल बत्ती वाली गाड़ी में मै भी बैठ कर इन मीटिंग में पहुँच जाता था ! वहाँ एक लंबा लाईन लगा होता था - सामने एक आदमी बैठ होता था - जो एक अटैची और एक पैकेट देता था ! अटैची में कागज पत्र होते थे और पैकेट में कुछ सौ रुपये ! अटैची मै लेकर कार में रख देता था और पैकेट बाबा अपने पॉकेट में ! बाद में अन्य जिला से आये लोगों से उनको बात करते सुनता था - टीए कम दिया है ! डीए एक दिन और का मिलना चाहिए था - ब्ला..ब्ला ! हम ज्यादा माथा नहीं लगाते - दोपहर को पसंदीदा मुर्गा भात खाने को मिलता - तपेश्वर बाबु हर टेबल पर् पहुंचते और सबसे हाल समाचार पूछते ! इन्ही एक मीटिंग में बिस्कोमान भवन के निर्माण के मंजूरी मेरे आँखों से मिली थी ! इन्ही मीटिंग में एक बार तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व० बिन्देश्वरी दुबे को मुर्गा का टांग दोनों हाथ और दांत में दबाये हुए अखबार में फोटो छाप दिया था ! :) सब याद है - हमको ! वो मेरा स्वर्णीम काल था ! अब गदहा काल है :( खट रहे हैं :(&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हाँ तो बात हो रही थी - टीए डीए पर् ! बाबु जी वर्तमान में पटना के एक कॉलेज में विभागाध्यक्ष हैं - प्रैकटीकल परीक्षा में एग्जामिनर बाहर से आते हैं ! बिहार सरकार / कॉलेज / विश्वविद्यालय का जो हाल है वो किसी से छुपा नहीं है ! वैसे परीक्षक जाते वक्त 'टीए - डीए' को लेकर कुछ हल्ला नहीं मचाये सो बाबूजी को अपने पॉकेट से ही देना पड़ता है !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम भी शिक्षक हैं ! दूसरे कॉलेज में प्रैक्टिकल परीक्षा लेने जाना पड़ता है ! परीक्षा खत्म होने के बाद - भारी हंगामा होता है ! टीए - डीए को लेकर हम तो चुप ही रहते हैं लेकिन बाकी लोग तो ऐसा करते हैं - जैसे उनका कोई हक मारा जा रहा है ! आयेंगे मोटरसाइकिल से टीए मांगेंगे - कार का ! एकाउंटेंट पूछ बैठेगा - कार नंबर दीजिए - बाहर पाकिंग से किसी का नंबर लिख देते हैं लोग ! एकॉन्टेंट हडकाता है - सरकार का पैसा है - जेल चले जाईयेगा ..ब्ला ब्ला...कौन उसकी बात सुनता है !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यही हाल कॉपी जांचते वक्त होता है ! उपरवाले की मेहरबानी से बड़ी कम उम्र में हेड एग्जामिनर बनने का मौका मिला ! बाकी के परीक्षक माथा नोच लेते थे - सर , एकॉन्टेंट बहुत बदमाश है - दो दिन का का डीए काट लिया ! सेन्ट्रलाईज कॉपी चेकिंग होती हैं ! भारी हेडक हो जाता है ! प्रोफ़ेसर को लेक्चरर वाला डीए मिल गया - हुआ हंगामा - बोला - इज्ज़त चला गया ! हम बोले भाई - दस - बीस रुपैया से क्या बिगड जायेगा ! प्रोफ़ेसर बोलेगा - आप नहीं समझियेगा ..ब्ला ..ब्ला !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कुल मिलाकर मेरी समझ में यही आया की - नौकरी करने वाला - टीए डीए को जन्मसिद्ध अधिकार समझता है - होना भी चाहिए - कंपनी / सरकार के काम से आप जा रहे हैं तो खर्चा पानी तो लगेगा ही ! हम भी गाँव में अपना नौकर को कहीं काम से भेजते हैं तो खर्चा देते ही थे ! लेकिन जब वो नौकर खर्चा में से कुछ बचा कर वापस कर देता था - मन एकदम से गद गद् हो जाता !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब आईये - किरण आंटी पर् ! एक एनजीओ से पैसा उठाकर दूसरे एनजीओ को पैसा देना - गलत है ! सीधे &amp;nbsp;चंदा मांग लेती ! दरअसल आदत खराब है ! यह विशुध्ध पाकिटमारी है ! आप इतनी ईमानदार थी फिर 'मिजोरम' से क्यों भागना पड़ा ? आप सभी मीडिया की देन हैं और याद रखिये यही मीडिया आपके चमक &amp;nbsp;को &amp;nbsp;खत्म भी करेगा ! आपके जैसे हर स्टेट में दस आई पी एस अफसर हैं ! मीडिया मैनेज ही सब कुछ होता तो - भाजपा के रविशंकर प्रसाद को राज्यसभा में नहीं जाना पड़ता - लोकसभा में जाते ! आपने क्या काम किया जिसके लिये - आप खुद को राष्ट्रिय स्तर की नेता खुद को समझाने लगीं ! बस 'अन्ना' मिल गए - सब कूद गए !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जिस लोकसभा को आपसभी रामलीला मैदान में नौटंकी कर के क्या क्या नहीं कहा - आज उसी लोकसभा में बैठने के लिये - सबकुछ मंजूर है ! टीवी पर् देश के प्रधानमंत्री का मजाक उडाना कहाँ तक सही था ! उनकी मीमीकरी करना ! क्या यह सब एक पूर्व आईपीएस को शोभा देता है ! अवकात में रहिए ! हम भी बिहार से आते हैं जहाँ हर मोहल्ले से दो सिविल सर्वेंट होते हैं ! पर् आप जैसा किसी को नहीं देखा ! हाँ , कॉंग्रेस गलत है ! पर् देश का संविधान उसको पांच साल शासन का अधिकार दिया है - कोई गलत नहीं है ! मैडम , बहुत आसान है - दिल्ली के किसी क्षेत्र को रिप्रेजेंट करना ! देहाती क्षेत्र में बुखार छूट जायेगा ! बेटी की शादी में दो क्विंटल चीनी मांगेगा ! कोई अपने बेटा को नौकरी के लिये कहेगा ! कोई भूख मर जायेगा !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हिम्मत और अवकात है तो - देश का कोई पिछड़ा क्षेत्र से खुद को लोकसभा का उम्मीदवार घोषित कीजिए - चुनाव जीतिए और वहाँ की जनता के दर्द को समझिए ! टीवी पर् बोलना बहुत आसान है ! चार एंकर / न्यूज रीडर से दोस्ती कर - किसी चैनल पर् बोंल लेना आसान है ! असली जनता के बीच रहना आसान नहीं है , मैडम !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;और आप केजरीवाल जी , याद है ..रँजन ऋतुराज का नाम ? नहीं याद होगा ! सत्येन्द्र दुबे हत्या कांड के बाद के जन्मे ग्रुप में ही आपका जन्म हुआ था ,ज्यादा नहीं लिखूंगा क्योंकी आपका भी इज्जत दो पैसा का हो गया है ! आई आई टी का सीट आपने खराब &amp;nbsp;किया - फिर सिविल सर्वेंट भी सही ढंग से काम नहीं किये - अब फ्लाईंग शर्ट को ऊपर से पहन - देश के सबसे ईमानदार बन् गए ! हद्द हाल देश की मिडिल क्लास का !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लोकपाल क्या कर लेगा ? दस लाख जनता से आप एक एम पी को चुनते हैं ! कभी किसी एम पी के घर गए हैं ? जितना आपके तनखाह है उतना का लोग उसके घर चाय पी जाता है ! कहाँ से लाएगा वो पैसा ? हर लगन में लाखों रुपैये के नेवता बंट जाता है ! कौन देगा ?&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;देश के सबसे बेहतरीन दीमाग को आप सिविल सर्वेंट बनाते हैं - देते क्या है - उसको ? पांचवे वेतनमान में - तनखाह थी - आठ हज़ार बेसिक ! अब है पन्द्रह हज़ार बेसिक ! उसका बच्चा भूख रहे और आपलोग ? दो महीना जावा सीख लिये और पचास हज़ार कमाने लगे !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जितना लोग हल्ला करता है - इंटरनेट की दुनिया में - सबसे ज्यादा ट्रैफिक रुल वही तोडता है ! सुबह में ट्रैफिक रुल तोडेगा और शाम को इंटरनेट पर् 'अन्ना - अन्ना' चिल्लाएगा ! गजब का चमड़ी है ! मै गुस्सा में हूँ - मुझे तीन किलोमीटर का सफर ऐसे कार वालों के कारण एक घंटा लगाना पड़ता है ! हद्द हाल है !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दिन में फेसबुक पर् 'अन्ना - अन्ना' चिल्लाएगा और शाम को बेटा बेटी के एडमिशन के लिये स्कूल के दलाल के घर जायेगा ! मत जाओ ..ना ! सेना की नौकरी सबसे बढ़िया - पर् वहाँ जायेगा - कौन ? पड़ोसी का बेटा ! हाय रे ...मिडिल क्लास !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एल पी जी में सब्सीडी क्यों ? डीजल में सब्सीडी क्यों ? शर्म नहीं आती ? - डीजल कार खरीदते वक्त ! आज दिल्ली - मुंबई जैसे शहर में डीजल कार पर् आठ आठ महीना का लाईन है ! डीजल का सब्सीडी किसके लिये है - मेरी जान - मिडिल क्लास ?&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भारत में भ्रष्टाचार खून में है ! हीरा चोर - खीरा चोर को पिटता है ! कई ईमानदार लोग भी कई गलत काम कर बैठते हैं - हक समझ कर !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब कितना लिखा जाए ! कानून भी दोषी है !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;माथा खराब है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-6172862564207246432?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/6172862564207246432/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=6172862564207246432' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/6172862564207246432'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/6172862564207246432'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/10/blog-post_25.html' title='टीए - डीए का खेला ...'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>8</thr:total><georss:featurename>Indirapuram, Ghaziabad, Uttar Pradesh, India</georss:featurename><georss:point>28.641485 77.37138559999994</georss:point><georss:box>28.6251155 77.34128009999993 28.6578545 77.40149109999994</georss:box></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-33767695288076166</id><published>2011-10-18T13:41:00.000+05:30</published><updated>2011-10-18T13:41:00.305+05:30</updated><title type='text'>दूसरी आज़ादी के साइड इफेक्ट्स – भाग दो</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; font-family: 'Courier New', Courier, FreeMono, monospace; font-size: 15px; line-height: 21px;"&gt;&lt;i&gt;&amp;nbsp;&lt;a href="http://www.facebook.com/rituraj57" style="color: blue; text-decoration: none;"&gt;ऋतुराज&amp;nbsp;&lt;/a&gt;सर&amp;nbsp;का लिखा यह लेख ! ऋतुराज सर बिहार राज्य के नालंदा जिला के रहने वाले हैं ! विश्व प्रख्यात नेतरहाट विद्यालय , पटना कॉलेज और जेएनयू से शिक्षा ग्रहण करने के बाद सन 1983 में भारतीय आरक्षी सेवा के अधिकारी बने और अपने गृह राज्य बिहार को सन 2005 तक सेवा दिया और स्वेच्छा से अवकाश ग्रहण &amp;nbsp;किया &amp;nbsp;! फिर उसके बाद कुछ वर्षों के लिये टाटा स्टील के साथ जुड़े रहे और पिछले दो साल से फुर्सत के क्षण अपने गृह जिला में बिता रहे हैं ! इनकी फोटोग्राफी भी कमाल की है !&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; color: #333333; line-height: 16px;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;वे पटना के एक नामचीन डाक्टर हैं. उनकी ख्याति पूरे राज्य में है और उनके क्लीनिक में मरीजों की लंबी लाइनें लगी रहती हैं. वे डाक्टरी के विज्ञान के साथ साथ मैनेजमेंट की कला में भी पारंगत हैं. बिहार का हर धनपशु उनका मरीज है. धनपशुओं से डाक्टर साहब के गहरे निजी सम्बन्ध भी हैं क्योंकि वे इनसे कोई फीस नहीं लेते हैं. धनपशुओं से फीस नहीं लेने की प्रक्रिया को डाक्टर साहब communication initiative की संज्ञा देते हैं और कहते हैं कि ये धनपशु ही उनके विजिटिंग कार्ड हैं. डाक्टर साहब की बात में दम भी है, क्योंकि इन धनपशुओं की बदौलत पूरे बिहार के मरीज डाक्टर साहब को साक्षात धन्वंतरि का अवतार समझते हैं. ऐसे आम मरीजों से डाक्टर साहब फीस लेने में कोई कोताही नहीं करते हैं क्योंकि उनके अनुसार, “घोड़ा यदि घास से दोस्ती कर लेगा, तो खायेगा क्या?”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;लेकिन, डाक्टर साहब बहुत भावुक भी हैं और गरीबों के दुःख से पीड़ित हो कर वे प्रतिदिन 20 मरीजों का न केवल मुफ्त इलाज करते हैं बल्कि उन्हें “Physician’s Sample. Not for sale.” वाली दवाएं भी मुफ्त देते हैं. डाक्टर साहब की इस सदाशयता की अखबारों और टी वी चैनलों में जम पर प्रशंसा होती है क्योंकि हर संपादक और संवाददाता भी डाक्टर साहब का मरीज है. डाक्टर साहब अपनी इस सदाशयता को मैनेजमेंट की भाषा में ‘outreach programme’&amp;nbsp; कहते हैं. इस ‘outreach programme’ से न केवल डाक्टर साहब की दरियादिली का डंका बजता है बल्कि दवा कंपनियों को भी खूब फायदा मिलता है क्योंकि डाक्टर साहब सिर्फ दो दिन की खुराक मुफ्त देते हैं और बाद में यही दवाएं खरीद कर खाने की ताकीद कर देते हैं. लिहाजा, डाक्टर साहब दवा कंपनियों के चहेते हैं. उनके यहाँ medical representatives की भीड़ लगी रहती है जिनसे डाक्टर साहब सिर्फ रात के 10 से 11 बजे के बीच ही मिलते हैं. दवा कंपनियों के सौजन्य से डाक्टर साहब साल में सिर्फ दो बार सपरिवार छुटियाँ बिताने विदेश चले जाते हैं. लालच तो उन्हें छू तक नहीं गया है. उनके दिल में लक्ष्मी नहीं गांधीजी का वास है.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;&amp;nbsp;अपने सामाजिक दायित्वों के निर्वहन में डाक्टर साहब देश के बड़े बड़े औद्योगिक घरानों के Corporate Social Responsibility Initiatives से भी आगे हैं. &amp;nbsp;नकली दवाओं के कहर से मरीजों को बचाने के उद्देश्य से डाक्टर साहब ने क्लीनिक के बगल में ही दवा की एक दुकान खोल दी है. उसी दुकान से दवा खरीदने की सख्त हिदायत डाक्टर साहब के कारिंदे हर मरीज को देते हैं और लगे हाथ यह गंभीर चेतावनी भी दे देते हैं कि किसी दूसरी दुकान से दवाएं खरीदने से जान जाने का भी खतरा है. लिहाजा, डाक्टर साहब की दवा दुकान में भीड़ लगी रहती है और अच्छा ख़ासा मुनाफा भी हो जाता है. यद्यपि उनकी पत्नी को दवा दुकान के कारोबार से कोई लेना देना नहीं है तथापि सरकारी तौर पर वे ही इसकी मालकिन हैं क्योंकि डाक्टर साहब टैक्स मैनेजमेंट में भी उस्ताद हैं.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;हर आम भारतीय की तरह डाक्टर साहब आयकर को एक अनावश्यक बोझ मानते हैं; और आयकर के इस बोझ को सही-गलत किसी भी तरीके से कम करना अपना नैतिक कर्तव्य मानते हैं. अस्तु, वे मरीजों की संख्या का कोई लेखा जोखा नहीं रखते हैं, अपनी वास्तविक आय का एक दशांश ही अपने रिटर्न में दर्शाते हैं और अपने घर के बिजली-पानी, दाई-नौकर, रसोईया-खानसामा, ड्राइवर-माली इन सब पर होने वाले खर्च को भी अपनी आय में से मिन्हा कर देते हैं. वह तो दुष्ट सरकार ने ऐसा कोई प्रावधान नहीं बनाया वर्ना वे अपने घर के चावल-दाल, नून-हल्दी, सब्जी-भाजी का खर्च भी अपनी आय में से मिन्हा कर देते !! आयकर विभाग वाले उन्हें अनावश्यक तंग नहीं करें इस निमित्त डाक्टर साहब न केवल उनकी मुफ्त चिकित्सा करते हैं बल्कि हर दीपावली और नववर्ष के पावन अवसर पर आयकर विभाग के चपरासी से लेकर चीफ कमिश्नर तक को नियमित सौगात भी भेजते हैं. साथ ही साथ अपने चार्टर्ड अकाउन्टेंट (सी. ए.) को उन्होंने स्पष्ट हिदायत भी दे रखी है कि ‘खर्चा-पानी’ करने में कभी कोई कोताही ना करे.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;डाक्टर साहब की इस चतुरंगी प्रतिभा के फलस्वरूप हर वर्ष उनके दो नंबर के बैंक खाते में एक मोटी रकम जमा हो जाती है. डाक्टर साहब अपने पूर्वजों का बहुत भी सम्मान करते हैं! &amp;nbsp;अतः उनसे प्रेरणा लेकर वे इस धन को जमीन में गाड़ देते हैं; और नियमित रूप से भूखंड / मकान / फ़्लैट का बेनामी क्रय कर लेते हैं.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;अचल संपत्तियों के पंजीकरण की प्रक्रिया को डाक्टर साहब अत्यंत जटिल और कठोर मानते हैं क्योंकि इस प्रक्रिया में उन्हें स्टैम्प ड्यूटी अदा करनी पड़ती है. वे हमेशा न्यूनतम स्टैम्प ड्यूटी ही अदा करते हैं और अचल संपत्तियों का वास्तविक मूल्य कभी नहीं दर्शाते हैं. इस प्रयोजन हेतु डाक्टर साहब ने पंजीकरण कार्यालय के हर कारिंदे से ‘लेन-देन’ का एक पवित्र रिश्ता स्थापित कर लिया है.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;&lt;strong&gt;सम्पूर्णता में देखा जाए तो डाक्टर साहब एक सच्चे भारतीय हैं !!!&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;और हर सच्चे भारतीय की तरह वे दूसरों के भ्रष्टाचार की सख्त खिलाफत करते हैं. भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी का नाम सुनते ही उनका चेहरा गुस्से से तमतमा जाता है, भृकुटी तन जाती है, नथुने फड़कने लगते हैं और आँखों से अंगारे बरसने लगते हैं. उनके इस रौद्ररूप को देखकर लगता है कि यदि कहीं कोई भ्रष्टाचारी उनके सामने पड़ गया तो वे उसका टेंटुआ ही दबा देंगे !!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;हर सच्चे भारतीय की तरह डाक्टर साहब भी भ्रष्टाचार को देश का सबसे बड़ा कोढ़ मानते हैं; इसके उन्मूलन के लिए कड़े से कड़ा क़ानून बनाए जाने की पुरजोर वकालत करते हैं और मानते हैं कि जन लोकपाल कानून बनते ही भ्रष्टाचार का सर्वनाश हो जाएगा.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;‘आज़ादी की दूसरी लड़ाई’ से वे इतने प्रभावित हुए कि अपने वातानुकूलित क्लीनिक से कूदकर सड़क पर आ गए तथा अन्य नामचीन और ख्यातिप्राप्त डाक्टरों के साथ ‘अन्ना टोपी’ और ‘अन्ना तख्ती’ से लैस होकर कड़ी धूप में पूरे आधे घंटे तक प्रदर्शन करते रहे !! उनके इस अप्रतिम बलिदान से सभी टी वी चैनल मंत्रमुग्ध हो गए और आधे घंटे के इस महान प्रदर्शन का ‘लाइव कवरेज’ 12 घंटे तक करते रहे!!! &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;डाक्टर साहब ने उसी दिन फेसबुक प्रोफाइल से अपनी तस्वीर उखाड़ फेंकी और अन्नाजी को वहाँ चिपका दिया, अपने क्लीनिक को अन्नाजी की तस्वीरों से पाट दिया, ‘अन्ना टोपी’ को अपने वस्त्र-विन्यास का अभिन्न अंग बना लिया और अपने दिल में गांधीजी के साथ साथ अन्नाजी को भी एडजस्ट कर लिया. ‘दूसरी आज़ादी’ के आंदोलन ने उन्हें देशभक्त से अन्नाभक्त बना दिया !!!&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;लेकिन अन्ना जी का अनशन समाप्त होने के कुछ दिनों बाद ही डाक्टर साहब के व्यक्तित्व में एक आमूलचूल परिवर्तन आ गया. उनके चेहरे से रौनक और सर से ‘अन्ना टोपी’ गायब हो गयी ! भ्रष्टाचार का नाम सुनने पर उनकी आँखों से अब अंगारे नहीं आंसू टपकते और अन्नाजी का नाम सुनते ही डाक्टर साहब दांत किटकिटाने लगते !!!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;डाक्टर साहब के व्यक्तित्व के इस आमूलचूल परिवर्तन का कारण एक खौफनाक हादसा था. हुआ कुछ यूँ कि :-&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;एक दिन डाक्टर साहब ‘अन्ना टोपी’ लगाए मरीजों से मुखातिब थे. मरीजों का भारी हुजूम बाहर वोटिंग रूम में जमा था. एक मरीज अंदर आया. अपनी आदत के मुताबिक़ डाक्टर साहब ने उससे पूछा, “क्या तकलीफ है?” मरीज बोला, “आप आयकर की चोरी करते हैं, यही मेरी तकलीफ है.” डाक्टर साहब सकपका से गए. यह कैसा मरीज है जो उन्हें ही ताने दे रहा है!! पर, वे अन्ना रस में सराबोर थे, उनके सर पर ‘अन्ना टोपी’ थी. दिल में अन्ना भक्ति का ज्वार और ‘दूसरी आज़ादी’ प्राप्त हो जाने का गुरूर था. सो तैश में बोले, “इतनी ओछी बात करते आपको शर्म नहीं आती?” मरीज ने संजीदगी से कहा, “जी नहीं. आपको आयकर चोर कहने में मुझे तनिक भी शर्म नहीं आ रही है.”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;मरीज की संजीदगी का असर डाक्टर साहब पर भी पड़ा, वे कुछ संयमित हुए और संजीदा लहजे में उन्होंने कहा, “माफ कीजियेगा, मैंने आपको पहचाना नहीं.” मरीज विनम्रता से फरमाया, “मैं इस एरिया का आयकर इन्स्पेक्टर हूँ.” डाक्टर साहब चौंके, यह कौन सा आयकर इन्स्पेक्टर आ गया जिसे वे पहचानते तक नहीं हैं? उन्होंने कुछ झेंपते हुए कहा, “यहाँ के इन्स्पेक्टर तो फलां जी हैं. मैं तो उन्हें बहुत अच्छे से जानता हूँ.” मरीज बोला, “उनका तबादला हो गया है और अभी दो महीने पहले ही मैंने यहाँ योगदान दिया है.”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;डाक्टर साहब की जान में जान आ गयी, उनकी साँसे फिर से सामान्य हो गयी और दिल की धडकन 103 से घट कर पुनः 72 पर स्थिर हो गयी !!. वे समझ गए कि चिंता करने का कोई सबब है ही नहीं ... यह नया इन्स्पेक्टर अपनी उपस्थिति भर दर्ज करा रहा है. वे मुस्कुराते हुए बोले, “अच्छा, इसीलिए पहचान नहीं पाया आपको. मैं अपने सी.ए. को बोल देता हूँ वह मिल लेगा आपसे.” इन्स्पेक्टर ने भी मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “जी जानता हूँ मैं आपके सी. ए. को.”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;डाक्टर साहब की पैनी बुद्धि ने तुरंत ताड़ लिया कि इन्स्पेक्टर सिर्फ अपनी खुराकी बढ़ाना चाह रहा है; और चाहे भी क्यूँ नहीं? मंहगाई भी तो आखिर आसमान छू रही है !! वे पुनः अपने प्रसन्नचित्त स्वरूप को प्राप्त हो गए और गदगद भाव से बोले, “वह मिल लेगा आपसे और जो भी आप चाहते हैं वह दे देगा.” इन्स्पेक्टर ने विनम्रता से उत्तर दिया, “लेकिन मुझे तो आप से ही चाहिए.”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;डाक्टर साहब को इंस्पेक्टर की बात बहुत अटपटी लगी. क्या चाहता है यह इन्स्पेक्टर? क्या उन्हें अपने हाथों से इसे घूस देना पड़ेगा?? क्या यह दुर्दिन भी देखना पड़ेगा उन्हें? राम, राम ... अन्ना, अन्ना ... !! इतनी धृष्टता, इतनी निर्लज्जता?? डाक्टर साहब को लगा कि वह इन्स्पेक्टर नहीं साक्षात् दुश्शासन है जो मरीजों से भरी क्लीनिक में उनका चीर-हरण कर रहा है ! संकट की इस घडी में उन्होंने अन्ना को याद किया. अन्ना का स्मरण करते ही डाक्टर साहब के शरीर में एक नयी स्फूर्ति का संचार होने लगा, उनके अन्नाभक्त रक्त में उफान आने लगा और सहसा उन्हें यह दिव्य ज्ञान प्राप्त हो गया कि वे ‘अन्ना टोपी’ रुपी कवच से सुरक्षित हैं !! उन्होंने ऐंठते हुए इन्स्पेक्टर को धमकाया, “मैं आपकी शिकायत आपके कमिश्नर साहब से करूँगा और तब आपको पता चलेगा कि आप किस से उलझ रहे हैं. अरे, आप मुझे कोई ऐरा-गैरा-नत्थूखैरा समझ रहे हैं क्या? मैं अन्ना-भक्त हूँ और भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ हूँ.”&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;डाक्टर साहब के इस प्रलाप का इन्स्पेक्टर पर लेशमात्र भी असर नहीं हुआ. उसने अपना फटीचर सा ब्रीफकेस खोला और कुछ कागजातों के साथ-साथ एक टोपी निकाली. कागजातों को टेबल पर रख उसने टोपी को शिरोधार्य कर लिया. डाक्टर साहब को मानो सांप सूंघ गया. उनकी बोलती बंद हो गयी और विस्फारित नयनों से एकटक वे उस टोपी और टोपी धारक को ताकते रहे. वह इन्स्पेक्टर भी अब उनकी ही तरह ‘अन्ना टोपी’ से सुसज्जित हो गया था. ‘अन्ना टोपी’ को अपने सर पर सही ढंग से व्यवस्थित कर इन्स्पेक्टर डाक्टर साहब से मुखातिब हुआ और बोला, “आपको कमिश्नर साहब से बात करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनके निर्देशन में ही मैं पिछले एक महीने से आपका समस्त लेखा जोखा खंगाल रहा हूँ और उनके द्वारा हस्ताक्षरित ये नोटिसें आपको तामील करने आया हूँ. कृपया इन्हें हस्तगत करें और प्रमाणस्वरूप अपने हस्ताक्षर अंकित कर दें.” कांपते हाथों से डाक्टर साहब ने हस्ताक्षर किये.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;इन्स्पेक्टर ने ‘अन्ना टोपी’ को पुनः ब्रीफ्केसस्थ किया और यह कहते हुए बाहर निकल गया, “मैं अन्नाभक्त नहीं सिर्फ ईमानदार हूँ! यह ‘अन्ना टोपी’ तो सिर्फ दिखावा है. होने को तो आप की ‘अन्ना टोपी’ भी वैसे दिखावा ही है, क्यूँ?” इन्स्पेक्टर के जाने के बाद डाक्टर साहब काफी देर तक ‘कारवाँ गुज़र गया ... गुबार देखते रहे’ की तर्ज़ पर नोटिसों को देखते और ‘दूसरी आज़ादी’ के इस साइड इफेक्ट पर सर धुनते रहे.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;और उसी पल से डाक्टर साहब के चेहरे से रौनक और सर से ‘अन्ना टोपी’ गायब हो गयी !!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em; text-align: justify;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Courier New', Courier, monospace;"&gt;नोट : इस कथा के सभी पात्र और स्थान पूर्णतः काल्पनिक हैं और एक ‘सच्चे भारतीय’ के चरित्र को उजागर करने के लिए मात्र रूपक के तौर पर हैं.&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="font-family: 'lucida grande', tahoma, verdana, arial, sans-serif; font-size: 11px;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;=================================&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-33767695288076166?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/33767695288076166/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=33767695288076166' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/33767695288076166'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/33767695288076166'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='दूसरी आज़ादी के साइड इफेक्ट्स – भाग दो'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-2459707912561687228</id><published>2011-09-06T22:00:00.000+05:30</published><updated>2011-09-07T11:53:43.398+05:30</updated><title type='text'>दूसरी आज़ादी के साइड इफेक्ट्स - भाग एक</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;i&gt;&amp;nbsp;&lt;a href="http://www.facebook.com/rituraj57"&gt;ऋतुराज &lt;/a&gt;सर&amp;nbsp;का लिखा यह लेख ! ऋतुराज सर बिहार राज्य के नालंदा जिला के रहने वाले हैं ! विश्व प्रख्यात नेतरहाट विद्यालय , पटना कॉलेज और जेएनयू से शिक्षा ग्रहण करने के बाद सन 1983 में भारतीय आरक्षी सेवा के अधिकारी बने और अपने गृह राज्य बिहार को सन 2005 तक सेवा दिया और स्वेच्छा से अवकाश ग्रहण &amp;nbsp;किया &amp;nbsp;! फिर उसके बाद कुछ वर्षों के लिये टाटा स्टील के साथ जुड़े रहे और पिछले दो साल से फुर्सत के क्षण अपने गृह जिला में बिता रहे हैं ! इनकी फोटोग्राफी भी कमाल की है !&amp;nbsp;&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;i&gt;============&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;i&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: white; color: #333333; font-family: 'lucida grande', tahoma, verdana, arial, sans-serif; font-style: normal; line-height: 16px;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;मेरे एक पुराने मित्र हैं. हम दोनों कालेज और विश्वविद्यालय के दिनों से ही मित्र रहे हैं और यह मित्रता अब तक बरकरार है. सार्वजनिक रूप से उनका नाम बताने में संकोच है इसलिए उन्हें ‘राजा’ के छद्मनाम से ही संबोधित करूँगा. मूल बिंदु पर आने के पहले ‘राजा’ का एक संक्षिप्त परिचय समीचीन होगा.&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;मेरी ही तरह ‘राजा’ के जीवन के समापन की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है अर्थात 50 वर्ष की सीमारेखा के पार खड़ा है वह भी. सही उम्र का पता तो खैर उसे भी नहीं है, क्योंकि उसके दूरदर्शी और कंजूस पिता ने विद्यालय में नामांकन के समय ही अपनी कंजूस प्रवृति के अनुरूप ‘राजा’ की उम्र अंकित करने में भी कंजूसी दिखा दी थी.&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; ‘राजा’ अपनी युवावस्था से ही काफी जुझारू किस्म का इंसान रहा है. लोकनायक जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रान्ति में उसने सम्पूर्णता से भाग लिया था. आपातकाल में पुलिस की लाठियां भी खाई थीं और जेल भी गया था. लिहाजा ‘राजा’ मुझसे दो साल बाद स्नातक बना. स्नातकोत्तर हेतु वह दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय आया और तब से संघर्ष के साथ-साथ उसने दिल्ली को भी सीने से लगा लिया. संघर्ष और दिल्ली ने उसके दिल में डेरा डाल दिया और इस चक्कर में प्रणय के लिए उसके दिल में कोई स्थान ही नहीं बचा. नतीजा यह हुआ कि 40 वसंत देखने के बाद ही वह प्रणय निवेदन कर सका. सम्प्रति ‘राजा’ अपने परिवार (पत्नी और दो छोटे बच्चों) के साथ दिल्ली में ही रहता है. लेकिन, दिल्ली की रौनक भी उसकी जुझारू प्रकृति के पैनेपन को कुंद नहीं कर पायी है और अभी भी वह हर संघर्ष में बढ़ चढ कर हिस्सा लेता है. ‘राजा’ की मैं बहुत कद्र करता हूँ क्योंकि तीन दशक से दिल्ली में रहने के बावजूद वह अब तक बुद्धिजीवी है.&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; ‘राजा’ ने अपनी आदत के मुताबिक़ अन्ना हजारे जी के नेतृत्व में ‘दूसरी आज़ादी की अगस्त क्रान्ति’ में भी सम्पूर्णता से भाग लिया. इस दौरान एक दिन मैंने उसे टी वी पर देखा. बिलकुल शिव स्वरूप दीख रहा था ... गले में सर्प माला की जगह भ्रष्टाचार विरोध की तख्ती थी और सर पर जटा की जगह ‘मैं अन्ना हूँ’ की टोपी. बच्चों को भी उसने अन्ना टोपी से संवार दिया था और अपनी धर्मपत्नी के चेहरे पर तिरंगा का लेप लगवा दिया था. ‘राजा’ और ‘रानी’ दोनों एक एक बच्चे का हाथ थामे हुए थे और पूरा परिवार जोर जोर से ‘वंदे मातरम’ ... ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ के नारे लगा रहा था. मैं मंत्रमुग्ध हो इस अविस्मरणीय दृश्य तो तब तक देखता रहा जब तक मुए टी वी वालों ने दृश्य बदल नहीं दिया. दूसरे दिन ‘राजा’ को मैंने फोन किया और बताया कि मैंने उसे टी वी पर देखा था सपरिवार. वह खुशी से झूम उठा, और पूछा ‘बढ़िया लग रहा था न?’ मैंने कहा, ‘अत्यंत मोहक दृश्य था ... पूरे के पूरे जोकर लग रहे थे तुम सब!’ वह कुछ खिसिया सा गया लेकिन भडका नहीं. बहुत ही संजीदा इंसान है मेरा मित्र.&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; कल जब अन्ना हजारे जी के अनशन का समापन हो गया और पूरा देश ‘दूसरी आज़ादी’ के जश्न टी वी पर मनाने लगा तो मैंने ‘राजा’ को बधाई देने के निमित्त फोन किया. परेशानी से सराबोर एक रुआंसी सी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी तो मैंने पूछा, ‘क्या हुआ, खैरियत तो है न?’ ‘राजा’ ने कहा, ‘अरे क्या बताऊँ यार, भारी मुश्किल खड़ी हो गयी है. बाद में फोन करता हूँ तुम्हें.’&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मैं चिंताग्रस्त हो उसके फोन का इंतज़ार करने लगा. मन में तरह तरह बातें घुमड़ने लगीं. खैर, देर रात उसका फोन आया. इस वार्तालाप को अक्षरशः प्रस्तुत कर रहा हूँ :-&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;मैं : “क्या बात है, इतने परेशान क्यों थे?”&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;राजा : “भारी मुसीबत हो गयी थी यार. यह पांच साल का छोटुआ सुबह सुबह मोहल्ले के अपने 10-12 दोस्तों को बुला लाया और अन्ना टोपी पहन, डाइनिंग टेबल को मंच बना कर अनशन पर बैठ गया. उसके दोस्त डाइनिंग टेबल को घेर कर बैठ गए और भजन गाने लगे. बीच बीच में वे ‘वंदे मातरम’ और ‘इन्कलाब जिंदाबाद’ के नारे भी लगाते.&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;मैं और तुम्हारी भाभी समझा समझा कर थक गए लेकिन वह माने तब तो !! काफी देर तक समझाने बुझाने के बाद मैंने खीझ कर डांट दिया तो उसके दोस्त भड़क गए. कहने लगे कि हम अन्ना की तरह अहिंसक और शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं और आप हमें धमकी दे रहे हैं??? एक दो बच्चे गए और मोहल्ले के ढेर सारे बच्चों-बच्चियों को इकठ्ठा कर लाये. बगल के पार्क में एक टेबल लगा दिया और छोटुआ को कंधे पर बिठा कर नारे लगाते हुए वहाँ लेते गए. तीन से तेईस साल के बच्चे-बच्चियां इकठ्ठे होने लगे. कुछ गिटार और ड्रम ले आये और लड़कियों के साथ मिल कर ‘मितवा ... ओ मितवा’ गाने लगे. एस.एम.एस और इंटरनेट के माध्यम से अपने सभी दोस्तों को खबर कर दी और थोड़ी ही देर में मोटरसाइकिलों / गाड़ियों पर सवार हो हो कर बच्चे पहुँचने लगे. पार्क के अगल बगल की सारी सड़कें खचाखच भर गयीं. मोहल्ले के बाज़ार में खबर हो गयी तो चाट/आइसक्रीम/भूंजा/नूडल बेचने वाले भी अपना अपना ठेला ले कर चले आये. अन्ना जी के अनशन के चक्कर में दिल्ली के हर बाज़ार में तिरंगे झंडों और अन्ना टोपी / अन्ना तख्ती की दुकानें तो खुल ही चुकी थीं ... वे सब भी अपना अपना बचा खुचा माल ले कर आ गए और ‘एक पर एक फ्री’ चिल्लाने लगे. तुम तो जानते ही हो कि फ्री की हर चीज़ हम भारतीयों को कितनी अच्छी लगती है, सो देखते ही देखते पूरा पार्क रामलीला मैदान की तरह तिरंगों / अन्ना टोपियों / अन्ना तख्तियों से पट गया. बाल हितों की रक्षा करने वाले कुछ गैर सरकारी संगठनों (एन.जी.ओ.) को भी खबर हो गयी. तुरंत फैब इंडिया के डिजाइनर कपड़ों में सजे धजे एन.जी.ओ. वाले भी कंधे पर झोला टाँगे पहुँच गए. उनलोगों ने तुरंत मंच बने उस टेबल के ऊपर एक शामियाना टंगवा दिया, लाउडस्पीकर लगवा दिया, बिजली बत्ती का इंतजाम कर दिया और छोटुआ के लिए एक पेडस्टल पंखा भी मंगवा दिया. बाल हितों की रक्षा में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करने के उद्देश्य से उन्होंने टी वी वालों को फोन करके खबर कर दी कि आज़ादी के बाद देश का महानतम बाल संघर्ष इस मोहल्ले में चल रहा है और इस संघर्ष को वे अपना पूरा समर्थन दे रहे हैं. बस, पलक झपकते टी वी वाले भी कैमरा और माइक लिए धमक गए. थोड़ी ही देर में पार्क में बच्चों से कहीं ज्यादा संख्या एन.जी.ओ. और टी.वी. वालों की हो गयी. बस यही समझो यार, कि रामलीला मैदान की तरह पूरा पिकनिक का माहौल बन गया मेरे मोहल्ले के पार्क में. अब बच्चे माइक के सामने ‘मितवा ... ओ मितवा’ के साथ साथ यह भी गाने लगे, ‘सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं”, “कर चले हम फ़िदा जान ओ तन साथियों ... अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों”, “मेरा रंग दे, मेरा रंग दे बासंती चोला ...”, “मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास ... हम होंगे कामयाब एक दिन” !!&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; टी वी पर ब्रेकिंग न्यूज़ आने लगा “आज़ादी के बाद का सबसे व्यापक बालाक्रोश”, “अपने अधिकारों की रक्षा के लिए मासूम बच्चों ने बाँधे सर पर कफ़न”, “माता-पिता द्वारा अपने बच्चों के लोमहर्षक उत्पीड़न का पर्दाफाश”, “दिल्ली में माँ-बाप ने ही घोंट दिया ममता का गला” आदि आदि. कुछ टी वी चैनलों ने सेवानिवृत्त समाजशास्त्रियों, बेरोजगार मनोवैज्ञानिकों, बूढ़े पत्रकारों और निठल्ले नेताओं को बुला कर चर्चा प्रारम्भ कर दी और छोटुआ के अनशन का गहन सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, मनोवज्ञानिक और भौगोलिक विश्लेषण होने लगा. एक दो टी वी चैनलों ने अन्य महानगरों में स्थापित अपने संवाददाताओं को निर्देश दिया कि दिल्ली में चल रहे इस बाल संघर्ष पर देश के बच्चों की प्रतिक्रियाएं दें. धड़ा-धड़ हर महानगर से बच्चों की प्रतिक्रियाएं आने लगीं कि वे इस संघर्ष में छोटुआ के साथ हैं और अपने माता-पिता के ज़ुल्म अब वे बर्दाश्त नहीं करेंगे. टी वी वालों ने छोटुआ के अनशन को “बाल आज़ादी का प्रथम भारतीय संग्राम” घोषित कर दिया.&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; देखते ही देखते तीन-चार पुलिस जिप्सियां सायरन बजाती हुई मेरे घर के सामने आ गयीं. क्या बताऊँ भाई, पहली बार घर में पुलिस वालों को देख कर मेरे तो रोंगटे ही खड़े हो गए. थानेदार ने गुर्राते हुए कहा, “यह क्या बवंडर खड़ा कर दिया है आपके बच्चे ने? क्या मांग है उसकी??” मैंने कहा, “अभी तक तो मुझे बताया ही नहीं है कि उसकी मांग आखिर है क्या!!” इतना सुनते ही थानेदार हत्थे से उखड़ गया और बोला, “इतना बड़ा बवंडर खड़ा हो गया है और आप को पता तक नहीं है कि आपके बेटे की मांग क्या है?? तुरंत जाइए और इस मामले को फौरन निपटाइए, वर्ना आप दोनों पति-पत्नी को बाल उत्पीडन के जुर्म में गिरफ्तार करना पड़ जाएगा !”&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मैंने थानेदार को समझाने की बहुत कोशिश की कि हमने कोई बाल उत्पीडन नहीं किया है. अपने दोनों बच्चों पर हाथ उठाना तो दूर हमने कभी उनके कान तक नहीं ऐंठे हैं. लेकिन वह मानने को तैयार ही नहीं हुआ और बोला, “इतना व्यापक जनाक्रोश क्या बिना बात के ही है? अरे, जरूर आप दोनों नियमित रूप से अपने बच्चों को उत्पीड़ित करते रहे होंगे जिसका परिणाम इस व्यापक जन आंदोलन में नज़र आ रहा है मुझे. आप अभी तुरंत जाइए और अपने बच्चे से बात करिये.” अपने छोटे दारोगा को उसने हिदायत दी, “साथ जाओ इसके ... और ध्यान रखना कहीं भाग ना जाए!”&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मुंह लटकाए मैं छोटे दारोगा और एक दो सिपाहियों से घिरा हुआ मंच के पास पहुंचा. मुझे पुलिस वालों के साथ देखते ही एन.जी.ओ. वाले उत्तेजित हो गए और नारे लगाने लगे. “हर जोर ज़ुल्म के टक्कर में ... संघर्ष हमारा नारा है”, “जो हमसे टकराएगा ... चूर चूर हो जाएगा”, और “वापस जाओ ... वापस जाओ” के नारों से पूरा मोहल्ला गूंजने लगा. मैं अवाक खड़ा हो कर टेबल नुमा मंच पर आसीन अपने बच्चे को देखता रहा ... वह मसनदों के सहारे अधलेटा हुआ था और उसकी दो सहपाठिनें उसे पंखा झल रही थीं. उधर भीड़ की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी. वह तो भला हो उस छोटे दरोगा का जिसने समय रहते मुझे वहाँ से निकाल लिया नहीं तो मुझे अस्पताल ही पहुंचा देते ये एन.जी.ओ. वाले.&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; थानेदार ने सुना तो उसने छोटे दारोगा को कहा, “फौरन दो तीन लोगों को सादे कपड़ों में भेजो और प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधिमंडल को वार्ता के लिए प्रेरित करो”. कुछ ही देर में तीन एन.जी.ओ. वाले छोटुआ के प्रतिनिधिमंडल के रूप में वार्ता के लिए आ गए. मैंने उनसे पूछा, “क्या मांग है छोटुआ की?” वे बोले, “आप पहले यह बताइये कि उसकी सभी मांगें मानने के लिए आप तैयार हैं या नहीं?” मैंने कहा, “अरे पहले मांगें तो बताइये!” मेरे यह कहते ही वे तैश में आ गए और तमतमाते हुए बाहर चले गए. टी वी वालों ने उनको घेर लिया और सवालों की बौछार कर दी. प्रतिनिधिमंडल के एक सदस्य ने जवाब दिया, ”हमारे लाख प्रयास करने के बावजूद, छोटुआ जी के पिता के अड़ियल रवैये के कारण ... वार्ता विफल हो गयी है. वे बालमानस की मांग तक सुनने के लिए तैयार नहीं हैं. ऐसा लगता है कि छोटुआ जी उनके सगे नहीं सौतेले बेटे हैं.”&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; टी वी चैनलों में हमारी भर्त्सना करने की होड़ लग गयी. मेरा घर पड़ोसियों, पुलिसवालों और नेताओं से खचाखच भर गया. इन सबकी सलाह और डांट सुनते सुनते मेरे कान पक गए. उधर तुम्हारी भाभी का रो रो कर बुरा हाल हो गया. उसे चुप कराने जाऊं तो वह बार बार यही कहती, “दोपहर हो गयी और मेरे छोटुआ ने अभी तक कुछ खाया नहीं है. आप कुछ भी करिये लेकिन उसके&amp;nbsp; अनशन को समाप्त करवाइए नहीं तो मैं आपको कभी माफ नहीं करूंगी.”&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मैंने कुछ पड़ोसियों को कहा कि कृपया छोटुआ के प्रतिनिधिमंडल को वार्ता के लिए पुनः बुलाने का प्रयास करिये क्योंकि यदि मैं उस पार्क में गया तो भीड़ को एन.जी.ओ. वाले फिर उत्तेजित कर देंगे. मैं छोटुआ की हर मांग बिना शर्त मानने के लिए तैयार हूँ.&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; पड़ोसियों ने लौट कर सूचना दी कि एन.जी.ओ. के नेतागण बगल के पांच सितारा होटल में लंच करने चले गए हैं. वे जब लौटेंगे तब ही वार्ता संभव है. मैंने माथा पीट लिया. उधर मेरा मासूम छोटुआ सुबह से भूखा प्यासा बैठा है और इधर ये एन.जी.ओ. वाले, जो खुद को उसका हमदर्द बताते हैं, पांच सितारा भोजन का लुत्फ़ उठा रहे हैं. मन में तो आया कि दुबारा आयें तो इन एन.जी.ओ. वालों का गला ही घोंट दूँ. पर क्या करता, खून का घूँट पीकर रह गया.&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; शाम के चार बज गए तब जा कर कहीं छोटुआ का एन.जी.ओ. प्रतिनिधिमंडल प्रगट हुआ. पता चला कि लंच के बाद वे आराम करने चले गए थे. आते के साथ उन्होंने पूछा, “हाँ तो छोटुआ की सारी मांगें मानने के लिए आप तैयार हैं या नहीं?” मैंने दांत पीसते हुए कहा, “हाँ, मैं तैयार हूँ. क्या मांगें हैं उसकी?” वे बोले, ”अपनी मांगें तो वही बताएगा क्योंकि उसकी मांग से हमें कोई लेना देना नहीं है. हाँ, आज आपके छोटुआ के संघर्ष ने हमें पूरे भारत में विख्यात कर दिया है.” मारे गुस्से के मैं कांपने लगा. ये लोग मेरे छोटुआ को मोहरा बना कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं ... एक निरीह और अबोध बालक की जान से खेल रहे हैं ... ये इंसान हैं या हैवान??? क्या विदेशी धन के लालच में ये किसी को भी बलि का बकरा बना दे सकते हैं? तरह तरह के प्रश्न कौंध रहे थे मेरे मन में, पर मौके की नजाकत तो समझ कर मैं चुप ही रहा.&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; &amp;nbsp; एन.जी.ओ. प्रतिनिधिमंडल ने बाहर निकल कर घोषणा की, “छोटुआ जी &amp;nbsp;के पिता के रुख में कुछ बदलाव आया है लेकिन वे अभी भी सभी मांगें मानने के लिए तैयार नहीं हैं. इसलिए छोटुआ जी का अनशन अभी जारी रहेगा.”&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मैं, पडोसी, पुलिस वाले सभी अवाक रह गए ... यह क्या कह रहे हैं ये एन.जी.ओ. वाले??? मैंने तो बिना शर्त सभी मांगें मानने की बात कही थी और ये बिलकुल उल्टी बात बता रहे हैं टी वी वालों को !! गुस्से में मैं घर के बाहर निकला तो थानेदार ने मुझे रोक लिया. उसे अब मेरी हालत पर तरस आ रहा था. मुझसे उसने पूछा, “कहाँ है आपका बड़ा बेटा? उसे बुलवाइए.” कुछ पडोसी पार्क की तरफ भागे और थोड़ी देर में मेरे बड़े बेटे बड़कू को साथ लिए लौटे.&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; थानेदार ने बड़कू को अपने पास बिठाया और प्यार से पुचकारते हुए कहा, “बेटा, तुम्हारा छोटा भाई सुबह से भूखा है, तुम्हारी माँ का रो रो कर बुरा हाल हो गया है, तुम्हारे पिता दिन भर परेशान रहे हैं. क्या तुम्हें अपने भाई के लिए बुरा नहीं लग रहा है?” बड़कू रुआंसा हो गया और बोला, “अंकल, छोटुआ तो कब से अनशन तोड़ने को तैयार बैठा है लेकिन ये एन.जी.ओ. वाले उसे मंच से हटने ही नहीं दे रहे हैं.” थानेदार ने कहा, “बेटा, जाओ और छोटुआ को बोलो कि वह मंच से घोषणा कर दे कि उसकी सभी मांगें मान ली गयी हैं और इसलिए वह अब अपना अनशन समाप्त कर रहा है ... लेकिन ध्यान रहे कि यह बात कोई एन.जी.ओ. वाला नहीं सुने.” बड़कू चुपचाप उठा और बाहर चला गया. कुछ पडोसी भी उसके साथ चल पड़े पीछे पीछे.&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; कुछ समय बाद पड़ोसियों ने लौट कर बताया कि बहुत समझदारी का परिचय देते हुए बड़कू छोटुआ को ले कर टेबल के एक कोने में चला गया है और कान में फुसफुसा रहा है. थानेदार मुस्कुराया और बोला कि बस अब कुछ ही देर में सारा मामला शांत हो जाएगा ... आप लोग चिंता मत करिये बस टी वी देखिये.&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; और थोड़ी ही देर में सचमुच टी वी पर ब्रेकिंग न्यूज़ आने लगा “छोटुआ जी की मांगे बिना शर्त मानी” ... “छोटुआ जी ने अपना अनशन समाप्त करने की घोषणा की”, “छोटुआ जी की जीत पूरे राष्ट्र के बच्चों के हक की जीत है” ... !!&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; आधे घंटे में ही बड़कू और छोटुआ के अन्य दोस्त उसे कंधे पर बिठाए हुए घर आ गए. पीछे पीछे एन.जी.ओ. वाले भी जीत के नारे लगाते हुए चल रहे थे. &amp;nbsp;छोटुआ दौड कर अपनी माँ से चिपट गया. मैंने एन.जी.ओ. वालों को कहा, “सालों, यदि घर के अंदर पैर रखा तो पैर तोड़ कर हाथ में दे दूंगा ... उसके बाद बच्चों नहीं अपाहिजों के हितों की रक्षा करते रहना.” थानेदार भी उनपर गुर्राया तो वे अपना अपना झोला संभालते हुए भागे.&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; घर के अंदर पहुंचा तो छोटुआ रोते रोते अपनी माँ से कह रह था कि मैं तो बस मैगी नूडल खाना चाहता था. उस दिन पापा के साथ रामलीला मैदान में अन्ना का अनशन देखा था तो मुझे लगा कि यह काम बहुत अच्छा होता होगा इसीलिए अनशन करने लगा था. अब कभी नहीं करूँगा मम्मी!!&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; बस यार इसी परेशानी में दिन भर उलझा रहा था ... अभी मैगी नूडल खा कर छोटुआ सो गया है, तुम्हारी भाभी को भी काम्पोज खिला कर सुला दिया है और तुम्हें फोन करके अपनी आपबीती सुना रहा हूँ यार.”&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;मैं : “ अरे यार, यह तो लेने के देने पड़ गए तुम्हें.”&lt;/div&gt;&lt;div style="line-height: 1.5em;"&gt;राजा : “हाँ यार, दूसरी आज़ादी का साइड इफेक्ट है यह.”&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-2459707912561687228?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/2459707912561687228/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=2459707912561687228' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/2459707912561687228'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/2459707912561687228'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='दूसरी आज़ादी के साइड इफेक्ट्स - भाग एक'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-6236200253095402411</id><published>2011-08-19T21:16:00.002+05:30</published><updated>2011-08-19T22:14:30.723+05:30</updated><title type='text'>अन्ना का आंदोलन - भाग एक</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बचपन याद है ! बुढा बाबा ( बाबा के बड़े चाचा ) ओसारा के एक कोना में एक पलंगनुमा काफी ऊँचा 'नेवारी' &amp;nbsp;के &amp;nbsp;खटिया पर् लेटे रहते थे ! बहुत गुस्से वाले थे और कंजूस भी - जो कुछ भी हम लोग हैं - उनके त्याग का ही फल है - खुद उनको अपनी कोई संतान नहीं थी ! छोटे मोटे ज़मींदार थे !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जब उनका मूड ठीक होता हम बच्चे उनके बगल में बैठ जाते ! वो दौर था - जब हम मिडिल स्कूल में पढते थे ! &amp;nbsp;वीर कुंवर सिंह का नाटक हमारे किताब में था ! 'खूब लड़ी मर्दानी- झांसी की रानी' कविता कंठस्थ था ! चेतक :) और 'हार की जीत' ! बुढा बाबा से एक प्रश्न किया था - बाबा , देश आज़ाद हुआ तो आप कितने वर्ष के थे - वो बोले पचपन ! गांधी जी - हमारे गाँव आये थे ? वो बोले - हाँ , बगल वाले गाँव में 'कार' पर् ! गाँधी जी और कार :( मूड ऑफ हो गया था :( 'वामपंथी किताबों' में कार का जिक्र ही नहीं होता था !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बाबा राजनीति में थे ! बाबा से प्रश्न होता था - राजेन बाबु ( डा० राजेंद्र प्रसाद ) से आप मिले हैं ? वो बोले - हाँ ! संतोष होता था ! मेरा परिवार भी आजादी की लड़ाई में शामिल था ! राजेन बाबु की सादगी की कल्पना ही अपने आप में रोमांचित करती थी ! वामपंथी इतिहास की किताबें ! बाद में पता चला - राजेन बाबु का हमारे छपरा जिला के सबसे बड़े 'ज़मींदार' 'हथुआ' से काफी गहरे सम्बन्ध थे !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एक याद है - एक मामा के बियाह में १९८२ में पटना आये थे ! कदमकुआं से 'बिहार विधानसभा' निकल गए &amp;nbsp;- यह देखने की वो कौन सात विद्यार्थी थे जिन्होंने देश के लिये गोली खाया ! फिर उन नामो में 'खुद के जिले' का कोई है या नहीं - उसको खोजना ! मुजफ्फरपुर में थे तो 'खुद्दी राम बोंस' की मूर्ती के पास से जब भी गुजरे - एक नमन तो जरुर ही किया ! बचपन में सोचता था - जब भी बड़ा होऊंगा - भगत सिंह - चंद्रशेखर आज़ाद जैसा मुछ रखूँगा ! चंद्रशेखर आज़ाद के किस्से हर वक्त जुबान पर् होता था ! कई चाचा - मामा टाईप आईटम लोग वैसा ही मुछ रखता था !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;थोडा बड़ा हुए तो - पटना आये ! यहाँ हर कोई 'छात्र आंदोलन ' का नाम लेता ! छात्र आंदोलन में हई हुआ - हउ हुआ ! लालू - नितीश - पासवान - यशवंत सिन्हा - फलना - ठेकाना - झेलाना - जिसको देखो - सब के सब 'छात्र आंदोलन' की उपज ! कुछ लोग इमरजेंसी की प्रशंषा भी करते - कहते ट्रेन समय से चलने लगे थे ! समाज में बकवास बंद हो गया था - पर् घुटन थी !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस् तरह की कई कहानीयां कानों में गूंजती रही ! जब कोई बोलता - आंदोलन - तो हमारे जेनेरेशन के पास कहने को था - 'आई टी आंदोलन' ! मेरा जेनेरेशन सबसे ज्यादा बदलाव देखा है ! मंडल - कमंडल आया लेकिन वो समाज को विभाजीत ही कर के गया :( शर्म से उसको 'आंदोलन' नहीं कह सकते थे :( आई टी - आंदोलन में सब कुछ था - पर् वो नहीं था - जो आजादी और छात्र आंदोलन में था ! आई टी - आंदोलन कुछ फीका जैसा लगता था :(&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;'अन्ना' आये ! क्या आये ! जबरदस्त आये ! वो सभी इतिहास की किताबों को सच करने का मौका आ गया ! कानो में गुजती उन कहानीओं को जुबान पर् लाने को दिल मचलने लगा ! टी वी पर् सीरीयल बंद हो गया - रवीश कुमार की खनकती आवाज़ गूंजने लगी ! मस्त ! दिन भर ओफ्फिस में बॉस से अन्ना को डिस्कस &amp;nbsp;करने के बाद 'होंडा सीटी' को घर के पड़ोस वाले पार्क के नज़दीक पार्क कर के - मोमबत्ती मार्च में शामिल होना - फिर खुद के घर के बालकोनी की तरफ - अपनी ही बीवी को गर्व से देखना - देखो ..देखो ..न..मै &amp;nbsp; भी कुछ कर सकता हूँ ! मै विदेशी कंपनी' का गुलाम नहीं - एक भारतीय भी हूँ - तुम भी आओ न ..हर्ष और खुशी को भी लेकर आओ ...रुको आती हूँ ..जींस मिल नहीं रहा ! &amp;nbsp;ऐसा लगा - हम भी इतिहास में शामिल हो गए !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;थैंक यू - अन्ना !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-6236200253095402411?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/6236200253095402411/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=6236200253095402411' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/6236200253095402411'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/6236200253095402411'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='अन्ना का आंदोलन - भाग एक'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-8349994389931609484</id><published>2011-06-22T23:32:00.000+05:30</published><updated>2011-06-22T23:32:56.322+05:30</updated><title type='text'>बहस जारी रहेगी ...भाग एक !!</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बहुत पहले की बात है ! एक दोस्त को इंजीनियरिंग में 'मैकेनिकल ब्रांच' मिला ! उसके बाबु जी का बयान था - 'जीप वाला नौकरी नहीं मिलेगा - एस डी ओ नहीं बन् पायेगा' ! बेहद निराशजनक शब्दों में ! शायद उसके बाबु जी की चाहत थी - सिविल इंजिनियर बनता - बिहार सरकार में इंजीनीयर होता - कंकरबाग में जमीन खरीदता - फिर उसमे चार मंजिला मकान - दरवाजे पर् एक जीप खड़ी होती ! दोस्त एकदम अड़ा रहा - पढूंगा तो मैकेनिकल ही वरना कुछ नहीं !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस् पिता की अभिलाषा कहाँ से आई ?&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मेरे इस् मैकेनिकल दोस्त की एक दोस्त होती थी ! बेहद ख़ूबसूरत ! एक देर शाम "नोट्स" आदान प्रदान करना था ! अब उसके घर जाना था ! मै प्लस टू ज़माने में गैरों के लिये काफी 'सोबर' और नजदीक से जानने वालों के लिये 'बदमाश' ! अब दोस्त के 'दोस्त' के घर जाना था ! देर शाम था ! कार चलाने सिर्फ मुझे ही आता - ऊपर से मै काफी 'सोबर' - कहीं भी किसी से पहली मुलाकात में - एक इम्प्रेशन बढ़िया बनने का डर - मेरे दोस्त को सता रहा था ! खैर , मन मार् के वो मुझे लेकर गया !दोस्त के दोस्त के &amp;nbsp;घर पहुंचे ! एक ड्राईंग रूम खुला - वहाँ से दूसरा ड्राईंग रूम - फिर तीसरा ड्राईंग रूम ! मेरा माथा घूम गया ! टेंशन में हम सोफा पर् धम्म से जा गिरे ! ख़ाक ..इम्प्रेशन बनेगा ! तीन ड्राईंग रूम देख और तीनो बेमिसाल -&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम तीन दिन तक सोचते रहे - बिहार सरकार !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मेरे गाँव में - हमारे घर के ठीक सामने वाले घर से - एक चाचा जी - इंजीनियरिंग में टॉप किये ! इंजीनियरिंग में टॉप बोले तो पक्का इंजिनियर - उनके फाईनल ईयर प्रोजेक्ट को देश भर में सहारा गया ! अब वो एम टेक करने लगे ! इरादा कुछ और था - होस्टल के लॉबी के सभी विद्यार्थी - यू पी एस सी दे रहे थे - ये भी बैठ गए ! आई ये एस बन् गए ! इनके बाबु जी इनको लेकर मेरे बाबु जी के पास आये ! सर झुका ! मेरे बाबु जी बोले - सर क्यों झुकाए हो ? हाकीम बन् गए :)) खुश रहो ! आई एस एस चाचा बोले - नहीं ....मन था अमरीका जा कर कुछ रिसर्च करता !&amp;nbsp;खैर हाकीमगिरी में अठारह साल गुजारे और अब देश के सबसे धनी व्यक्ती के कंपनी में सबसे बड़े मैनेजर हैं :))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;क्या सामाजिक दबाब ने विश्व से एक बेहतरीन वैज्ञानिक नहीं छिन लिया ??&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मार्च महीने में पटना जा रहा था ! राजधानी एसी टू में आर् ए सी ! साथ में उमर में काफी छोटा लड़का ! बात शुरू हुई - हम पूछे - बाबु क्या करते हो ? बोला - सर , मै फलाना स्टेट में फलाना अधिकारी हूँ ! मैंने बोला - हूँ ..आई ए एस हो - और मै मुस्कुरा दिया ! मेरी मुस्कान थोड़ी टेढी थी ! उसने हंसते हुए बोला - सर , मै ईमानदार रहूँगा ! मै जोर से हंस दिया ! वो काफी शरमा रहा था - टी टी को बुला - मैंने उसको फर्स्ट क्लास में भेज दिया !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;क्या जरुरत आ पडी - उसको यह बोलने की - 'मै ईमानदार रहूँगा' !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बहस जारी रहेगी ....क्रमशः&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-8349994389931609484?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/8349994389931609484/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=8349994389931609484' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/8349994389931609484'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/8349994389931609484'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/06/blog-post_22.html' title='बहस जारी रहेगी ...भाग एक !!'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-2576049597614209279</id><published>2011-06-10T13:37:00.000+05:30</published><updated>2011-06-10T13:37:06.283+05:30</updated><title type='text'>मेरा गाँव - मेरा देस - गर्मी की छुट्टी</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;परसों ट्विटर पर् देखा ..जुही चावला अपने बच्चों के बारे में लिखी थीं - उनके बच्चे गर्मी की छुट्टी मनाने अपने 'ग्रैंड &amp;nbsp;पैरेंट्स' के पास गए हैं :) मेरे बच्चे भी चार जुन को पटना निकल गए ! मुझे भी जाना था पर् नहीं गया ! ट्रेन पर् बहुत खुश थे ...ट्रेन खुलते वक्त बच्चों ने फ्लाईंग किस दिया ...रमेश भी उसी ट्रेन से जा रहा था ..गेट पर् लटका हुआ था - बोला की - भाभी को फ़्लाइंग किस दे रहे हैं , क्या ? हम बोले ..नहीं भाई ...बच्चे खुश हैं ...उनको फ्लाईंग किस मार् रहा था ..और कुछ नहीं !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अपना बचपन याद आ गया ! बचपन से लेकर मैट्रीक की परीक्षा पास करने तक मैंने सभी गर्मी की छुट्टीयां 'गाँव में बाबा - दीदी ( दादी ) के साथ ही मनाया है ! मस्त ! हर उम्र की यादें साथ हैं !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दस बजिया - हिन्दी स्कूल से पढ़ा लिखा हूँ ! छमाही की परीक्षा खत्म होते ही 'पटना/मुजफ्फरपुर' का डेरा जेल सा लगने लगता था ! माँ बाबु जी किसी जेलर से कम नहीं ! गाँव से किसी के आने का इंतज़ार - फिर गाँव के लिये निकल पड़ना ! बाबू जी वाला जेनेरेशन पहला जेनेरेशन नौकरी था - गाँव से लोगों को लगाव था ! पूरा गाँव आ जाता था ! मजा आता !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सुबह में दरवाजा पर् बड़ा बाल्टी और बाल्टी में पानी और पानी में आम ! कहीं से भी खेल कूद कर आईये और एक आम :) मुझे आम चिउरा बहुत पसंद ! चिउरा को पानी में फूला कर फिर आम के रस के साथ - भर पेट नाश्ता ! फिर थोड़ी धूप निकल जाती - तो दालान में "वीर कुंवर सिंह" वाला नाटक खेलना ! शाम को "घोन्सार" से भूंजा आता - तरह तरह का - चावल का - चना का - मकई का - शाम को भर पाकीट भूंजा ! फिर खेल कूद !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लट्टू नचाना पसंदीदा होता ! बढ़ई के यहाँ जा कर गूँज ठोकवाना ..फिर लट्टू ..शाम को 'गुल्ली - डंडा' ...वो एक समय था - "गुरदेल का" ( गुलेल ) ! गाँव के दक्षिण से 'चिकनी मिट्टी' लाना - उसकी गोली बनाना और फिर गोली को धूप में सुखा - आग में पका - गुलेल चलाना ! उफ्फ्फ्फ़ ....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;क्या लिखूं और क्या न लिखूं ? सप्ताह में दो बार - गाँव में हाट लगता था - बाबा चार आना देते थे ! चार आना में "भगाऊ महतो" के ठेला पर् खूब तीता "भूंजा" खाते ...दौड़ते भागते घर लौट आना ! गाँव के बाज़ार में "छुरी" बिकता - बहुत मन करता - एक मै भी रखूं - बाबा से जिद करता - बाबा अपने पॉकेट में एकदम कडकड़ीया नोट रखते थे - वहीँ से एक पांच रुपैया का नोट निकालते और मै एक छुरी खरीदता - घर लौटते - लौटते उंगली कट चुकी होती - घर में किसी को इज़ाज़त नहीं थी - डांटने की ! 'हजाम डाक्टर' आते ! मरहम पट्टी लगती ! फिर मै बाबा के साथ उनके हवादार कमरे में सो जाता ! बाबा के सिराहने एक बन्दूक - एक टॉर्च होता और खूब बड़ा मसनद !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आम से कुछ याद आया - अन्यथा नहीं लीजियेगा ! हम बिहार के 'छपरा जिला' वाले थोड़े गरीब होते हैं ! पुरे भारत में इससे ज्यादा उपजाऊ ज़मीन कहीं और की नहीं है - सो जनसँख्या ज्यादा है ! 'इज्ज़त बचाने' के लिये हम सम्मलित रूप से रहते हैं ! कई बगीचा हम 'पट्टीदारों' में संयुक्त थे ! वहाँ से आप तुडा कर आता था - परबाबा जिन्दा थे - आँख से अंधा - क्या मल्कियत थी ....सभी आम उनके सामने रखा जाता ..एक आदमी गिनती करता ...फिर सभी पट्टीदारों में बराबर ..हाँ , पहला हिस्सा 'राम जानकी मठ' को जाता ! इसको हमलोग 'मठिया' कहते थे ! मेरे परिवार के पूर्वजों का देन है - ट्रस्ट है ! इस् ट्रस्ट का मुखिया हमेशा हमारे परिवार का सबसे बुजुर्ग व्यक्ती ही होगा ! गाँव की सबसे बढ़िया ज़मीन इस् ट्रस्ट को दान दी हुई है - करीब पचीस एकड का एक प्लाट है !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आम बंटवाने का रोज का नियम होता था ! तरह तरह के आम - केरवा आम , पिलुहिया आम , बिज्जू , सेनुर ..मालूम नहीं कौन कौन ...! तब तक बड़े बाबा मुजफ्फरपुर से लकड़ी के बक्सा में पांच दस हज़ार लीची भेजवा देते थे ! शाही लीची ! दालान पर् रख दे तो दालान खुशबू से भर जाता !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दोपहर में नहाने में मजा आता ! 'इनार' पर् - बाबा के साथ ! लक्स साबुन घस घस के ! "पकवा इनार" ! धीरे धीरे इनार की जगह चापाकल ले लिया ! थोड़ी देर चापाकल चलाया जाता ! उसमे ठंडा पानी निकलता ! पानी एक बड़ा लोहे के टब में भरा जाता ! टब को चार आदमी पकड़ के 'बरामदा में लाते' वहाँ एक खूब बड़ा पीढा होता - उसपर बाबा नहाते ! लक्स साबुन से ! जनेऊ मे वो अपना बेहतरीन मूंगा वाला खूब बड़ा अंगूठी बाँध देते ! फिर वो दुर्गा पाठ करते - सिर्फ धोती पहन ! फिर एकदम सात्विक भोजन ! पीढा पर् बैठ के - भंसा घर के कोना पर् - परदादी खुद बाबा का खाना परोसती - अंत में दही &amp;nbsp;! यह एक ऐसी आदत लगी मुझे की मै कभी भी 'भोज भात' में नहीं खा पाता हूँ - खाते वक्त मै बिलकुल अकेला होना चाहिए ! आज भी - दोपहर का भोजन मै बिलकुल अकेले करता हूँ और पत्नी उतने देर खड़ी रहती हैं !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बाबा राजनीति में थे सो गोपालगंज में डाकबंगला मिला हुआ था - कई एकड में फैला हुआ - डाक्बंगला ! लाल बत्ती गाड़ी और एस्कोर्ट जीप और मालूम नहीं क्या क्या ! बाबा के साथ गोपालगंज निकल जाता ! बाबा नहा धो अपने राजनीतिक सफर पर् और मेरे साथ उनका खानसामा ! डाकबंगला के सामने दो होटल थे ! वहाँ से एकदम खूब झालदार , गाढा रस वाला 'खन्सी का मीट' एक प्लेट आता ! भात और मीट खा के एक नींद मारता ! &amp;nbsp;बाबा एक जीप मेरे लिये डाकबंगला में रखवा देते थे और गोपालगंज के सभी 'सिनेमा हौल' को बोला होता था - मै कभी भी किसी भी सिनेमा हॉल में धमक जाउंगा - सो बिना किसी रोक टोक सिनेमा देखने दिया जाए ;) मेरी सबसे छोटी और मुझे सबसे ज्यादा मानने वाली फुआ वहीँ गोपालगंज के महिला कॉलेज में शिक्षिका थी - उसके डेरा पर् निकल जाता ! बहुत खातिर होता ! बहुत महीन और पढ़ा लिखा परिवार ! बैंक में पैसा रख भूखे पेट सोने वाला परिवार नहीं था - तरह तरह का सब्जी ! छोटा फुफेरा भाई था - हम जहाँ जाते वो मेरे पीछे पीछे ! &amp;nbsp;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;धीरे धीरे हम टीनएज हो गए ! गाँव में लगन का समय होता ! दिन में जनेऊ और रात में बारात ! स्कूल पर् बारात ठहरता ! अपना टीम था ! अब हम रात में "दुआर" पर् सोने लगे ! दादी बहुत ख्याल रखती ! बाबा के बड़ा वाला खटिया के बगल में मेरा भी खटिया लगता ! खूब बड़ा - एक दम टाईट बिना हुआ ! सफ़ेद खोल वाला तोशक और चादर ! दो बड़ा मसनद , एक सर के पास और एक पैर के पास ;) बगल में स्टूल - स्टूल पर् एक 'जग ठंडा पानी' और गिलास ! मुशहरी का डंडा और सफ़ेद कॉटन वाला मुशहरी ! रात में सब चचेरा भाई लोग के साथ 'स्कूल पर् रुके हुए बारात का नाच देखने के लिये फरार' ;) डर भी - कोई पहचान न ले ! कभी कोई हंगामा होता तो सबसे पहले हम भागते ! हा हा हा ! सोनपुर मेला से खरीदा हुआ "गुपती" साथ में होता - किसी पर् चल जाए तो भगवान भी न बचा पाये !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;थोड़ा और बड़ा हुए तो चाचा का 'राजदूत मोटरसाईकील' ! मजा आ जाता ! चाचा बैंक में मैनेजर हैं ! अगर चाचा गाँव पर् नहीं हैं - बाबा भी नहीं हैं - फिर एक चेला मोटरसाईकील के पीछे !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मैट्रीक की परीक्षा के बाद मै जबरदस्ती गाँव गया और खेती सिखा ! बाबा एक बगीचा लगवाए थे ! बाबा ही नहीं - हम तीनो पट्टीदार ! अलग अलग जगह - बगीचा के बगल में पोखर ! सुबह सुबह बगीचा चला जाता ! दस बजे तक वहीँ रुकता ! फिर पम्प सेट चालू करवा - खूब ठंडा पानी में &amp;nbsp;छोटा वाला चौकी पर् 'गमछी' लपेट - जनेऊ धारण कर - नहाता ! फिर वहाँ से खाली पैर - एक किलोमीटर चल घर पहुँचता ! फिर शाम को बगीचा में - फिर नहाना !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आज भी बाबा से उस बगीचे का हाल जरुर पूछता हूँ ! बाबू जी दोनों भाई को बाबा ज़मीन बाँट दिए हैं - बगीचा का कौन सा हिस्सा मुझे मिला - बाबा कहते हैं - आ कर देख लो ! अपना सब ज़मीन पहचान लो !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आज उस ज़मीन से पेट नहीं भरेगा ! बहुत दुःख है ! कुछ और ज़मीन होता ! असली रईसी तो वहीँ है - जो जमीन से जुड़ा है - बाकी सब तो ...खोखला है ! ज़मीन ऐसा चीज़ है ..टाटा - बिडला भी ईमानदारी से नहीं खरीद सकते :))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मेरे बच्चे पटना गए हुए हैं - गाँव भी जायेंगे ! 'मल्कियत' तो नहीं रही - फिर भी &amp;nbsp;कुछ तो एहसास होगा ....समय बदल गया है ...फिर भी ..कुछ चीजें इतनी जटिल होती हैं ..उनको बदलने में कई जेनेरेशन लग् जाता है !!&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-2576049597614209279?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/2576049597614209279/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=2576049597614209279' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/2576049597614209279'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/2576049597614209279'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='मेरा गाँव - मेरा देस - गर्मी की छुट्टी'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-1261059607528624535</id><published>2011-04-25T20:21:00.001+05:30</published><updated>2011-04-25T20:23:59.731+05:30</updated><title type='text'>एक सच्ची कहानी ....भाग - एक</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बात चार साल पुरानी है ! मेरे 'हेड' जो भारत सरकार के वैज्ञानिक रह चुके थे अचानक से हमारे यहाँ से छोड़ कर चले गए ! जिम्मेदारी मेरे कंधो पर आ गयी ! मुश्किल घड़ी थी - तब जब आपके डिपार्टमेंट में करीब चालीस 'पढ़ी लिखी' महिलायें हो :( मैंने अपनी मुश्किल ऊपर तक पहुंचाई और मुझे 'एम टेक ( कंप्यूटर इंजिनीयरिंग)' का इंचार्ज बना दिया गया और डिपार्टमेंट के झमेले से छूटकारा मिल गया &amp;nbsp;! यह कोर्स विश्वविद्यालय के शिक्षकों के लिए ही था ! खैर जुलाई का महीना था - कॉलेज में छुट्टी हो गयी और मै इस कोर्स के चलते छुट्टी पर नहीं जा सका ! यहाँ एक नियम था की सिर्फ - प्रोफ़ेसर रैंक के ही शिक्षक पढ़ा सकते हैं ! अब कंप्यूटर इंजिनीरिंग में प्रोफ़ेसर पास के आई आई टी में ही थे और उनके नखरे इतने की मुझे उनमे से किसी को बुलाने की हिम्मत नहीं हुई ! तभी अचानक एक वैज्ञानिक एवं भारत सरकार के एक शिक्षण संस्थान के प्रोफ़ेसर के बारे में पता चला ! मैंने उनके नाम के लिए - अपने वाईस चांसलर से परमिशन ले लिया ! उनकी उम्र करीब अस्सी को होने को आयी थी ! उनको लाने &amp;nbsp;और ले जाने के लिए - मुझे संस्थान से गाड़ी मिली थी पर उनकी इज्जत के लिए मैंने सोचा की - मै खुद उनको लाऊंगा और ले जाऊँगा ! तब मै सहायक प्राध्यापक था !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मेरी एक आदत है - जब मै किसी भी व्यक्ति से मिलता हूँ - उनके बारे में 'गूगल' में थोडा खोज बिन कर लेता हूँ ! इस प्रोफ़ेसर साहब के बारे में भी थोड़ा सर्च किया - हालांकी उनका बहुत छोटा और एक पन्ने का रेज्यूमे मेरे पास था ! थोडा इन्फो हंगरी हूँ ! गूगल पर खोज किया !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उनको क्लास लेने के लिए - मेरे यहाँ करीब पन्द्रह दिन आना था ! उनको लाते - ले जाते फिर क्लास के बीच चाय पानी फिर उनका मेरे केबिन में बैठना - जान पहचान और अपनापन बढ़ता गया ! मै उनसे 'कंप्यूटर इंजीनियरिंग' के सवाल न के बराबर पर जीवन दर्शन पर उनकी सोच के बारे में पूछता !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जो कुछ उन्होंने खुद के बारे बताया - वो इस प्रकार था - उन्होंने अपनी पी एच डी सन 1957 में विक्रम साराभाई के गाईड में की - उनके वाइवा लेने के लिए अमरीका से प्रोफ़ेसर आये थे - संयुक्त राष्ट्र संघ के ! फिर वो अमरीका के सबसे मशहूर विश्वविद्यालय में शिक्षक बने - जिंदगी मजे में गुजर रही थी - कहते हैं - एक दिन अचानक उनके पास भारत से फोन आया - 'श्रीमती गाँधी अब आप से बात करेंगी ' - श्रीमती गाँधी - " देश को आप जैसे लोगों की जरुरत है - अगर आप भारत लौट आयें तो देशवासीओं के साथ साथ मुझे प्रसन्नता होगी " ! वो कहते हैं - कौन ऐसा देशभक्त होगा जो सीधे प्रधानमंत्री से बात कर देश नहीं लौटेगा - मै अगले महीने ही 'भारत लौट आया' ! श्रीमती गाँधी ने बहुत इज्ज़त दी और धीरे - धीरे मै भारत सरकार के सभी 'विज्ञानं और तकनिकी प्रयोगशाला' में अपना योगदान दिया ! एक प्रधानमंत्री के लंबे कार्यकाल में मै 'उनका तकनिकी सलाहकार' बना ! ( पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम आज़ाद , राष्ट्रपति बनने के पहले इसी पोस्ट पर थे ) !&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कई बार मुझे अजीब लगता ! इतना बड़ा आदमी ! सरकारी बस से अपने संस्थान में आता है ! अस्सी के उम्र में भी पढाता है और पढता है ! मेरी रुची उनके बारे में जानने को और बढ़ी - मै गूगल के तरफ मुखातिब हुआ ! वैज्ञानिक लोग या शिक्षक देश विदेश के जर्नल में अपना 'पेपर' लिखते हैं - इनको भी आदत थी ! रक्षा के बड़े बड़े कंपनी अपने प्रोडक्ट के बारे में रक्षा से सम्बंधित मैग्जीन में निकालते हैं या कुछ फ्री सैम्पल विभिन्न सरकारों को भेजते हैं ! सो , इन्होने एक प्रोडक्ट का ट्रायल रिपोर्ट विदेश की किसी मैग्जीन वाले को भेजा ! कुरियर कंपनी को संदेह हुआ ! उसने कुरियर खोला और कुछ तकनिकी चीज़ें मिली ! केस दर्ज हुआ ! रातों रात छापा पड़ा ! कहीं कुछ भी नहीं मिला ! "जासूसी उपन्यास और मसाला " के लिए पुलिस अधिकारी बुरी तरह पीछे पड गए ! ( बड़े अधिकारी ) !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इनको कोर्ट ने बा इज्ज़त बरी कर दिया - सी बी आई के किसी अधिकारी की अहंकार को ठेस पहुँची थी ! उसने फिर से केस खुलवाया ! ऊपर वाले कोर्ट में अपील हुआ - देश के साथ विश्वासघात का ! देशद्रोह का ! केस दस साल चला - इस बीच इस गरीब ब्राह्मण ने अपने बड़ी पुत्र को खोया ! पूरा परिवार डिप्रेशन में ! वो सब कुछ बेच अपनी कोई इज्ज़त और प्रतिष्ठा के लिए लड़ रहे थे ! अंत में सुप्रीम कोर्ट ने जबरदस्त फटकार "बड़े पुलिस अधिकारिओं" को लगाईं और इनको बा इज्ज़त बरी किया गया ! इस बीच बारह साल बीत चुके थे !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इनको एक संस्थान में प्रोफ़ेसर एमिरीटस नियुक्त किया गया ! कुछ साल वो यहाँ बिताए - इसी दौरान मेरी उनसे मुलाक़ात हुई !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मै इस कहानी को जिस दिन जाना - रात भर नहीं सो सका ! अगले दिन जब उनसे मिला तो मै उनके चरण स्पर्श किया और आँख में आंसू आ गए - वो पूछे - क्यों रो रहे हो - मैंने झूठ बोला - आपको देख 'दादा जी' की याद आ रही है - छुट्टी मिलता तो गाँव घूम आता ! वो हंसने लगे - कहे मुझे भी गाँव जाना है - मेरी माँ ने मुझसे वादा माँगा था - जीवन में कुछ पैसे बचा लिया तो - गाँव के प्राथमिक विद्यालय को डोनेट करूँगा ! मेरे पास कुछ रुपैये बचे हैं - दो साल से लगा हूँ - गाँव का प्राथमिक विद्यालय लगभग तैयार हो चूका है !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मै हतप्रभ था - पावर के घमंड में चूर अधिकारी इनके जीवन से इनके पुत्र को छीना - आप जीवन में उच्च शिखर पर हैं - प्रधानमंत्री से हर हफ्ता मिल रहे हैं - अचानक आपके हाथ हथकड़ी और फिर बारह साल की लड़ाई ! फिर भी प्राथमिक शिक्षा के लिए यह व्यक्ति अपना सब कुछ लगा रहा है और वो भी अस्सी वर्ष की आयु में - उसी जोश से ! वो बार बार कहते रहे - 'प्राथमिक शिक्षा और शिक्षक' का बहुत रोल है जीवन में ! इनको इज्ज़त देना सीखिए !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;वो अपना मोबाईल नहीं रखते थे ..जब तक वो पढ़ाते रहे ..मै कोशिश करता रहा ..उनसे मिलूं ..और मिला भी ...उनकी पूरी कहानी नहीं छाप रहा हूँ ....पर ..बहुत दर्द छिपा था ...और हमेशा मुस्कुराते ...और मै .....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;क्रमशः&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-1261059607528624535?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/1261059607528624535/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=1261059607528624535' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/1261059607528624535'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/1261059607528624535'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/04/blog-post_25.html' title='एक सच्ची कहानी ....भाग - एक'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-3610760157795717092</id><published>2011-04-23T21:00:00.000+05:30</published><updated>2011-04-23T21:00:10.817+05:30</updated><title type='text'>मेरा गाँव - मेरा देस - दादी की कहानी :))</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मुजफ्फरपुर में रहते थे ! बात 1978 -1979 की रही होगी ! बड़ी दादी - हर शाम एक कहानी सुनाती थी ! उन्ही कहानी में से एक 'कहानी' जिसे आप सभी भी सुने होंगे - लिख रहा हूँ !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एक बारएक चिड़िया कहीं से दाल का एक दाना चुग कर ले जा रही थी ! रास्ते में सुस्ताने के लिये वो एक 'खूंटा' के ऊपर बैठ गयी ! तभी उसके चोंच से 'दाल का दाना' खूंटा के अंदर जा गिरा ! अब बेचारी 'चिड़िया' परेशान हो गयी ! बहुत दुखी :( सोचने लगी दाल का दाना कैसे वापस मिले ..इसी सोच में वो 'बढ़ई' के पास गयी ! बढई से बोली - ' बढ़ई - बढ़ई ..खूंटा चीर ..खूंटा में हमार दाल बा .का खाई ..का पी ..का ले के परदेस जाईं' ! बढ़ई कुछ देर सोचा फिर बोला - ए चिड़िया ..तुम्हारे एक दाना के लिये ..हम खूंटा नहीं चीरेंगे ..मुझे और भी काम है !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;चिड़िया और दुखी हो गयी और वो 'राजा' के पास गयी और राजा से बोली - राजा राजा ..बढई के डंडा मार् ..बढ़ई ना खूंटा चीरे ..खूंटा में हमार दाल बा ..का खाई ..का पी ..का लेके परदेस जाईं ..! राजा हँसे लगा - बोला - ए चिड़िया ..तुम्हारे एक दाना के लिये हम 'बढ़ई' को क्यों मारे ..जाओ भागो यहाँ से ..मुझे और भी जरूरी काम है !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;राजा से ना सुन ..चिड़िया और भी दुखी हो गयी ! कुछ हिम्मत रख वो 'सांप' के पास गयी और सांप से बोली - सांप सांप ..राजा डंस ..राजा ना बढ़ई डंडा मारे ..बढ़ई ना खूंटा चीरे ...खूंटा में हमार दाल बा ..का खाई ..का पी ..का ले के परदेस जाईं ! सांप को भी अजीब लगा वो चिड़िया से बोला - तुम बेवकूफ हो , तुम्हारे एक दाना के लिए मै राजा को डंसने वाला नहीं हूँ ..जाओ ..भागो यहाँ से ..मुझे अभी सोना है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब चिड़िया को गुस्सा आया और वो 'लाठी' के पास गई ! लाठी से बोला - लाठी ..लाठी ..सांप मार ..सांप ना राजा डंस ...राजा ना बढ़ई डंडा मारे ..बढ़ई ना खूंटा चीरे ...खूंटा में हमार दाल बा ..का खाई ..का पी ..का ले के परदेस जाईं ! लाठी को भी अजीब लगा और उसने चिड़िया को भगा दिया !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लाठी से ना सुन ...अब चिड़िया 'आग' के पास गयी ! आग से विनती किया - आग आग ...लाठी जलाव ..लाठी ना &amp;nbsp;सांप मारे ....सांप ना राजा डंस ...राजा ना बढ़ई डंडा मारे ..बढ़ई ना खूंटा चीरे ...खूंटा में हमार दाल बा ..का खाई ..का पी ..का ले के परदेस जाईं ! आग को बहुत गुस्सा आया ....और वो चिड़िया को भगा दिया और बोला ..मुर्ख चिड़िया ..मै तुम्हारे एक दाना के लिए ...लाठी को जला दूँ ...ऐसा कभी नहीं हो सकता ..भागो यहाँ से ...!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब चिड़िया हताश हो गयी और अंत में वो अपनी सहेली 'नदी' के पास गयी ! नदी को वो अपनी बड़ी बहन जैसा मानती थी ...रोज नदी में डूबकी लगा नहाती थी ...नदी को बोली - ' नदी ..नदी ..आग बुझाओ ..आग ना लाठी जलाव ...लाठी ना &amp;nbsp;सांप मारे ....सांप ना राजा डंस ...राजा ना बढ़ई डंडा मारे ..बढ़ई ना खूंटा चीरे ...खूंटा में हमार दाल बा ..का खाई ..का पी ..का ले के परदेस जाईं ! चिड़िया की व्यथा सुन ..नदी को तरस आ गया ..और वो सोची ...चलो ..बेचारी चिड़िया का मदद किया जाए ...और नदी निकल पडी ..आग बुझाने ..नदी को अपने तरफ आता देख ..आग डर गया ..और बोला ..अरे नदी ..मै अभी लाठी को जला कर आता हूँ ...आग को देख लाठी भी डर गया और वो बोला ..रुको ..मै अभी सांप को मारता हूँ ...लाठी देख ..सांप तेज़ी से राजा के तरफ भागा ..राजा को डंसने के लिए ....सांप को देख ..राजा ने बढ़ई को बुलवाया ...राजा के भय से ...बढ़ई तुरंत खूंटा को चीरने को तैयार हो गया ...बढ़ई को आता देख ...खूंटा बोला ..ए भाई ..हमको क्यों चिरोगे ...बस हमको उल्टा कर दो ...दाल का दाना खुद निकल जाएगा ...बढ़ई ने खूंटा को उल्टा किया और ..दाल का दाना बाहर निकल आया ..चिड़िया ..उसको अपने चोंच से पकड़ कर ...सबको धन्यवाद करके ...फुर्र्र से उड गयी ..:))&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम्मम्मम ....सो बच्चों और उनके माता - पिता &amp;nbsp;...दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है ...बस ...एक हिम्मत और प्रण चाहिए :))&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहानी कैसा लगा ....कम्मेंट देंगे ..या फेसबुक पर लाईक करें ...:))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-3610760157795717092?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/3610760157795717092/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=3610760157795717092' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/3610760157795717092'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/3610760157795717092'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/04/blog-post_23.html' title='मेरा गाँव - मेरा देस - दादी की कहानी :))'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-78732390920819440</id><published>2011-04-03T20:05:00.000+05:30</published><updated>2011-04-03T20:05:04.027+05:30</updated><title type='text'>क्रिकेट जूनून है ....</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कल रात मै दंग था ! हतप्रभ था ! बालकोनी से देखा - रात 'बारह' बजे - लोग सडकों पर् ! 'चिल्ला रहे थे' ! ऐसा वीकेंड कभी नहीं देखा ! जिस किसी ने भी इस् खुशी को हम सब को दिया - उनको शत शत 'नमन' !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम एक गरीब देश थे ! 'खुशी' का इज़हार कभी सीखे ही नहीं ! टी वी पर् देखता था ! जर्मनी - इंग्लैण्ड में फूटबोंल मैच के बाद 'सडकों' पर् आया जाता है ! जोर जोर से चीखा जाता है - चिल्लाया जाता है ! हमें कभी मौका ही नहीं मिला की हम भी 'चीख - चिल्ला' दुनिया की इलीट क्लब में शामिल हो सकें !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सच पूछिए तो 1983 का वर्ल्ड कप जब भारत जीत गया तब 'हमको' पता चला था :( तब जा कर मैंने "खेल भारती' ( संपादक - डा० नरोत्तम पूरी ) और 'क्रिकेट सम्राट' - 'स्पोर्ट्स स्टार' जैसे पत्रिकाओं के मध्यम से 'खेल की दुनिया' को जाने ! "किर्ती आज़ाद' की पारी आज तक याद है - जवाहर लाल स्टेडियम में ! बाद में पता चला की - इनका पूरा नाम - 'किर्ती झा आज़ाद ' है :))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;1985 में भी गावस्कर के नेतृत्व में "बेन्सन और हेजेज' ट्राफी जीते थे - ऑस्ट्रेलिया में ! एक एक मैच का गवाह हूँ ! कसम मेरे 'अटारी कलर टी वी' का ! रवि शास्त्री को "औडी" कार मिली थी ! फिर भी हिम्मत नहीं हुई थी - 'सडकों' पर् आकार "चीखूँ - चिल्लाऊँ" ! औडी तो बस टी वी में दिखा था :( आज कई दोस्तों के पास है - एक ने तो दो - दो रखी है ! हमउम्र है - दो चार साल ज्यादा ! 1985 से दीमाग में "औडी" घुसा हुआ होगा - आज पैसा हुआ तो एक को कौन पूछे - दो दो खरीद लिया :))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;क्रिकेट जूनून है ! जिला स्कूल मुजफ्फरपुर में था - क्लास वालों ने 'कैप्टन' बनाने से मना कर दिया - तब हम क्लास के "मुकेश अम्बानी" हुआ करते थे ;) बेचारों को मुझे 'कप्तान' बनाना ही पड़ा ! नंबर पांच का बैट होता था - मेरी ही ऊँचाई का ! लिकोप्लास्त को साट के उसको कई वर्ष जीवित रखा ! पटना आया तो ज्यादा नहीं खेल पाया ..........तृष्णा को 'टी वी ' में देख तृप्त किया !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;क्रिकेट खुदा है ! परबाबा के छोटे और चचेरे भाई थे - "छोटका बाबा" - संतोष रेडियो पर् दिन भर कमेंट्री सुनते थे &amp;nbsp;और उस जमाने में - रवि शास्त्री की धीमी पारी के सबसे बड़े आलोचक ! मेरी याद में ..मैंने उनको गाँव से बाहर कभी जाते नहीं देखा - पुत्र सभी अपने अपने 'कैरियर' में बहुत ऊँचाई पर् है - उनके साले साहब भी 'भारत के प्रमुख डाक्टर थे ! क्या जूनून था - पुरे स्टेडियम और खेल की कल्पना वो रेडियो पर् ही कर लेते थे ! दिन भर पान खाते और कमेंट्री सुनते थे !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हल्की याद है - बेदी की - प्रसन्ना की - चंद्रशेखर की ! बाबु जी अक्सर 'चंद्रशेखर' की बौलिंग की कहानी बताते ! हम भी उनकी बौलिंग बिना देखे - कल्पना कर लेते ! 'गावस्कर - कपिलदेव" पर् तो खुद भी कई बार दोस्तों से 'खून खराबा' कर चुके हैं :))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"कैरी पैकर" समय से कितना आगे थे ....आज वही सब "आई पी एल" में हो रहा है ! चैनल 9 से हमने 'प्रसारण' सीखा ! सुबह सुबह टी वी पर् ऑस्ट्रेलिया वाला खेल देखना और वहाँ के 'दर्शकों' को देखना ! एक एहसास था - हम उनके जैसे नहीं हैं ! ठण्ड के दिनों में - रजाई में दुबक कर 'मैच' देख लेना - बस जीत को स्कूल के दोस्तों तक इज़हार करना !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कल पुरस्कार समारोह में कई वर्षों बाद 'क्लाईव ल्योड़' दिखे ! उफ्फ्फ ...आज भी याद है ...उनके मैल्कम मार्शल ....जिनकी बहुत बड़ी तस्वीर मेरे कमरे में होती थी ! मालूम नहीं ..कितने लोगों ने उनको पहचाना !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पर् मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतिओं ने देश को कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया ! इस् देश में 'अज़ीम प्रेम जी - नारायण मूर्ती' पैदा लिये ! "राजू - रजत गुप्ता - मोदी" भी पैदा लिये ! जी - राजा और निरा राडीया भी !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम सभी में आत्मविश्वास आया - अब हमने भी सडकों पर् "चीखना - चिल्लाना" सीख लिया है ! क्या अम्बानी - क्या सोनिया - क्या हम - क्या तुम !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आगे क्या लिखूं ......अचानक से आज एक खालीपन है .....!&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-78732390920819440?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/78732390920819440/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=78732390920819440' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/78732390920819440'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/78732390920819440'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='क्रिकेट जूनून है ....'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-5930902571860934309</id><published>2011-03-02T13:00:00.003+05:30</published><updated>2011-03-02T18:52:25.236+05:30</updated><title type='text'>मेरा गाँव - मेरा देस - मेरा स्कूल अलुम्नी मीट - पार्ट 2 :))</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh3.googleusercontent.com/-qoBiCzyIXY4/TW5DqAfMT5I/AAAAAAAAA6Y/dtLsOEctnTQ/s1600/DSC04359.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="https://lh3.googleusercontent.com/-qoBiCzyIXY4/TW5DqAfMT5I/AAAAAAAAA6Y/dtLsOEctnTQ/s320/DSC04359.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&amp;nbsp;सुन्दरम( 85 ) &amp;nbsp;- दिवाकर( 83 ) - रँजन - रँजन पांडे ( 85 )&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh6.googleusercontent.com/-gSlLe2yYXPc/TW4_sYFalHI/AAAAAAAAA6I/fpNKfmJRhjE/s1600/DSC_0046.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="212" src="https://lh6.googleusercontent.com/-gSlLe2yYXPc/TW4_sYFalHI/AAAAAAAAA6I/fpNKfmJRhjE/s320/DSC_0046.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&amp;nbsp;रँजन - डा० दिवाकर तेजस्वी - तपन झा&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;रँजन - प्रकाश - दीपक&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh6.googleusercontent.com/-hV1dc-8JAs8/TW5AVrK9a1I/AAAAAAAAA6M/hqdSq8oALa8/s1600/DSC_0080.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="212" src="https://lh6.googleusercontent.com/-hV1dc-8JAs8/TW5AVrK9a1I/AAAAAAAAA6M/hqdSq8oALa8/s320/DSC_0080.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="https://lh4.googleusercontent.com/-UqO7FGHrxPY/TW5B4hzDJqI/AAAAAAAAA6Q/CYPB0VSzoEE/s1600/DSC04270.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="https://lh4.googleusercontent.com/-UqO7FGHrxPY/TW5B4hzDJqI/AAAAAAAAA6Q/CYPB0VSzoEE/s320/DSC04270.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&amp;nbsp;रँजन - दीपक - उज्जवल नारायण - श्री गौरी शंकर सिन्हा एवं अन्य&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;सोलह फरवरी को 'टीम' विदा लिया और तय हुआ की 'इण्डिया गेट' पर् अठारह को मिलेगा ! हम भी हाँ में हाँ मिला दिए ! सत्रह को 'एनर - बैनर' बैठ के डिजाईन करवाए और ऑर्डर दे दिए - अठारह को देगा ! अठारह को शाम पांच बजे पहुंचे तो पता चला की - "लह.." मशीन खराब है ..एक दो घंटा लेट होगा ! इसी चक्कर में 'इण्डिया गेट' नहीं पहुँच पाया !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अठारह काफी देर रात 'जमशेदपुर' से प्रकाश का फोन आया की वो उन्नीस को रांची में एक मीटिंग अटैंड कर के शाम वाला फ्लाईट से दिल्ली पहुँच जायेगा और शाम साथ बजे मेरे यहाँ ! शनीवार दोपहर रांची से दीपक का फोन आया की - "जेतना के मुर्गी न ..ओतना के मसाला" ! फिर हम दोनों हंस दिए ! शाम पांच बजे - दीपक और प्रकाश दिल्ली लैंड कर गए - फोन से बात हुई और बोले की - वो अपने ससुराल से दस मिनट मिल जुल कर - आ रहे हैं ! आठ बजे के करीब वो लोग पहुँच गए ! इतनी खुशी की उनको रिसीव करने मै खाली पाँव ही निकल पड़ा - करीब दस ग्यारह साल बाद 'प्रकाश' से मिल रहा था ! "कोई बदलाव नहीं" - हम दोनों ने एक दूसरे को यही बोला :)) वो आज भी उतना ही मेहनती - और मै आज भी उतना आलसी :))&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मैंने पूछा - नॉन वेज ?? वो दोनों भाई बोले - शनिवार को नहीं ! फिर पत्नी ने शुध् शाकाहारी भोजन बनाया - इसी बीच हम तीनो पैदल एक राउंड 'इंदिरापुरम' का चक्कर लगा लिये ! गप्प - गप्प - पुरानी यादें - कुछ नयी भी - कुछ खट्टे तो कुछ मीठे :))) दीपक अपने स्वभाव के विपरीत चुप था ;) रात तीन चार बजे तक गप्प चलता रहा ! फिर सुबह साथ बजे हम तीनो उठ गए :) फिर गप्प ....दस बजे 'नरेन्द्र जी' का फोन आया - मै निकल रहा हूँ - आप भी पहुंचिए - मेरे मुह से निकला .."लह....."&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ड्राइवर 'त्यागी' को बोला - रमेश वाला बी एम डब्लू - सीरीज पांच &amp;nbsp;निकाल लो - चमका दो - आज इसी गाड़ी से जायेंगे :)) दीपक खुश हो गया - उसे महंगी गाडीओं का शौक है - खुद भी 'रांची' में बढ़िया सा रखा है - पिछली दफा आया था तो बोला "औडी" खरीद दो - मैंने मना &amp;nbsp;कर दिया -&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम तीनो बिलकुल हाई स्कूल के विद्यार्थी का मन लिये हुए - स्पोर्ट्स क्लब पहुँच गए ! एक - एक कर के लोग आते गए ! दिवाकर भैया का फोन आया - "लैंड" कर गया हूँ ..बस पहुँच ही रहा हूँ ! मजा आ गया ! खुशी इतनी हो रही थी - कुछ समझ में नहीं आ रहा था - क्या बोले और क्या करें :) 'पंकज तेतरवे' का गोल्ड फ्लेक एक पॉकेट बातों ही बैटन में खाली हो गया ! धीरे से 'नरेन्द्र जी' से पूछा - स्टेज कौन देख रहा है ? बोले विश्वप्रिय के बड़े भैया - 1975 के 'शिवप्रिय वर्मा' ..मेरे मुह से अनायास ही निकल पड़ा - "वाह....." ! थोड़ी देर में 'रँजन पाण्डेय ' भी पहुँच गए - हमने पूछा - 'रँजन ठाकुर ?? ' ( 82 बैच ) ..मुझे थोडा डर था - अगले दिन से चालू होने वाले "लोक सभा" के कारण - हो सकता है - कई अधिकारी नहीं भी आ सकें ...पर् ये ..क्या ...धीरे धीरे ..लाल बत्ती - ब्लू बत्ती - ऑटो - कैब - सभी लोग आने लगे - शम्भू अमिताभ भैया भी ! हर किसी का चेहरा - मुस्कुरा रहा था :)) एक अजीब सी खुशी थी ....अधिकतर "88 बैच" वाले ही नज़र आ रहे थे :)) कमलेश भैया , गौरी शंकर भैया ..कई लोग ..तब तक एक हाथ कंधा पर् टिका - पहचान रहे हो ? हा हा हा ..ये थे "विनय रँजन" भैया करीब आठ साल से हम दोनों इंटरनेट के माध्यम से जुड़े थे - पर् मिल पहली बार रहे थे ...मजा आ गया !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कई भैया लोग जो मुझसे इंटरनेट पर् परिचित थे ..पर् पहली दफा मुझसे मिल रहे थे - अधिकतर का यही " आप बढ़िया ..लिखते हैं " :)) अच्छा लग् रहा था ! तब तक कुछ अनाउंस हुआ - हम कुछ इधर उधर देखते की - देखे की - "दीपक पाटलिपुत्रा &amp;nbsp;स्टाईल में " सबसे आगे वाला सीट लूट लिया :))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एक एक कर के सभी सीनियर लोग बैच वाईज स्टेज पर् आने लगे ...उफ्फ़ शमा बंध गया ...शिक्षकों की याद आने लगी ..कई किस्से निकल कर आये .."पिटाई " के किस्से ...दीपक सबसे आगे बैठ कर ..मजा ले रहा था ..मै उसके पास पहुँच कर पूछा .."मुर्गी महंगी या मसाला ??" वो हंस दिया और बोला - "मुर्गी" :)) हा हा हा !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बहुत सीनियर लोगों की बातें ..यहाँ नहीं लिख सकता ..पर् 1983 और 1984 बैच जब आया तो ..मजा आ गया ...एक से बढ़ कर एक ..."जय हो " के गाने पर् पहले डांस हुआ ..सांस रुका ..फिर यादों का सिलसिला ...&lt;b&gt;दिवाकर भैया बोले - क्या स्कूल था - जिस बेंच पर् शहर के मशहूर डाक्टर का बेटा बैठा &amp;nbsp;हो - उसी बेंच पर् उनके धोबी का भी बेटा - जिस बेंच पर् 'राज्यपाल के पुत्र बैठे हों - उसी बेंच पर् उनके ड्राईवर का भी पुत्र ' ..धन्य है वो शिक्षक गण ...जिनकी नज़र में सभी बराबर ..पिटाई हो रही हो तो सबको एक बराबर ..' क्लास में , स्कूल में ..बोर्ड में ...फर्स्ट करना आपकी पहचान हो सकती है ...पर् कैम्पस के अंदर सब बराबर !&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;थोड़ी देर ही पहले ..इसी स्टेज से दिवाकर भैया के चाचा ..पी के शरण भैया एक कहानी सुना कर गए थे ..:)) हंसते हंसते लोट पोट हो गए थे हम सभी ...तपन भैया और आनंद द्विवेदी भैया &amp;nbsp;..ने बहुत ही बढ़िया बात बोली ..कुछ करना चाहिए स्कूल के लिये जिससे हम स्कूल के गौरव को दुबारा स्थापित कर सकें !&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब 1984 बैच के "राज दुबे" भैया शुरू हो गए ...एकदम टिपिकल "पाटलिपुत्र स्कूल स्टाईल" में :) फिर स्कूल के लिये पचास हज़ार का डोनेशन भी अनाउंस किया !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब आये ..रँजन पांडे भैया ...दिल्ली विश्वविद्यालय से अगर आप पढ़े हैं तो उनके नाम से परिचित होंगे :) मुझसे वो व्यक्तिगत रूप से कुछ कहानी बता चुके थे ...स्टेज पर् कुछ और कहानी सुनाये :)) ये उन लोगों में से थे - जिनके खानदान के कई लोग इस स्कूल से पढ़ चुके हैं ..सो एक भावनात्मक लगाव !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हर एक बैच और हर एक भैया लोग को स्टेज पर् "गुलदस्ता" दिया जा रहा था ...वो क्षण बड़ा ही भावुक होता था ..! एक दर्द और एक खुशी ..हर किसी के चहरे पर् ...बिहार बोर्ड में "नेतरहाट विद्यालय" को टक्कर देने वाला "सर गणेश दत्त पाटलिपुत्र विद्यालय" का नई दिल्ली में पहला संगठीत पूर्व छात्रों का मिलन ..इससे भी बड़ी कोई खुशी &amp;nbsp;हो सकती है ..भला ?&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इसी बीच विश्व प्रसिध्ध कार्टूनिस्ट "पवन" भी आ गए ....यहाँ वो अन्यों की तरह एक सामन्य अलुम्नी की तरह ..&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;फिर हमारा बैच आया :) मैंने कुछ पहले से सोच नहीं रखा था ..बस यही पता था की ..अंत में 'नरेन्द्र जी के साथ धन्यवाद बोलना है " ..पर् मैंने भी कुछ बोला ....बैच के साथ ..जब सब बोल लिये ...मै थोडा "लंबा" बोल दिया :))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बाद में दिवाकर भैया बोले - &lt;b&gt;गजब के ओरेटर हो&lt;/b&gt; और ......फिर वो , तपन भैया ..आनंद भैया ..राकेश भैया ..."कुछ मदद हम लोग भी करना चाहते हैं &amp;nbsp;" ...जिस प्रेम और हक से वो लोग बोले ..आँखों में आंसू आ गए ...नहीं भैया ..."कल शाम ही ...बहुत पैसा दुबे भैया , दिनेश भैया , रँजन भैया , उज्जवल जी इत्यादी का टीम दे चूका है ..." अब आगे जरुरत होगी तो खुद बोलेंगे ...!&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;फिर आया 88 batch Onwards - जम के डांस किया सब ! "कार्टूनिस्ट" पवन ने जी भर नाचा :))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;समय बहुत तेज़ी से खतम हो रहा था .....अंत में हम सभी स्टेज पर् कूद गए :) आप सभी ने फेसबुक पर् सारी तस्वीर देखी होगी .....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ऐसा भावुक माहौल हो गया की ....लौटते वक्त ..कोई किसी से नहीं मिला ..मालूम नहीं ...खुद को रोक पायें या नहीं ...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;======================&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कई दिन तक हैन्ग्वोभर रहा ..यही सोचता रहा ...एक स्कूल ..जिसके पास बिहार के अन्य स्कूलों की तरह अपना बहुत बड़ा कैम्पस नहीं ..सिमित &amp;nbsp;संसाधन ..फिर भी कैसे वो स्कूल "नेतरहाट विद्यालय" को टक्कर देता .होगा ....कैसे इसके विद्यार्थी ..भारत वर्ष में फैले हुए हैं ..1967 पास आउट से लेकर 1991 तक के पास आउट तक की बातों को सुन कर लगा ....यह योगदान उन शिक्षकों का है ...खासकर 1972 के पहले इसके प्रिंसिपल "अवधेश बाबु " और फिर "रामाशीष बाबु" का .....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;देखिये ....बिहार में "नेतरहाट विद्यालय" के बाद मैंने किसी अन्य विद्यालय को कभी तरजीह नहीं दी ...पटना में कुछ और अन्य स्कूल हैं ..पर् वो समाज के एक खास वर्ग के लिये ही हैं ...वहाँ के अधिकतर विद्यार्थी में वो लचीलापन नहीं है की ..वो सब जगह फिट कर सकें ....! एक घटना याद है ....साईंस कॉलेज की चाहरदीवारी ..एक लाईन से पचास ...मेरे स्कूल वाले बैठे हुए हैं ..क्या मजाल की कोई कुछ बोल दे .....रांची मेसरा में एडमिशन के लिये ...सुबह वाली बस में तीस सीट ..सभी के सभी ...एक ही स्कूल के ....नालंदा मेडिकल कॉलेज ..ओल्ड कैम्पस हॉस्टल ...डा० प्रवीण गरज रहे हैं ....सभी चुप चाप सुन रहे हैं .....दिवाकर भैया ..को गोल्ड मेडल मिल रहा है .....आई आई टी - कानपूर में चुनाव ....कौशल अजिताभ ...गरज रहे हैं ....आई आई टी - जी ई ई &amp;nbsp;में प्रथम सौ का तगमा पहले से ही है - क्या मजाल की कोई कुछ बोल सके ....विश्व प्रसिध्ध ...आई पी एस .."अभय &amp;nbsp; आनन्द " - इस स्कूल के शिक्षकों को साष्टांग दंडवत करते हैं .....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सुब्रतो कप - फूटबाल ...भारतवर्ष में "सर गणेश दत्त पाटलिपुत्र हाई स्कूल" का नाम ....क्या लिखूं और और क्या न लिखूं ....स्कूल बिल्डिंग और कैम्पस से नहीं होता है .....विद्याथी और शिक्षक ...और अभिभावक का समर्थन ....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;फिर कभी यादों को याद किया जायेगा ........&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-5930902571860934309?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/5930902571860934309/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=5930902571860934309' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/5930902571860934309'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/5930902571860934309'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/03/2.html' title='मेरा गाँव - मेरा देस - मेरा स्कूल अलुम्नी मीट - पार्ट 2 :))'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='https://lh3.googleusercontent.com/-qoBiCzyIXY4/TW5DqAfMT5I/AAAAAAAAA6Y/dtLsOEctnTQ/s72-c/DSC04359.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-2209470815766213561</id><published>2011-02-23T15:47:00.000+05:30</published><updated>2011-02-23T15:47:56.969+05:30</updated><title type='text'>मेरा गाँव - मेरा देस - मेरा मैट्रीक परीक्षा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बिहार में छठ पूजा के बाद - सबसे महत्वपूर्ण पर्व त्यौहार होता है - घर के लडके - लडकी का मैट्रीक परीक्षा ! मत पूछिए ! मैट्रीक परीक्षार्थी को किसी 'देवी - देवता' से कम नहीं वैल्यू नहीं होता है :))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दसवां में था तब - राजेंद्र नगर स्टेडियम में क्रिकेट मैच हुआ था - मार्च के महीना में - सब यार दोस्त लोग तीन चार दिन देखे थे ! उस वक्त हमसे ठीक सीनियर बैच का परीक्षा चल रहा था ! स्टेडियम से लौटते वक्त पुर रास्ता जाम रहता था ! सीनियर बैच का उतरा हुआ चेहरा देख दिल "ढक ढक" करे लगता :(&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दसवां के पहले मेरे यहाँ एक नियम था - छमाही - नौमही - वार्षिक परीक्षा के ठीक तीन दिन पहले - बाबु जी मेरा "रीन्युअल" करते - बहुत ही हल्का 'नेपाली' चप्पल होता था - बहुत एक्टिंग करना पड़ता - इस चप्पल से बिलकुल ही चोट नहीं लगता था - पर् एक्टिग ऐसा की जैसे की बहुत मार पड़ रहा हो ;) फिर हम कुल तीन दिन पढते और आराम से परीक्षा पास ;)&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब मैट्रीक का परीक्षा आ गया था - सितम्बर -ओक्टुबर में "सेंटअप" का परीक्षा हो गया ! हम लोग का स्कूल जाना बंद ! "भारती भवन " का गोल्डन गाईड खरीदा गया ! गोविन्द मित्र रोड से खरीद - साईकील के पीछे 'चांप' &amp;nbsp;के - ऐसा लगता जैसे आधा परीक्षा पास कर गए ;) "गोल्डन गाईड" को अगरबत्ती दिखाया गया ! कभी वो टेबल पर् तो कभी वो बेड में तकिया के बगल में ! दोस्त यार के यहाँ गया तो देखा की उसको पन्द्रह भाग में विभाजीत कर दिया है - हम भी कर दिए ! अब इस गोल्डन गाईड का पन्द्रह टुकड़े हो गए - रोज एक "भुला" जाता - सारा गुस्सा माँ पर् निकलता :)&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हमको भूगोल / इतिहास / अर्थशास्त्र / नागरीक शास्त्र एकदम से मुह जबानी याद हो गया था ! शाम को बाबु जी आते तो बोलते की - हिसाब बनाये हो ? :( सब लोग कहने लगा की - सबसे ज्यादा "नंबर" गणित में उठता है - अलजेब्रा छोड़ सब ठीक था - थोडा मेहनत किया तो वो भी ठीक हो गया ! दिक्कत होती थी - केमिस्ट्री और बायलोजी में :( बकवास था ये सब ! डा ० वचन देव कुमार का "वृहत निबंध भाष्कर' तो खैर जुबान पर् ही था ! अंग्रेज़ी जन्मजात ही कमज़ोर था - इसलिए वहाँ तो बस "पास" ही करने का ओबजेकटीव था ! नौवां से ही - स्कूल के एक दो शिक्षक के यहाँ टीउशन का असफल प्रयोग कर चूका था - सो अब किसी के यहाँ जाने का सवाल ही पैदा नहीं था !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;खैर ...एक दो और गाईड ख़रीदा गया ! सभी विषय का अलग से "भारती भवन" का किताब ! अर्थशास्त्र में "मांग की लोच " इत्यादी चैप्टर तो आज तक याद है :))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;खैर ...धीरे धीरे ..प्रेशर बढ़ने लगा ...आज भी याद है ..गाँव से बाबा किसी मुंशी मेजर के हाथ कुछ चावल - गेहूं भेजे थे - और वो पटना डेरा पहुँच चाय की चुस्की के बीच - मेरी तरफ देखते हुए - बोला - "बउआ ..के अमकी "मैट्रीक" बा ..नु " ! मन तो किया की ..दे दू हाथ ! फूफा - मामा - मामी - चाची - चाचा - कोई भी आता तो "उदहारण" देता - फलाना बाबु के बेटा / बेटी को पिछला साल 'इतना' नंबर आया था - ऐसी बातें सुन - हार्टबीट बढ़ जाता ! फिर सब लोग गिनाने लगते - "इस बार कौन कौन मैट्रीक परीक्षा दे रहा है " जिससे मै आज तक नहीं मिला - वो भी मुझे दुश्मन लगता ! कोई चचेरा भाई - मोतिहारी में दे रहा है तो कोई फुफेरी बहन - सिवान में ! उफ्फ्फ्फ़ ....इतना प्रेशर !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;रोज टाईम टेबल बनने लगा ! क्या टाईम टेबल होता था ;) बिहार सरकार की तरह - सब काम कागज़ में ही ;) धीरे धीरे ठंडा का मौसम आने लगा ! कहीं भी आना जाना बंद हो गया ! बाबु जी को सब लोग कहता - "आपके बेटा - का दीमाग तेज है - बढ़िया से पास कर जायेगा" ! अच्छा लगता था ! पर् ...और बहुत सारी दिक्कतें थी ...:( &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सुबह उठ के नहा धो के - छत पर् किताब कॉपी - गाईड लेकर निकल जाता ! साथ में 'एक मनोहर कहानियां या कोई हिन्दी उपन्यास ' ! गाईड के बीच उपन्यास को रख कर - पढ़ने में जो थ्रील आता ..वो गजब का था :)) फिर 'जाड़ा के दिन' में छत का और भी मजा था ! :)) कहीं से उपन्यास वाली बात 'माता श्री' तक पहुँच गयी ! 'माता श्री ' से 'पिता जी' तक :( तय हुआ - एक मास्टर रखा जायेगा - जो मुझे पढ़ाएगा नहीं - बल्की सिर्फ मेरे साथ दो तीन घंटा बैठेगा ! मास्टर साहब आये - एक दो महीना बैठे - फिर मुझ द्वारा भगा दिए गए ;) लेकिन एक फायदा हुआ - गणित के सवाल रोज बनाने से गणित बहुत मजबूत हो गया ! अलजेब्रा भी मजबूत हो गया - !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब हम लोग दूसरी जगह 'सरकारी आवास' में आ गए - यहाँ भी सभी लोग बाबु जी के नौकरी - पेशा वाले ही लोग थे - माहौल अजीब था - किसी का पुत्र दून में तो किसी का वेलहम में - इन सभी लोगों का जीवन का उद्येश ही यही था - बच्चों को पढ़ाना - अब वो सब कितना पढ़े - हमको नहीं पता - पर् नसीब से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिला ! खैर ...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यहाँ के लिये मै अन्जान था - बस बालकोनी से मुस्कुराहटों को देख मूड फ्रेश कर वापस किताबों में घुस जाना ! तैयारी ठीक थी - मै संतुष्ट था ! अंग्रेज़ी - बायलोजी - केमिस्ट्री छोड़ सभी विषय बहुत परफेक्ट थे - मैंने किसी विषय को रटा नहीं था - आज भी 'रटने' से नफरत है ! खैर ...बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाती - ऐडमीट कार्ड मिलने का दिन आ गया - स्कूल गया - कई महीनो बाद दोस्तों से मुलाकात हुई -&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;स्कुल में पता चला की - सेंटर दो जगहों पर् पड़ा है :( पहले दो सेक्शन "जालान" और हम दो सेक्शन "एफ एन एस अकेडमी " ! मन दुखी हो गया - बहुत दुखी ! "जालान" में सुना था - उसका बड़ा गेट बंद कर के - अनदर ...सब कुछ का छूट था ;) &amp;nbsp;बहुत करीबी दोस्त था - दीपक अगरवाल - बात तय हुआ - परीक्षा के दिन - साईकल &amp;nbsp;से मै उसके घर जाऊंगा - फिर वहाँ से हम दोनों साथ में !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;परीक्षा के दिन 'जियोमेट्री बॉक्स' लेकर ..एक हैट पहन कर ..साईकील से दीपक अगरवाल के यहाँ निकल पड़ा ..वहाँ पहुंचा तो पता चला की ..दीपक अपने मामा - मामी - फुआ - बाबु जी - माँ - बड़ा भाई इत्यादे के साथ निकल चूका है :( &amp;nbsp;अजीब लगा ..इतने लोग ..क्या करेंगे ?? रास्ते में साईकील के कैरियर से 'जियोमेट्री बॉक्स ' गिर गया ..देखा तो 'एडमीट कार्ड' गायब ....हाँफते - हुन्फाते ..साईकील को सौ पर् चलाते ..घर पहुंचा तो देखा की ..बाबु जी बालकोनी में मेरा एडमीट कार्ड हाथ में लिये खडा है ...जबरदस्त ढंग से दांत पीस रहे थे ... मुझे नीचे रुकने को बोले और खुद नीचे आये ...लगा की ..आज "जतरा" बाबु जी के हाथ से ही बनेगा ....फिर पूछे ..सेंटर कहाँ पड़ा है - हम बोले ...गुलजारबाग ...! हम अपना "हैट" अडजस्ट किये ..साईकील का मुह वापस किये &amp;nbsp;..पैडल पर् एक पाँव मारे ..और चल दिए ...!&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अजीब जतरा था ...रास्ता भर साईंकील का "चेन" उतर जा रहा था :( किसी तरह पहुंचे ...मेरे मुह से निकला ..."लह" ....यहाँ तो "मेला लगा हुआ है " ! हा हा हा ....सेंटर पर् सिर्फ मै ही "अकेला" था ..वरना बाकी कैंडीडेट ..पुरा बारात ! अपने परीक्षा कक्ष में गया ....सबसे आगे सीट ! पीछे "राजेशवा" था ! फिएट से उसका &amp;nbsp;पुरा &amp;nbsp;खानदान लदा के आया था ! अब देखिये ...वो हमसे पूछता है ...."पुरा पढ़ के आये हो ना .." हा हा हा हा हा ....प्रश्नपत्र मिला और मै सर झुका के लिखने लगा ....एक घंटा ..शांती पूर्वक ...फिर पीछे के जंगला से एक आवाज़ आई - राजेश का बड़ा भाई था - "ई ..चौथा का आन्सर है" - ढेला में एक कागज़ लपेटा हुआ - राजेश के पास आया ...धब्ब...! राजेशवा जो अब तक मेरा देख लिख रहा था ....अब वो परजीवी नहीं रहा ...वादा किया .."लिख कर ..मुझे भी देगा " ....पहला सिटिंग खत्म हुआ ! टिफिन के लिये मै अपने साथ "शिवानी" के उपन्यास लाया था ..ख़ाक पढता था :( &amp;nbsp;हल्ला हुआ - सब क्योश्चन .."एटम बम्ब" से लड़ गया ...अब सेंटर के ठीक सामने "एटम बम्ब" बिक रहा था ...मै भी एक खरीद लिया ..बिलकुल सील किया हुआ :) खोला और एक नज़र पढ़ा ..बकवास !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम हर रोज उदास हो जाता था ...सभी दोस्त के साथ पुरे खानदान की फ़ौज होती थी ! टिफिन में हम अकेले किसी कोना में बैठे होते थे ...इसी टेंशन में ...दीपक अगरवाल' को बीच चलते हुए परीक्षा में "धो" दिए ....उसको भी कुछ समझ में नहीं आया ..वो मुझसे क्यों धुलाया ...हा हा हा !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इसी तरह एक एक दिन बितता गया ....अंग्रेज़ी भी पास होने लायक लिख दिया ..गणित- अर्थशास्त्र - भूगोल &amp;nbsp;- &amp;nbsp;इतिहास - &amp;nbsp;और संस्कृत सबसे बढ़िया ...बहुत ही नकरात्मक हूँ ..फिर भी खुद के लिये बहुत अच्छे नंबर सोच रखे थे ....अंतिम दिन ..चपरासी को दस रुपैया देकर ..कॉपी कहाँ गया है ..पता करवा लिया ...पर् जहाँ कोई मेरे साथ "सेंटर" पर् जाने को नहीं था ...कोई "कॉपी" के पीछे क्यों भागता ..हा हा हा .....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अंतिम दिन परीक्षा देकर ..कहीं नहीं गया ...चुप चाप चादर तान सो गया ...कितने घंटे सोया ..खुद नहीं पता ...ऐसा लग् रहा था ..वर्षों से नहीं सोया हूँ .....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आज पटना वाले अखबार में पढ़ा की - कल से "बिहार मैट्रीक परीक्षा " शुरू हो रहा है ..सभी विद्यार्थीओं को शुभकामनाएं ..... ज्यादा क्या कहूँ ..मेहनत कीजिए :))&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-2209470815766213561?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/2209470815766213561/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=2209470815766213561' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/2209470815766213561'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/2209470815766213561'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/02/blog-post_23.html' title='मेरा गाँव - मेरा देस - मेरा मैट्रीक परीक्षा'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-9153810213114110432</id><published>2011-02-22T20:55:00.000+05:30</published><updated>2011-02-22T20:55:01.392+05:30</updated><title type='text'>मेरा गाँव - मेरा देस - मेरा स्कूल अलुम्नी मीट - पार्ट १  :))</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भैया लोग ( सीनियर )&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भयवा ( बैचमेट )&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भाई लोग ( जूनियर )&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हैंगओवर क्या होता है ? वो आज हमको बुझा रहा है ! परसों &amp;nbsp;मेरे स्कूल का अलुम्नी मीट था - नई दिल्ली में ! क्या कहूँ ..और क्या न कहूँ ...यादों की बारात अपने आप में एक याद बन् के रह गयी ! बिना शराब पिए हुए - हैंगओभर ...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;चलिए कुछ पृष्ठभूमी बताता हूँ ...( भाषा पर् गौर मत फरमाईयेगा )&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सन 2005 में 'नरेन्द्र जी' ( 88 बैच ) मिलने के लिये आये ! उनदिनो मै सेटर बासठ - नॉएडा में रहता था ! उनदिनो घर के लोगों के बीमार रहने के कारण करीब २ साल से परेशान था ! बात आई गई हो गयी ! इस बीच पटना में स्कूल मीट होता रहा - पिछला साल दिसंबर में जाने का बहुत मन था - पर् 'नौकरी' के कारण नहीं जा सका ! खैर .....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इसी बीच 'फेसबुक' पर् नरेन्द्र जी अचानक प्रकट हुए और वो स्कूल अलुम्नी मीट - दिसंबर - पटना गए ही नहीं अपने तरफ से वहाँ "कनट्रीब्यूट" भी किया और हम दोनों के बीच बात हुआ की - हम लोग किसी शनीवार मिलेंगे ! एक शनीवार वो आये - जनवरी में - हम दोनों "कुछ यहाँ भी करना है" पर् बात कर ही रहे थे की उनके बैच के दो और लोग आ गए - सुजय जी ( लोकसभा पदाधिकारी ) और आनंद वर्धन ( राष्ट्रीय सहारा ) ! बस एक छोटा सा अलुम्नी मीट हो गया :))फिर अशोक अगरवाल भैया ( 1979 ) &amp;nbsp;दिल्ली में थे तो हमको और नरेन्द्र जी को बुलाहट &amp;nbsp;हुआ और जल्द से जल्द नई दिल्ली मीट पर् आगे बढ़ने का बात हुआ - वहाँ उनके बैच के भारतीय विदेश सेवा के 'शम्भू अमिताभ' भैया , आई आर् एस दीप शेखर भैया , बिहार निवास में इंजिनीयर - पद्म कान्त झा भैया , एल आई सी के सुनील भैया इत्यादी से मुलाकात हुई ! फिर निर्णय हुआ की - अब बस स्कूल अलुम्नी मीट करवा देना है ! कुछ जगहों का वो सब निर्णय भी कर लिये ! मेरे लिये तो आज भी 'दिल्ली' अन्जान ही है - नरेन्द्र जी से अगले दिन से बात होने लगी - लगभग हर शनीवार - इतवार वो जगह खोजने लगे ! अंत में ..स्कूल के ही और नरेन्द्र जी की तरह ही सुप्रीम कोर्ट के वकील - "रँजन पांडे " भैया ( 1985 ) ने स्पोर्ट्स क्लब बुक करवा दिया - नरेन्द्र जी का फोन आया - जगह बुक हो गया - अब "रेस" हो जाईये :)) अब रेस होना था - कैसे रेस हुआ जाए :( मेरे जैसा आदमी के लिये भारी टेंशन :( &amp;nbsp;हम दोनों लगभग हर शनीवार मिलने लगे ...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://gardeniaindia.com/"&gt;Gardenia India Limited&amp;nbsp;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;वाले बिहार के ही हैं और मेरे जान पहचान के हैं - उन्होंने बोल रखा था - "रँजन जी , आपसे पुराना परिचय है - जब कभी भी आपको बिहार से जुड़े किसी भी कार्यक्रम को करना है - संकोच नहीं कीजियेगा - जितना संभव हो - मै मदद करूँगा" ! फिर भी मेरे लिये ये कष्टदायक था ! एक दिन उनलोगों से मिला और बोल दिया ! फिर एक दिन उनको फोन किया - वो बोले की आप मेरे गाज़ियाबाद वाले ओफ्फिस चले जाईये - एकाऊँन्टेंट को बोल दिया हूँ ! हम और नरेन्द्र जी वहाँ पहुंचे - मै अंदर गया - थोडा संकुचाये हुए - कुछ बोला -&amp;nbsp;&amp;nbsp;एकाऊँन्टेंट ने दे दिया और हम नरेन्द्र जी को ! हम दोनों कनफीडेंस में आ गए ! अगले दिन 'रँजन पांडे' भैया भी कुछ नरेन्द्र जी को दे दिए ! नरेन्द्र जी ने करीब एक सौ बीस लोगों के लिये - क्लब वाले को पैसा जमा करवा दिए ! डेट फिक्स हो गया - बीस फरवरी - रविवार !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब हम लोग टेकनौलोजी का प्रयोग शुरू किये ! इसी बीच नीरज आनंद भी जुड गए - वो नरेन्द्र जी के ही बैच के &amp;nbsp;हैं ! नरेन्द्र जी को अपने बैच , दुबे भैया , रँजन पांडे भैया पर् पूरा &amp;nbsp;विश्वास - हर बार वो कहते - ऋतुराज जी , घबराईये मत ! इस बीच मेरी बात हुई - रँजन पांडे भैया से - बोले ...तुम्हारा ब्लॉग तो पढ़ लिया - बढ़िया लिखते &amp;nbsp;हो ..मै मुंबई निकल रहा हूँ ...तुम और नरेन्द्र देख लेना ..."लह" ...मेरे मुह से पटना स्टाईल में निकल गया ..हा हा हा&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कुछ लोगों का पता / फोन पटना से दीपक जैसवाल भैया और संजय भैया से मिला ..संजय भैया हर दो दिन पर् एक दो नंबर &amp;nbsp;भेज रहे थे ...नरेन्द्र जी अपना डायरी में नोट कर रहे थे ..इधर हम भी ...मेरे पास पचास लोग का डाटा तैयार हो गया ..नरेन्द्र जी के पास भी ..दोनों को मर्ज किया गया ..संख्या करीब डेढ़ सौ पहुँचने लगी ...अब काम होना था ..सबको "फोन " करना ..एक दिन नरेन्द्र जी सुप्रीम कोर्ट से ही मेरे पास आ गये ..हम दोनों बैठ कर एक एक कर के बहुत लोगों को फोन किये ....इस बीच जब नरेन्द्र जी को फुर्सत मिलता ..वो लोगों से बात करते ...एक दिन हम पूछे ...आपके बैच के उज्जवल जी ?? जबाब आया - दुबई ..हम बोले .."लह" ...हा हा हा ...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उनके बैच का ही और मेरा काफी करीबी दोस्त - प्रकाश जो टॉपर भी था और अब बिजिनेस मैन - अफ्रीका में दो स्टील प्लांट खरीदा है - बोला मुझे भी अफ्रीका दौरा पर् निकलना है ..फिर मेरे मुह से निकला ...."लह" ....हा हा हा ...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पर् नरेन्द्र जी अति आशावादी ...हम उम्र ही हैं ..एक दिन हमदोनो ..भर पेट यहीं इंदिरापुरम में "चिकेन चंगेज़ी" खाए ...थोडा टेंशन कम हुआ !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम भी अपने ढेर सारे बैचमेट को जानते थे - खबर कर दिया गया - नरेन्द्र जी को हम साफ़ साफ़ बोल दिए - बैचमेट को "निहोरा" नहीं करने जायेंगे - सीनियर - जूनियर के 'गोर' भी पड़ लेंगे ....कौन हम अपना बेटा का "तिलक" कर रहे हैं ...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस बीच - वरिष्ठ अधिकारी गण को फोन करने का जिम्मा मिला - सुजय जी को ! वो एक राऊंड &amp;nbsp;सबको खबर कर दिए - जितना वो जानते थे - मीडिया का &amp;nbsp;जिम्मा मिला- "आनंद वर्धन" जी को &amp;nbsp;! नीरज आनंद बाबु - कूदने लगे - म्यूजिक रहना चाहिए ...हम लोग बोले - पाटलिपुत्रा स्टाईल में - कर भयवा ..जे करेला हउ ...वो खुद बोले &amp;nbsp;किसी भी कीमत पर् - "शीला - मुन्नी" नहीं रहेगी :)&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;नरेन्द्र जी से लगभग रोज बात होते रही - भोजन 'नान वेज' और "लिकर" &amp;nbsp;इत्यादी बिलकुल ही नहीं क्योंकि डर था - सीनियर लोग 'लिकर' के बाद 'एन डी ए से लेकर रविन्द्र बालिका' घूमने लगते ...हा हा हा हा ....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;फिर ...हुआ की 'एनर - बैनर' इत्यादी ..जिम्मा हम उठा लिये ...फिर हम लोग सोलह तारिख को एक बार फिर बैठे - सभी लोग मेरे ही डेरा में आ गए -नरेन्द्र जी और &amp;nbsp;नीरज आनंद जी और हम शुरू हो गए फिर से सभी को एक एक कर के फोन करना ...थोड़ी देर में सुजय और आनंद वर्धन भी आ गए ....थोड़ी देर के लिये ऐसा लगा की ..जैसे कॉल सेंटर में बैठे हैं ....उसी दिन निर्णय हो गया की ...प्रती व्यक्ती पांच सौ और एन सी आर् से बाहर वालों से कुछ नहीं ...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;धकाधक बाहर से कन्फर्मेशन आने लगा ..विजय रँजन भैया ( 85 ) मुंबई से ....दिवाकर तेजस्वी भैया और उनके बैच के राकेश दुबे और आनंद द्विवेदी पटना से ...टाटा से प्रकाश ..रांची से दीपक ...पटना से विश्व प्रसिध्ध कार्टूनिस्ट - पवन और दीपक जयसवाल भैया तो एक दम से रोज खुद नगाडा पीट रहे थे :)&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;अगला पार्ट का इंतज़ार कीजिए ;) ..............&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-9153810213114110432?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/9153810213114110432/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=9153810213114110432' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/9153810213114110432'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/9153810213114110432'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/02/blog-post_22.html' title='मेरा गाँव - मेरा देस - मेरा स्कूल अलुम्नी मीट - पार्ट १  :))'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-7971389236100858362</id><published>2011-02-06T13:08:00.004+05:30</published><updated>2011-02-07T11:11:51.951+05:30</updated><title type='text'>मेरा गाँव  - मेरा देस - मेरा स्कूल</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम कितना स्कूल में पढ़े - ये खुद हमको नहीं पता है :( &amp;nbsp;कभी हम स्कूल को रिजेक्ट किये तो कभी स्कूल हमको रिजेक्ट किया ;) &amp;nbsp;खैर , सातवीं क्लास मैंने अपने खानदानी स्कूल &amp;nbsp;"जिला स्कूल - मुजफ्फरपुर" से पास किया ! ये &amp;nbsp;स्कूल कई मायनों में मेरे परिवार के लिये महतवपूर्ण है - परबाबा से लेकर मुझ तक - चार पीढ़ी इस स्कूल में पढ़े &amp;nbsp;और इसके ठीक बगल में 'चैपमैन गर्ल्स स्कूल' था जिसमे फुआ दादी और फुआ तीनो बहन ! तीन खूब बड़े बड़े मैदान , अंग्रेजों के द्वारा बनवाया हुआ विशाल स्कूल , स्कूल के अंदर ही शिक्षकों का बड़ा बड़ा क्वार्टर ..क्या नहीं था ! सबसे विशेष यह था की - वहाँ के प्रिंसिपल 'जयदेव झा' ! वो बाबु जी &amp;nbsp;को पढ़ा चुके थे - अब मै उनका विद्यार्थी था ! न जाने कितने ऐसे शिक्षक थे - जो बाबु जी सभी भाईओं को पढ़ा चुके थे और अब मै उन सब शिक्षकों का विद्यार्थी था ! स्नेह मिलता ! कई किस्से हैं ..कभी बाद में सुनाऊँगा :))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;अभी सातवीं का &amp;nbsp;वार्षिक परीक्षा देने ही वाला था की बाबु जी का ट्रांसफर 'पटना' हो गया ! हम मुजफ्फरपुर में ही रुक गए - फिर टी सी लेकर &amp;nbsp;पटना आ गए ! हम सभी उन दिनों - नाना जी के साथ 'सलीम अहरा - गली नंबर &amp;nbsp;एक " ( उमा टाकीज के ठीक पीछे ) रहते थे ! पटना हम लोगों के लिये किसी भी विदेश से कम नहीं था ! बड़ा और लगभग सौ साल पुराना मकान था ! खूब चौडा चौड़ा बरामदा ! मामू जान लोगों के पीछे - पीछे ही समय कटता था ! अब मेरा 'एडमिशन' कहाँ हो - यह नाना जी का हेडक था ;) नाना जी कहीं से किसी से "चिठ्ठी" लिखवा कर लाये - फिर एक दिन मै पहुँच गया - " सर गणेश दत्त पाटलिपुत्र हाई स्कूल " , कदम कुआं ! जहाँ मै भव्य 'जिला स्कूल' से आया था वहीँ ये स्कूल का कैम्पस छोटा था ! मन में अभी भी 'नेतरहाट' था - एक क्लास जूनियर ही सही - वहीँ निकल जाना चाहिए ! बहुत लोग बोले - बिहार बोर्ड में "नेतरहाट" के बाद "सर गणेश दत्त पाटलीपुत्र " ही आता है ! फलाना बाबु का बेटा - चिलाना बाबु का पोता - तरह तरह के उदाहरण दिए गए ! खैर 'आठवीं' में एक सेक्शन में जगह मिल गया !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पहला दिन स्कूल जाने के लिये 'रिक्शा का भाड़ा' मिला ! हम भी रिक्शा खोज उस पर् बैठ गए ! शाम को लौटे तो पता चला की पड़ोस में रहने वाले के पुत्र महोदय भी मेरे क्लास लेकिन दूसरे सेक्शन में हैं - कल से उन सब के साथ ही जाना है ! नाना जी के पड़ोसी थे - पटना / बिहार के शराब के सबसे बड़े विक्रेता 'शालीग्राम प्रसाद' ! बहुत पैसा पर् हम सभी का गजब का इज्जत ! अगले दिन से "बबलू" के साथ जाने लगा ! एक नियम था - मकान के कैम्पस से निकल कर रोड पर् &amp;nbsp;खडा होना - फिर देखता की उधर से कई लडके आ रहे हैं - फिर एक झुण्ड बन् गया ...और झुण्ड चल दिया ..जगत नारायण रोड :)) रास्ता में 'जन संपर्क विभाग' का एक ऑफिस था &amp;nbsp;- जहाँ मै थोड़ी देर के लिये 'हिन्दी अखबार' पढ़ने के लिये रुकता था ...हाल में वहाँ गया था - कुछ नहीं था :( "बबलू " चिल्लाता - अखबार पढता है ..हुंह ..नेता बनना है ..का ?? :))&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;रिक्शा की जगह - पैदल जाने में मजा आने लगा ! रास्ता भर तरह - तरह 'बहस' और स्कूल पहुँचते सब अपने अपने क्लास में ! मेरे बेंच पर् थे - मृत्युंजय कुमार &amp;nbsp;, दीपक अगरवाल , एक था कोचर और चौथा था - एक वर्मा - नाम भूल रहा हूँ :( श्रीकांत बाबु क्लास शिक्षक थे ! यहाँ फीस का जमाना नहीं था - पर् जो जितना दिन ऐबसेंट रहता - उतना दिन का - प्रती दिन शायद दस पैसा के हिसाब से जमा करना होता था ! पहले ही महीने - श्रीकान्त बाबु ने मुझे यह अवसर दिया की मै ही वो पैसा सर के बगल में बैठ कर जमा करूँ - यह बात उन विद्यार्थीओं को नहीं पचा जो मुझसे पहले से इस स्कूल में थे ! अगले महीने से मै दरकिनार कर दिया गया :(&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;खैर ..दो तीन महीना के बाद ही हम लोग 'डोक्टोर्स कॉलोनी ' कंकडबाग आ गए ! यहाँ इस कॉलोनी और पास वाले मोहल्ले के लगभग सभी नामी - गिरामी लोगों के पुत्र मेरे सीनियर ही थे ...वो बैच था - class of 1983 - &amp;nbsp;दिवाकर भैया(डॉक्टर,पटना ) - आनंद मोहन भैया( इंदौर) - राजा भैया( इन्स्युरेंस) - हिमांशु भैया ( हरा रंग का &amp;nbsp;राजदूत वाले , डॉक्टर - पटना , ) &amp;nbsp;डोक्टोर्स कॉलोनी में ही हर शाम पुर इन लोगों का झुण्ड आता और बैठता था - क्या मजाल की कोई &amp;nbsp;दूसरा स्कूल वाला कुछ बोल दे ..मेरे मकान में ही 'आनंद मोहन' भैया रहते थे - गजब का स्नेह ! ठीक सामने - बलदेव बाबु का मकान था - जो उन &amp;nbsp;दिनों वाईस प्रिंसिपल होते थे ! शाम को उनके यहाँ मेरे बैच के कई लडके पढ़ने आते ! उनका खुद का बहुत ही बड़ा मकान था !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब कंकडबाग से स्कुल जाने के लिये 'हीरो' का नया साईकील खरीदाया ...पहला दिन साईकील से स्कुल गए ...कोई घंटी चुरा लिया :( दोस्तों की जिद से ..अब हम सभी पैदल जाने लगे ! सचिवालय कॉलोनी से मृत्युंजय , पत्रकार नगर से प्रमोद और भी एक दो क्लास जूनियर सब आने लगे ...हम लोग 'राजेंद्र नगर' गुमटी पार कर के &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp; &amp;nbsp;जाने लगे ..तब 'राजेंद्र नगर ओवरब्रिज' बन् रहा था ! वहाँ नीचे ....जुआ वाला सब ठेला पर् जुआ दिखाता ...ताश के तीन पत्ते का हेर फेर ...कई दोस्त जिनको लंच के नाम पर् कुछ पैसा घर से मिलता था ..वो रास्ते में ही इस 'जुआ' में गंवा देते ...हा हा हा हा हा ! हम सब उसका हाथ पकड़ के खिंच के वापस ले जाते ...वैशाली सिनेमा के ठीक सामने से होते हुए ..शेखर सुमन के घर होते हुए ...लोहानीपुर से एक पतली गली से होते हुए स्कुल ....लोहानीपुर पहुंचते ही हम सब ठिठक जाते ....कंकडबाग वाला लड़का सब एक दम से सावधान की मुद्रा में ! मेरे क्लास में 'इन्द्रजीत - दिग्विजय' ..एक से एक हीरो ! अब मालूम सब कहाँ हैं :( &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घींच घांच के आठवीं पास किया ! नौवीं में बद्री बाबु क्लास टीचर थे - अंग्रेज़ी पढ़ाते - सैमसंग एंड डेलीला ....डी डी राय ..जो पुरे पटना के सबसे मशहूर शिक्षक थे - वो गणित पढ़ाते - एक दिन 'दिग्विजय' हत्थे चढ गया - हो गया धुनाई .....हा हा हा हा ....महिला शिक्षक बहुत ही कम ...! एक दू नेता टाईप शिक्षक भी ! प्रिंसिपल थे - रामाशीष बाबु - जबरदस्त - भारी भरकम शारीर - अपने कमरे से अगर निकल गए तो - फिर क्या - जो जहाँ है - वो वहीँ रुक गया ! पर् उनसे भी ज्यादा शक्तिशाली - हमारे स्कुल का गेटकीपर - लंच के ठीक बाद - जब वो शहंशाह स्टाईल में गेट का सिक्कड़ घुमाता ....हीरो टाईप लड़का लोग का होश ठिकाने आ जाता ! क्या मजाल कि कोई लडका गेट से निकल जाए ! प्रिंसिपल सर के कमरे में "ट्रॉफी" भरा होता था ! बोर्ड &amp;nbsp;लगा होता - बोर्ड पर् तेज विद्यार्थी का नाम - राजीव कुमार सेठ - बिहार बोर्ड - प्रथम - फलाना - बिहार बोर्ड - तृतीय ..चिलाना - बिहार बोर्ड - नौवां स्थान !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नौवां में ही था - युवा दिवस के शुभ कार्यक्रम के लिये - मोईनउल हक स्टेडियम में - हमें कुछ प्रैक्टिस करने जाना था - अपने क्लास से मै सेलेक्ट हुआ - स्कूल से नौवीं और दशमी के ढेर सारे लडके - वहाँ एक दिन प्रैक्टिस के दौरान मेरे स्कूल के किसी दसवें वाले ने किसी 'अंग्रेज़ी' स्कूल की लडकी पर् सीटी मार दी - अगले दिन - हुआ मार - हा हा हा हा हा ....अब सर गणेश दत्त पाटलिपुत्रा का विद्यार्थी कहाँ रुकने वाले थे ...जबरदस्त हंगामा ! कार्यक्रम रोकना पड़ा ! कहानी शुरू हुआ - लोयला में एक बार सेंटर पड़ा - लोयला में डी डी राय पर् कुछ कमेन्ट हुआ ...लगा की ...लोयला में आग लगा देंगे ! ये क्रेज था - डी डी राय का !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वचनदेव कुमार का बृहत् निबंध भाष्कर जुबान पर् था ! एक घटना याद है - आठवीं का नौमही परीक्षा दे रहा था - वर्मा प्रेस से लाल हरा नीला - प्रश्नपत्र आता था ! हिन्दी का परीक्षा था - बगल में नौवां का एक विद्यार्थी बैठा था - इंदिरा गाँधी पर् निबंध लिखने को आया था - हम अपना परीक्षा छोड़ - अपने सीनियर को पुरा &amp;nbsp;निबंध लिखने में मदद की !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्लास में अंदर - एक लडका था - राकेश - काला सा - क्या लिखता था ..एकदम मोती जैसा अक्षर और गजब का लैंग्युज सेंस - उससे जलन होती :) एक बेंच पर् हम सभी - फिक्स थे ! महीनो आपस में बात चीत नहीं होता - इगो क्लैश ! एक क्लास छूटता और दूसरे शिक्षक के आने के बीच - पुरा स्कुल ..बरामदा में :) इस वक्त आप किसी को खोज नहीं सकते ! छुट्टी के समय - जिस रफ़्तार से हम सीढियां फांदते ...उफ्फ़ ...! लौटते वक्त ..रास्ता &amp;nbsp;भर .."कपिलदेव बनाम गावस्कर" ...एक दिन गेट पर् एक सरदार विद्यार्थी .. ..तिवारी पर् मुक्का चला दिया ..तिवारी का जबड़ा टूट गया ....उफ्फ़ ...अगर आज ऐसा होता तो ..अखबार और टीवी में तिवारी हीरो बन् जाता ! गेट पर् छुट्टी के ठीक बाद सभी क्लास के हीरो भाई लोग ..एक साथ जमा होता था ...हा हा हा ...यूँ कहिये ..लोहानीपुर का सब विद्यार्थी हीरो ही होता था !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दसवीं में 'डी डी राय' हमारे क्लास टीचर बने ! बहुत ही गर्व की बात थी - हमारे लिये ! इसी &amp;nbsp;साल &amp;nbsp;उनका आवाज़ जाने लगा ...और बाद में पता चला की उनको "कैसर" हो गया ! पटना प्रसिध्ध इस टीचर के हम अंतिम बैच थे ! आज भी उनकी याद आती है ....मन करता है ..उनके नाम पर् एक स्कॉलरशिप शुरू करूँ .....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत यादें हैं ....क्या लिखूं और क्या न लिखूं ....सभी शिक्षक को नमन ....सीनियर को नमस्ते ......बैचमेट को .." का रे ? कहाँ हो आज कल ? " ......जूनियर को ....."और भाई ...सब ठीक न .." :))&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपको एक बात बताता हूँ ....इस स्कुल का अलग संस्कार होता था .....पुरे भारत में उच्च शिक्षा का कोई ऐसा संस्थान नहीं है ...जहाँ यहाँ के विद्यार्थी नहीं पाए जाते होंगे ...अगर आप उन्हें पहचानना चाहते हैं तो जो भी आदमी पटना का हो ..थोडा टेढा हो ..आप "सूंघ" के बता देंगे की - वो "सर गणेश दत्त पाटलिपुत्रा" का अलुम्नी है ....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलिए ....कुछ आपको याद हो तो लिखिए ...कमेन्ट में ...मै अगले &amp;nbsp;पोस्ट में आपके कमेन्ट डालूँगा :))&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाँ , बीस फरवरी को हम सभी नेशनल स्पोर्ट्स क्लब ऑफ इंडिया , प्रगति मैदान के ठीक सामने , नई दिल्ली में "री उनीयन" / गेट टूगेदर / मीट ..जो कहिये ..मना रहे हैं ....जबरदस्त ढंग से ....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-7971389236100858362?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/7971389236100858362/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=7971389236100858362' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/7971389236100858362'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/7971389236100858362'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='मेरा गाँव  - मेरा देस - मेरा स्कूल'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-1393627350711477609</id><published>2011-01-18T09:55:00.002+05:30</published><updated>2011-01-18T10:11:30.555+05:30</updated><title type='text'>"समाज"</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एक घटना सुनाता हूँ - बहुत पहले की बात है ! गाँव में एक अपवाह थी की मेरे बड़े परबाबा के पास बहुत पैसा है और वो पैसों को घर में ही रखते हैं - गाँव के एक थोड़े बदमाश व्यक्ती को यह पता चला तो उसने चोरी करने की कोशिश की - रात में वो 'दालान' में चोरी करने आये - मेरे बाबा ने उनको पकड़ लिया &amp;nbsp;! सुबह गाँव के लोग आये और एक छोटी सी पंचायत और मेरे परबाबा के कारण उनको छोड़ दिया गया ! &amp;nbsp;पुलिस - केस - मुकदमा नहीं हुआ ! इस घटना को हुए करीब चालीस साल हो चुके होंगे ! जिन्होंने चोरी करने की कोशिश की - वो गाँव छोड़ कर चले गए फिर कभी वापस नहीं आये ! लोग कहते हैं - कुछ दूरी पर् किसी गाँव में बस गए और जब कभी अपने गाँव का कोई मिलता तो मुह गमछी से ढक लेते थे ! चोर थे - चोरी किया पर् एक शर्म भी - आँखों में ! वो शर्म उन्हें गाँव के समाज ने दिया था !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस घटना पर् मै ज्यादा कुछ और नहीं बोलूँगा पर् वर्तमान में ऐसा नहीं है ! अभी हाल में गाँव गया था - पता चला की 'फलाना बाबु' का बेटा बदमाश हो गया - कुछ 'केस - मुक़दमे' भी चल रहे हैं ! रात - दिन 'कट्टा' साथ में ही रखता है ! जब मूड आया किसी को 'गरिया' दिया ! कोई उसको टोकने - बोलने वाला नहीं है ! गाँव के ही एक शिक्षक को उसने कुछ गाली दे दी ! फिर अगले दिन 'शिक्षक' के ही काफी करीबी 'पट्टीदार / गोतिया' के दरवाजे पर् लंबी - चौड़ी बातें कर रहा था ! मैंने कुछ लोगों से बोला - आप सभी उसे समझाते क्यों नहीं हैं ? जबाब आया -&lt;u&gt; 'गुंडा - मवाली' को कौन समझाए और दोस्ती है तो कभी काम ही आएगा !&amp;nbsp;&lt;/u&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;u&gt;&lt;br /&gt;&lt;/u&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;समाज महत्वहीन हो गया है !मुझे बिलकुल याद है - गाँव के किसी लडके के यहाँ कोई बरतुहार &amp;nbsp;आया तो सभी बुजुर्ग लडके के दरवाजे पर् पहुँच कर - लडके के पिता जी को समझा बुझा कर 'फैसला' हमेशा से 'लडकी' वाले के ही फेवर में देते थे - उस फैसले को 'लड़का वाला' मानने को विवश होता था ! अब ऐसा नहीं है - शादी और लेन - देन बंद कमरे में होने लगी है ! बिहार लोक सेवा आयोग के एक मेंबर परिचित थे - कहते थे - मैंने कई जान पहचान वाले लड़को को - डिप्टी कलक्टर - डीएसपी - बनने में मदद की ! आशा के अनुसार - वो वैसे लड़कों के यहाँ 'बरतुहार' ( लडकी वाला ) को भेजा करते &amp;nbsp;थे - लड़का वाला का जबाब - फलाना बाबु का 'पैरवी' लेकर नहीं आईये !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कभी कभी लगता है - लोगों के आँखों में शर्म खत्म हो गयी है ! "लिहाज" भी समाप्त है ! बचपन में देखता था - गाँव के कई छोटे चाचा &amp;nbsp;लोग 'खैनी' खाते थे - बाबु जी या बाबा के सामने नहीं ! गलती से "चुनौटी" दिख गया तो आँख नीची कर के 'निकल' पड़ते थे ! अब शायद ऐसा नहीं है !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बड़े बाबा मुजफ्फरपुर में रहते &amp;nbsp;थे - मेरे बाबु जी - मेरे चाचा - फुआ लोगों के शिक्षा का "कर्तव्य" उनके ही सर पर् था ! यूँ कहिये - एक जमाने में - पुरे इलाके का ! इस आधार पर् ही जब हम लोग पटना आये तो चाचा की बेटी को साथ रखने लगे क्योंकि चाचा बैंक में थे और ग्रामीण पोस्टिंग थी - एक बहुत बड़े खानदान के - एक बहुत ही बड़े डॉक्टर ने 'कमेन्ट' किया हमलोगों पर् - "आप लोग पिछड़े हैं" :))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"लोग क्या कहेंगे ? " जबरदस्त ताकत वाला वाक्य है ! पर् अब किसी को इसका ख्याल नहीं है ! लोग हर बंधन से आज़ाद होना चाहते हैं ! इस आज़ादी में ही 'सामाजिक बंधन' कमज़ोर हो रहे हैं ! कोई भी &amp;nbsp;किसी भी और के लिये - अपनी छोटी सी भी 'खुशीओं' का बलिदान नहीं देना चाहता है ! कल तक गाँव पराया था - आज भाई पराया है - कल माता पिता पराये हो जायेंगे और परसों आपके बच्चे आपको 'पराये' घोषित कर देंगे !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;तथाकथित "समाज शास्त्र" के विद्वानों के कमेन्ट की आशा में ....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-1393627350711477609?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/1393627350711477609/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=1393627350711477609' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/1393627350711477609'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/1393627350711477609'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/01/blog-post_18.html' title='&quot;समाज&quot;'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-8385501781927435251</id><published>2011-01-14T10:15:00.000+05:30</published><updated>2011-01-14T10:15:29.646+05:30</updated><title type='text'>मेरा गाँव - मेरा देस - मकर संक्रांति</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कॉलेज के लिये निकलते वक्त हर रोज देर हो जाती है ! आज भी हुआ ! नहा कर सीधे पूजा घर में चला जाता हूँ ! वहाँ गया तो देखा की - सब कुछ सजा हुआ है - 'दही - तील - तिलकुट , गुड़ , चिउरा' ! तुलसी चौरा से तुलसीदल को निकाल कर सभी पर् डाला ! पत्नी ने झट पट 'टपरवेयर' के लंच बॉक्स में चुरा दही सब्जी गुड़ तिलकुट डाला !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हर पर्व की तरह बचपन याद आ गया ! पहले 'गीजर' नहीं होता था - होता भी होगा तो हम जैसों के यहाँ नहीं था ! बडका 'तसला' में पानी चुल्हा पर् चढ जाता था ! गरम हुआ तो - बाल्टी में डाला , नहाया फिर बडका "फुलहा" कटोरा में दही चिउरा ! अनुपात इस प्रकार होता था - सबसे कम चिउरा &amp;nbsp;, उससे ज्यादा दही और फिर सबसे ज्यादा चीनी :)) , छोटका कटोरी में 'आलू दम का सब्जी - गोभी और - मटर' या फिर 'मिर्च का अंचार' :))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गाँव में रहता था तो - 'ईनार' का पानी गर्म - वहीँ बडका पीढा पर् - बाबा के साथ नहाना ! फिर कांपते हुए अपने &amp;nbsp;से बड़ी औकात वाली 'खादी के &amp;nbsp;गमछा' को लपेट हाथों को सीने से लगा - कापते हुए आँगन में जाना ! फिर कुछ नया कपड़ा पहन - बाबा का इंतज़ार करना ! फिर बाबा के साथ - दही - चिउरा इत्यादी !!&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम तीन पट्टीदार होते थे ! सबके यहाँ से 'चावल - दाल - हल्दी और आलू' आ जाता था ! परबाबा जो तब तक अंधे हो चुके थे - उनसे सभी सामान को 'छुआया' जाता था - फिर घर का कोई मुंशी मैनेजर दरवाजे पर् चौकी लगा के बैठ जाता - दिन भर ..मालूम नहीं कहाँ कहाँ से लोग आते ...करीब दो तीन हज़ार ..सबको एक बड़ा गिलास चावल , एक मुठ्ठी दाल , दो हल्दी का टुकड़ा और एक चुटकी नमक और दो तीन आलू .....मै भी कभी कभी वहीँ कुर्सी लगा के बैठ जाता था ! अच्छा लगता था ! यह सिर्फ मेरे घर में नहीं था ....गाँव के हर बाबु लोग के दरवाजे पर् यही हाल होता था !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दिन भर लाई और लटाई का चक्कर होता ....:))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मेरे ससुराल के परिवार में एक बहुत अच्छी परंपरा थी - इस दिन वो सभी लोग अपने सभी दोस्त - सम्बन्धी को 'दही' भेज्वाते हैं....वहाँ दो तीन पहले से करीब सौ दो सौ किलो दही जमता है ...फिर वो सभी दही 'पटना' पहुंचा ....और सभी दोस्त महीम सगे सम्बन्धी के घर पहुंचाया जाता था ! दो तीन साल पहले तक - जब तक सास जिन्दा थीं यह परंपरा चलते रहा ! अब का नहीं पता ....कई लोग तो अपने घर 'दही' जम्वाते तक नहीं थे - की 'फलाना बाबु' के यहाँ से आएगा ही - एक बड़ा 'नदिया दही' :)) 1996 में मेरे ससुर जी आज के ही दिन एक नदिया दही - बेसन की मिठाई और अपनी बेटी का टीपण ( जन्म कुंडली ) मुझे दिए थे ....हर साल आज के दिन वो पल याद आता है ....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;माँ के एक ही मामा जी थे - गया जिला के ! हर साल वो सिर्फ एक बार आते थे - मकर संक्रांती के दिन ! तिलकुट लेकर और बासमती चिउरा ! कुछ देर रुकते फिर चले जाते !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कल रात देखा - सोसाईटी में - पंजाबी लोग बहुत जोरदार ढंग से 'लोहडी' मना रहे थे .....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आप सभी को मकर संक्रांती की शुभकामनाएं .....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-8385501781927435251?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/8385501781927435251/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=8385501781927435251' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/8385501781927435251'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/8385501781927435251'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='मेरा गाँव - मेरा देस - मकर संक्रांति'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-1206295035869153610</id><published>2010-12-30T21:33:00.001+05:30</published><updated>2010-12-30T21:44:32.699+05:30</updated><title type='text'>ये साल भी जा रहा है ....</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब से कुछ घंटो में यह साल भी चला जायेगा ! विदाई ! इससे ज्यादा कष्ट किसी और शब्द में नहीं है ! मालूम नहीं लोग कैसे नए साल का स्वागत करते हैं !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;नया नया टी वी आया था ! टी वी के सामने बैठ - रजाई के अंदर से टुकुर - टुकुर टी वी देख रात तक जागना ! फिर थोडा शर्माते हुए - घर के लोगों को 'हैप्पी न्यु ईयर' बोलना और सो जाना ताकि सुबह उठ कर - "मुर्गा" खरीदने जाना है ! बस यही था - नया साल ! मोबाईल नहीं होता था ! बहुत हुआ तो घर वाले सरकारी फोन से किसी खास दोस्त को ! कभी कभी वो भी नहीं !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बहुत दोस्त लोग पटना के 'बौटनिकल गार्डन' में - तो कोई गंगा किनारे - दियारा में ! तो ढेर एडभांश भाई लोग 'फिएट कार' से राजगीर ! हम कभी नहीं - कही नहीं !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बंगलौर में नौकरी किया तो एम जी रोड पर् ! तब देखा की 'रात में नए साल ' में प्रवेश करते समय - कैसे चिल्लाया जाता है ! हम कभी नहीं चिल्लाये - कोई साथ में था भी नहीं - जिसके साथ चिल्लाया जाए ;)&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बाबा - बाबु जी को कभी 'शराब' के साथ नहीं देखा ! चाचा के जेनेरेशन में लोग 'ड्रिंक' करने लगे ! मेरे संगी साथी - "हार्ड - सोफ्ट " ! और नया जेनेरेशन .......कॉलेज में था तो ऐसा आईटम लोग का कमी नहीं था ...घर से ड्राफ्ट आया नहीं की ...शुरू हो गया ' 31 दिसंबर' का पार्टी का प्लान ! घसीट के सब ले जाता था ! नहीं जाने पर् - ऐसा लगता जैसे हम इस दुनिया के प्राणी नहीं हैं ! अपना पैसा से 'खिला पिया ' दिया फिर एक सप्ताह बाद - हिसाब ! जो "पीता" नहीं - उससका हिसाब अलग से ! अजीब हाल था :(&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोक में ग्रीटिंग्स कार्ड खरीदाता - साथ में स्केच भी ! खूब मन लगा के - दोस्त - सगे सम्बन्धी का एड्रेस लिखता - लिफाफा में ! फिर हर दिन डाकिया का इंतज़ार - सभी कार्ड्स को इकठ्ठा कर बेड के नीचे तोसक के निचे रखना ! फुर्सत में - उनको बार बार देखना ! 'किसी खास का कार्ड हो तो बिन कहे शब्दों को बार बार पढ़ने की कोशिश करना' :))&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब से नॉएडा - इंदिरापुरम आया हूँ - हर बड़ा दिन कि छुट्टी में परिवार 'पटना' चला जाता है :( कुछ अकेले ही यह दिन बितता है :( सबसे पहले पत्नी का ही फोन आता है ! पूछती है - क्या खाए ? मालूम नहीं इनको मेरे खाने का ही ज्यादा चिंता रहता है ! :) फिर उनसे पूछता हूँ - 'माँ - बाबु जी - बच्चे सो गए , क्या ? ' कहती है - हाँ ! सुबह में - माँ और बाबु जी का फोन ! माँ आज भी मुझे 'आप' कह कर ही बुलाती हैं :) बाबु जी - भोजपुरी में 'तू' हम भी उनको भोजपुरी में उनको 'तू' ही बोलते हैं और हिन्दी में 'आप' :) बहस हिन्दी में होती है - "आप" के साथ !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब साल कैसा बिता - यही सोच रहा था ! जहाँ काम करता हूँ - वहाँ 'अरियर' के साथ 6th पेय कमीशन लागू हुआ ! प्रोमोशन भी मिला ! सहायक प्राध्यापक से 'सह- प्राध्यापक' हो गया हूँ - इस शर्त के साथ की - अगले कुछ सालों में 'पीएचडी' कर लूँगा - वर्ना नौकरी खतरे में है .... :( और मेरे पास 'पीएचडी' का कोई प्लान अभी नज़र नहीं आ रहा है :( सन 2005 में मुझे डबल प्रोमोशन मिला था - मेरे महाविद्यापीठ के पचास साल में पहला उदहारण ! सब , किसी अदृश्य शक्ती का कमाल है &amp;nbsp;- हम जो आज से बीस साल पहले जैसे थे - आज भी वैसे ही हैं :(&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुत्र का जनेऊ किया ! हम छपरा जिला के हैं - यहाँ एक रिवाज है - घर में किसी लडके - लडकी की शादी के साथ ही घर के छोटे बच्चे का जनेऊ होता है ! बाबु जी के शादी में चाचा का जनेऊ हुआ था ! चाचा की शादी में मेरा और चचेरी बहन की शादी थी तो मेरे पुत्र का ! बहुत खुश और रोमांचित था ! &amp;nbsp;सम्बन्धी को छोड़ किसी और को &amp;nbsp; इनवाईट नहीं किया था - फेसबुक से सिर्फ दो जाने - कृष्ण सर और प्रभाकर जी ! पुत्र जब स्कूल गया तो उसे 'जनेऊ' के बारे में बोलने में थोड़ी शर्म आई तो अपने मुंडन का दूसरा बहाना बना दिया ! यह एक अलग जेनेरेशन है - मुझे खुशी है ! ( संभवतः आप लोग मेरी बात समझ रहे होंगे )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह साल 'फेसबुक' के भी नाम गया ! कई नयी दोस्ती हुई और सम्बन्ध बने ! धर्म और जाति के बंधन से बिलकुल अलग ! कुछ लोग अजीबोगरीब ढंग से मुझसे पेश आये - भगवान उनको सुबुध्धि दे ! कई पुराने संबंधों में सुधार आया ! स्कूल और कॉलेज के कई बिछड़े दोस्त मिले ! सीनियर भी ! फेसबुक पर् जो बिहार ग्रुप हैं - वहाँ से मुझे 'फेसबुक यूथ आइकन ऑफ बिहार' मिला - अच्छा लगा ! :)) और क्या कहूँ ? :)) अतुल काफी जोशीला है - मुझे लगता है - आज के बिहार में जैसे 'जयप्रकाश आंदोलन' के लोग राजनीति में हैं - वैसे ही 'अगले दस य बीस साल में इस फेसबुक / याहूग्रुप से निकले लोग - बिहार कि सता पर् काबीज होंगे ! संभवतः तब भी यह ग्रुप मेरे साथ होगा ;)&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एक नयी गाड़ी खरीदने का प्लान था - जो नहीं हो सका ! शायद होली तक ! हम लोग बैंक में पैसा रखने वाले प्राणी नहीं हैं ! दो - तीन लाख में ही "अउल - बउल" होने लगते हैं :( &amp;nbsp;पति - पत्नी दोनों खर्चीले हैं :) &amp;nbsp;पन्द्रह साल इंतज़ार किया और एक 'बोस' का स्पीकर खरीदा ! संगीत अच्छा लगता है ! हिम्मत नहीं हो रही थी - पत्नी ने बोला ले लीजिए - कल का कल को देखा जायेगा !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस साल बाबु जी बहुत बीमार रहे ! हमेशा यही चिंता लगी रहती है ! कई बार बोला - मारिये गोली - बिहार सरकार की नौकरी को - मालूम नहीं क्या सोचते हैं ? :(&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब अगला साल क्या करना है ?&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आज तक प्लानिंग नहीं तो अब क्या करूँ ?? :(&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जे होगा से देखा जायेगा !!!&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आज से हर पोस्ट के साथ एक गीत होगा - लीजिए आज का मेरा पसंदीदा गीत सुनिए :))&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;object height="385" width="480"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/0GLYKYgSE0Y?fs=1&amp;amp;hl=en_US"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/0GLYKYgSE0Y?fs=1&amp;amp;hl=en_US" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="480" height="385"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-1206295035869153610?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/1206295035869153610/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=1206295035869153610' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/1206295035869153610'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/1206295035869153610'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2010/12/blog-post_30.html' title='ये साल भी जा रहा है ....'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-7223795091589700779</id><published>2010-12-27T11:16:00.000+05:30</published><updated>2010-12-27T11:16:12.924+05:30</updated><title type='text'>CNN - IBN अवार्ड समारोह !!</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;२२ दिसंबर को परिवार को 'पटना' जाना था ! सो मै लंच के बाद कॉलेज से लौट आया ! अभी लिफ्ट में ही था की फोन की घंटी बजी और उधर थे सी एन एन से आकाश - हिन्दी में ही :) बोले आज शाम आप सी एन एन आई बी एन 'अवार्ड समारोह' में आमंत्रित हैं - ताज पैलेस होटल में ! मै मंद मंद मुस्काया और 'प्रभाकर ' को रिंग किया - बोला ..थैंक्स भाई ...!&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;फ़्लैट में घुसा तो पत्नी को बोला - तुम लोगों को ट्रेन में बिठा कर - मुझे 'अवार्ड समारोह' के लिये निकल जाऊंगा ! सो कोई बढ़िया सूट निकाल दो - प्रिंस - बंद गला - थ्री पीस - टू पीस - इंग्लिश :( खैर ..एक बढ़िया ग्रे कलर का सूट - सफ़ेद कमीज़ और एक नयी टाई सेलेक्ट हुई - फिर हुआ की स्टेशन पर् 'सूट' गन्दा हो जाएगा - सो कार में ही कोट लटका रहेगा !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;स्टेशन पर् पहुंचा - वहाँ 'कृष्ण सर ' मिल गए - उनको भी बताया - 'सी एन एन - आई बी एन अवार्ड' समारोह जा रहा हूँ :)&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पुरानी आदत है - समय से पहले पहुँचने का :) आधा घंटा पहले पहुँच गया - लॉबी में खडा था - राजदीप से मुलाकात हुई - ब्लैक कलर के बंद गला में 'गजब के स्मार्ट दिख रहे थे ! स्वभाव से शर्मीला हूँ सो थोड़ी देर बाद आकाश को फोन किया और वो मुझे 'दरबार हौल में पहले से निर्धारित एक टेबल पर् बैठा दिए ! चुप चाप ! थोड़ी दूर पर् थे - 'कुमार &amp;nbsp;मंगलम बिरला - अपने दादा जी और दादी जी के साथ ' सभी से मिल जुल रहे थे ! धीरे - धीरे &amp;nbsp;सभी गेस्ट पहुँचाने लगे - वो सभी लोग थे - जिनको आज तक हम जैसे लोग सिर्फ 'अखबार और टी वी ' में ही दिखते थे ! प्रणव मुखर्जी , नितिन गडकरी , सुशील मोदी , ज्योतिराजे सिंधिया , रवि शंकर प्रसाद , विजय त्रिवेदी , सर मेघ्नंद देसाई , "सुधांशु मित्तल" और मालूम नहीं कितने लोग .....हम तो अपने टेबल पर् ऐसे बैठे थे - जैसे इन लोगों से रोज ही मुलाक़ात होती हो .....;)&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;प्रोग्राम शुरू हुआ ..राघव जी कुछ बोले ...लिंक लगाया हूँ - आप लोग देख लीजियेगा ....फिर आये 'राजदीप सरदेसाई' ! मै उनको गौर से देख रहा था - आँखों में भोलापन् - चेहरे पर् गजब का आत्मविश्वास ! मै कई 'पत्रकारों' से मिला हूँ - और सबका यह मानना है की 'राजदीप' एक बेहद ही बढ़िया 'इंसान' है ! एक सच्चे नेतृत्व &amp;nbsp;का यह एक विशेष गुण होता है !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;और फिर शुरू हुआ - अवार्ड समारोह - मै दो लोगों से बेहद प्रभावित हुआ - एक 'कुमार मंगलम बिरला' - सचमुच - जो वृक्ष फल से लदा होता है - वो उतना ही झुका होता है ! उनके दादा जी 'सी के बिरला और दादी जी' कितने खुश थे ! दूसरे थे - "पत्रकार - गोपीनाथ" जिन्होंने 'टू जी' स्कैम का पर्दाफाश किया - जब वो स्टेज पर् आये तो - पीछे खड़े कई पत्रकार सबसे ज्यादा देर तक - आँखों में खुशी के आंसू लिये 'ताली ' बजा रहे थे ! यह अवार्ड था उन पत्रकारों के लिये - जो 'सता की गलियारी' के चहलकदमी नहीं कर अपना काम ईमानदारी पूर्वक करते हैं - !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;नितीश को इन्डियन ऑफ द इन्डियन का अवार्ड मिला - मेरे बगल में एक विदेशी और बेहद ख़ूबसूरत - शालीन &amp;nbsp;महिला बैठी थीं - जब नितीश को अवार्ड मिला तो - खुशी से आंसू आ गए - यह सम्मान - सभी बिहारी के लिये था ! हम तो कुर्सी से खडा हो गया - सबसे देर तक ताली बजाया - विदेशी महिला ने मुझसे पूछा - ये कौन हैं ? मैंने बोला - अगला 'प्रधानमंत्री' :)) मेरे दूसरी तरफ एक बिहारी भाई थे - हम उनके हाव भाव से पहचान लिये थे की - बिहारी हैं - अब भाई इतना बड़ा फंक्शन में - कौन किसको टोके ;) जब नितीश के नाम पर् हम दोनों खडा होकर &amp;nbsp;- ताली बजाये और एक दूसरे को देख 'मुस्कुराए' तब मैंने बोला - पहले बोलना था न् .."बिहारी" हूँ :))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;प्रोग्राम खत्म हुआ - भर पेट भोजन हुआ ! "सुधांशु मित्तल" मुझसे कुछ बात करना चाह रहे थे - पर् मेरे पास वक्त नहीं था ! फोन पर् 'प्रभाकर' को बहुत बहुत धन्यवाद दिया - लौटते वक्त रास्ता भूल गया :( एक बिहारी ऑटो वाला मिला - "मोतिहारी" का - उसने रास्ता बताया -&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बढ़िया लगा ....बहुत दिन तक 'नितीश' के शब्द कानो में गूंजते &amp;nbsp;रहे .....राजदीप का भोलापन याद आता रहा ...कुमार मंगलम बिरला ......गोपीनाथ ....&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;प्रोग्राम देखने के लिये - &lt;a href="http://ibnlive.in.com/videos/138316/nitish-kumar-is-cnnibn-indian-of-the-year-2010.html"&gt;यहाँ क्लिक करें &lt;/a&gt;! जरुर देखें !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-7223795091589700779?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/7223795091589700779/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=7223795091589700779' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/7223795091589700779'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/7223795091589700779'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2010/12/cnn-ibn.html' title='CNN - IBN अवार्ड समारोह !!'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-8239585528402305550</id><published>2010-12-16T16:11:00.000+05:30</published><updated>2010-12-16T16:11:54.051+05:30</updated><title type='text'>"अवकात"</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"तुम्हारी &amp;nbsp;अवकात क्या है ? तुम्हारे अवकात का आदमी मेरे घर मुंशी मैनेजर होता है ! तुम जैसे की अवकात जानता हूँ ! अवकात में रहो ! तुम मेरी अवकात क्या समझोगे ? रुको , अपनी अवकात दिखाता हूँ ! देखो इस नीच को - अपनी अवकात दिखा दिया &amp;nbsp;"&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मालुम नहीं ऐसे कई शब्द कानों में गूंजते हैं !हमें अपनी अवकात से ज्यादा दूसरों की अवकात की ज्यादा चिंता रहती है ! समाज में थोडा कुछ बोलिए नहीं की लोग अपनी अवकात भूल आपकी अवकात नापने लगेंगे !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कंकडबाग में किराया के मकान में रहते थे ! पड़ोस वाले के बेटे मेरी उम्र के थे - उनका अपना मकान था ! एक दिन बालकोनी से बोल दिया - "किरायेदार हो , अवकात में रहो " ! आठवीं में पढता था ! बोला नीचे आओ ! वो तीन और मै अकेला ! जम के लड़ाई हुई ! बाबु जी छत से चिल्लाते रहे - मै कहाँ सुनने वाला था ! "उसने बात अवकात की थी - चोट बहुत गहरी लगी थी " ! आज भी वो तीनो भाई मेरे नाम से कांपते हैं ! आज उस मकान से मात्र कुछ सौ मीटर की दूरी पर् हमारा मकान है ! बाबु जी , सभी भाई का - एक साथ ! एक बार रास्ते में मिला - बोला देख लो मेरा अवकात - हम उस खानदान से नहीं आते हैं - जहाँ एक भाई गाँव में खुरपी लेकर 'सोहनी' कर रहा है और दूसरा पटना में मकान पर् मकान बना रहा है ! मै जान बुझ कर उसे अपनी अवकात से ज्यादा बोला था ! बाद में मुझे खुद बहुत बुरा लगा पर् उसकी दी हुई चोट बहुत गहरी थी ! शायद यही एक कारण है की - मै किसी भी किरायेदार को बहुत ही इज्जत करता हूँ !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बहुत कम लोग ऐसे होते हैं - जो ताउम्र एक ही रफ़्तार &amp;nbsp;से आगे बढते हैं ! बाकी की जिंदगी में बहुत उतार और चढाव होता है ! जब किसी की जिंदगी उतर पर् &amp;nbsp;हो हमें 'अवकात' वाली शब्दों से बचना चाहिए ! कल किसी ने नहीं देखा है ! "गोली" से भी खतरनाक "बोली" होती है ! आदमी नहीं भूलता ! कब किस पर् भगवान मेहरबान हो जाए - कोई नहीं जानता :)&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एम् &amp;nbsp;टेक करने के बाद मै पटना के एक प्राईवेट कॉलेज में पढाने गया ! उस कॉलेज के चेयरमैन साहब जब तब मुझे मेरी अवकात दिखा देते :) मुझे समझ में नहीं आया ! बाद में पता चला की कॉलेज के संस्थापक और चेयरमैन साहब के पिता जी मेरे ससुर जी के साथ बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पढते थे - तब शायद मेरे ससुर जी की औकात ज्यादा रही होगी ! जिस दिन मुझे यह पता चला - मैंने उसी वक्त 'नौकरी' को छोड़ा और नॉएडा का ट्रेन पकड़ लिया ! फिर , गया उनसे मिलने :) बंद कमरे में - मै बोला और इस बार उनको सुनना पड़ा !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कंकडबाग में हमारे एक पारिवारीक मित्र और हमारे काफी शुभचिंतक बच्चों के एक डॉक्टर हैं ! मेरे और मेरे पिता जी के उम्र के बीच के हैं ! मै उनकी बहुत इज्जत करता हूँ और वो भी मेरी ! कुछ साल पहले - बिहार के बाहुबली लोग उनको थोडा तंग करने लगे ! वो कुछ बर्दाश्त किये ! फिर एक दिन एक बाहुबली को बोला - "डॉक्टर समझ मेरी अवकात मत नाप - जिंदगी के किसी भी परीक्षा में अपने क्लास में 'सेकण्ड' नहीं किया - जिस दिन तुम्हारे धंधे में उतर जाऊंगा - वहाँ फिर मै ही फर्स्ट करूँगा " ! अब बेचारा 'बाहुबली' जो मेरे भी मित्र थे &amp;nbsp; - एकदम से सहम गए :) मैंने उनको बोला - 'बाहुबली जी , किसी सज्जन पुरुष का अवकात मत नापिए - फेरा में पड़ जाईयेगा " !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अभय जी बी पी एस सी परीक्षा में अवल्ल आये - बिहार सरकार में डी एस पी बने ! बात 2006 की है - &amp;nbsp;उनकी माता जी बीमार थीं और तारा हॉस्पीटल में भरती थीं ! मुझे 'देवेश भैया' का फोन आया - अभय जी से मिल लो ! मै जब तारा हॉस्पीटल पहुंचा तो वहाँ की सेकुरीटी देख मेरा दीमाग खराब हो गया ! काले काले ड्रेस में कमांडो ! कई जिप्सी ! और अभय जी एक कमरे में अपनी माता जी के साथ अकेले बैठे ! पता चला की इतनी सेकुरीटी - बिहार के डी जी पी के पास भी नहीं है ! मामला मैंने अभय जी से खुद पूछा - बोले की 'सिवान का डी एस पी हूँ - 1989 में बहाल हुआ - आज तक फिल्ड पोस्टिंग नहीं हुई - शायद एक खास जाती के होने के कारण - खैर जेल में शहाबुद्दीन को जम के पीटा " ! वो भी एकदम सिनेमा स्टाईल में - जब पीटा तब उसके लोग भी आगे आये - उसने सबको मना कर दिया - और जब मेरे तरफ से लोग आगे आये तो मैंने मना कर दिया - और जी भर उसको पीटा !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जी , यही है अवकात !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;दालान ब्लॉग लोकप्रिय हो रहा है :)) और भी लेखक इससे जुड सकते हैं ! मेरी "अवकात " मत नापियेगा ..मै एक शिक्षक हूँ ...आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता :))&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-8239585528402305550?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/8239585528402305550/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=8239585528402305550' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/8239585528402305550'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/8239585528402305550'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2010/12/blog-post_16.html' title='&quot;अवकात&quot;'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-5298990019639123784</id><published>2010-12-08T19:04:00.002+05:30</published><updated>2010-12-08T19:41:37.388+05:30</updated><title type='text'>"बिहारी प्राईड - भाग चार "</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दो साल पहले की बात है - अचानक से एक ई-मेल आता है - "रँजन जी , अपने गाँव में एक इंजीनियरींग कॉलेज खोलना चाहता हूँ , आप किस तरह से मुझ से जुड सकते हैं " ! ये मेल था - "चंद्रकांत जी " का ! करीब १८-१९ साल पहले की एक घटना याद आ गयी ! उस वक्त बाबु जी के साथ 'तारा हॉस्पीटल' में बैठा था - तब तक 'चंद्रकांत' आते हैं - अपने टेस्टीमोनीयल्स पर् "ऐयटेस्ट" करवाने ! बहुत ही हल्की परिचय हुई थी - उस वक्त ! उनका सेलेक्शन तत्कालीन बिहार के सबसे बढ़िया इंजीनीयरिंग कॉलेज में हुआ था - सिंदरी ! बेहद शर्मीला और ग्रामीण परिवेश की एक झलक ! वो हमारे गाँव के ठीक बगल वाले गाँव के रहने वाले थे ! बीच बीच में उनके बारे में पता चलता रहा ! सिंदरी के बाद वो आई आई टी - मुंबई गए और फिर शादी विवाह और जर्मनी ! खांटी 'इलेक्ट्रिकल इंजिनीयर' हैं ! एक कोशिश उन्होंने 'आई टी सेकटर' में भी की जहाँ वो सन २००१ के हादसे के शिकार हुए !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उनका ई-मेल आने के बाद मेरी उत्सुकता बढ़ी और मैंने उनको हरसंभव मदद का वचन दिया ! उनके प्लान काफी क्लेअर थे ! वो एक जिद पर् अड़े थे - जो कुछ भी करूँगा - अपने गाँव में ! उनके गाँव में लोग उत्सुक होने लगे ! धीरे - धीरे माहौल बनने लगा ! उनके पिता जी जो शिक्षक हैं - उन्होंने गाँव को भरोसे में लिया ! 'चंद्रकांत' का प्लान इंजीनियरिंग कॉलेज का था - उनके साथ उनके कई दोस्त भी थे - सभी के सभी सिंदरी वाले - किसी के पिता 'बड़े अफसर' नहीं थे - कोई &amp;nbsp;आरा का तो कोई मुंगेर का - सभी को 'चंद्रकांत' में असीम विश्वास ! उनकी टीम में मै ही एक अकेला अलग सा था ! बात होते होते - थोडा और करीब आये तो मैंने उन्हें 'स्कूल' खोलने का सलाह दिया क्योंकी इंजीनियरिंग कॉलेज खोलना इतना आसान नहीं था वो भी पटना से १५० किलोमीटर दूर एक गाँव में ! मै बंगलौर भी गया - चंद्रकांत से मिलने ! १८-१९ साल बाद पहली मुलाक़ात थी - बदल चुके थे ! अपनी कहानी सुनाई - कहते गए - जर्मनी में था - अचानक बेहोश हो गया - हॉस्पीटल गया तो पता चला की 'मधुमेह' है वो भी बहुत सीरियस ! हॉस्पिटल में २ महीना भर्ती कर दिया ! पत्नी अकेली ! एक छोटी बेटी ! माँ-बाबु जी गाँव में ! किसी के पास पासपोर्ट नहीं ! माँ बाबु जी हर रोज रोते थे - कहाँ जाते - किससे कहते - कहाँ आते ? "चंद्रकांत" तुरंत भारत लौट आये और बंगलौर में एक ज़मीन लेकर एक कोठी बनवाई ! फिर भी यहाँ उनका मन नहीं लगता था - फिर अचानक उन्होंने एक डिसीजन लिया - अपनी सारी कमाई अपने गाँव में लगाने की ! गाँव का कई दौरा किया - लोगों का विश्वास जीता और फिर दोस्तों की एक टीम बनाई !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;फिर वो नितीश के प्रिय 'राघवन' से टाईम लिये &amp;nbsp;! मुझे भी बोला आप भी चलिए पटना - मै भी गया ! राघवन के साथ , अशोक सिन्हा जी और संदीप पुण्डरीक थे ! मेरी थोड़ी जिद थी - पटना के आस पास ही खोलने की ! हम सभी इस आशा में थे की सरकार 'चंद्रकांत' को जमीन बाज़ार रेट पर् दे देगी ! संदीप पुण्डरीक के पास जमीन भी थी ! और सूबह में जो मूल्य बताया गया &amp;nbsp;वो मूल्य बिलकुल 'चंद्रकांत' के फेवर में थे ! सुबह की मुलाकात के बाद - शाम को अशोक सिन्हा जी अपने पास बुलाये - वहाँ जब हम सभी पहुंचे तब तक 'संदीप' जमीन की कीमत चार गुना बढ़ा चुके थे ! हम सभी एकदम 'शौक' में आ गए ! मेरे साथ मेरे बहनोई जी भी थे ! मै 'अशोक सिन्हा' जी की बेबसी समझ रहा था ! और मेरे दीमाग में यही ख्याल आया की 'काश , मै नालंदा का होता ' ! :) खैर अगले दिन हम बिहटा इत्यादी भी घुमे ! शाम को चंद्रकांत अपने गाँव गए और वो अपनी टीम के साथ मीटिंग करने के बाद बोले - वो अपने गाँव में ही स्कूल खोलेंगे ! अब मेरे पास 'कंसल्टेंसी' देने को नहीं रहा ...और उनकी अपनी टीम बीजी हो गयी ! मै बस यहीं से बैठे - शुभकामनायें ही दे सकता था !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उन्होंने अपने गाँव में करीब २५ एकड जमीन लिया ! स्कूल बनाया ! और अब स्कूल तेजी से चल रहा है ! जो जमीन उन्होंने लिया - उसकी कीमत ही करीब पांच गुना हो चुकी है ! "चंद्रकांत" इंटरनेट पर् बैठ 'मुखिया जी ' की तरह 'बिहारी प्राईड' नहीं लिखते हैं ! वो पटना के किसी बड़े अफसर के बेटे नहीं हैं ! वो सेंट माइकेल और दिल्ली के मॉडर्न स्कूल से नहीं पढ़े ! वो ..अपनी कहानी शान से सुनाते हैं - कहते हैं - एक वक्त ऐसा था की बाबु जी मुझे 'एयरफ़ोर्स' में बहाल होने को जोर दे रहे थे - आज वो देश दुनिया घूम अपनी जिंदगी की सारी कमाई अपने गाँव में लगा दिए ! वो अभी चालीस भी पार नहीं किये हैं ! कई 'पेटेंट' उनके नाम से है ! बेहद रईस के तरह &amp;nbsp;बंगलौर में रहते हैं ! उनके किस्से किसी अखबार में नहीं छपते हैं ! वो 'इलीट' नहीं हैं ! पर् एक जज्बात है - मिटटी के क़र्ज़ को लौटाने का ! यह काम आसान नहीं था !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ऐसे कई लोग आपके - हमारे इर्द गिर्द हैं - जिनके जज्बे को सलाम कर हम कई और को प्रेरित कर सकते हैं !!&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अगर आपके पास ऐसी कोई कहानी हो तो मुझे ई-मेल करें - mukhiya.jee@gmail.com&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-5298990019639123784?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/5298990019639123784/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=5298990019639123784' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/5298990019639123784'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/5298990019639123784'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2010/12/blog-post_08.html' title='&quot;बिहारी प्राईड - भाग चार &quot;'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-6747088451383312308</id><published>2010-12-05T23:06:00.001+05:30</published><updated>2010-12-05T23:12:31.514+05:30</updated><title type='text'>मेरा गाँव - मेरा देस - मेरे बिजनेस</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अभी कुछ दिन पहले की एक बात है ! एक बिहारी मित्र के यहाँ दोपहर में बैठा हुआ था वो खुद बहुत ही बड़े व्यापारी हैं - तब तक दो सज्जन आये ! मेरे मित्र ने मुझसे भी उनका परिचय कराया ! मैंने बात ही बात में पूछ दिया - आप दोनों क्या करते हैं ? उनमे से एक ने बोला - अजी , मेरा 'बाल्टी' चलता है ! मै कुछ समझा नहीं - तो दुबारा पूछा - 'क्या ???' वो फिर बोले - &lt;b&gt;&lt;i&gt;' अजी , मेरा 'बाल्टी' चलता है' &lt;/i&gt;&lt;/b&gt;! इस बीच मेरे मित्र मंद मंद मुस्कुराने लगे - वो समझ गए - बात मेरी समझ में नहीं आई है ! मेरे मित्र ने मुझे समझाया की हर शनीवार दिल्ली / एनसीआर के सभी रेड लाईट पर् आपको पीतल का बाल्टी मिलेगा - लोग उसमे 'सरसों का तेल' और पैसा डालते हैं - सो , ये दोनों भाईसाहब का दिल्ली में हर शनीवार करीब 'दो तीन सौ' बाल्टी "लगता" है ! पुर टीम है ! वर्कर है ! टेम्पो है ! शनीवार सुबह टेम्पो पर् &amp;nbsp;तीन सौ 'बाल्टी' लदा जाता है - हर चौक चौराहा पर् उसको रख दिया जाता है -दिन भर लोग उसमे पैसा डालते हैं और कई सरसों का तेल भी 'शनी भगवन' को खुश करने के लिये ! &amp;nbsp;शाम को उसको उठा लिया जाता है ! मै एकदम से भौच्चक रह गया ! फिर खुद को संभाला और पूछा - टर्नओवर कितना है ? दोनों ने बोला - करीब महीना में साठ हज़ार से एक लाख के बीच काट छांट कर बच जाता है !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कॉलेज के ज़माने का एक जिगरी दोस्त होता था - चन्दन ! हमसभी उसको 'पंडीत' कहते थे ! कहता था - 'देखो &amp;nbsp;, नेता - पैसा सड़क पर् गिरा पडा है - उठाने का कुब्बत और दिमाग चाहिए !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पिछला दस साल छोड़ दीजिए तो हम बिहारी या जिस समाज से हम आते हैं - वहाँ 'बिजनेस' का अलग मायने था ! कुछ बिजनेस जो मुझे याद हैं और पसंद भी - उनके बारे में कुछ लिखता हूँ !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;१. दवा का दूकान :-&lt;/b&gt; आप मिडिल क्लास से हैं ! चश्मा वाले पढ़ाकू हैं ! कम्पीटिशन देते देते थक गए ! पहले मेडिकल का दिया , फिर बिहार सरकार का क्लास वन , फिर पीओ , फिर बैंक क्लर्क - कहीं कुछ नहीं हुआ ! थोड़ा ठीक ठाक परिवार के हैं ! एमएससी , एमए कर &amp;nbsp;के किसी प्राईवेट कॉलेज में बहाल हो गए - तनखाह नहीं मिल रहा ! शादी में भी दिक्कत ! तब तक आपके कोई 'फूफा-मामा' सलाह देंगे 'दवा के दूकान' का !&amp;nbsp;आपको बिहार के अधिकतर दवा के दुकानदार इसी पृष्ठभूमि से नज़र आयेंगे ! आज ही अपने एक छोटे फुफेरे भाई से पूछा - जो की गोपालगंज में दवा का व्यापार करता है - कितना का टर्नओवर हुआ - बोला , चिंकू भैया - अमकी एक करोड 'ठेक' जायेगा :) !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;२. किताब का दुकान :- &lt;/b&gt;मेरा यह पसंदीदा व्यापार है ! पटना के अशोक राजपथ पर् आपको कई पुराने बंगाली दादा लोग मिल जायेंगे - बेहद मीठे बोलने वाले - मै बंगलौर के गंगा राम और सपना बुक शॉप &amp;nbsp;में घंटों बिताया हूँ ! किताबों से भी ज्यादा बढ़िया मुझे 'मैग्जीन' के दूकान लगते हैं ! नाला रोड के मैग्जीन कॉर्नर पर् मै एक पाँव पर् खड़े होकर कई शाम बिताएं हैं ! मालूम नहीं इस तरह के दुकान कितने फायदे के रह गए हैं - पर् ये कुछ बेहतरीन बिजनेस में से एक है ! पिछले तीस साल में इसके स्वरुप बदले हैं ! पर् जेंटलमैन का बिजनेस आप इसे कह सकते हैं !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;३.ठेकेदारी : - &lt;/b&gt;समाज के जिस वर्ग से मै आता हूँ - वहाँ हर परिवार में आपको एक 'ठेकेदार' जरुर मिल जायेंगे ! &amp;nbsp; एक से बढ़ कर एक 'ठेकेदार' ! एक शादी में गया - पूछा लड़का क्या करता है ? पता चला एक सिनेमा हॉल में 'साईकील स्टैंड' का "ठीका" है ! पिछले आठ साल से नॉएडा - इंदिरापुरम इलाके में हूँ - मुझे बहुत कम बार 'पार्किंग' देना पड़ा - क्योंकी यहाँ के सभी ठेकेदार 'बिहारी' ही हैं :)) आज़ादी के बाद देश निर्माण के समय दो काम हुआ - उत्तर बिहार में हर घर में लोग सड़क निर्माण के 'ठीकेदार' बन् गए - जो ठेकेदार नहीं बने वो 'शिक्षक' बन् गए ! लालू राज में सब ठेकेदार गायब हो गए - अब नितीश राज में 'शांती' का एक वजह यह भी है की - सभी के सभी छोटे बड़े गुंडे 'सड़क निर्माण' के ठेकेदार बन् अब 'स्कोर्पियो और पजेरो' से नीचे बात ही नहीं करते हैं !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;४.कोचिंग :- &lt;/b&gt;याद है मुझे&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;बंगलौर से बाबु जी को फोन किया था - बोला की 'अब ई नौकरी न होई' ;-) बाबूजी पूछे -त का करोगे - मेरा जबाब था - "कोचिंग" ;) लालू राज में बिहार के सभी शहरों में हर गली की बात छोडिए - हर घर में - एक कोचिंग सेंटर खुल गया था ! जिसको देखिये वही एक चौकी लगा के - दू चार विद्यार्थीओं को पढ़ा रहा है ! अरबपति कोचिंग वाले से लेकर तुरंत का मैट्रीक पास किया हुआ - कोचिंग मालिक तक ;) हर वेरायीटी का कोचिंग मालिक और पढाने वाला ! आई आई टी टॉपर से लेकर घींच घांच के मैट्रीक पास तक ! आज भी बिहार के कई कोचिंग वाले हैं जिनकी सलाना आय करीब पांच करोड से लेकर पन्द्रह करोड तक है ! अगर आप इन् कोचिंग मालिकों की तरफ उंगली उठा दिए तो 'पत्रकार' आपको पटना में जिन्दा जला देंगे :)) जी , मै सच कह रहा हूँ ! सम्राट कामदेव सिंह के जमाने में बिहार के पुलीस अधिकारीओं को एक तनखाह सरकार देती थी दूसरी तनखाह - सम्राट देता था ! ;-)&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;५. नर्सिंग होम :&lt;/b&gt; अगर आप उत्तर बिहार से गंगा ब्रीज से पटना में घुस रहे हैं तो आपको हर दूसरे मकान में एक नर्सिंग होम मिल जायेगा ! :) खासकर कंकडबाग में ! एक कमरे का नर्सींग होम भी है ! तिलक से मिल रहे पैसे से एक कमरे वाले 'नर्सिंग' होम खुल रहे हैं ! हनुमान मंदिर से लेकर एनआरआई तक इस धंधे में अपना पैसा लगा रहे हैं !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पर् , नितीश आगमन पर् इस बिजनेस को बल मिला और पटना में कई पुराने नर्सिंग होम खुद को अपग्रेड किये ! इससे सबसे ज्यादा सहूलियत एनआरबी ( अप्रवासी बिहारी ) को मिला - जिनके माता पिता पटना में रह रहे हैं और बेहतर स्वास्थ्य सेवा उनको मिल सकती हैं ! पटना के डॉक्टरों में एक बीमारी होती थी - खुद को आगे बढ़ाते थे - अपने नर्सिंग होम को नहीं - लेकिन अब ऐसा नहीं है !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मै आपको पटना के प्राईवेट हॉस्पिटल के अंदर की एक तस्वीर दिखाता हूँ - जो सन १९८६ में खुला था ! पर् नितीश राज के दौरान यहाँ के प्रोमोटर ने इसको एक नया रूप दिया !&lt;b&gt; &lt;u&gt;"तारा हॉस्पीटल "&lt;/u&gt; &lt;/b&gt;- बिस्कोमान के ठीक पीछे - मेरे पिता जी भी यहाँ कार्यरत हैं !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TPvML60fHxI/AAAAAAAAA4w/jCrQ7B5fN3Y/s1600/IMG_0342.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://3.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TPvML60fHxI/AAAAAAAAA4w/jCrQ7B5fN3Y/s320/IMG_0342.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TPvMVJME47I/AAAAAAAAA40/V2JpZxQ1K00/s1600/IMG_0343.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://1.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TPvMVJME47I/AAAAAAAAA40/V2JpZxQ1K00/s320/IMG_0343.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TPvMeO4DkwI/AAAAAAAAA44/OLFoc8ch7a8/s1600/IMG_0344.JPG" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://1.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TPvMeO4DkwI/AAAAAAAAA44/OLFoc8ch7a8/s320/IMG_0344.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-6747088451383312308?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/6747088451383312308/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=6747088451383312308' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/6747088451383312308'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/6747088451383312308'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='मेरा गाँव - मेरा देस - मेरे बिजनेस'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TPvML60fHxI/AAAAAAAAA4w/jCrQ7B5fN3Y/s72-c/IMG_0342.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-2152015890623485371</id><published>2010-11-30T14:25:00.001+05:30</published><updated>2010-11-30T14:28:49.372+05:30</updated><title type='text'>मेरा गाँव - मेरा देस - जाड़ा का दिन !!</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पिछला हफ्ता देखा की कुछ लोग हाफ स्वेटर पहने हुए थे ! शाम को घर लौटा तो &amp;nbsp;पत्नी को बोला - ए जी ..अब कोट सोट , स्वीटर इयूटर निकालिए ..कहाँ रखीं है सब ? बोली की 'पलग' के बक्सा में रखा हुआ है - कल निकाल दूंगी ! &amp;nbsp;इस बात पर् 'एक राऊंड बहस' हो गया ! पुर पलंग के बक्सा को 'उकट' दिए ! फिर देखे की लाल वाला स्वेटर नहीं मिल रहा है - थोडा कड़ा आवाज़ में बोले - 'लाल वाला स्वेटर नहीं दिख रहा है ??' पत्नी बोली - 'हमको , क्या पता' ! अब फिर एक राऊंड बहस हुआ ! फिर , माँ को फोन लगाया - माँ बोलीं - वहीँ पटना में है ..पापा के आलमीरा में !!&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;खैर , पटना याद आ गया ! छठ पूजा खत्म &amp;nbsp;होते ही माँ लालजी मार्केट जाती थीं ! उन का गोला खरीदने ! साथ में 'काँटा' ( सलाई ) ! ठण्ड शुरू होते ही छत पर् चटाई बीछ जाता - दिन भर माँ - चाची - फुआ - मामी जैसा लोग स्वेटर बुनता था ! हर चार दिन पर् - हमको बुलाया जाता और आधा बीना हुआ स्वेटर &amp;nbsp;मेरे ऊपर नपाता ! कभी कभी पुराना स्वेटर को 'उघार' दिया जाता - फिर उस रंग का उन खोजने जाओ - यहाँ जाओ - वहाँ जाओ :( हम लोग तबाह हो जाते - साईकील चलाते चलाते :( "मनोरमा" नाम की एक मैग्जीन होती थी - उसमे 'स्वेटर' के तरह तरह के डिजाईन ! पुर मोहल्ला में एक ही मनोरमा - सबके घर घूमता :)&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मौसी लोग बाबु जी के लिये कोट के नीचे पहनने वाला हाफ स्वेटर बून कर भेजता ! कई महिलायें काफी फास्ट - चार दिन में स्वेटर बून के तैयार ! कुछ लोग पुर सीजन लेता और नवंबर से जो प्रोजेक्ट शुरू होता वो जनवरी में खत्म होता ! हाथ से बुने हुए स्वेटर की खासियत यह थी की - स्वेटर की प्रशंषा होते वक्त 'बुनने वाले' की भी बडाई होती या &amp;nbsp;बताया जाता की कौन बुना है !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हाल फिलहाल तक मेरी छोटी फुआ जो मुझे 'चिंकू' के नाम से पुकारती हैं - मेरे लिये स्वेटर बुन कर भेजती थी ! बहुत प्यार से ! पत्नी को फुर्सत नहीं है या मेरे लिये स्वेटर बुनने का मन नहीं है &amp;nbsp;और मेरे बच्चों की &amp;nbsp;कोई छोटी 'मौसी' नहीं है :(&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कॉलेज तक लाल और ब्लू वाला 'ब्लेज़र' का फैशन था ! अब तो बहुत कम लोग पहनते हैं ! मफलर का क्रेज होता था ! थ्री पीस सूट जो बियाह में सिलाता था ..लोग पहनते थे ! इंग्लिश जैकेट भी ! ओवर कोट भी ! आज कल तो चाईना वाला जैकेट का फैशन है ! वूडलैंड के मालिक चाईना से जैकेट माँगा के यहाँ बेच रहे हैं :( &amp;nbsp;मैंने बचपन में कई लोगों को देखा है &amp;nbsp;'थ्री पीस कोट' और साईकील :)) अब वैसा सीन नहीं दिखता !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बचपन में खेल भी सीजन के हिसाब से होते थे ! देर शाम तक लाईट जला के 'बैडमिंटन' खेलना ! उसके पहले क्रिकेट ! बाबु जी बैडमिंटन खेलते थे और जब वो घर लौट जाते तो हम लोग टूटे हुए कॉर्क के साथ :) शाम को स्कूल से आता तो 'चुरा - घी - चीनी ' - मनपसंदीदा ! स्कूल जाने के पहले भर पेट 'कूकर से तुरंत निकला हुआ - गरम गरम भात - दाल भुजीया और धनिया का चटनी ' ! मजा आ जाता ! लाई बनता था ! एकदम बज्ज्जर लाई - लोढा से फोड के खाना पड़ता था ! :) अमीर रिश्तेदारों के यहाँ से 'बासमती का चिउरा' आता था - झोला में :( एक किलो - दू किलो :(( माँ के एक ही मामा जी थे - बहुत अमीर - हर साल खुद आते थे ' बासमती चिउरा - गया वाला तिलकूट' लेकर ! जब तक जिन्दा रहे आते रहे ..! ऐसे कई सम्बन्ध थे ! मालूम नहीं वो सभी लोग कहाँ खो गए :(&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गाँव में 'घूर' ( घूरा , आग ) जलता था ! माल मवेशी के समीप ! वहाँ पुरा गाँव आता ! शाम साढ़े सात बजे का प्रादेशीक समाचार फिर बी बी सी - हिंदी &amp;nbsp;:) वहीँ हम बच्चे भी :) अलुआ पका के खाते थे :) उफ्फ़ ....आँगन में बोरसी जलता था ...खटिया के नीचे रख दीजिए और सूत जाईये .. :) बाहर बरामदा में ..चौकी से घेर के ..धान के पुआल पर् चादर बिछा दिया जाता ...जो सो आकार सोता ...! वो एक व्यवस्था थी ! खुद का खुद होता ! अब सब कुछ बदल गया ! अब हमारे बरामदा पर् कोई सोने नहीं आता :( &amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बचपन में बिना रजाई जाड़ा जाता ही नहीं :( सफ़ेद रंग के कपडे से रजाई का खोल ! कम्बल में भी खोल लगता था ...हम तो आज भी कम्बल ओढ़ के नहीं सो सकते :( ....एकदम से रजाई चाहिए ..! अब तो रूम हीटर आ गया है ..तरह तरह का ! कार में भी हीटर :) "गांती" भी बच्चे बांधते थे ..हम आज तक नहीं बांधे !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दिन भर ईख ( उख &amp;nbsp;) चूसना ! मैट्रीक का परीक्षा का तैयारी भी ! 'सेन-टप' एग्जाम देने बाद ..इसी जाडा में दिन भर छत पर् 'गोल्डन गाईड' के अंदर हिंदी 'उपन्यास' पढते रहना ;) दोस्त लोग भी आ जाता था ! एक सुबह दस बजे से शाम चार बजे तक गप्प ;) बीच बीच में पढाई भी ! कई दोस्त ऐसे होते जो कार्तिक पुर्णीमा के दिन नहाते फिर 'मकर संक्रांती ' दिन ! हा हा हा ......एक से बढ़ कर एक आइटम होता था !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;क्या लिखूं :) हंसी आ रही है ..गुजरे जमाने को याद कर !! :))&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;रँजन &amp;nbsp;ऋतुराज &amp;nbsp;- इंदिरापुरम !&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-2152015890623485371?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/2152015890623485371/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=2152015890623485371' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/2152015890623485371'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/2152015890623485371'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2010/11/blog-post_30.html' title='मेरा गाँव - मेरा देस - जाड़ा का दिन !!'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-5761663752599845606</id><published>2010-11-24T10:12:00.001+05:30</published><updated>2010-11-24T10:17:08.236+05:30</updated><title type='text'>"नितीश मोदी " को बधाई !!!!</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TOvWdkrunRI/AAAAAAAAA4o/R3D8xDpc4rA/s1600/Nitish_India_Today_2005.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TOvWdkrunRI/AAAAAAAAA4o/R3D8xDpc4rA/s320/Nitish_India_Today_2005.jpg" width="232" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TOvWdkrunRI/AAAAAAAAA4o/R3D8xDpc4rA/s1600/Nitish_India_Today_2005.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="640" src="http://3.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TOvWdkrunRI/AAAAAAAAA4o/R3D8xDpc4rA/s640/Nitish_India_Today_2005.jpg" width="464" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: justify;"&gt;ये पांच साल पुरानी तस्वीर है ! ठीक पांच साल पुरानी ! यह तस्वीर अब और बड़ी हो चुकी है ! नितीश और बड़े होकर निकले ! जनता के पास और कोई उपाय नहीं था ! विकल्पहीनता के बेताज बादशाह को इस बार फिर 'ताज और राज' मिला !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: justify;"&gt;बिहार का स्वर्णीम काल चल रहा है या नहीं - ये मुझे नहीं पता पर् 'नितीश कुमार' पर् 'समय' इस कदर मेहरबान है की वो एक साथ अपने कई दोस्तों और दुश्मनों को &amp;nbsp;अपनी और उनकी अवकात दिखा दिया ! इनकी जीत में विकास से ज्यादा कुछ और फैक्टर है - और सबसे बड़ा फैक्टर है - "ईबीसी और एमबीसी" वोट का लालू से नितीश के तरफ शिफ्ट करना ! यहाँ नितीश उनका 'विश्वास' जीतने में सफल हुए !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: justify;"&gt;इस बार नितीश कुमार के सामने कई और चैलेन्ज होंगे ! उनका ड्रीम कानून - "बटाईदार कानून" के साथ वो क्या करेंगे - यह देखना होगा ! क्या इस बार भी &amp;nbsp;वो 'नालंदा और अपनी जाति' के लोगों को मलाईदार पदों पर् बैठाएंगे ? सवर्णों के प्रती उनका क्या रवैया रहेगा ?&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: justify;"&gt;नितीश तो उस दिन ही जीत गए थे - जिस दिन 'दिग्विजय बाबु' का देहांत हो गया था और लालू ने रघुवंश बाबु को मुख्यमंत्री के रूप में आगे नहीं बढ़ाया .....बाकी की सभी चीज़ें खानापूर्ती थी !&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: justify;"&gt;अंततः ...नितीश मोदी ..बिहार को एक नयी छवी देंगे ..इन्ही आशाओं के साथ ....&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-5761663752599845606?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/5761663752599845606/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=5761663752599845606' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/5761663752599845606'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/5761663752599845606'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2010/11/blog-post_24.html' title='&quot;नितीश मोदी &quot; को बधाई !!!!'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TOvWdkrunRI/AAAAAAAAA4o/R3D8xDpc4rA/s72-c/Nitish_India_Today_2005.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-7204744980677699408</id><published>2010-11-20T11:03:00.000+05:30</published><updated>2010-11-20T11:03:50.924+05:30</updated><title type='text'>"बिहारी प्राईड - भाग तीन"</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बात उन दिनों की है ! २००३ की ! फेसबुक नहीं था ! ऑरकुट भी नहीं था ! याहूग्रुप हुआ करते थे ! घर से दूर होने के कारण मैंने भी कई 'याहूग्रुप' अपने स्वादानुसार&amp;nbsp; ज्वाइन किया ! बिहारीओं के भी ग्रुप थे ! पढ़े - लिखे बिहार से बाहर बसे युवाओं का ग्रुप ! सबके अंदर एक ही भावना - मेरा बिहार ..देश की रफ़्तार के साथ कैसे जुडेगा ! अगर आप उनदिनो उन ग्रुप के मेंबर थे तो आपको उस छोटे ग्रुप में एक 'मिनी बिहार' नज़र आता ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इंटरनेट में बने याहूग्रुप दरअसल 'डिस्कशन फोरम' था - जिसको कई लोग समझ नहीं पाते थे ! फिर भी लोगों ने इस छोटे छोटे ग्रुप से बहुत कुछ निकालने की कोशिश की ! कई बार तरह तरह के काम के लिये 'चंदे' इकठ्ठे किये गए - थोडा बचकाना भी लगता था - पर् भावना ऐसी थी की आपको अपना 'झंडा' ऊँचा रखना था ! इन युवाओं में अपने 'राज्य' के लिये कुछ करने की बेचैनी थी - अजब सी बेचैनी - पर् साथ साथ 'बिहार के सारे रंग' ;-) &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मुझे कुछ चीजें बहुत अच्छी लगी ! उनमे से एक था - 'मीडिया' का मुह बंद करना ! 'राष्ट्रीय मीडिया' ने अजब सा तमाशा बना दिया था - जब देखो तब 'बिहार' के लिये कुछ 'निगेटीव' ! इसमे आगे आये - आई टी - बी एच यू के अलुम्नी ठाकुर विकास सिन्हा जिन्हें सभी प्रेम से 'TVS' कहते हैं ! इनके साथ एक मजबूत कड़ी और थी इनका 'XLRI' का भी अलुम्नी होना - जिसके कारण &lt;a href="http://daalaan.blogspot.com/2007/08/blog-post_21.html"&gt;'अजित चौहान'&lt;/a&gt; इत्यादी लोग मजबूती से इनका साथ देते गए और नतीजा निकला - 'मीडिया' मुह बंद करने लगा ! कई लड़ाई इनलोगों ने लड़ी ! धीरे - धीरे इन्होने ने एक 'कोर इलीट ग्रुप - वन बिहार' भी बनाया ! फ्लड रीलीफ में इनलोगों ने पटना निवासी 'चन्दन सिंह' के एन जी ओ के द्वारा बहुत कुछ करने की कोशिश की ! लालू प्रसाद विदा हुए और नितीश के आगमन पर् इस ग्रुप ने एक बेहतरीन काफी टेबल बुक निकली - गौरवशाली बिहार ! जिसमे नवीन और चन्दन का बहुत बड़ा रोल था ! बिहार्टाईम्स के द्वारा आयोजित ग्लोबल मीट में&amp;nbsp;&amp;nbsp;ये&amp;nbsp;ग्रुप काफी सक्रिय भी रहा ! नवीन आई आई टी - खरगपुर के अलुम्नी हैं और नितीश जी के काफी करीबी भी - जिसके फलस्वरूप 'नालंदा खँडहर' के गेट के ठीक सामने 'नितीश' जी ने इनको जगह दी - जहाँ इन्होने 'मल्टीमीडिया' सेंटर खोला !&amp;nbsp; सुना है लाखों में कमाई है ! अभी ५-६ दिन पहले अजीत चौहान ने मुझे फेसबुक पर् बने 'बिहार' ग्रुप पर् एड किया - जबकि वहाँ करीब&amp;nbsp;तीन सौ मेंबर पहले से मौजूद थे - थोडा आश्चर्य भी हुआ - सोचा ..चलो कोई बात नहीं .....याद तो किया :-) थैंक्स ..अजीत भाई !! :)) &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अभी&amp;nbsp;हाल में ही इलेक्ट्रोनिक मीडिया के एक वरिष्ठ पत्रकार ने बहुत गंदे ढंग से बिहार के लिये अपने शब्दों का प्रयोग किया - अजीत चौहान - टीवीएस टीम को पता चला और इनलोगों के उनको मुहतोड &amp;nbsp;जबाब दिया - उन्हें अपने&amp;nbsp;शब्द वापस लेने पड़े ! व्यक्तिगत रूप से मुझे काफी खुशी मिली ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;२००३ में ही मेरी जान पहचान हुई - संजीव रॉय से ! वो भी आई टी - बी एच यू के अलुम्नी ! टोएफेल और जी आर् ई के वर्ल्ड टोपर :) सिंगापूर में 'बिहार और झारखण्ड' का ग्रुप "बिझार" को चलने वाले ! बेहद मृदुभाषी और सभ्यता - संस्कृति को अपने अगले जेनेरेशन तक ले जाने को बेचैन ! ये ग्रुप सिंगापूर में बिहारीओं के बीच लोकप्रिय भी हुआ और 'रीयल ग्रुप' के रूप में सामने आया - यह ग्रुप साल में सभी पर्व त्योहारों में आपस में मिलता और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी करता ! लोहा सिंह के कई नाटक - मैंने इस ग्रुप के वेब साईट पर् जा कर देखे हैं :) मेरे दालान को शुरू करने का सलाह 'संजीव रॉय ' का ही था ! वो सिर्फ बिहार ही नहीं रांची के अपने स्कूल और आई टी - बी एच यू अलुम्नी के बीच भी काफी व्यस्त रहते हैं साथ ही साथ अपनी कंपनी के 'ग्लोबल मैनेजर' भी हैं ! अब वो बे एरिया में शिफ्ट कर गए हैं - मैंने उनको 'मुंबई' के लिट्टी चोखा ग्रुप के बारे में बताया - तो वो बोले हाँ - मेरे ही आई टी - बी एच यू के सीनियर वहाँ एक्टिव हैं :) मै टीवीएस को याद कर मुस्कुरा दिया ! फिर संजीव रॉय बोले - कनाडा में 'मनोज कुमार सिंह' ने भी ऐसा ही ग्रुप बनाया है - मै फिर मुस्कुराया - क्योंकी मनोज भैया मेरे स्कूल के सीनियर ही नहीं 'दालान' के काफी बड़े फैन भी हैं :) मनोज भैया भी आई टी - बी एच यू के ही अलुम्नी हैं ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आई टी - बी एच यू के इन तीनो अलुम्नी को सलाम ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इंटरनेट से ही लोगों को जोड़ 'विभूती विक्रमादित्य और राम राज पांडे ' ने 'बिहार साईनटीफिक सोसाईटी' बना हर साल विश्व स्तर के कॉन्फेंस करते हैं ! यह काम आसान नहीं है ! इंटरनेट पर् दोस्ती तो बहुत जल्द होती हैं - पर् विश्वास बनाने में कई जनम भी लग् सकते हैं ! पर् अपने राज्य के लिये कुछ करने की जिद ने ऐसे लोगों को हर एक बाधा पार करने की क्षमता दी ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इन सबमे बिहारटाईम्स डॉट कोम के अजय कुमार का भी योगदान रहा ! वो १९९८ से लगातार अपनी साईट बिना किसी भेदभाव के चलाते रहे ! २००६ जनवरी में ग्लोबल मीट करवा - एन आर् बी की मजबूत आधार को और मजबूती दी ! पटना डेली भी है जो पटना के रंग बिरंगे फोटो और समाचारों के साथ अपने विजिटर्स का स्वागत करती है ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ये कोई फैशन नहीं है ! कोई जरूरत&amp;nbsp;नहीं है ! यह एक भावना है ! मुझे बहुत अच्छी तरह याद है - सन २००४ में जब मनमोहन सिंह जी प्रधानमंत्री बने तो दिल्ली के सभी अखबारों में 'वर्ल्ड पंजाबी फोरम' के तहत उनको बधाई सन्देश हाफ पेज में दिए गए थे ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सफर अभी लंबा है और बहुत सारी चीजों से लड़ना बाकी है !! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-7204744980677699408?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/7204744980677699408/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=7204744980677699408' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/7204744980677699408'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/7204744980677699408'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2010/11/blog-post_20.html' title='&quot;बिहारी प्राईड - भाग तीन&quot;'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-313617281407240634</id><published>2010-11-08T11:36:00.001+05:30</published><updated>2010-11-08T11:42:29.218+05:30</updated><title type='text'>मेरा गाँव - मेरा देस - मेरा छठ</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TNeT48xV4aI/AAAAAAAAA4g/gfVp5WEJIZk/s1600/Chhath.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" px="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TNeT48xV4aI/AAAAAAAAA4g/gfVp5WEJIZk/s320/Chhath.jpg" width="212" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;कल से ही अखबार में 'छठ पूजा' को लेकर हो रही तैयारी के बारे में समाचार आने लगे ! आज तो दिल्ली वाला 'हिंदुस्तान दैनिक' फूल एक पेज लिखा है ! कल दोपहर बाद देखा - फेसबुक पर् शैलेन्द्र सर ने एक गीत अपने वाल पर् लगाया था - शारदा सिन्हा जी का ! गीत सुनते सुनते रोआं खडा हो गया और आँख भर आयी ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"छठी मैया ...छठी मैया....." ..............&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;क्या लिखूं ? अपना वतन याद आ रहा है ! अपना गाँव - शहर - अपने लोग ! क्या खोया - क्या पाया ..इसका हिसाब तो बाद में होगा ! ये चमक - ये दमक - ये धन - ये दौलत - ये रोब - ये अकड - ये घमंड ..कभी कभी ये सब फीका लगता है ! खैर ...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दशहरा के बाद ही 'कैलेण्डर' में 'चिन्हा' लगा दिया जाता था - कहिया गाँव जाना है ! हमारे गाँव में एक बहुत खूबसूरत परंपरा थी - दशहरा से लेकर दीपावली के बीच 'नाटक' खेला जाता था ! कभी पहले पहुंचा तो ..नाटक में भाग ले लेता था ! अब कुछ नहीं होता - अब हर घर में टी वी है ! मेरे घर में एक परंपरा है - हर होली और छठ में परिवार के सभी लोगों के लिये 'कपड़ा' खरीदने का पैसा - बाबा देते हैं - आज उनकी उम्र करीब चौरासी साल हो गयी - फिर भी इस बार दशहरा में उनसे मिला तो 'छठ' के नाम पर् वो बच्चों और पत्नी के कपडे के लिये कुछ पैसा - मां को दिए - फिर मां ने हमारी पत्नी को दीं ! :) पैसा से ज्यादा 'आशीर्वाद' होता है ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बचपन में ये पैसा से हमलोग का कपड़ा खरीदाता था ! रेडीमेड का जमाना नहीं था ! मा बाबु जी के साथ रिक्शा से जाना - कपड़ा खरीदना - फिर उसको 'फेरने' जाना ;-) 'फेरते' वक्त बाबु जी नहीं जाते - खैर ..कपडा खरीदा गया ! दीपावली भी मन गया ! मुजफ्फरपुर में रहते थे - एक दिन पहले रिक्शा वाले को बोल दिया जाता की - सुबह सुबह ३ बजे आ जाना ! उस रात ..माँ रात भर कपडा को सूटकेस में डालती ! हल्का ठण्ड भी होता था सो स्वेटर वैगरह ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सुबह सुबह रिक्शा आ जाता ! सूटकेस रखा जाता ! एक रिक्शा पर् माँ और बहन और एक पर् बाबु जी और हम ! पैर को सूटकेस के ऊपर लटका के ! बाबु जी के गला में मफलर और एक हाफ स्वेटर ! चार बजे एक बस - रेलवे स्टेशन के सामने से खुलता था ! ठीक उसी वक्त एक ट्रेन 'कलकत्ता' से आता - हम लोग जब तक पहुंचते बस भर चूका होता ! सिवान के बच्चा बाबु का बस होता था - कंडक्टर - खलासी - ड्राईवर जान पहचान का सो सीट का इंतजाम हो जाता ! अब इमेजीन कीजिए - पूरा बस 'कलकतिया' सब से भरा हुआ ! "चुकुमुकू" कर के सीट पर् बैठ कर बीडी ! भर माथा 'कियो-कारपीन' तेल ! एक झोला और झोला में तरह तरह का साबुन :) और पाकीट में 'गोल वाला चुनौटी' ;-) खिडकी खोल के हवा खाता :) &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गाँव से कुछ दूर पर् ही एक जगह था - वहाँ हम लोग उतरते ! माँ को चाय पीने का मूड होता ! तब तक बाबु जी देख रहे होते ही गाँव से कोई आया है की नहीं ! पता चलता की 'टमटम' आया हुआ है ! माँ और बहन टमटम पर् ..पूरा टमटम साडी से सजाया हुआ ! 'कनिया' :) हम और बाबु जी हाथी पर् ! हम लोग निकल पड़ते ..! वो लहलहाते खेत ! रास्ता भर हम बाबु जी को तंग करते जाते - ये खेत किसका है ? इसमे क्या लगा है ? &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गाँव में घुसते ही - बाबु जी हाथी से उतर जाते और पैदल ही ! जो बड़ा बुजुर्ग मिलता - उसको प्रणाम करते - अपने बचपन के साथीओं से मिलते जुलते ! तब तक हम दरवाजे पर् पहुँच जाते ! बाबा को देख जो खुशी मिलती उस खुशी को बयान नहीं कर सकता ! वो खादी के हाफ गंजी में होते - सीसम वाला कुर्सी पर् - आस पास ढेर सारे लोग ! उनको प्रणाम करता और कूदते फांदते आँगन में ..दीदी( दादी) &amp;nbsp;के पास ! आँगन में लकड़ी वाला चूल्हा - उस चूल्हे से आलूदम की खुशबू ! आज तक वैसा आलूदम खाने को नहीं मिला :(&amp;nbsp; दरवाजे पर् कांसा वाला लोटा में पानी और आम का पल्लो लेकर कोई खडा होता ..माँ के लिये ! फिर 'भंसा घर' में जा कर 'कूल देवी' को प्रणाम करना ! इतने देर में हम 'दरवाजा - आँगन' दो तीन बार कर चुके होते ! ढेर सारे 'गोतिया' के भाई बहन - कोई रांची से - कोई मोतिहारी से - कोई बोकारो से ! कौन कब आया और कितने 'पड़ाके' साथ लाया :-) तब तक पता चलता की 'पड़ाका' वाला झोला तो मुजफ्फरपुर / पटना में ही छूट गया ! उस वक्त मन करता की 'भोंकार' पार कर रोयें ! गोतिया के भाई - बहन के सामने सारा इज्जत धुल जाता ! माँ को तुरंत खड़ी खोटी सुनाता ! दीदी ( दादी ) को ये बात पता चलता - फिर वो बाबा को खबर होता ! बाबा किसी होशियार 'साईकील' वाले को बुलाते - उसको कुछ पैसा देते की पास वाले 'बाज़ार' से पड़ाका ले आओ :) &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दोपहर में हम बच्चों का डीयुटी होता की पूजा के परसाद के लिये जो गेहूं सुख रहा है उसकी रखवाली करो के कोई कौआ नहीं आये ! हम बच्चे एक डंडा लेकर खडा होते ! बड़ा वाला खटिया पर् गेहूं पसरा हुआ रहता ...फिर शाम को कोई नौकर उसको आटा चक्की लेकर जाता ! कभी कभी हम भी साथ हो जाते ! बिजली नहीं होता था ! आटा चक्की से एक विशेष तरह का आवाज़ आता ! वो मुझे बहुत अच्छा लगता था ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दादी छठ पूजा करती ! पहले बाबु जी भी करते थे ! आस पास सभी घरों में होता था ! नहा खा के दिन बड़ा शुद्ध भोजन बनता ! खरना के दिन का परसाद सभी आँगन में घूम घूम के खाना ! छठ वाले दिन - संझीया अरग वाले दिन - जल्दी जल्दी तैयार हो कर 'पोखर' के पास पहुँचाना ! बहुत साल तक माँ नहीं जाती - फिर वो जाने लगीं ! वो सीन याद आ रहा है और आँखें भींग रही हैं ! १५ - २० एकड़ का पोखर और उसके चारों तरफ लोग ! रास्ता भर छठ के गीत गाते जाती महिलायें ! भर माथा सिन्दूर ! नाक से लेकर मांग तक ! पूरा गाँव आज के दिन - घाट पर् ! क्या बड़ा - क्या छोटा - क्या अमीर - क्या गरीब ! गजब सा नज़ारा ! पोखर के पास वाले खेत में हम बच्चे ..पड़ाका में बिजी ..तब तक कोई आता और कहता ..'अरग दीआता' &amp;nbsp;...पड़ाका को वहीँ जैसे तैसे रखकर दादी के पास ..वो "सूर्य" को प्रणाम कर रही हैं ....आस पास पूरा परिवार ...क्या कहूँ इस दृश्य के बारे में ....बस कीबोर्ड पर् जो समझ में आ रहा है ..लिखते जा रहा हूँ ....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हमारे यहाँ 'कोसी' बंधाता है - आँगन में ! उस शाम जैसी शाम पुर साल नहीं आती ! बड़ा ही सुन्दर 'कोसी' ! चारों तरफ ईख और बीच में मिट्टी का हाथी उसके ऊपर दीया ...! घर के पुरुष कोसी बांधते ..हम भी पुरुष में काउंट होते :)&amp;nbsp; बड़े बड़े पीतल के परात में परसाद ! वहाँ छठ मैया से आशीर्वाद माँगा जाता - हम भी कुछ माँगते थे :) फिर दादी को प्रणाम करना ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब यहाँ एक राऊंड फिर से दरवाजा पर् 'पड़ाका' ! पूरा गाँव हील जाता ;-) दादी कम्बल पर् सोती सो उनके बड़े वाले पलंग पर् जल्द ही नींद आ जाती ...सुबह सुबह ..माँ जगा देती ....कपड़ा बदलो ....पेट्रोमैक्स जलाया जाता ...कई लोग "लुकारी" भी बनाते ! कई पेट्रोमैक्स के बीच में हम लोग फिर से पोखर के पास निकल पड़ते ! दादी खाली पैर जाती थी ! पूरा गाँव ..नहर के किनारे ....&amp;nbsp; एक कतार में ......पंडीत जी की खोजाई होती ..'बनारस वाला पत्रा' देख कर वो बताते ...सूरज भगवान कब उगेंगे ....उसके १० -१५ मिनट पहले ही दादी पोखर के किनारे पानी के खडा होकर 'सूर्य' भगवान को ध्यानमग्न करती ! अरग दिआता ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पूजा खत्म हो चूका होता ! पोखर से दरवाजे लौटते वक्त ...तरह तरह का परसाद खाने को मिलता ! किसी का देसी घी में तो किसी का 'तीसी के तेल ' का :) फिर दरवाजे पर् आ कर 'गन्ना चूसना' :)) फिर हम दादी के साथ बैठ कर खाते - पीढा पर् ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब दिल धक् धक् करना शुरू कर देता ..बाबु जी को देखकर डर लगता ..मालूम नहीं कब वो बोल दें ...मुजफ्फरपुर / पटना वापस लौटना है :( बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाती ...माँ को देखता ...वो धीरे धीरे 'टंगना' से सिर्फ हम लोगों के ही कपडे चुन चुन कर एक जगह रख रही होतीं ....ऐसा लगता ..अब दिल बाहर आ जायेगा ....तब तक देखता ..टमटम सजा खडा है ..पता चलता की 'मोतीहारी' वाले बाबा का परिवार वापस जा रहा है ...सब गोतिया - पटीदार के भाई बहन हम ऐसे मिलते जैसे ..मालूम नहीं अब कब मिलेंगे ....बाबा के पास दौर कर जाता ..काश वो एक फरमान जारी कर दें ...एक दिन और रुकने का ....बाबा ने फरमान जारी कर दिया और हम लोग एक दिन और रुक गए :)) &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अगले दिन ...जागते ही देखता की ..बाबू जी 'पैंट शर्ट 'में :( मायूस होकर हम भी ! माँ का खोइंछा भराता..कुल देवी को प्रणाम ..दादी के आँखें भरी ..माँ की ...दादी - बाबा आशीर्वाद में कुछ रुपये ..पॉकेट में छुपा कर रख लेता :) &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;फिर होली का इंतज़ार .....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;-----------&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मालूम नहीं ..क्या लिखा ..कैसा लिखा ..बस बिना संपादन ..एक सांस में लिख दिया ....कम्मेंट जरुर देंगे ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;छठ का गीत !!&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;object height="385" width="480"&gt;&lt;param name="movie" value="http://www.youtube.com/v/ZVDsXa8uWqo?fs=1&amp;amp;hl=en_US"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowFullScreen" value="true"&gt;&lt;/param&gt;&lt;param name="allowscriptaccess" value="always"&gt;&lt;/param&gt;&lt;embed src="http://www.youtube.com/v/ZVDsXa8uWqo?fs=1&amp;amp;hl=en_US" type="application/x-shockwave-flash" allowscriptaccess="always" allowfullscreen="true" width="480" height="385"&gt;&lt;/embed&gt;&lt;/object&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-313617281407240634?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/313617281407240634/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=313617281407240634' title='33 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/313617281407240634'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/313617281407240634'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2010/11/blog-post_08.html' title='मेरा गाँव - मेरा देस - मेरा छठ'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TNeT48xV4aI/AAAAAAAAA4g/gfVp5WEJIZk/s72-c/Chhath.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>33</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-2603416029234314619</id><published>2010-11-03T11:19:00.001+05:30</published><updated>2010-11-15T23:39:21.232+05:30</updated><title type='text'>बिहारी प्राईड : भाग दो</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अभी हाल तक मलय स्कूल में था ! बारहवीं की परीक्षा के बाद जहाँ उसके सभी दोस्त आगे की पढाई के लिये कमर कस रहे थे - मलय अमरीका पहुँच छः महीने का 'हवाई जहाज' उड़ाने का ट्रेनिंग लिया और अब मात्र २२-२३ साल में वो 'कैप्टन' रैंक पर् पहुँच गया ! अभय मरे स्कूल का दोस्त है और मरे साथ ही काम करता है - मलय उसका छोटा साला है ! जब कभी मै मिलता हूँ - दोस्त के साले के नाते हंसी - मजाक ! बात बात में ही पूछ दिया - कितना मिलता है ? बोला - काट कूट के ५ लाख महीना ! अब वो बी एम डब्लू का कोई नया सीरीज खरीदने वाला है ! इतने कम उमर में इतना तनखाह फिर भी बेहद शर्मीला ! नॉएडा के आम्रपाली ग्रुप के एक प्रोजेक्ट में खुद के लिये एक पेंट हॉउस भी बुक किया है ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ये एक मलय नहीं है - हो सकता है आपके जान पहचान में भी ऐसे कई बिहारी हों ! लालू-राबड़ी के पन्द्रह साल के शासन काल में कई परिवारों को बिहार से दिल्ली - मुंबई आने पर् मजबूर कर दिया ! ये लोग कोई बड़ा सपना लेकर नहीं आये थे - बस दो वक्त की रोटी कि तलाश में आये थे ! संजीव मरे साथ पढता था - पर् दूसरे कॉलेज में ! सिविल इंजीनियर - इरादा - बिहार सरकार में नौकरी का ! पर् बिहार नसीब में नहीं था ! कहता है - नौकरी मिलने के ठीक पहले वाले महीने में - पॉकेट में मात्र कुछ रुपये बच गए थे - इंडोनेशिया - मलेशिया इत्यादी जगहों से काम कर के कुछ पैसा जमा किया और चाचा के बिजिनेश में छोटा पार्टनर बन गया ! जब पूरी दुनिया आर्थिक रूप से टूट रही थी - संजीव ने दूसरे बिहारी के साथ मिलकर अपनी कंपनी २००६ में शुरू की और इस साल उसने नॉएडा में १५० एकड लेकर पुरे एन सी आर में हंगामा खड़ा कर दिया - जिसकी सरकारी कीमत करीब एक हज़ार करोड होती है ! साल में २ नए गाड़ी जरूर खरीदता है&amp;nbsp;- उसके पार्टनर और मरे पुराने मित्र मनोज रे कहते हैं - अब हम बिहारीओं को बाकी के लोग सीरियस लेने लगे हैं ! हमारी पहचान 'पुरबिया मजदूर' से मालिक वाली होने लगी है ! इन दोनों की कम्पनी 'गारडेनिया' अब अगले साल आई पी ओ लाने वाली है - देखिये आगे आगे क्या होता है ? पर् ..इस जोखिम के खेल में बहुत साहस चाहिए ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;और आम्रपाली ग्रुप के अनील शर्मा का क्या कहना :) कहते हैं - हम तो किसान के बेटे थे - बिहार में क्षीण होती संभावनाएं और कुछ करने कि तमन्ना ने आज 'एन सी आर' का बादशाह बना दिया - बेहद मीठे बोलने वाले ! दिल्ली से लेकर पटना तक - बिहारी प्राईड से जुड़े किसी भी कार्यक्रम को वो प्रायोजित करने से नहीं चूकते ! कल तक पटना की सडकों पर् पीले रंग की स्कूटर से चलने वाले अनील शर्मा का काफीला जब नॉएडा से दिल्ली एअरपोर्ट के लिये निकलता है - 'ओबामा' भी शरमा जाएँ :) इस तेज रफ़्तार की बढ़त में कई और कारक हो सकते हैं - पर् 'इरादा' बुलंद है ! हिटलर पर् एक सिनेमा भी बना रहे हैं ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बक्सर निवासी संजीव श्रीवास्तव पैन बिहारी इमेज के साथ हैं ! एन सी आर से कमाए पैसे बिहार में लगाना चाहते हैं ! बिहार के परिवहन मंत्री के बेटे के साथ मिलकर कंकडबाग में ४०० बेड का हॉस्पीटल और कई होटल ! बयूरोक्रैट परिवार से आते हैं - पता है - अपर क्लास को क्या पसंद है :) सो उनके सभी प्रोजेक्ट काफी इलीट होते हैं ! अभी हाल में ही 'आई बी एन - सी एन एन ' के सागरिका के प्रोग्राम में नज़र आये थे ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कवी कुमार से बेहतर बोलने वाला बिहारी मैंने आजतक नहीं देखा ! जमींदार घराने से आये हुए - कवी कुमार इंडियाबुल्स के एक मजबूत खम्भे थे ! समीर गहलौत के सबसे नजदीकी है ! समीर ने उनकी प्रतिभा का उपयोग और सम्मान भी किया ! बड़े ही आलिशान कोठी में - नॉएडा में रहते हैं ! कहते हैं - हम हर सुबह 'दही चुडा' ही नास्ता करता हूँ ! अपने गाँव सीतामढी में सिनेमा सूटिंग के लिये एक स्टूडियो बनाया है ! हर दूसरे महीने बिहार जाते हैं ! अपने शहर में जमीन खरीद .कई परियोजनाओं में पैसा लगाना चाह रहे हैं ! एक भोजपुरी सिनेमा भी बनाया है - कब अइबू अंगनवा हमार - और उसको नॉएडा के मल्टीप्लेक्स में भी लगवाया ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ये अनगिनत बिहारी हैं - जो घर&amp;nbsp; से बाहर आकर 'बिहारी प्राईड'&amp;nbsp; और रोजगार पैदा कर रहे हैं और सबके दिल में एक बिहार बसता है - सभी बिहार के लिये कुछ करना चाहते हैं ! &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;क्रमशः&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह जारी रहेगा ....कृपया आपको कुछ और जानकारी हो तो मेल कीजिए mukhiya.jee@gmail.com&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-2603416029234314619?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/2603416029234314619/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=2603416029234314619' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/2603416029234314619'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/2603416029234314619'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2010/11/blog-post_03.html' title='बिहारी प्राईड : भाग दो'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-5982195973036377563</id><published>2010-11-01T09:43:00.001+05:30</published><updated>2010-11-04T12:55:11.147+05:30</updated><title type='text'>मेरा गाँव - मेरा देस - मेरी दीपावली</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एक बार फिर दिवाली आ गया ! हर साल आता है ! यादों का मौसम एक बार फिर आया ! अभी अभी पटना से लौटा हूँ - कई लोग फिर से बोलने पूछने लगे - 'दिवाली में भी आना है ?' अरे ..मेरे भाई ..हम पेटभरुआ मजदूर हैं ..कहाँ इतना पैसा बचाता है कि ..हर पर्व त्यौहार में घर-गाँव जा सकें !&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;स्कूल में पढते थे ! कई दिन पहले से सड़क पर् ईट लगा के चौकी पर् 'पड़ाका' ( पटाखा ) बिकता था ! स्कूल से लौटते वक्त उन पडाकों को मन भर देखना - दोस्तों से तरह तरह के 'पडाकों' के बारे में बात करना - खासकर 'बम' ..एटम बम ..बीडिया बम.. हई बम ..हौऊ बम - सड़क पर् लगे चौकी पर् चादर बिछा कर पठाखे को देख उनको एक बार छूना ...! फिर ..घर में पिछले साल के बचे पटाखे खोजना और उनको छत पर् चटाई बिछा करने धूप दिखाना ! उफ्फ़..वो भी क्या दिन थे ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दिवाली के एक दो दिन पहले से ही .खुद को रोक नहीं पाते ..कभी बालकोनी तो कभी छत पर् जा कर एक धमाका करना और उस धमाके के बाद खुद को गर्वान्वीत महसूस करना ! फिर ये पता करना की सबको पता चला की नहीं ..मैंने ही ये धमाका किया था :-)&amp;nbsp;कार के मोबील का डब्बा होता था - उस तरह के कई डब्बों को दिवाली के दिन के लिये जमा करना और फिर दिवाली के दिन उन डब्बों के नीचे बम रख उनको आसमान में उडाना :-) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धनतेरस के दिन दोपहर से ही 'बरतन' के दूकानदारों के यहाँ भीड़ होती थी - जो बरतन उस दिन खरीदाता वो 'धनतेरस वाला बरतन' ही कहलाता था ! अब नए धनीक बैंक से सोना का सिक्का खरीदते हैं - तनिष्क वाला डीलर धनतेरस के दिन राजा हो जाता है ! पब्लिक दुकान लूट लेता है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दीया का जमाना था - करुआ तेल डाल के - स्टील के थरिया में सब दीया सजा के घर के चारों तरफ दीया लगाना &amp;nbsp;! इस काम में फुआ - बहन लोग आगे रहती थीं - हमको इतना पेशेंस नहीं होता ! बाबु जी को कभी लक्ष्मी पूजन में शरीक होते नहीं देखा - मा कुछ आरती वैगरह करती थीं - हम लोग इतने देर बड़ी मुश्किल से खुद को रोक पाते ! पूजा के बाद लड्डू खाया और फरार !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कॉलेज गया तो - 'फ्लश' ! एक दोस्त होता है - पंडित ! बेगुसराय का पंडित ! बहतर घंटा लगातार 'फ्लश' का रिकॉर्ड - पंडित &amp;nbsp;के चक्कर में ! बहुत बड़ा करेजा था उसका ! अब तो रिलाइंस में मैनेजर है - लेकिन कॉलेज के ज़माने उसके दबंगई का कोई जोड़ नहीं ! दिवाली के दस दिन पहले से ही पंडित के यहाँ कॉलेज के सभी &amp;nbsp;वेटरन जुआरी सीनियर - जूनियर पंडित के कमरे में पहुँच जाते ! पब्लिक के जोर पर् 'नेता' भी शामिल होते ! हमारा पूरा गैंग ! हंसी मजाक और कभी कभी मामला काफी सीरिअस भी ! हारने पर् हम अपना जगह बदलते या फिर कपड़ा भी - यह बोल कर की - यह 'धार' नहीं रहा है ! :-) कई दोस्त इस दिन गर्ल्स होटल के पास मिठाई और पटाखे के साथ देखे जाते ! :-)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचपन में दीवाली की रात कुछ पटाखे 'छठ पूजा' के लिये बचा कर रखना - और फिर अगले सुबह छत पर् जा कर यह देखना की ..पटाखे के कागज कितने बिखरे पड़े हैं :-) अच्छा लगता था !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नॉएडा - गाजियाबाद आने के बाद - मुझे पता चला की - इस दिन 'गिफ्ट' बांटा जाता है ! अब मुझ जैसे शिक्षक को कौन गिफ्ट देगा :) खैर , बिहार के कुछ बड़े बड़े बिल्डर यहाँ हो गए हैं और पिछले साल तक दोस्त की तरह ही थे - सो वो कुछ कुछ मेरी 'अवकात' को ध्यान में रखते हुए - भेज देते थे :-) घरवालों को भी लगता कि हम डू पैसा के आदमी हैं :-) लेकिन ..इस गिफ्ट बाज़ार को देख मै हैरान हूँ ! मेरा यह अनुमान है की कई ऐसे सरकारी बाबु हैं - जिनको दिवाली के दिन तक करीब एक करोड तक का कुल गिफ्ट आता है !&amp;nbsp; जलन होती है - पर् सब दोस्त ही हैं - सो मुह बंद करता हूँ ;-) वैसे इनकम टैक्स वाले अफसर भाई लोग को '१-२ लाख' का जूता तो मैंने मिलते देखा है ! मालूम नहीं ये जूता कैसे चमड़ा से बनता है :(&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार मै भी धनतेरस में एक गाड़ी खरीदने का सोचा था ! डीलर भी उस दिन देने के मूड में नहीं था ! कोई नहीं - अगला साल ! पटना के फेमस व्यापारी अर्जुन गुप्ता जी जो मेरे ससुराल वालों के काफी करीबी हैं - कह रहे थे - नितीश राज में हर धनतेरस को लगभग ४०-५० टाटा सफारी बिकता है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पवन जी ने कुछ कार्टून "दालान" के लिये भेजे हैं - आप सभी इसका आनंद उठायें :)&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TM49h-oXl-I/AAAAAAAAA4U/-OjX0AybaJE/s1600/diwali+cartoon2.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TM49h-oXl-I/AAAAAAAAA4U/-OjX0AybaJE/s320/diwali+cartoon2.jpg" width="269" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TM487fqFjSI/AAAAAAAAA4Q/0U_Uj4YGjuI/s1600/diwali+cartoon3.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TM487fqFjSI/AAAAAAAAA4Q/0U_Uj4YGjuI/s320/diwali+cartoon3.jpg" width="269" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TM49zhrYhlI/AAAAAAAAA4Y/3BDgblyRprk/s1600/diwali+cartoon1.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://3.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TM49zhrYhlI/AAAAAAAAA4Y/3BDgblyRprk/s320/diwali+cartoon1.jpg" width="311" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TM4-DcBZSVI/AAAAAAAAA4c/NX3ANUyKf-4/s1600/diwali+cartoon4.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="294" src="http://3.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TM4-DcBZSVI/AAAAAAAAA4c/NX3ANUyKf-4/s320/diwali+cartoon4.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;पवन जी का एक फैन पेज फेसबुक पर् है - जिसका लिंक है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://facebook.com/pawantoon&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-5982195973036377563?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/5982195973036377563/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=5982195973036377563' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/5982195973036377563'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/5982195973036377563'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='मेरा गाँव - मेरा देस - मेरी दीपावली'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TM49h-oXl-I/AAAAAAAAA4U/-OjX0AybaJE/s72-c/diwali+cartoon2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-8417412138607550806</id><published>2010-10-29T18:53:00.003+05:30</published><updated>2010-11-15T23:40:03.880+05:30</updated><title type='text'>बिहारी प्राईड : भाग एक</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://ibnlive.in.com/videos/133986/battle-for-bihar-is-bihari-pride-finally-back.html"&gt;कल रात &lt;strong&gt;सी एन एन-&amp;nbsp;आई बी एन&lt;/strong&gt; &amp;nbsp;पर् 'बिहारी प्राईड' पर् एक सकरात्मक बहस चल रही थी !&lt;/a&gt; हम सपरिवार बड़े ही ध्यान से देख रहे थे ! अच्छा लगा ! नीतू चंद्रा ने बड़े ही भोले अंदाज में अपनी बात कही , इरफ़ान भी ! सैबाल और संजीव की मजबूरी थी - नितीश सरकार के पक्ष में बोलने की ! खैर , कुल मिला कर बेहद 'पोजीटिव शो' ! सागरिका घोष बधाई की पात्र है - वो अभी हाल में पटना भी गयी थी ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अभी नीरज से बात हो रही थी - हमदोनो साथ में ही पढ़े हैं - कॉलेज के दिनों में कई राजनीतिक बहस होती थी - राजनीति उसकी भी रुची है ! एल एंड टी में प्रोजेक्ट मैनेजर है ! शुरू से ही महाराष्ट्र , गुजरात , राजस्थान में उसकी पोस्टिंग रही ! कहता है - हाल फिलहाल तक खुद को 'बिहारी' कहने पर् अजीब लगता था लेकिन अब बिहार से आती अच्छी खबरें 'फील गुड' का फैक्टर देती हैं और बिहारी कहने पर् शर्म नहीं होती ! नितीश और मीडिया को धन्यवाद दे रहा था ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ऐसा एक नीरज नहीं है - करोड़ों हैं ! नितीश ने कुछ किया हो न किया हो - थोडा तो सर ऊँचा कर ही दिया - इसमे बिहार और बाहर कि मीडिया का भी प्रमुख रोल है ! अच्छा होना और अच्छा प्रचार होना दोनों अगर साथ हों तो छवी सुधरती है ! छवी सुधरने में वर्षों लग जाता है और छवी गलत होने के लिए एक सेकेण्ड काफी है ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मै जब फाईनल इअर में पढने जाता हूँ तो - पहले लेक्चर में अपने विद्यार्थीओं को कहता हूँ - अपनी आँख बंद करो और 'इन्फोसिस' को सोचो - कैसी तस्वीर मन में आयी - अधिकतर का यही जबाब होता है - 'नारायणमूर्ती और नंदन निलेकनी' का ! जी , यही है लीडरशीप ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;नितीश की लीडरशीप उन बिहारीओं के लिए अच्छी है - जिन्हें राजनीति से कुछ लेना देना नहीं है या जिनके परिवार का अब कोई बिहार सरकार में ना हो ! नितीश के पक्ष में कितना लहर है - यह हमको नहीं पता - पर् 'पति-पत्नी' की पन्द्रह साल की अजीबोगरीब शासनकाल ने नितीश को बहुत मदद किया - इस चुनाव में भी 'एंटी लालू' लहर है - दुर्भाग्यवश कॉंग्रेस और भाजपा दोनों इसको भुनाने में असफल हुए और नितीश विजेता ! नितीश जब आये थे - बिलकुल ताज़ा - चंद दिनों के लिए वो 'स्टेटमैन" रहे फिर वो एक पके राजनेता के रूप में अपनी वोट बैंक बनाने को बढे ! विकास नहीं किया - रंगाई - पोताई जरुर किया - झरझर हो चुके बिहार में हल्की पोताई भी दूर से दिखने लगी - वो और बहुत कुछ कर सकते थे - पर् वो बकरे को किश्तों में काटना चाहते थे और सफल भी हुए - विकल्पहीनता उनके लिए वरदान बनी ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अफसरों से हमेशा घिरे रहनेवाले नितीश ने हर गाँव - टोला में कुकुरमुता की तरह उग आये - क्षेत्रीय नेताओं को खत्म कर दिया - जिसका तत्काल राहत आम जनता को मिला - वैसे सभी नेता / अपहरणकर्ता अब अपनी अवकात के हिसाब से सड़क निर्माण में लग गए और धीरे धीरे राजनीति नितीश केंद्रित होती चली गयी ! कई कांटो को वो बहुत आसानी से निकल - देह झाड खडा हो गए ! कई जगहों पर् वो लालू से भी ज्यादा कट्टर लगे - जैसे सभी मलाईदार पदों पर् सिर्फ अपनी जाति के लोगों को बैठाना - लेकिन यह सन्देश आम जनता तक नहीं पहुंचा और पहुंचा भी आम जनता को कोई फर्क नहीं पड़ा - कौन इंजीनियर किस जाति और जिला का है - जनता को बस यही समझना था की - कॉंग्रेस राज में बनी सड़क - रिपेयर हो रही है ..या नहीं ! जी , कहने का यही मतलब की - नितीश राज में कोई नया प्रोजेक्ट नहीं आया ! १९९० में कॉंग्रेस ने जिन सडकों को जिस हालात में छोड़ा था - नितीश ने पन्द्रह साल में बेहद खराब स्थिति में आ चुकी सडकों को ठीक बनवा दिया ! जनता खुश ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आम जनता को और क्या चाहिए ! पिछले २० साल में पूरा एक नया जेनेरेशन आ चूका है जो विकास चाहता है - बिहार को महाराष्ट्र और गुजरात देखना चाहता है और उसके पास नितीश से बढ़िया कोई विकल्प नहीं - जब तक की नितीश कुमार अपनी जातीय कमजोरी के कारण बुरी तरह बदनाम ना हो जाएँ - होशियार होंगे बिहार कि जनता - जिसका हर एक तबका उनको वोट दिया है - उसका आदर करते हुए अपने आवास को 'नालंदा माफिया' से मुक्त करवाएंगे - &lt;strong&gt;भ्रष्टाचार चरम सीमा पर् है ! &lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TMrKswAE8hI/AAAAAAAAA4I/Pjv3_rHDqa0/s1600/Nitish.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="284" nx="true" src="http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TMrKswAE8hI/AAAAAAAAA4I/Pjv3_rHDqa0/s320/Nitish.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; text-align: justify;"&gt;पर् ..अभी आप ही हमारे प्राईड बने हुए हैं - अंदर कैसे हैं - आम जनता को इससे कोई मतलब नहीं - यही आपकी जीत है - बधाई स्वीकार करें !! &lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-8417412138607550806?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/8417412138607550806/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=8417412138607550806' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/8417412138607550806'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/8417412138607550806'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2010/10/blog-post_29.html' title='बिहारी प्राईड : भाग एक'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TMrKswAE8hI/AAAAAAAAA4I/Pjv3_rHDqa0/s72-c/Nitish.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-357967163432195790</id><published>2010-10-22T19:24:00.002+05:30</published><updated>2010-10-22T19:56:05.870+05:30</updated><title type='text'>बिहार तमाशा - भाग पांच</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कल प्रथम चरण का चुनाव समाप्त हो गया और दूसरे चरण का आज प्रचार भी समाप्त हो गया ! बहुत मुश्किल है कुछ भी कह पाना ! पर् आश्चर्यजनक रूप से 'छोटे भाई' ने 'बड़े भाई' पर् हमला बंद कर - कॉंग्रेस पर् तेज कर दिया ! सिग्नल साफ़ है - लालू की वोट बैंक में 'कॉंग्रेस' ने सेंध लगा दिया है - अब हानि कितना हुआ - मतगणना में पता चलेगा ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify" style="text-align: justify;"&gt;" विकास बनाम जाति "﻿ का बहस थोडा प्रायोजित लगता है ! वैसे धंधा चलाने के लिए ..प्रायोजित कार्यक्रम होना जरुरी है ...बहुत खर्चा है :) स्टार न्यूज तो हद कर दिया - नितीश को १४३ सीट में १२० ;-) आर सी पी को हम सभी के तरफ से बधाई ! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नितीश के 'विकास' के तीन चेहरे थे - 'लौ &amp;amp; ऑर्डर' - 'शिक्षा' - 'सड़क' ! ये तीनो के पीछे 'ब्यूरोक्रेट' थे ! काम ठीक हुआ है - लेकिन इतना भी नहीं की - नितीश को हम सभी डिक्टेटर बना दें - वो एक बहुत ही सामन्य आदमी हैं - पगला जायेंगे - फिर बिहार कौन संभालेगा ? कॉंग्रेस का अगला मुख्यमंत्री 'ललन यादव' को अभी वक्त लगेगा ! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TMGevm67XWI/AAAAAAAAA4E/hEUD8bN9qg0/s1600/22+pawan+cartoon_2.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="206" nx="true" src="http://1.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TMGevm67XWI/AAAAAAAAA4E/hEUD8bN9qg0/s320/22+pawan+cartoon_2.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-357967163432195790?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/357967163432195790/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=357967163432195790' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/357967163432195790'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/357967163432195790'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2010/10/blog-post_22.html' title='बिहार तमाशा - भाग पांच'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/TMGevm67XWI/AAAAAAAAA4E/hEUD8bN9qg0/s72-c/22+pawan+cartoon_2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-705120903550383296</id><published>2010-10-21T12:54:00.000+05:30</published><updated>2010-10-21T12:54:23.143+05:30</updated><title type='text'>दालान को पसंद करनेवाले :)</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जब से फेसबुक ज्वाइन किया - 'दालान' को पसंद करने वाले लोग बढे ! कई लोग कई तरह के सवाल - जबाब करते हैं ! बहुत दिन तक खुद को छुपाये रखा ! फिर धीरे धीरे खुद के बारे में सबको बताया ! कई मैसेज आते हैं ! एक मैसेज ये भी आया : &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;आशीष : सिवान / मोटोरोला - हैदराबाद &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="GBThreadMessageRow_Body_Content"&gt;Thanks for your blogs in "Daalaan".I am a regular visitor of daalan right from ur 1st blog in July 2007.I am working in Motorola Hyd.apke blogs ke through Bihar ki samvednaye milti rahti hai.Apke harek blog me kafi apnapan feel hota hai.Jab chhath aur holi me ghar(siwan,ujain market) jata hu tab Daalan ke print outs le ke jata hu...papa aur other family members ko paradhta hu.Apse milne ki bahut dili tamanna hai kyu ki apke bachpan aur apne bachpan me kafi similarity pata hu..like ghar me &lt;strike&gt;XXXXXXXXXX &lt;/strike&gt;...bahut kuch hai share krne ko..samay ka aabhav hai..phir kabhi....Anyway...keep writing in a same way... &lt;/div&gt;&lt;div class="GBThreadMessageRow_Body_Content"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div class="GBThreadMessageRow_Body_Content"&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3286126586768298851-705120903550383296?l=daalaan.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daalaan.blogspot.com/feeds/705120903550383296/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3286126586768298851&amp;postID=705120903550383296' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/705120903550383296'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3286126586768298851/posts/default/705120903550383296'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daalaan.blogspot.com/2010/10/blog-post_21.html' title='दालान को पसंद करनेवाले :)'/><author><name>रंजन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03013961954702865267</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_fabeCWoNzTg/S0NirelveMI/AAAAAAAAAzs/NYUC_9QX7yw/S220/IMG_0257.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3286126586768298851.post-3628387879876176288</id><published>2010-10-19T22:29:00.000+05:30</published><updated>2010-10-19T22:29:20.480+05:30</updated><title type='text'>बिहार तमाशा - भाग चार !</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भाग तीन संजय भैया लिख चुके हैं ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आज प्रथम चरण का चुनाव प्रचार समाप्त हो गया होगा ! अब असली काम शुरू हुआ होगा ! बोरा का बोरा - ठूंस के - टोला - टोला , गाँव - गाँव एजेंट लोग घूम रहा होगा ! नितीश बाबु ने बहुत कुछ किया उसमे से एक काम था पूरा बिहार को शराबी बना दिया ! सो आज - कल और परसों मस्त लाईफ होगा ! पटना गया था - कौन ऐसा गली नहीं था जहाँ शराब का दूकान नहीं था - सबका बोर्ड एक डीजाईन का ! लौ - ऑर्डर ठीक है सो किसी शराब के दूकान में पहले जैसा लोहा का सुरक्षा कवच नहीं था ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इस बार कार्यकर्ताओं में कोई उत्साह नहीं है ! अब देखिये - अफसर राजा हो गया ! एक अफसर अपने अंदर कई हज़ार 'साधू - सुभाष' को डकार सकता है ! पर् सब कुछ 'लौ -ऑर्डर' के अंदर ! साधू - सुभाष जैसा नहीं - खाली हल्ला ! खाया पिया कुछ नहीं और गिलास तोडा बारह आने का ! तो मै बात कर रहा था - कार्यकर्ताओं के उत्साह का ! :( सब ठंडा है ! पांच साल में मुख्यमंत्री जब मिनिस्टर से नहीं मिलते थे तो कार्यकर्ताओं का क्या अवकात ? जे कामया से अफसर&amp;nbsp;और ठेकेदार &amp;nbsp;! बहुत कार्यकर्ता मास्टर बन गया - कम से कम महीना में पांच हज़ार त मिलेगा :) एक नितीश जी के पार्टी के राष्ट्रीय 'महासचिव' से मिले - मोटरसाईकील पर्&amp;nbsp;ढनमना रहे थे ! हम बोले - काश आप नालंदा के होते :) आपके लिए नितीश अंकल हेलोकोपटर का इंतजाम करवा देते ! खैर , नितीश जी का पार्टी है - हम कौन होते हैं कुछ बोलने वाले ! &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कॉंग्रेस का तो अजीब हाल है ! दिल्ली में बैठा हुआ सब चाहता ही नहीं है कि कॉंग्रेस बिहार में मजबूत हो ! जगदीश टाईटलर आये थे - खाया - पिया पप्पू यादव से दोस्ती किया और कॉंग्रेस को और कमज़ोर कर के निकल पड़े ! :) अनील शर्मा - कैसा नेता हैं - आज तक नहीं समझ पाया ! अरे बाबा - पांच साल में एक क्षेत्र तो बना लिया होता ! महबूब कैसर आये - चांदी कि कुर्सी दिखाने में ही व्यस्त रहे - हम खानद
