तीन साल से 'ब्लॉग' लिख रहा हूँ ! जो दिल में आया - बस लिख दिया ! कुछ भी सोचा नहीं ! कई 'पोस्ट' लिखते वक्त आँखों से आंसू भी आये - कई में इतनी हंसी आयी की 'हाथों' से चाय गिरते गिरते बचा ! कई 'पोस्ट' बहुत बकवास तो कई दिल के बहुत ही करीब ! कई तो गुस्से में लिखे हुए हैं !
याद है - पोस्ट लिखते ही सबसे पहले 'सर्वेश भाई' को बताता था - बंगलोर में रहते हैं ! वो तुरंत 'ब्लोग्वानी' में 'वोट' दे दिया करते :) कभी उनका मूड हुआ तो "बूथ छाप" दिया करते और मेरा 'पोस्ट' "स्टार" हो जाता और ढेर सारे लोग आ कर पढते ! :) अगर "संजय भैया " ऑनलाईन हुए तो वो भी "वोट" दे दिया करते ! फिर मै अपने ब्लॉग का खुद से प्रचार करता ! सर्वेश भाई और संजय भैया तो यहाँ मेंबर भी हैं - "दालान" उनका कर्ज़दार है और रहेगा !!
इधर "फेसबुक" में मेंबर बना ! देखते देखते कई अन्जान लोगों से परिचय गया ! "पत्रकारों" को बहुत इज्जत देता हूँ सो बहुत सारे पत्रकार दोस्त बन गए पर वो मेरा "ब्लॉग" नज़रंदाज़ करते हैं - खैर , यह उनकी अपनी मजबूरी है ! पर , फेसबुक पर कई लोग यूँ ही टकरा गए और अच्छे दोस्त बन गए - "गप्पी हूँ" सो दोस्त तो बनेंगे ही ! दोस्ती की क़द्र करता हूँ - पर ये सोशल नेटवर्किंग साईट पर "विश्वास" जल्द नहीं बनता - पर जो कुछ भी विश्वास बना या बनाया - उसकी 'क़द्र' करूँगा - विश्वास कीजिए :) हाल में ही किसी ने कहा - आपका 'ब्लॉग' नहीं आया तो उनके कहने पर 'फैशन' पर लिख दिया ! १-२ दिन गायब रहने पर लोग पूछते भी है - आप कहाँ हैं ? मालूम नहीं ये कैसा 'बंधन' है ? अहमद भाई हमेशा कहते हैं - कोई उपन्यास लिखो या ब्लॉग को प्रिंट करवाओ - पैसा मै दूँगा :) उनसे कभी नहीं मिला हूँ - जब भी दिल्ली आने का होता है - पूछते हैं - कुछ तुम्हारे लिए लाना है ?? कई लोग मिले ....
इधर मई से कॉलेज में थोडा काम कम हो गया था सो समय पूरा था - जम के फेसबुक का मजा लिया ! "मेरा गाँव - मेरा देस" सीरीज शुरू किया - लोगों ने पसंद किया ! कई तरह के कम्मेंट लोगों ने व्यक्तिगत ढंग से मुझे दिया - एक ने कहा 'मै "मासूम सामंत" की तरह लिखता हूँ और हूँ भी :)
"मेरा गाँव - मेरा देस" के पहले पोस्ट पर 'फेसबुक' पर विनोद दुआ साहब का कम्मेंट आया - "आप बढ़िया लिखते हैं - लिखते रहिये " ! यह एक सपना की तरह था ! आम इंसान हूँ - जिस पत्रकार को बचपन से देखता सुनता आया - वो अगर कुछ मेरे जैसे आदमी को जिसका पेशा यह सब नहीं है - कुछ कहे तो सचमुच बहुत बढ़िया लगा ! अगर फेसबुक नहीं होता तो शायद ऐसे लोग से कभी मिल नहीं पाता !
आज सुबह एक दोस्त ने कहा 'दिल खोल' कर लिखता हूँ ! अछ्छा लगा ! साहित्य को दसवीं के बाद कभी पढ़ा नहीं - पर यह समझ कैसे पैदा हो गयी - पता नहीं ! घर में वैसा माहौल नहीं था - हाँ ननिहाल में था ! पर जब से थोड़ी बहुत समझ आयी - तब से ननिहाल नहीं गया ! माँ ने हिंदी और संगीत की पढाई की है पर उनसे हिंदी कभी नहीं सीखा ! हाँ , बचपन में "डा० वचन देव कुमार' की निबंध भाष्कर ही पढता था ! याद है कुछ महीने - पटना आया तो मकान मलिक मलिक के छत पर एक बड़ा सा ट्रंक था - जिसमे हिंदी की कई उपन्यास रखे हुए थे - सब के सब २-३ महीने में ही चट कर गया ! शिवानी - अमृता प्रीतम , ओशो और ना जाने कितने लोग ! मुंशी प्रेमचंद को बहुत कम पढ़ा हूँ पर 'फणीश्वर नाथ रेणु' पसंदीदा रहे पर वो भी आठवीं - नौवीं तक ही ! बंगलौर में नौकरी कर रहा था तब 'आचार्य चतुरसेन ' की उपन्यासों से मुलाकात हो गयी ! अब हाल के दिनों में फिर से एक बार ढेर सारे हिंदी ऊपन्यास खरीद लाया हूँ ! पढ़ना है :)
पर मेरे लिखने का सारा श्रेय "श्री संजीव कुमार रॉय" को जाता है - जिनसे यूँ ही इन्टरनेट पर टकरा गया और वो मेरा लिखा हुआ कुछ पढ़े फिर मुझे हमेशा प्रोत्शाहित किये ! उनसे भी कभी नहीं मिला - पर ७-८ साल से परिचय है - फेसबुक पर हर रोज मुझे पढते हैं :) मैंने उनका नाम 'जतिन दीवान' रखा हुआ है ;) पहले वो 'सिंगापूर' में थे जहाँ उन्होंने 'BIJHAR GROUP' बनाया - अब वो अपनी बहुत बड़ी कंपनी के 'ग्लोबल मैनेजर' बनके Bay Area , SFO , CA चले गए हैं ! भैया , जब भी कुछ लिखता हूँ - आपको याद जरुर करता हूँ :) , कैसे हैं ?
शायद आने वाले सोमवार से थोडा कम समय मिले पर अदा कदा 'ब्लॉग' लिखना जारी रहेगा - अभी तो बहुत सारी यादें लिखनी हैं :)
चलिए ..एक गीत सुनते हैं और स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं और देखते हैं - लाल किला के प्राचीर से 'मनमोहन सिंह' क्या बोलते हैं :)
रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !
