Thursday, October 7, 2010

मेरा गाँव - मेरा देस - मेरा त्यौहार - दशहरा - भाग बारह


हर जगह का 'दशहरा' देखा हूँ :) मुज़फ्फ्फरपुर -  रांची - पटना - गाँव - कर्नाटका - मैसूर - नॉएडा -गाज़ियाबाद :)

गाँव में बाबा कलश स्थापन करेंगे ! हर रोज पाठ होगा ! बाबा इस बीच दाढ़ी नहीं बनायेंगे ! पंडित जी हर रोज सुबह सुबह आयेंगे ! नवमी को 'हवन' होगा ! दशमी को मेला ! दशमी को हम सभी बच्चे मेला देखने जाते थे - हाथी पर् सवार होकर ;) ( सौरी , मेरी हाथी वाली किस्से पर् कई भाई लोग नाक - भों सिकोड़ लेते हैं )...महावत को विशेष हिदायत ...गान के सबसे बड़े ज़मींदार के दरवाजे के सामने से ले चलो ...जब तक मेरा हाथी उनका पुआल खाया नहीं ...तब तक मन में संतोष कहाँ ...:P  गाँव से दूर ब्लोक में मेला लगता था ! जिलेबी - लाल लाल :) मल मल के कुरता में ! फलाना बाबु का पोता ! कितना प्यार मिलता था ! कोई झुक कर सलाम किया तो कोई गोद में उठा कर प्यार किया ! किसी ने खिलौने खरीद दिए तो किसी ने 'बर्फी मिठाई' ! तीर - धनुष स्पेशल बन कर आता था ! लगता था - हम ही राम हैं :) पर् किस सीता के लिए 'राम' हैं - पता नहीं होता ! 

रांची में याद है  नाना जी के एक पट्टीदार वाले भतीजा होते थे - एच ई सी में - हमको मूड हुआ - रावणवध देखने का - ट्रक भेजवाये थे ! ट्रक पर् सवार होकर हम 'रावण वध' देखने गए थे ! ननिहाल से लेकर अपने घर तक - दुश्मन से लेकर - दोस्त तक - 'भाई ..बात साफ़ है ....मेरा ट्रीटमेंट एकदम 'स्पेशल' होना चाहिए ...अभी भी वही आदत है ...जहाँ हम हैं ..वहां कोई नहीं .. :P

मुजफ्फरपुर में 'देवी स्थान' ! बच्चा बाबु बनवाए थे - सिन्धी थे - पर नाम 'बिहारी' ! अति सुन्दर - दुर्गा की प्रतिमा  ! वहाँ से लेकर कल्याणी तक मेला ! पैदल चलते चलते पैर थक जाता था :( चाचा जैसा आइटम लोग पीठईयाँ कर लेता :) फिर बाबू जी एक आर्मी वाला सेकण्ड हैंड जीप ले लिए ! पूरा मोहल्ला उसमे ठूंसा जाता ! फिर रात भर घूमना :) झुलुआ झुलना ! कुछ खिलोने - चिटपुटिया बन्दूक  !  उस ज़माने में दुर्गा पूजा के अवसर पर् - ओर्केस्ट्रा आता था ! शाम से ही आगे की कुर्सी पर् बैठ जाना और प्रोग्राम शुरू होने के पहले ही सो जाना :) पापा मोतीझील के पूजा मार्किट से एक हरे रंग का 'एक्रिलिक' का टी शर्ट खरीद दिए थे - तब वो पी जी ही कर रहे थे - मोहल्ला के सीनियर भईया लोग के साथ घुमने गए थे - बहुत साल तक उस हरे रंग के टी शर्ट को 'लमार - लमार' के पहिने ..:)) 

पटना आ गया ! विशाल जगह था ! बड़ा ! माँ - बाबु जी घूमने नहीं जाते ! कोई स्टाफ साथ में ! भीड़ ही भीड़ ! मछुआटोली आते आते - लगता कहाँ आ गए ! तब तक आवाज़ आती - अमूल स्पेय की दुर्गा जी - पूरा भीड़ उधर ! ठेलम ठेल ! ये लेडिस के लाईन में घुसता है ? हा हा हा हा ! उफ्फ्फ ...बंगाली अखाड़ा ! नवमी को दोस्त लोग मिलता - कोई बोलता - फलाना जगह का मूर्ती कमाल का है - फिर नवमी को ..वही हाल ! 

 गाँधी मैदान और पटना कौलेजीयट में तरह तरह का प्रोग्राम होता - पास कैसे मिलता है - पता ही नहीं था ! गाँधी मैदान गया था - महेंद्र कपूर आये थे ! देख ही लिए :) एक बार मूड हुआ 'गाँधी मैदान' का रावण वध देखने का ! एक दोस्त मेरे क्लास का ही - हनुमान बना था - राम जी के साथ जीप पर् सवार था ! इधर से बहुत चिल्लाये - नहीं सुना :) एक बार गए - फिर दुबारा नहीं गए ! बाद में छत पर् पानी के टंकी पर् चढ  कर देखने का एहसास करते थे :)

थोडा जवानी की रवानी आयी तो सुबह में - सुबह चार बजे ..:)) जींस के जैकेट में ....बाल में जेल वेल लगा के ...जूता शुता टाईट पहिन के ...:)) आईक - बाईक पर ट्रिपल सवारी ...पूरा पटना रौंद देते थे ...

नॉएडा आ गए ! बंगाली लोग का एक मंदिर है - कालीबाड़ी ! वहाँ जरुर जाते ! नवमी को मोहल्ले में ही 'बंगाली दादा' लोग पूजा करता था ! जबरदस्त ! अब यहाँ एकदम एलीट की तरह ! मल मल का कुरता ! बेटा भी ! दुर्गा माँ को साष्टांग ! हे माँ - इतनी शक्ति देना की ..........! फिर प्रोग्राम ! रविन्द्र संगीत और नृत्य ! ये लोग बड़े - बड़े कलाकार बुलाते हैं - कभी कुमान शानू तो कभी उषा उथप ! गाना साना सुने ! ढेर बंगाली दादा लोग हमको 'बिहारी बाहुबली' ही समझता था - सो इज्जत भी उसी तरह ! पर् अच्छा लगता था !


रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !

Wednesday, October 6, 2010

बिहार चुनाव - भाग एक

कल देर रात तक 'चन्दन' पास बैठा हुआ था ! बोला - भैया , अब आपको राजनीति ज्वाइन कर लेना चाहिए ...फिर हंसने लगा ..आप इतना "तीखा"  बोलते हैं - कौन आपके साथ रहेगा ? :(  फिर उसको बोला ..मेरा 'ब्लॉग' पढ़ो :) मै "बिहार राजनीति" का बाल कलाकार 'सचिन' हूँ :) बहुत देर तक बातें हुई !

इस बार अजीब हुआ - कई लोग फोन किये - रंजन जी , यही मौका है - कूद जाईये ! एक देर रात - राजीव कुंवर अड् गए - अभी बाओ डाटा भेजिए - अभी का अभी ! खैर , ना तो इतना पैसा है और ना ही 'कुब्बत' ! बेरोजगार होता - पटना में होता तो कोई और बात होती ! कई करीब के दोस्तों ने समझाया - अभी खेलो - कूदो , फिर आराम से "हनुमान कूद" करना :)

बिहार में एक कहावत है - किसी से दुश्मनी है तो उसको एक 'सेकण्ड हैंड गाड़ी' खरीदवा दो - दुश्मनी गहरी है तो 'चुनाव' लडवा दो :) एक जमाना था - जब चुनाव में खेत बिकते थे - अब 'चुनाव' में हारने के बाद भी लोग नॉएडा में प्लाट खरीदते हैं :) कॉंग्रेस के एक बहुत ही बड़े नेता से बात हो रही थी - बोले - क्या हीरो - कब आ रहे हो मैदान में ? मै एक शर्मीला लडका की तरह नजरें झुका मुस्कुराने लगा - वो बोले - अरे , इंदिरापुरम में फ़्लैट लिए हो न ..क़र्ज़ से लिए होगे ...एक चुनाव में सब क़र्ज़ खत्म हो जायेगा :)

देखिये , बाहुबली से डर नहीं लगता है ! बिलकुल नहीं ! डर लगता है - नेता सब से ! कहाँ 'सेट' कर दे और आप 'बैकुंठधाम' :( बात करीब तेईस साल पुरानी है - बिहार के प्रथम बाहुबली 'काली पांडे' जी हमारे सांसद हुआ करते थे ! मै मैट्रीक के परीक्षा के बाद अपने गृह जिला के दौरा पर् था और तत्कालीन मुख्यमंत्री 'श्री विदेश्वरी दुबे' जी भी आने वाले थे सो हम सभी उनकी आगवानी के लिए लोकल हवाई अड्डा पर् खड़े थे ! मेरी थोड़ी नोक झोंक 'काली पांडे' जी से हो गयी - जो बिलकुल मेरे बगल में थे ! मेरे दादा जी बीच बचाव करते - पर् मै पुरे आवेश में था जिसका भरपूर इज्जत "काली पांडे" ने किया - पर् इस छोटी सी घटना ने कईओं को आशा जगा दिया की - एक दिन मै भी .....

राजनीति ठीक है ..लेकिन 'हिंसा' देखकर डर लगता है ! बहुतों को मौत के घाट तक पहुंचते देखा हूँ ! कई करीबी ! यहाँ घात होता है ! मर्दों की तरह सामने से लड़ाई नहीं होती है ! जो कल तक आपकी उंगली पकड़ 'राजनीति का पाठ' पढ़ रहा था वो आज अपने निजी स्वार्थ के लिए आपकी हत्या करवाने में थोडा भी नहीं जिझकेगा - ये बहुत ही गलत है ! नगीना राय की हत्या देखी है ! उस दौर में "गोपालगंज" में कई हत्याएं देखी ! लगातार ! 

लेकिन ये नशा है ! नगीना राय को मरे १९ साल हो गए - एक बार फिर उनके पुत्र 'महेश राय' कॉंग्रेस की टिकट पर् चुनाव लड़ रहे हैं ! सोचा फोन करूँगा ! कई अपने अलग अलग पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं !

मंजीत हमारे विधायक होते थे ! पिछली दफा हार गए ! हमलोगों की बहुत इज्जत करते हैं ! नितीश ने उनको फिर एक बार टिकट दिया है ! आशा है जीत जायेंगे ! उनके पिता जी हमलोगों के विधायक होते थे - हमसभी उनको 'बाबूसाहब' कहते थे - छोटे सरकार ( सत्येन्द्र बाबु) के दाहिना हाथ ! राजनीतिक विरोध था पर् बड़े ही खानदानी थे ! 'बड़े आदमी' ! छोटापन नहीं था ! सत्येन्द्र बाबु के कैबिनेट में वो थे - मंत्री बनने के बाद सबसे पहले हमारे दरवाजे पर् आये थे - हमने भी उनके 'बडपन्नता' को इज्जत दी थी !

पारिवारिक मित्र और पटना में हमारे परिवार के अभिभावक 'कृष्णकांत बाबु' के परिवार से उनके बड़े लडके - चुन्नू बाबु गोरियाकोठी से भाजपा से चुनाव लड़ रहे हैं ! फरवरी २००५ में जीते भी थे ! इस बार उनको जरूर जितना चाहिए ! इस परिवार ने 'गोरियाकोठी' को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई है ! बिहार का कोई भी ऐसा जिला नहीं है जहाँ आपको इस गाँव की कोई लडकी डॉक्टर नहीं मिलेगी !

और क्या लिखूं ? सभी अपने जीते ! शुभकामना रहेगी !

पर् मुझसे 'नितीश कुमार' नहीं "घोंटाता" है :( 






रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Saturday, September 25, 2010

लाईफ इन अ मेट्रो - पार्ट वन

फाईनल सेमेस्टर का परीक्षा के बाद हम 'पटना' में जम गए थे ! दोस्त लोग नौकरी में जाने लगे - फोन आने लगे ! हम सोचे जब सब 'नौकरी' कर रहे हैं - फिर हमें भी कर लेना चाहिए ! :)

'अमित' को बंगलौर में नौकरी लगी थी ! फोन किया - बोला 'आ जाओ' ! हम भी ट्रेन पकड़ लिए ! उनदिनो 'मोबाईल' नहीं होता था ! बंगलौर पहुंचा तो पता चला की वो 'दूसरे शहर ' गया हुआ है दीदी से मिलने ! अब मै क्या करूँ ? सोचा "नौकरी" करने आया हूँ - अंदाज़ फ़िल्मी होना चाहिए ! पूरी रात 'मजेस्टिक बस स्टेशन' पर् गुजार दिया ! अगली सुबह 'अमित' से मुलाकात हुई ! उसको कंपनी वालों ने 'मल्लेश्वरम' चौक पर् एक कमरा दिया हुआ था ! जम गए 'कमरा' में ! 'अमित' को हमारे बैच वाले 'दादा' कहते हैं ! 'दादा' को मेरी नौकरी की टेंशन थी - मैंने उसको समझाया - नौकरी बड़ी चीज़ नहीं है - नौकरी में मन लगना बड़ी चीज़ है ! पटना से चलते वक्त - बाबु जी ने बाटा का किंगस्ट्रीट जूता खरीद कर दिया था - १० ही दिन में वो बेचारा दम तोड़ दिया ! खैर अगले एक दो सप्ताह में ही नौकरी लग गयी ! एक आई आई एम अलुम्नी की छोटी सी कंपनी थी !

हर सुबह 'नहाने' का झंझट होता था ! जब तक मै सो कर उठता - 'दादा' नहा धो कर 'तैयार' :) अब जब वो अपने ओफ्फिस की तरफ निकलता तब मै 'अखबार' पढता - फिर चाय - फिर नहा धो कर लेट लतीफ़ ! शाम को लगभग हम दोनों एक ही समय में पहुँचते ! फिर साथ में 'दूकान' में एक कप चाय को दो भाग में करके  पीते ! जिस जगह हम रहते थे - वहाँ काफी व्यस्त सड़क थी ! उसको 'मल्लेश्वरम सर्किल' कहते थे ! देर रात तक भीड़ भाड़ ! एक मैग्जीन की दूकान होती थी - वहाँ से आठ आना में मैग्जीन को रात भर पढने के लिए लाते थे ! :) The Week की लत वहीँ लगी थी !

रात को खाने का हमलोगों ने बढ़िया ट्रिक निकाला था ! एक अंडा के दूकान से चार उबला अंडा खरीद , फिर एक रेस्तरां से छह रुपईया में एक प्लेट चावल और चिकन की करी :) कुल १२ -१३ रुपईया में दम भर खाना :) दरअसल 'दादा' ने रेस्तरां के किचेन वाले को 'फिट' कर रखा था :) वो एक प्लेट चावल की जगह दो प्लेट दे देता था और चिकन करी मुफ्त में :) हम इतने बेचारा शक्ल में होते की - कोई भी कुछ भी दे सकता था :) एक शनीवार दादा 'ब्रिगेड' लेकर गया - बोला 'देखो' यही है "दुनिया" ! फिर क्या 'दादा' के "विजय सुपर " पर् चढ हम रोज "दुनिया" देखने जाने लगे ! :) फिर , शनीवार देर रात ! क्या 'दुनिया थी' :) "जन्नत लगता था" ! कई दोस्त जो वहाँ विदेशी कंपनी में काम करते थे - वहीँ मिलते ! जो जितना 'कमाता' वो उतना ही बड़ा 'कंजूस' :)

मेरे लिए 'अन्जान' लोगों से दोस्ती थोड़ी मुश्किल थी - पर् 'दादा' सब से कर लेता था ! हम जिस मकान में रहते थे - उसका नाम था "रतन महल" ! हम जैसे ही वहाँ रहते थे ! दादा वहाँ बहुतों से दोस्ती कर लिया ! एक और टीम था - उडिया का - "सुबुध्धी" - ISRO में वैज्ञानिक था ! अब टीम बड़ी हो गयी - रात में साथ खाना खाने वालों का ! हम और दादा अब 'चावल और अंडा' वाला धंधा बंद कर दिए थे - हम सभी अब नए ठीकाने खोज लिए - "आन्ध्र स्टाईल" रेस्तरां ! इसी बीच हम भी एक 'बजाज चेतक स्कूटर' खरीद लिए !

तब तक 'तविंदर सिंह' पहुँच गया ! लंबा चौड़ा 'जम्मू का सरदार' ! उसको भी नौकरी लग गयी :) हम तीनो एक साथ "दादा" के कमरे में रहने लगे ! एक दिन 'दादा' बोला - भाई - ये रूम मेरी कंपनी का है - अब तुम दोनों अलग कमरा ले लो ! हम और तविंदर दोनों ने एक कमरा उसी 'रतन महल' में ले लिया ! तविंदर सरदार था - दिल बहुत बड़ा और 'बहस करने में उतना ही माहीर ! रात भर बहस करता था ! और कमरे में मै पलंग पर् सोता और वो नीचे ! कभी शिकायत नहीं किया ! अब वो कंगारू स्टेपलर का इंटरनेशनल हेड है :) नॉएडा आया था तो मिला था :) फेसबुक पर् भी है :)

तविंदर के आने से एक फायदा हुआ - हम सभी अलसूर रोड पर् एक गुरुद्वारा में हर रविवार 'लंगर' खाने जाने लगे :) बहुत मजा आता था ! पूरा एक टीम ! तविंदर देर रात अपनी पगड़ी को हम सभी से सीधा करवाता था :) फिर सुबह में उसकी पगड़ी बांधो !

एक छोटी सी घटना याद है - के आर सर्किल के पास बंगलौर का सबसे बढ़िया 'इंजिनिअरिंग कॉलेज' है - वेश्वेश्वरैया जी के नाम पर् ! वहाँ से गुजर रहा था ! पोस्टर देखा - वहाँ 'मिलेनियम ग्रुप' का रॉक शो होने वाला था ! मै कॉलेज के अंदर घुसा गया ! अभी नया नया खुद भी कॉलेज से पास किया था तो झिझक नहीं हुई ! वहाँ के विद्यार्थीओं के कल्चरल सेक्रेटी से मिला और बोला - "मुझे अवसर दोगे , मिल्लेनियम ग्रुप के साथ ? " वो बहुत देर तक हंसा फिर बोला - ओके , आ जाना कल :) अब , कल के लिए कपडे नहीं थे :) जिस कपडे में 'इंटरविउ' देता फिरता था - उसमे ही पहुँच गया - सफ़ेद शर्ट - काला पैंट और लाल टाई ;) "दादा" भी साथ में था ! जबरदस्त स्टेज और क्रावूड ...मस्त !! ;) पचास हज़ार वाट के स्पीकर्स :) बेहद ख़ूबसूरत लड़कियां - हर लिबास में ! दक्षिण भारत के सभी बढ़िया इन्जीनिअरिंग कॉलेज के एक से बढ़कर एक लडके - लडकी आये थे ! "दादा" को किस किया और फांद गया - स्टेज पर् - खुद का लिखा 'गाना' - सब झूम गए ! स्टेज से नीचे उतरा तो 'दादा' बोला - क्या बोला ....आज तक कानो में सुरक्षित हैं :) फिर क्या था ...दादा थोडा दूर खड़ा था और मै जिंदगी में पहली दफा इतनी सारी हसीनाओं के बीच अकेला खडा था :) किसी ने कहा 'दम चलेगा ? " हा हा हा ... ....उफ्फ्फ्फ़ ..वैसे पल फिर कभी नहीं आये ...और सिर्फ 'दादा' ही इसका गवाह बन सका ! दोस्त है - बड़ा भाई जैसा भी ! इंदिरापुरम में ही रहता है :) विप्रो में बहुत बड़ा अधिकारी बन गया है ! मेरी एक डायरी भी उसके पास सुरक्षित है ;) !
कुछ महीनो के बाद दादा कलकत्ता चला गया ! वहीँ उसको नौकरी मिल गयी ! तविंदर अपने ढेर सारे सामान को मेरे पास छोड़ ..जम्मू वापस चला गया ! मै काफी अकेला हो गया ! मै अपनी पुरानी कंपनी छोड़ 'दादा' वाली कंपनी में चला गया ! 'सिंगापूर' की कंप्यूटर नेटवर्किंग कंपनी थी - मालिक 'I I Sc ' से पास था - 'वैज्ञानिक' जैसा ! बहुत पढ़ना पड़ता था - वहाँ ! तनखाह मुहमांगी जैसी थी - पर् 'मन' बिलकुल नहीं लगता था ...बिलकुल भी नहीं ..!

क्रमशः !!!


रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !


Thursday, September 16, 2010

अखबार में नाम - "हिंदुस्तान दैनिक" में अपना दालान !!

बिहार में चुनाव के घोषणा होते ही मैंने 'फेसबुक' पर् लिखा की - चुनाव की हलचल को 'दालान' पर् लिखूंगा - रवीश भी कम्मेंट किये की - 'इंतज़ार करूँगा' ! मैंने लिखा भी - फिर डिलीट मार दिया ! अचानक दो दिन पहले - रवीश का एस एम एस आया की - अपने दालान का लिंक दीजिए ! उस वक्त मै अपने एक बेहद जिगरी दोस्त से गप्प मार रहा था - उसको भी बोला - शायद 'रवीश अभी फुर्सत में दालान पढ़ना चाह रहे होंगे ! फिर अगले दिन रवीश को मैसेज भेजा - "दालान कैसा लगा ?" उन्होंने जबाब दिया - "मेरा गाँव - मेरा देस " काफी पसंद आया !  बात आयी गयी हो गयी !

कल सुबह अचानक संजय भैया का फोन आया ! बोले की "दालान" के चर्चे "हिंदुस्तान दैनिक" में छपा है ! आम इंसान हूँ - खुशी हुई ! नेट पर् लिंक खोजा और चार बार पढ़ा ! फिर रवीश को थैंक्स एस एम एस भेजा ! कई नजदीकी दोस्त खुश हुए ! डरते डरते बीवी को भी बताया - एक छोटी सी सच्ची कहानी के साथ ! वो मुस्कुरायीं और हम थोड़े निश्चिन्त हुए :)

आम  इंसान हूँ ! खुश हूँ और खुशी से लिखने की तमन्ना बढ़ी है ! "पत्रकारों" की बेहद इज्जत करता हूँ ! पर् 'पत्रकार' बनना पसंद अब नहीं होगा - हिंदी पत्रकारिता में बहुत ही गंदी राजनीति है ! बहुत ही करीब से देख लिया ! प्रतिभाएं कैसे पनप जाती है - आश्चर्य होता है ! यहाँ "भ्रूण हत्या" होती है ! दुःख होता है ! शायद रवीश मुझसे सहमत होंगे !

खैर , राजनीति भी ज्वाइन नहीं करना ! इस बार करीब बीस लोग फोन किये होंगे - चुनाव कहाँ से लड़ रहे हो ? :) कई वरिष्ठ लोग बोले - राहुल जी से एक बार और मिल लो - टिकट मिल जाएगा ! मेरा जबाब स्पष्ट था - 'इगो' डाउन कर के राजनीति नहीं करनी ! राहुल जी चाहेंगे तो 'राज्यसभा' भेज सकते हैं ;) ( हवा )

खैर ...चलिए देखते हैं ...रवीश ने क्या लिखा

"जातिगत समीकरणों का ऐसा ही विश्लेषण पिछले चुनावों के दौरान भी था। बहुत समीकरण बनाए गए, लेकिन नीतीश का जातिगत समीकरण और एक पार्टी के लंबे शासन से निकलने की पब्लिक की चाह ने नतीजे बदल दिये। जातिवाद की मजबूरी बिहार की राजनीति की आखिरी सीमा नहीं है। इसे समझने के लिए दालान ब्लॉग पर जा सकते हैं।

http://daalaan.blogspot.com/ पर रंजन ऋतुराज लिखते हैं कि उनके गांव में एक ब्राह्मण को पोखर दान कर दिया गया। मरने के बाद एक ठेकेदार ने उसकी विधवा से पोखर अपने नाम करा लिया, लेकिन लोग कई साल से पोखर का सार्वजनिक इस्तेमाल भी करते रहे। छठ पूजा का घाट बन गया। रंजन के परिवारवालों ने मुसलमानों से चंदा करा कर पोखर के एक किनारे मस्जिद बनवा दी। जब ठेकेदार ने कब्जा करने की कोशिश की सब ने उसे भगा दिया। गांव के हर घर ने चंदा कर मुकदमा लड़ा। अदालत का फैसला हुआ और पोखर को सार्वजनिक घोषित कर दिया गया।

इस छोटी-सी सत्यकथा में बिहार के लिए सबक है। रंजन लिखते हैं कि मैंने समाजशास्त्र किसी किताब में नहीं पढ़ा है। समाज के साथ रहा हूं सो जो महसूस करता हूं लिखता हूं। लोग किस-किस अवस्था में कैसे सोचते हैं, इसका पता किसी को नहीं चलता। रंजन अपने फेसबुक पर स्टेटस में लिखते हैं कि दलसिंहसराय के विधायक राम लखन महतो को जदयू में लाने की बात पर उपेंद्र बाबू गुस्सा गए। जहानाबाद के दलबदलू अरुण बाबू भी कहने लगे कि दूसरी पार्टी के लोगों की पूछ नहीं बढ़नी चाहिए। भूल गए कि वे बिहार के सब दलों में घूम कर वापस आए हैं।

वाकई बिहार एक फैसले के मोड़ पर खड़ा है। सब एक ही सवाल कर रहे हैं कि बिहार विकास के नाम पर वोट करेगा या जाति के नाम पर। कोई इन दोनों के कॉकटेल की बात नहीं कर रहा है। जो कॉकटेल बना लेगा जीत का नशा वही चखेगा। रंजन लिखते हैं कि जाति की राजनीति बिहार या भारत या विश्व के लिए नयी नहीं है।
बिहार पोलिटिक्स पेज है - फेसबुक पर् ! वहाँ की बातें भी मेरे नाम से कोट की गयी हैं - पर् उसमे ज्यादा योगदान "सौमित्र जी और सर्वेश भाई " का है - दोनों बंगलौर में ही रहते हैं !


लिंक है "हिंदुस्तान में दालान"  



रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Friday, September 10, 2010

टुनटुन बाबु की कहानी !!


टुनटुन बाबु - गाँव के सबसे बड़े गृहस्थ के एकलौते बेटे ! कहते हैं - इनके यहाँ १९०७ से ही गाड़ी है ! सन १९५२ से ही रसियन ट्रेक्टर और अशोक लेलैंड की ट्रक ! जम के ईख की खेती होती ! खुद परिवार वालों को नहीं पता की कितनी ज़मीन होगी ! इलाके में नाम ! गांव बोले तो 'टुनटुन बाबु' के बाबा के नाम से ही जाना जाता था !

मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज से बी ए फिर एम ए पास करने के बाद - जब सभी दोस्त 'दिल्ली' जा कर 'कलक्टर' की तैयारी करने लगे तो 'टुनटुन बाबु' को भी मन किया ! अब बाबा और बाबु जी को बोले तो कैसे बोलें ? माँ को बोला - 'दिल्ली' जाना चाहता हूँ ! माँ ने बाबु जी को बोला - बाबु जी ने बाबा को बोला ! 'कलक्टर' बनने के नाम से इजाजत मिल गयी - पर् शर्त यह की - डेरा अलग लिया जायेगा - एक रसोइया रहेगा साथ में रहेगा और एक नौकर ! दिल्ली के मुखर्जी नगर में डेरा हो गया ! गाँव से 'मैनेजर' जी आये थे - साथ में चावल -आटा - शुद्ध खोवा का पेडा ! देखते देखते ढेर सारे 'दोस्त' बन गए ! सुबह उनके डेरा पर् दोस्त जमा हो जाते - गरम गरम पराठा और भुजिया खाने ! "टुनटुन बाबु' को काहे को पढने में मन लगता :) कई दोस्त उनका ही खा कर 'कलक्टर' बन निकल पड़े :) कई पत्रकारिता की तरफ तो कई एक्सपोर्ट हॉउस में ! ३ साल बाद टुनटुन बाबु वापस लौट गए - गाँव ! जो गाँव के दोस्त थे - उनसे 'दिल्ली' का गप्प होता - वहाँ ये किया - वहाँ वो किया - हाव भाव भी बदले हुए !

शादी तय हो गयी ! तिलक के दिन - पूरा इलाका आया था ! टुनटुन बाबु के कई दोस्त भी ! लडकी वाले ने सिर्फ 'चांदी' का सामान चढ़ाया था ! कई 'कलक्टर' दोस्त भी आये थे - उनलोगों को ठहरने का अलग इंतज़ाम ! सब भौचक्क थे !

शादी के बाद - पहला होली आया ! माँ के कहने पर् १० दिन पहले ही 'टुनटुन बाबु' ससुराल पहुँच गए ! साथ में एक 'हजाम' , एक नौकर भी ! हर रोज तरह तरह के पकवान बनते ! घर के सबसे छोटे दामाद थे - पूरा आवभगत हुआ ! होली के २ दिन पहले और भी बड़े 'साढू-जेठ्सर' आ गए ! कोई कहीं कैप्टन तो कोई कहीं अफसर ! पत्नी का जोर था - 'जीजा जी' लोग से मिक्स क्यों नहीं करते ? पत्नी के दबाब में - "टुनटुन बाबु" अपने साढू भाई लोग से गपिआने लगे ! कोई बंगलौर का कहानी सुनाता तो कोई दिल्ली का ! बात - बात में वो सभी अपनी 'नौकरी' के बारे में बात करते - और 'चुभन' टुनटुन बाबु को होती ! पत्नी भोलेपन में अपनी दीदी लोग के रहन सहन की बडाई कर देती ! होली का माहौल था ! "सास" सब समझ रही थीं ! छोटे दामाद की पीड़ा ! "साढू भाई" लोग की बोलियां और नौकरी की बडाई - टुनटुन बाबु के अंदर एक दूसरी होली जला दी थी ! खैर , पत्नी को मायके में छोड़ - होली के दो दिन बाद वो वापस अपने गाँव आ गए ! उदास थे ! सब कुछ था - पर् नौकरी नहीं था ! अक्सर यह सोचते - नौकरी से क्या होता है ? पैसा ? पैसा से क्या ? घर - जमीन जायदाद ? परेशान हो गए !

जब परेशानी बढ़ गयी तो - माँ को बोले - मै नौकरी करने 'दिल्ली' जाना चाहता हूँ ! माँ ने बाबु जी को बोला - बाबु जी ने बाबा को बोला ! बाबा बोले - "क्या जरुरत है - नौकरी की ? हम गिरमिटिया मजदूर थोड़े ही हैं ? " खैर किसी तरह इजाजत मिल गयी ! टुनटुन बाबु भी अपने एक दोस्त का पता ..पता किया ! पता चला की वो एक एक्सपोर्ट हॉउस में है - वो नौकरी दिलवा देगा !
जाने के दिन - माहौल थोडा अजीब हो गया ! माँ ने 'अंचरा' से कुछ हज़ार रुपये निकाल के दिए - बाबु जी से छुपा के दे रही हूँ ! जब  दिक्कत होगा तो खर्च करना ! बाबु जी भी उदास थे ...जाते वक्त ..'एक पाशमिना का शाल" कंधे पर् डाल दिया ! बड़ा ही भावुक माहौल था ! जीप से स्टेशन तक आये ! ट्रेन पर् चढ ..दिल्ली पहुँच गए !

दिल्ली बदल चूका था - दोस्त बदल चुके थे ! इस बार ना तो रसोईया था और ना ही कोई नौकर ! कई 'कलक्टर' दोस्त जो दिल्ली में ही थे - सबको फोन लगाया - कुछ करो यार ! पहले तो सब हँसे - तुम और नौकरी ? जो पिछली बार तक इनके 'पराठे - भुजिया' खाने के लिए सुबह से ही इनके डेरा पर् जमे रहते थे - किसी ने घर तक नहीं बुलाया ! अंत में काम वही आया - एक्सपोर्ट हॉउस वाला - जिसको 'टुनटुन बाबु' कभी भाव नहीं दिए - अपनी शादी में भी नहीं बुलाया था ! एक सप्ताह में - नौकरी का इंतजाम हो गया ! एक दूसरे एक्सपोर्ट हॉउस में !

बड़ा मुश्किल था ! सुबह ८ बजे ही बस पकडो ! बस से ऑफिस पहुँचो ! फिर मैनेजर ! ढेर सारा काम ! बहस ! मालिक ! उफ्फ्फ्फ़ ! कभी कभी कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता ! पत्नी के साथ पटना में एक जूता ख़रीदे थे - वुडलैंड का ! अब वो जूता जबाब देने लगा ! माँ का भी दिया हुआ पैसा - खत्म होने के कगार पर् था ! सात तारीख को तनखाह मिलती !

सात तारीख आ गया ! मैनेजर ने बोला - कैश लोगे या चेक ! टुनटुन बाबु बोले - "कैश" ! ७ हज़ार रुपये ! कितने भारी थे ! माँ बाबु जी को याद किया ! बाबा को भी ! फिर 'साढू भाई' लोग याद आये :)
महंगे जूते खरीदने की हिम्मत नहीं हो रही थी - किसी तरह सब से सस्ता एक जूता ख़रीदा ! वैसा जूता उनके गाँव का उनका नौकर भी नहीं पहनता होगा !

अब घर याद आने लगा ! हर शाम वो बेचैन होने लगे ! मन में ख्याल आने लगा - कौन सा 'सरकारी हाकीम" बन गया हूँ ! प्राइवेट नौकरी है ! जितना कमाएंगे नहीं - उससे ज्यादा तो गाँव में लूटा जायेगा ! ऐसी सोच हावी होने लगी ! एक दिन "सामान" पैक किया - मकानमालिक को कमरे का चावी पकडाया और स्टेशन की तरफ चल दिए !

आये थे - थ्री टायर एसी में ! वापसी जेनेरल में ! दिल्ली ने धक्कों से लड़ना सिखा दिया था ! सीट पकड़ ही ली ! सामने एक बुजुर्ग भी बैठे हुए थे ! ट्रेन खुल गयी !
अलीगढ में ट्रेन रुकी तो चाय वाला आया - चाय की कुछ बुँदे जुते पर् गिर गयी ! कंधे पर् रखे - "पाशमिना के शाल" से टुनटुन बाबु जूता पोंछने लगे ! फिर कुछ देर बाद एक - दो बार और पोछे !
सामने की सीट पर् बैठे - बुजुर्ग ने पूछा - "बेटा , इतने महंगे शाल से इतने सस्ते "जूते" को क्यों पोंछ रहे हो ?

टुनटुन बाबु बोले - "ये कीमती शाल - बाप दादा की कमाई का है और ये जूता भले ही सस्ता है - लेकिन "अपनी कमाई" का है :)


रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Sunday, September 5, 2010

शिक्षक दिवस ....कुछ दिल से ...

बहुत सारे विषय पर लिखने का मन करता है ! कई लोग पर्सनल चैट पर प्रशंषा करते हैं - आगे खुल कर नहीं बोल पाते :) ! आप सभी को मेरा लिखना पसंद आता है - यही बहुत बड़ी बात है ! बहुत सारे लोग जो यह भी जानते हैं की मै एक शिक्षक हूँ - उन्हें यह आशा जरुर होगी की मै शिक्षक दिवस पर कुछ लिखूंगा ! 

एक घटना याद है - उन दिनो "याहू मेस्सेंजर" पर चैट होती थी - एक सज्जन थे - 'पनिया जहाज' पर कैप्टन या इंजिनियर ! सुना है वैसे कामो में बहुत पैसा होता है ! खैर , परिचय हुआ - बिहार के थे ! मैंने भी अपना परिचय दिया ! अब वो अचानक बोल पड़े - "शिक्षक हो ? कैसे अपना और अपने परिवार का पेट पालते हो ? - कितना कमाते हो ? " उनकी भाषा 'कटाक्ष' वाली थी ! मै कुछ जबाब नहीं दे पाया - सन्न रह गया ! जुबान से कुछ नहीं निकला - बस एक स्माईली टाईप कर दिया ! पर , उनके शब्द आज तक 'कानो' में गूंजते हैं ! 

कई घटनाएं हैं ! नॉएडा नया नया आया था ! जिस दिन ज्वाइन करना था - अपने 'हेड' के रूम के आगे दिन भर खड़ा रहा - मुझे उनसे मिलना था और उनके पास समय नहीं - मेरे 'इंतज़ार' करने का फल ये हुआ की - इम्रेशन बढ़िया बना ! सब्जेक्ट भी आसान मिला  - प्रथम एवं अंतिम बार "जम के मेहनत किया और पढाया" ! कई विद्यार्थीओं ने मेरे नाम के आगे "झा" जोड़ दिया था :) 

कुछ बैच ऐसे होते हैं - जिसमे आप २-३ सब्जेक्ट पढाएं तो वहाँ एक खास तरह का स्नेह बन जाता है ! फिर ता उम्र आप उनसे जुट जाते हैं ! एक रिश्ता बन जाता है ! एक विद्यार्थी था - दूसरे ब्रांच का ! उसे थोड़ी हिम्मत की कमी थी - अक्सर वो मिल जाता और मै उसको हमेशा यह बोलता की तुम अपने क्लास में टॉप कर सकते हो ...फिर मैंने उसको जान बुझ कर उसके हौसले को बढ़ाने के लिए १-२ मार्क्स ज्यादा दिए - फिर वो आगे देखा न पीछे ...अचानक फ़ाइनल इयर में पता चला की - वो टॉप कर गया है - क्लास में नहीं -पुरे यूनिवर्सटी में :) कॉलेज आया तो अपने माता -पिता से मुझसे मिलवाया ! अछ्छा लगा था ! 

एक बार मै अपने हेड के कमरे में गया तो वहाँ एक वृद्ध सज्जन बैठे थे - उनदिनो मेरे हेड एक 'सरदार जी' होते थे ! शायद उनको मै बहुत पसंद नहीं था - पर मै इतनी सज्जनता से पेश आता की - उनके पास कोई और उपाय नहीं था - खैर उनके कमरे में बैठे सज्जन के बारे में पूछा तो पता चला की उनका 'पोता' हमारे यहाँ पढता है और  फेल कर गया है - अब वो नाम कटवा के वापस ले जाना चाहते हैं - मैंने बोला - आप एक कोशिश और कीजिए - मै उसका ध्यान रखूँगा - मै ज्यादा ध्यान नहीं रख पाया - पर , हाँ - कभी कभी टोक टाक दिया करता था - वो लड़का सुधर गया - पास करने के कुछ दिन बाद आया - मेरे केबिन में -  "पैर छूने लगा - मैंने मना कर दिया " - धीरे से बोला - 'सर , विप्रो में नौकरी लग गयी है ' - बंगलौर जाना है - सोचा आप से मिल लूँ ! इतनी खुशी हुई की - पूछिए मत - लगा आँखों से खुशी के आंसू छलक जायेंगे ! मुझे यह पूर्ण विश्वास है की - दुनिया की कोई ऐसा दूसरा पेशा नहीं है - जिसमे आपको ऐसी खुशी मिल सके  ! 

मुझे मैनेजमेंट गुरु बहुत पसंद आते हैं - और अक्सर मै एक 'इलेकटीव' पढाता हूँ - जिसमे मैनेजमेंट के कुछ                   ज्यादा भाग हैं ! अखबार में अगर कोई ऐसा आर्टिकल किसी मैनेजमेंट गुरु का अगर आ जाए तो - मै उसे बिना पढ़े नहीं छोड़ता - खास कर 'ब्रांड मैनेजमेंट' का ! खैर ये मेरी पुरानी आदत से - कोर विषय से अलग हट के 'काम' करना ;) वैसे मेरी नज़र में 'कंप्यूटर इंजिनीरिंग' में 'प्रोग्रामिंग' के बाद अधिकतर  विषय बकवास ही होते हैं - और मुझे सब कुछ नहीं आता ! :) 

बाबू जी भी शिक्षक हैं ! जिस किसी दिन भी उनका क्लास होता है - उसके २ दिन पहले से वो 'जम' के पढते हैं - उनके कमरे में कोई नहीं जाता है ! 

खुद शिक्षक हूँ - पर मुझे मेरी जिंदगी में कोई ऐसा शिक्षक नहीं मिला - जो मेरी प्रतिभा को पहचान एक दिशा देता ! कुल मिलाकर - मेरे बाबु जी ही मेरे लिए दिशा निर्देशक के रूप में हैं - शुरुआती दिनों में उनके कई बात नज़रंदाज़ किया हूँ - अब दुःख होता है - खासकर उनकी एक सलाह - जब मैंने 'मैट्रीक पास किया' - मानविकी एवं समाज विज्ञानं  ले लो , पढ़ा होता तो शायद किसी बड़ी पत्रिका का संपादक या राज नेता होता ! माँ की  ट्रेनिंग भी बहुत महत्वपूर्ण है मेरे लिए - आम जिंदगी में मेरी शालीनता और त्याग जल्द ही नज़र आ जाती है - कभी इसका बुरा फल मिलता है - कभी लोगों में जलन तो कभी लोग महत्त्व भी देते हैं - मेरे इस गुण के लिए मेरी माता जी ही जिम्मेदार है - कुछ खून का असर है - कुछ ट्रेनिंग ! 

मेरी स्नातक 'इलेक्ट्रोनिक एवं संचार' अभियंत्रण में है ! 'खुद जब विद्यार्थी था तब क्लास में आज तक मुझे कुछ समझ' में नहीं आया ! जिसका रिजल्ट यह हुआ की  - मै  बहुत ही सरल अंदाज़ में कोई भी सब्जेक्ट पढ़ाना पसंद करता हूँ ! अब तो कुछ सालों से 'प्योर लेक्चर' - एक घंटा तक बक बक ! मुझे याद है - पटना के एक कॉलेज में पढाने गया था - पहले ही क्लास में वहाँ के डाइरेक्टर साहब बैठ गए - जो जाने माने शिक्षक होते थे और आजादी के समय अमरीका से  पढ़ कर लौटे थे - मेरा लेक्चर सुनने के बाद बोले - " पढने की कोशिश करना - ज़माने बाद - कोई ऐसा मिला - जिसके अंदर ऐसी क्षमता हो जो  बातों को सरल अंदाज़ में विद्यार्थीओं को समझा सके - पर ज्ञान बढ़ाने के लिए तुमको पढ़ना होगा " ! खुद विद्यार्थी जीवन में बहुत अच्छे मार्क्स कभी नहीं आये पर बहुत सारी चीज़ें बहुत जल्द समझ आ जाती थी - जिसने मुझे 'खरगोश' बना दिया और देखते देखते 'कई कछुए' आगे निकल गए ! 

मेरी दो तमन्ना है - एक मैनेजमेंट में कोई बढ़िया लेख लिखूं और 'हाई स्कूल' में पढाऊँ ! कंप्यूटर से पी जी करने के बाद भी - मैंने कई 'हाई स्कूल' में शिक्षक के रूप में नौकरी के लिए आवेदन दिया था - सब्जेक्ट - भूगोल , इतिहास , नागरीक शास्त्र :) मुझे लगता है - अगर हाई स्कूल में हम चाहें तो बच्चों को जीवन में कुछ बड़ा सपना देखने को बढ़िया ढंग से प्रेरित कर सकते हैं ! 

कई लोग मुझे मिलते हैं जो भिन्न - भिन्न पेशा में हैं और कहते हैं - मै भी कुछ दिनों बाद 'शिक्षक' बनना पसंद करूँगा ! पर , बहुत कम लोग 'शिक्षक' बनने आते हैं और एक बेहरतीन विद्यार्थी होते हुए भी - बढ़िया शिक्षक नहीं बन पाते ! 

बहुत कुछ लिखने का मन था ...लिख नहीं पाया ...फिर कभी .. 



रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Friday, September 3, 2010

सिनेमा- सिनेमा : सोनाक्षी सिन्हा

अपनी दबंग 'बिहारन' - सोनाक्षी सिन्हा ! वक्त कैसे गुजर जाता है - पता ही नहीं चलता ! अभी हाल फिलहाल तक तो मै 'फ़िल्मी मैग्जीन' में शॉटगन सिन्हा को पढता था - कैसे वो ट्रेन में 'आठवीं की छात्रा 'पूनम' से मिले थे , कैसे सिनेमा में एंट्री मिला और कालीचरण , विश्वनाथ , दोस्ताना , शान , क्रांति और न जाने कितने ...! और अब देखिये तो बेटी सिनेमा में आ गयी :) अब बहुत मुश्किल है उसको इग्नोर करना ..जब भी टी वी या इन्टरनेट पर उसको देखता हूँ - एक अलग एहसास होता है - 'पटना की है' - भगवान इसकी सिनेमा हिट कर देना ! अन्जान सा सम्बन्ध जिसकी डोर अनचाहे 'क्षेत्रवाद' पर टिकी है - पर डोर मजबूत है !
स्कूल में पढता था ..कई दोस्त ऐसे होते जिनके ये सम्बन्धी होते थे - मुझे ये विश्वास नहीं होता - मालूम नहीं क्यों ! कई दोस्त ऐसे होते थे की 'सम्बन्ध' जोडने में बेजोड ! हम आज तक ऐसा सम्बन्ध नहीं जोड़ पाए :(
कितने बिहारी हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री में थे य है ये नहीं पता पर कुछ नाम याद है - कुमुद चुगानी , कुमकुम , शत्रु जी , अपने शेखर सुमन और नीतू ! शेखर सुमन का घर हमारे स्कूल के पास होता था सो उनसे एक अलग तरह का लगाव है - उनकी एक सीरियल आती थी - "वाह जनाब ! " - संडे को ! कभी मिस नहीं किया !
सुना है - सोनाक्षी बहुत मोटी थी - वजन कम कर के खुद को मॉडल बनाया ! पिछले साल जब वो लक्मे फैशन शो में आयीं तो मैंने "बिहार टूडे" पर प्रमुख खबर के रूप में छापा था ! अछ्छा लगा था और आश्चर्य भी !
"दबंग" में वो गाँव की घरेलु लडकी के रूप में आयेंगी - बस यह छाप ना रह जाए - कुछ अलग किरदार में रूप में भी वो नज़र आयें - हम सब यही चाहेंगे ! अपने से २२ -२३ साल बड़े कलाकार के साथ काम करना आसान नहीं है - अब इसको 'सोनाक्षी' ने कितना आसान बनाया है - यह परदे पर ही नज़र आएगा !

आगे वो 'बोनी कपूर' के बेटे 'अर्जुन' के साथ भी नज़र आयेंगी !

कुछ का कहना है - सोनाक्षी को देख 'रीना रॉय' की याद आती है :) - फिलहाल हम चुप रहेंगे :)
रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Saturday, August 28, 2010

मेरा गाँव - मेरा देस - भाग ११ ( काका )

जब से बाबु जी ने अलग घर गृहस्थी बसाई - बाबा एक काम हमेशा करते रहे - वो था गाँव से 'किचेन हेल्पर' भेजना ! अलग अलग उम्र के ! मालूम नहीं पिछले ३० साल में कितने आये होंगे और कितने कितने दिन रहे होंगे !

शुरुआती दिनों की याद है ..एक था 'धर्मेन्द्र' ! वो चौथी कक्षा तक पढ़ा था ! मुझे याद है - उसे पढने का शौक था - वो मेरी 'नंदन' और 'पराग' लेकर पढता था ! उसका बड़ा भाई दिल्ली में रहता था सो वो जल्द ही दिल्ली चला गया था ! हाल में ही कुछ वर्षों पहले मुझसे मिलने आया था - अब उसकी खुद की फैक्ट्री हो गयी है :) ढेर सारे फल - मेवा - मिठाई लेकर आया था ! अपने फैक्ट्री के बने हजारों के 'बाथरूम आईटम' के सामान मुझे दे गया की मै उसे अपने फ़्लैट में लगा लूँ - पर मैंने वापस कर दिया ! पटना के मेरे घर में बाथरूम आइटम उसकी फैक्ट्री के ही लगे हैं !

कई आते गए - जाते गए ! उन दिनो 'डिम्पल' चूल्हा होता था ! फिर गैस आया ! ३० दिन में वो सभी गैस का चूल्हा जलाना सिखाते और ३१ वा दिन भाग जाते ! हंगामा हो जाता ! कोई साइकील से रेलवे स्टेशन जाता तो कोई बस स्टेशन - कहीं खो गया तो ? फिर अगले ही सप्ताह 'बाबा' किसी को भेज देते ! अंतहीन सिलसिला था ! "छपरा" जिला वालों से घर का काम करवा लेना बहुत मुश्किल था !

एक घटना याद है - बाबु जी बड़ी मुश्किल से कुछ पैसे जमा किये थे - गोदरेज का अलमीरा खरीदने को - एक रात 'भूटिया' उन पैसों और माँ के गहने लेकर भाग गया ! वो एक अजीब सा 'झटका' था ! कई महीनो तक हम परेशान रहे ! खैर किसी तरह कुछ गहने वापस मिले लेकिन एक हीरे का कान वाला टॉप्स नहीं मिला !

सिलसिला यूँ ही चलता रहा ! फिर आयीं 'शांती दी' काफी उमरदराज और काफी कड़ीयल स्वाभाव की ! वो भी हमारे गाँव तरफ की ही थीं - पर काफी वर्षों से पटना में रहती थीं ! कुछ वर्षों तक रहीं फिर अधिक उम्र होने के कारण अपने बच्चों के पास चली गयीं - फिर उनकी कोई खोज खबर नहीं मिली !

फिर आये "काका" ! काका का पूरा 'टोला' हमारा 'आसामी' होता था ! इनके कई चाचा - बाबा हमारे बाबा के काफी विश्वासी होते थे ! काका के खुद के परिवार को हमारे तरफ से कुछ बीघे ज़मीन इस एवज में दिया गया था की वो 'दालान' में लालटेन जलाने का काम करते थे - इनका काम था - हर शाम "दालान" में ठीक वक्त पर "लालटेन" जला के टांग देना या शादी बियाह के मौके पर 'पेट्रोमैक्स" !

वक्त के साथ - ना तो वो "दालान" की वैभव रही और न ही हमलोगों में उतनी क्षमता की सब  का पेट पाल सकें ! सो 'काका' कलकत्ता चले गए - जूट मिल में कमाने ! शायद वहाँ उनको 'टी बी' हो गया ! वापस लौट आये ! शादी हुई पर पत्नी कुछ महीने के बाद मायके गयी तो वापस नहीं आयी - अब वो 'गाँव' के बाज़ार में 'कचरी- बचरी-पकौड़ी' बेचने लगे ! खैर ..बाबा के कहने और अपनी जमीन को बचाने के लिए वो हमारे पास 'पटना' आ गए ! उनके कई भाई - भतीजा हमारे परिवार के साथ गांव में थे सभी उनको 'काका' ही कहते तो हम लोग भी कहने लगे ! धीरे धीरे 'पटना' में उनका मन लगने लगा ! बाबू जी शाम थके हारे लौटते तो वो चाय बना के बाबु जी का देह दबाते ! बात बीस साल पुरानी है ! घर दरवाजा सब साफ़ करना ! घर का सारा काम अपने माथे ले लेते और फिर एकदिन अचानक वो 'गाँव' के तरफ मुह मोड़ लेते ! फिर एक सप्ताह के बाद वापस ! जितना २-३ महीना में कमाते उतना वो 'गाँव' में "पी" पा के खतम ! "पीने " के बाद शुद्ध हिंदी में वार्तालाप :))

बहन की शादी और मेरे 'नॉएडा' आने के बाद 'माँ - बाबुजी' की जिम्मेदारी उनके ऊपर ही थी ! एक और खासियत है - हमारे यहाँ मेहमान बहुत आते थे - वो ऐसा 'खाना' बनाते की कोई मेहमान ज्यादा दिन नहीं खा पाता :) नॉएडा आया तो - माँ हर ३-४ महीना पर उनको कुछ सामान के साथ भेज देती ! अब वो मेरे लिए 'हेडक' हो जाता ! काका को रिसीव करो - २-३ रुकेंगे तो उनकी विदाई करो फिर लौटने का खर्चा - पता चलता मुझसे कुछ और पैसा लेकर वो दिल्ल्ली से सीधे गाँव का रास्ता घर लेते :)

अत्यधीक खर्चीला ! सब्जी खरीदने के बाद पैसा वापस माँगने पर गुस्सा भी जाते हैं ! हाल में वो बहुत ही ज्यादा पीने लगे ! तंग आकार बाबु जी उनको मना दिया और बाबा को भी बोल दिया की अब किसी को भेजने की जरुरत नहीं है !

जुन में पटना गया तो 'काका' आये थे - फिर वही 'तमाशा' - पी के शुद्ध हिंदी ! घर में चचेरी बहन की शादी और पुत्र का जनेऊ और उधर 'काका' का शुद्ध हिंदी जारी :) खैर , मेरी पत्नी ने उनको थोडा बहुत समझाया और साथ में 'इंदिरापुरम' चलने को तैयार कर लिया ! सुबह सुबह ६ बजे ही नहा लेते हैं - पीते भी नहीं हैं - हाँ , दिन भर में ३०-४० गुटखा जरुर खा लेते हैं - मेरे लिए कभी कभी 'पान' भी ले आते हैं ! "चाय" इतना ज्यादा की ...पूछिए मत ! खाना ऐसा की ..मै बहुत स्लिम हो गया हूँ ;) हाँ , नॉन वेज वो बहुत पसंद से बनाते हैं ! रूठते भी बहुत हैं ! रूठने के बाद १-२ दिन खाना ही नहीं खाते हैं ! भारी फेरा हो जाता है :(

पत्नी कह रही थीं की जितना सरसों का तेल और घी एक साल में खर्च नहीं हुआ वो पिछले २ महीने में हो चूका है - खैर मुझे विश्वास नहीं हुआ ! खर्चीले हैं ..लेकिन विश्वासी :) घर में उनको कोई "तुम" कह के नहीं बुलाता है - सिवाय बाबा - बाबु जी के !

मालूम नहीं कितने दिन तक साथ रहेंगे - पर बच्चे और पत्नी खुश हैं :-|

रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Saturday, August 21, 2010

तनखाह .....

देश के 'संसद' की क्या हैसियत है ? अगर मै गलत नहीं हूँ तो शायद इससे शक्तिशाली कोई और दूसरी संस्था नहीं है - फिर वहाँ के लोग जिसमे से करीब ५२३ हमारे द्वारा ही दिए गए वोट से जीते जाते हैं , क्यों न एक बेहतर तनखाह लें ? जब 'हरी - हैरी और हरिया' भी मेट्रो में रह कर २-४ लाख झार लेता है फिर जिस संस्था के ऊपर पुरे देश की जिम्मेदारी है  अगर उसके सदस्य को पचास हज़ार मिल ही रहा है तो क्या गुनाह हो गया ?

एक छोटा सा सवाल है ? हम में से कितने लोग  संसद के दौरान 'लोकसभा टी वी या राज्यसभा टी वी ' देखते हैं ! मुझे जितना वक्त मिलता है - मै देखता हूँ और इसी दालान पर मैंने चौदहवीं लोकसभा में पटना के सांसद 'श्री राम कृपाल यादव' को सर्वश्रेष्ठ सांसद बोला था - बाद में उनको लोकसभा ने उनके कार्यों को देख सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान दिया था ! मैंने 'बाहुबली पप्पू यादव' को लोकहित में बोलते देखा हूँ !

जिस आदमी को राजनीति का क , ख , ग भी नहीं पता वो भी राजनेता को 'भ्रष्ट' बोल देता है ! आज के दिन में बिहार जैसे गरीब प्रदेश में भी 'विधायक' का चुनाव जितने लायक लडने के लिए कम से कम एक करोड चाहिए ! एक उम्मीदवार क्या करता है इन पैसों से ? जी , आपके और हमारे जैसे लोग बिना पैसे दिए वोट नहीं डालते ! फिर 'भ्रष्ट' तो हम ही हुए ! दस साल पहले तो इस तरह पैसा नहीं बहता था !

"लोकतंत्र" में सबसे शक्ती शाली जनता होती हैं ! अगर ऐसा नहीं होता तो एक चपरासी का भाई - बेटा किसी प्रदेश पर २० साल तक राज नहीं करता ! अगर ऐसा नहीं होता तो इंदिरा गाँधी जैसी शक्तिशाली नेत्री चुनाव नहीं हारती !

 बहुत कम ऐसे 'लोकप्रतिनिधि' हैं जिनके बाल बच्चे आपकी तरह एक 'एम एन सी ' की नौकरी करते हैं ! उनका बचपन और जवानी दोनों बर्बाद हो जाता है ! अगर वो थोडा खुद के लिए ले ही लिया तो इतना हंगामा ? आप और हम 'बेईमान' रहे और सामनेवाला 'ईमानदार' क्योंकि उसने 'समाज सेवा ' का प्रण लिया है ! इट्स नोट अ फेयर गेम !

देखिये , पैसे की जरुरत अब सबको है ! अगर आप उचित तनखाह नहीं देंगे फिर उसकी नज़र आपके 'तिजोरी' जायेगी ही जायेगी - आप कुछ नहीं कर सकते ! 'पावर' से पेट नहीं भरता ! आज जिसको 'कम्यूटर' का थोडा भी ज्ञान है वो ४०-५० पा लेता है ! फिर , 'लोकप्रतिनिधि' के साथ ऐसा व्यवहार क्यू ? भूखे पेट वो आपके लिए कितना सोचेगा ? इंसान है - उसके भी बाल बच्चे है - कुछ इधर उधर की सोचेगा ही ...!

यही हाल 'अधिकारिओं' के साथ भी है - आप संघ लोक सेवा आयोग के द्वारा सबसे तेज लोगों को चुनते हैं और उनको देते हैं क्या ? और समाज उनसे अपेक्षा रखता है की वो अपने पद के अनुसार जीवन शैली रखें ! अगर कोई 'सिविल सर्वेंट' यह घोषणा कर दे की वो जीवन में कभी घुस नहीं कमाएगा - उसके यहाँ कोई अपनी बेटी का बियाह नहीं करेगा ! इसका सिर्फ और सिर्फ एक ही वजह है की - कम तनखाह !

कल रवीश की रिपोर्ट देख रहा था - एक शिक्षक की शिकायत बच्चे कर रहे थे ! अब पांच हज़ार में आप कैसा 'शिक्षक' चाहते हैं ? इससे ज्यादा तो मेरे फ़्लैट के सामने 'गुटखा' बेचने वाला कमा लेता है ! 

अब किसी पेशा में इज्जत नहीं है ! एक जमाना था - जब लोग पूछते थे की आपको कितना पढ़े लिखे हैं - अब पूछा जाता है 'कितना माल' ( पैसा ) है ? यह दबाब कौन पैदा कर रहा है ? बचपन याद है - पटना के विधायक क्लब जाता था - बाबा के ३-४ दोस्त मंत्री - विधायक हुआ करते थे ! वहाँ 'टोनी' जी से दोस्ती हो गयी ! उनके पास गाड़ी होती थी - वहीँ बगल के फ़्लैट में 'पालीगंज' के विधायक रहते थे ! टोनी जी के यहाँ भीड़ होती थी - 'पालीगंज' के विधायक के यहाँ कोई नहीं ! "समाज भी चाहता है की आप झमका कर रहे" ! आज नेता बोले तो ..एक बड़ा गाड़ी ..२-४ चेला चपाती ...कौन देगा खर्चा ? बिना चेला चपाती वाला को आप नेता भी नहीं मानेंगे !

कल शाम बगल के 'शिप्रा मॉल' में चला गया ! एक राज्यसभा सांसद दिख गए - अपनी पत्नी के साथ थे - मै अपने दो दोस्त के साथ ! मैंने 'राज्यसभा सांसद' को अभिवादन किया और रुक कर उनकी पत्नी से उनके बच्चों की पढाई - लिखाई के बारे में पूछने लगा ! फिर वो लोग बाहर निकल गए और मै उनको गाड़ी तक छोडने आ गया ! मेरे दोनों दोस्त थोडा परेशान हो गए - बाद में पूछा - कौन थे ये लोग ? मिने बोला एक संसद सदस्य - वो चौंके - विश्वास नहीं होता - बिना वजन वाला संसद सदस्य होगा - वरना ऐसे ही बिना 'चेला चपाती - सुरक्षा ' का कोई कैसे चलेगा ? यह सवाल ऐसे लोग कर रहे थे - जो बिहार के सबसे बढ़िया इंजिनीअरिंग कॉलेज से पास एक बेहतरीन कंपनी में नौकरी कर रहे हैं - फिर बाकी की जनता तो अपने 'प्रतिनिधि को अवश्य की "शक्तिशाली" और 'झमकते' हुए देखना चाहेगी !

फिर 'बाज़ार' में  झमकाने  के लिए - पैसा चाहिए - अगर संविधान उनको नहीं देगा तो अवश्य ही उनकी नज़र 'तिजोरी' पर रहेगी ! यह मनुष्य का स्वभाव है !


खैर ..बहस जारी रहेगा ...

"दालान" से

रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Friday, August 13, 2010

शुक्रिया दोस्तों ....

तीन साल से 'ब्लॉग' लिख रहा हूँ ! जो दिल में आया - बस लिख दिया ! कुछ भी सोचा नहीं ! कई 'पोस्ट' लिखते वक्त आँखों से आंसू भी आये - कई में इतनी हंसी आयी की 'हाथों' से चाय गिरते गिरते बचा ! कई 'पोस्ट' बहुत बकवास तो कई दिल के बहुत ही करीब ! कई तो गुस्से में लिखे हुए हैं !

याद है - पोस्ट लिखते ही सबसे पहले 'सर्वेश भाई' को बताता था - बंगलोर में रहते हैं ! वो तुरंत 'ब्लोग्वानी' में  'वोट' दे दिया करते :) कभी उनका मूड हुआ तो "बूथ छाप" दिया करते और मेरा 'पोस्ट' "स्टार" हो जाता और ढेर सारे लोग आ कर पढते ! :) अगर "संजय भैया " ऑनलाईन हुए तो वो भी "वोट" दे दिया करते ! फिर मै अपने ब्लॉग का खुद से प्रचार करता ! सर्वेश भाई और संजय भैया तो यहाँ मेंबर भी हैं - "दालान" उनका कर्ज़दार है और रहेगा !!

इधर "फेसबुक" में मेंबर बना ! देखते देखते कई अन्जान लोगों से परिचय गया ! "पत्रकारों" को बहुत इज्जत देता हूँ सो बहुत सारे पत्रकार दोस्त बन गए पर वो मेरा "ब्लॉग" नज़रंदाज़ करते हैं - खैर , यह उनकी अपनी मजबूरी है ! पर , फेसबुक पर कई लोग यूँ ही टकरा गए और अच्छे दोस्त बन गए - "गप्पी हूँ" सो दोस्त तो बनेंगे ही ! दोस्ती की क़द्र करता हूँ - पर ये सोशल नेटवर्किंग साईट पर "विश्वास" जल्द नहीं बनता - पर जो कुछ भी विश्वास बना या बनाया - उसकी 'क़द्र' करूँगा - विश्वास कीजिए :)  हाल में ही किसी ने कहा - आपका 'ब्लॉग' नहीं आया तो उनके कहने पर 'फैशन' पर लिख दिया ! १-२ दिन गायब रहने पर लोग पूछते भी है - आप कहाँ हैं ? मालूम नहीं ये कैसा 'बंधन' है ?  अहमद भाई हमेशा कहते हैं - कोई उपन्यास लिखो या ब्लॉग को प्रिंट करवाओ - पैसा मै दूँगा :) उनसे कभी नहीं मिला हूँ - जब भी दिल्ली आने का होता है - पूछते हैं - कुछ तुम्हारे लिए लाना है ?? कई लोग मिले ....
इधर मई से कॉलेज में थोडा काम कम हो गया था सो समय पूरा था - जम के फेसबुक का मजा लिया ! "मेरा गाँव - मेरा देस"  सीरीज शुरू किया - लोगों ने पसंद किया ! कई तरह के कम्मेंट लोगों ने व्यक्तिगत ढंग से मुझे दिया - एक ने कहा 'मै "मासूम सामंत" की तरह लिखता हूँ और हूँ भी :)
"मेरा गाँव - मेरा देस" के पहले पोस्ट पर 'फेसबुक' पर विनोद दुआ साहब का कम्मेंट आया - "आप बढ़िया लिखते हैं - लिखते रहिये " ! यह एक सपना की तरह था ! आम इंसान हूँ - जिस पत्रकार को बचपन से देखता सुनता आया - वो अगर कुछ मेरे जैसे आदमी को जिसका पेशा यह सब नहीं है - कुछ कहे तो सचमुच बहुत बढ़िया लगा ! अगर फेसबुक नहीं होता तो शायद ऐसे लोग से कभी मिल नहीं पाता !
आज सुबह एक दोस्त ने कहा 'दिल खोल' कर लिखता हूँ ! अछ्छा लगा ! साहित्य को दसवीं के बाद कभी पढ़ा नहीं - पर यह समझ कैसे पैदा हो गयी - पता नहीं ! घर में वैसा माहौल नहीं था - हाँ ननिहाल में था ! पर जब से थोड़ी बहुत समझ आयी - तब से ननिहाल नहीं गया ! माँ ने हिंदी और संगीत की पढाई की है पर उनसे हिंदी कभी नहीं सीखा ! हाँ , बचपन में "डा० वचन देव कुमार' की निबंध भाष्कर ही पढता था ! याद है कुछ महीने - पटना आया तो मकान मलिक मलिक के छत पर एक बड़ा सा ट्रंक था - जिसमे हिंदी की कई उपन्यास रखे हुए थे - सब के सब २-३ महीने में ही चट  कर गया ! शिवानी - अमृता प्रीतम , ओशो और ना जाने कितने लोग ! मुंशी प्रेमचंद को बहुत कम पढ़ा हूँ पर 'फणीश्वर नाथ रेणु' पसंदीदा रहे पर वो भी आठवीं - नौवीं तक ही ! बंगलौर में नौकरी कर रहा था तब 'आचार्य चतुरसेन ' की उपन्यासों से मुलाकात हो गयी ! अब हाल के दिनों में फिर से एक बार ढेर सारे हिंदी ऊपन्यास खरीद लाया हूँ ! पढ़ना है :)

पर मेरे लिखने का सारा श्रेय "श्री संजीव कुमार रॉय" को जाता है - जिनसे यूँ ही इन्टरनेट पर टकरा गया और वो मेरा लिखा हुआ कुछ पढ़े फिर मुझे हमेशा प्रोत्शाहित किये ! उनसे भी कभी नहीं मिला - पर ७-८ साल से परिचय है - फेसबुक पर हर रोज मुझे पढते हैं :) मैंने उनका नाम 'जतिन दीवान' रखा हुआ है ;) पहले वो 'सिंगापूर' में थे जहाँ उन्होंने 'BIJHAR GROUP' बनाया - अब वो अपनी बहुत बड़ी कंपनी के 'ग्लोबल मैनेजर' बनके Bay Area , SFO , CA चले गए हैं ! भैया , जब भी कुछ लिखता हूँ - आपको याद जरुर करता हूँ :) , कैसे हैं ?

शायद आने वाले सोमवार से थोडा कम समय मिले पर अदा कदा 'ब्लॉग' लिखना जारी रहेगा - अभी तो बहुत सारी यादें लिखनी हैं :)

चलिए ..एक गीत सुनते हैं और स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं और देखते हैं - लाल किला के प्राचीर से 'मनमोहन सिंह' क्या बोलते हैं :)







रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Sunday, August 1, 2010

मेरा गांव - मेरा देस- मेरे दोस्त - भाग १०

आज कई दोस्त याद आये ! गांव से लेकर दिल्ली तक ! 
बचपन में 'गोतिया / पट्टीदार' के भाई - चाचा जो हमउम्र थे उनसे बड़ा ही लगाव था ! उनमे 'पुरुषोत्तम भाई ' खास थे ! अगर पास में एक भी बिस्किट हो तो पुरुषोत्तम भाई से बाँट कर ही खाता था ! उनके पिता जी उछ विद्यालय में शिक्षक थे और साथ ही साथ कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ! स्नातक के बाद पुरुषोत्तम भाई ने दिल्ली में कल कारखाना खोला था पर पिता के अचानक देहांत के बाद वो वापस बिहार चले गए ! अभी भी वहाँ वो अपनी क्षमता के हिसाब से एक उद्दमी हैं और एक शिक्षक भी ! सपरिवार छपरा में रहते हैं ! अब पुरुषोत्तम भाई से शादी विवाह में ही मिलना होता है ! स्नेह और प्रेम आज भी है - एक आदर भी ! मुझसे १-२ महीने के बड़े होंगे और दिखने में  बेहद स्मार्ट :) 

सर गणेश दत्त पाटलिपुत्र हाई स्कूल में नामांकन के बाद - बेंच पर हम ४ जाने थे ! वहीँ दोस्ती हुई 'मृत्युंजय' और 'दीपक अग्रवाल' से ! मृत्युंजय थोडा पढ़ाकू टाईप था पर 'तेज' मै ही कहलाता था ! दीपक अग्रवाल बहुत ही तीक्ष्ण बुध्धी का था - आज वो बहुत ही बड़ा 'लोहा' का व्यापारी हो गया है ! दस साल पहले मुलाकात हुई थी - मालूम नहीं कहाँ है ? :(  मृत्युंजय डॉक्टर बन गया - घस्सू :)) सुना है विदेश में है ! कई साल तक हमदोनो में बात चीत बंद रही - हाल में ही मुलाकात हुई थी - मै ठहरा मुहफट - बोल दिया - 'डागडर बाबु' जैसा नहीं लग रहे हो :)) बहुत मेहनती ! 

डॉक्टर कॉलोनी - कंकडबाग में रहता था - वहीँ सामने पत्रकार नगर में एक दोस्त होता था - प्रमोद ! बहुत शरीफ ! हर शाम हम दोनों मिलते थे ! वो अपने चाचा के यहाँ रहता था ! भूरी आँखें वाला प्रमोद ! बड़ा भोला था !  पैसे की तंगी होती थी - पर कभी नहीं माँगा ! मैट्रीक के बाद हम नालंदा मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर कॉलोनी चले गए और विज्ञानं मेरा विषय हो गया और वो आर्ट्स ले लिया ! १८-१९ साल हो गए उससे मिले - मालूम नहीं कहाँ है ? शायद उसके पिता जी नहीं रहे ! 

पटना आने के बाद की एक घटना  याद है - जिस घटना ने मुझे "दीपक कुमार " से जोड़ दिया ! स्कूल के एक शिक्षक होते थे - राजेंद्र बाबु ! बहुत टेढ़े और बेवजह के सिद्धांतवादी ! खैर , हम उनके यहाँ पढने गए ! वहीँ दीपक से मुलाकात हुई ! पढने के दौरान हमदोनो ने कुछ ऐसी 'बदमाशी' की - 'राजेंद्र बाबु ' को हम दोनों को - तडीपार करना पड़ा ! वैसे तो दीपक दूसरे सेक्शन में था ! धीरे धीरे हम दोनों बहुत ही गहरे दोस्त हो गए ! बिलकुल भाई की तरह ! स्कूल के बाद - + २ के ज़माने में हम दोनों की जोड़ी बहुत फेमस हुई ! मेरे सारे रिश्तेदार उसको पहचानने लगे और लगभग सभी पारिवारिक मित्र  भी ! हम दोनों दिखने में भी एक जैसे थे - कई लोग कन्फ्यूज भी कर जाते ! मै जितना आलसी वो उतना ही फुर्तीला ! 'स्पीड' उसे पसंद थी ! तेज इतना की किसी के पल्ले न पड़े ! उसका छोटा भाई था 'प्रकाश कुमार' - हमारे स्कूल का टॉपर - एक बैच जूनियर ! दोनों भाई झगड़ते और जिधर मै जाता उसका पाला भारी हो जाता ! हमारे घर का हर सदस्य उसको मुझ से कम महत्त्व नहीं देता ! 

उसकी सगाई के दिन मै इतना भावुक हो गया था की - खुशी से आँखों से सावन भादो निकलने लगे ! अब वो 'रांची' में बहुत ही बड़ा व्यापारी हो गया है ! उसका छोटा भाई भी ! दीपक का छोटा भाई मेरा हमउम्र है - साल में एक दिन फोन करता है - मेरे जन्मदिन पर ! दीपक को जब जरुरत पडती है तब - बड़े हक से बोलता है ! हाल में ही मेरे 'पिता जी ' रांची गए थे - रेलवे स्टेशन पर न जाने कितनी गाडीओं से स्वागत किया ! बाबु जी कह रहे थे बहुत बड़ा और आलिशान कोठी जिसमे कई करोड के लकड़ी लगे हैं ! दिल्ली जब भी फुर्सत में आता है - मेरे यहाँ ठहरता है ! जिंदगी में बहुत 'रिस्क' लिया शायद मै नहीं ले  सकता था ! हाल में ही हम दोनों एक साथ एक ही रंग के टी शर्ट ख़रीदे और खूब घुमे :) उम्र में बड़ा है - एक दो साल सो - मेरे घर में उसको वैसा ही आदर भव मिलता है - मुझे हंसी भी आती  है :) 

क्योंकी मै दोस्ती को बहुत ही ज्यादा क़द्र करता हूँ - कभी हल्का सा भी ठेस पहुँचने पर 'बौखला' जाता हूँ - याद है - किसी कारणवश - मै गुस्सा में था - +२ का समय था - दीपक पर हाथ उठा दिया - बाए हाथ से - बीच वाली उंगली टूट गयी और शायद आज तक टूटी हुई है - हर सुबह दीपक को याद करता हूँ :) वो भी मेरे जैसा ही 'शानी' है - पर मुझसे पिटता रहा ! "

कॉलेज में भी  कई दोस्त हुए ! मुझे छोड़ लगभग सभी 'कंपनी' में काम करते हैं ! 'डॉलर' से भरे पड़े हैं ! मिलते हैं  तो 'नयी गाड़ी - नया मकान - नयी घड़ी ' के सिवा कोई और बात नहीं होती ! साल में छः महीने अमरीका - एरोप रहते हैं ! हमसे कम ही पढ़े लिखे हैं ;) अधिकतर तो आस पास ही रहते हैं - पर अब मिलना जुलना थोडा कम सा है ! शिकायत करो तो - कहेंगे - कंपनी ने गदहा बना दिया है ! हाँ , बच्चों के जन्मदिन पर मुलाकात होती है - जहाँ अधिकतर मै ही छाया रहता हूँ ! बहुत सारे - फेसबुक पर भी है - पर मेरे प्रोफाईल पर डर से या जलन से कुछ नहीं लिखते ;) बहुत सारे विदेश में जा बसे ! 

हाँ , जब हम सब अकेले होते हैं तो .....गर्मी की छुट्टी या बड़ा दिन में तो ....जम के मुलाकात होती है :)) 

खुशी होती है ..पुराने पन्नों को झांकने में - सभी दोस्त 'खुशमय' जिंदगी बसर कर रहे हैं - और क्या चाहिए ? 

कुछ नए मित्र भी बने हैं - पर जो दोस्त जितना पुराना ..उतना ही कीमती ...... 

रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Sunday, July 25, 2010

मेरा गाँव - मेरा देस- "फैशन" - भाग नौ

अभी हाल में ही एक 'धनी व्यापारी' दोस्त के साथ एक पांच सितारा होटल में आयोजित फैशन शो में गया था - भारत के एक मशहूर 'फैशन डिजाइनर'' को बात ही बात में मैंने 'दर्जी' बोल दिया और मामला बढ़ गया - क्योंकि उसने बहुत पी रखी थी - हुआ हंगामा और मै चुपके से दोस्त की बड़ी लंबी गाड़ी में जा बैठा :)

खैर चलिए - फैशन की बात करते हैं ! बचपन की बात है - रेडीमेड का जमाना नहीं था ! मुजफ्फरपुर के मोतीझील के बंका मार्केट में पिता जी के स्कूल ज़माने के एक दोस्त हुआ करते थे - जो कुछ वो सील दिया करते - हम लोग पहन लेते ! वो जमाना  "बेलबॉटम" का था ! "मामा-चाचा" टाईप आइटम  'बेलबॉटम' पहनते थे ! नीचे 'मोहरी' में चेन लगा हुआ ! ऐसा लगता की सड़क सफाई के लिए बना है !  कुत्ता के कान की तरह वाला शर्ट का "कॉलर" और छींटदार कपड़ा - "बॉबी प्रिंट" ! बेलबॉटम उनीसेक्स था - महिलाएं भी पहनती थी - "नीतू सिंह" टाईप !

फैशन की समझ "नौवीं" कक्षा में आया - तब के साल में दो बार "कपड़ा" जरुर खरीदा जाता था - "होली और छठ" में ! कंकडबाग में एक दूकान होता था - सुशवी ! वहाँ आया हुआ था - "स्टोन वाश" - मै पुरे पटना में पहला आदमी हूँगा जिसने "स्टोन वाश" ख़रीदा होगा :) घर आया तो बाबु जी बोले " ऐसा कपडा पहनोगे तो कुत्ता भौंकने लगेगा " !

तभी के समय फैशन आया था - मिथुन चक्रवर्ती स्टाईल 'बिना कलम का बाल " और फूल पैंट में आगे कोई पौकट नहीं ! एक चाचा थे - जो "बीरगंज" से "हारा का जींस" खरीद लाते - मै भी एक बार उनके साथ लटक कर 'बीरगंज' जा पहुंचा और पहली बार विदेशी जींस पहनी !

+ २ में गया तो "क़यामत से क़यामत" तक आयी ! उस वक्त एक लहर आया ' काला पैंट और पीला शर्ट " का ! जिसको देखो वही पहन रखा है ! मैंने कभी नहीं पहना ! फिर आया "बैगी पैंट " का जमाना ! कंकडबाग वाला "सुशवी" दूकान वाला तब तक मुझे पहचान लिया था - और फिर एक बार उसने मुझे 'बैगी' थमा दिया ! मुझे चेक बैगी पैंट में देख पिता जी के एक दोस्त बोले  "क्या तुमने अपने बाबु जी का पैंट पहन रखा है  ? " बड़ी हंसी आयी थी :)

सफारी सूट बहुत पोपुलर होता था - यह ड्रेस बैंक अधिकारिओं के लिए डिजाईन किया गया था - पर यह शादी विवाह में बहुत पोपुलर हो गया - जो शादी में "सूट" नहीं सिलवा पाता वो 'सफारी सूट" जरुर सिलवाता - और धीरे - धीरे सफारी का पैंट की जगह 'लूंगी' ले लेता था :) बड़ा ही बेजोड कम्बिनेशन था ;) स्सफारी सूट और हाथ में एक ८ इंच का कला बैग - भर मुह पान - पतली मुछ ;)
तभी के समय मैंने कुछ जबरदस्त 'कॉटन' के बहुत सारे  ढीले शर्ट ख़रीदे थे ! टाईट जींस - खूब ढीला - स्टार्च डाल के आयरन किया हुआ - शर्ट और बी एन कॉलेज के सामने से खरीदा हुआ बीस रुपईया में 'गॉगल्स' - साथ में दोस्त का माँगा हुआ 'इंड सुजुकी' ! ऐसा लगता था की 'पटना के असली राजकुमार' हम लोग ही हैं - अब बड़ी हंसी आती है ;) वैसे मेरी साईकिल भी बड़ी डिजाईनदार होती थी !

स्नातक में गया तो वहाँ भी फैशन जारी रहा - पर मैंने कभी भी अपने जूता में घोडा का नाल नहीं डलवाया ;) कभी हाई हील जूता या खूब नुखिला जूता नहीं पहना ! पर मित्र मंडली में ऐसे लोगों की कमी नहीं थी :) बंगलौर के 'विअर हॉउस' के सेल्समैन भी पहचानने लगे थे :) एक खासियत थी - फैशन के वावजूद - ड्रेस का सोबरनेस कभी नहीं गया ! स्नातक के दौरान ही ' एरो और लुईस फिल्लिप ' टेस्ट लगा जो आज तक कायम है ! १० साल से 'विल्स' पसंदीदा है ! अपने कपड़ों को बड़े ही सहेज कर रखता हूँ - मौका मिले तो खुद हाथों से धोता हूँ और आयरन भी करता हूँ :)

"यूँ ही कुछ कुछ लिख दिया हूँ - ज्यादा गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है "

रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Friday, June 11, 2010

मेरा गाँव - मेरा देस - भाग आठ

आखिरकार वो कैसी घड़ी रही होगी - जब मोहनदास करमचंद गाँधी - सूट बूट में - चमड़े की सूटकेस और अंग्रेजों की चाबुक ! बैरिस्टर साहब की जिंदगी बदल गयी ! उस वक्त 'ब्लॉग' नहीं होता था - वरना वो अपनी बेइज्जती 'ब्लॉग' पर उतार शांत हो जाते ! खैर ...

क्षेत्रीयता क्या है ? जिंदगी की कुछ घटनाएँ याद हैं ! बात करीब १९८० की रही होगी ! मेरे गाँव में रेलवे स्टेशन नहीं था तो बाबा ने तत्कालीन सांसद स्व० नगीना राय को पत्र लिखा ! उन्होंने ने मदद किया और ५-६ साल में रेलवे विभाग ने एक 'हॉल्ट स्टेशन' पारित कर दिया ! पूरा गाँव खुश था ! पर एक दिक्कत आ गयी - बगल के गाँव वाले उस स्टेशन का नाम अपने गाँव पर रखना चाहते थे - जब यह नहीं हो पाया तो वहाँ के सब से बड़े आदमी ने कुछ 'पैरवी' लगा कर अपने दादा - परदादा के नाम पर 'स्टेशन' का नाम रख दिया ! दोनों गाँव में "आग लग गयी" ! जिनके नाम ये स्टेशन रखा गया - वो भी हमारी जाति के थे - पर यहाँ 'क्षेत्रवाद' उभर कर आ गया ! बाबा चुप थे ! आँखें नाच रही थी ! स्टेशन का उदघाटन का दिन आ गया ! 'तनाव' चरम सीमा पर थी ! उनलोगों ने किसी बड़े आदमी को बुला रखा था - उदघाटन के लिए ! और हमारा गाँव इस जीद पर अडा था की - स्टेशन का 'उदघाटन' मेरे बाबा ही करेंगे ! खैर , पहली ट्रेन रुकी और बाबा की उपस्थिती में स्टेशन चालू हुआ ! उस गाँव के लोग जो हमारी जाति ही नहीं एक गोत्र के भी थे - उनसे 'नेवता - पेहानी' काफी दिन तक बंद रहा !

कहाँ गया 'जातिवाद' ???

दूसरी घटना याद है ! मेरे गाँव में एक बहुत बड़ा "पोखर" है ! पूर्वजों ने उसको एक ब्राह्मण को दान दे दिया था ! वो ब्राह्मण नाव्ल्द हो गए ! उनके मरने के बाद उनकी पत्नी अपनी मायके रहने लगी ! बगल के गाँव में एक आदमी 'ठिकेदारी' से बहुत पैसा कमाया और उस विधवा से जमीन अपने नाम करवा लिया ! क्योंकि , वो पोखर करीब २०-२५ एकड़ में था सो मछली उत्पादन और आय का बहुत श्रोत हो सकता था ! पर एक दिक्कत थी - ब्राह्मण के नहीं रहने के हालत में - वो पोखर धार्मिक कामो में प्रयोग होने लगा और माल मवेशी को नहाने धुलाने में ! हिंदू वहाँ 'छट पूजा' करते थे ! पोखर के पछिम दिशा में बाबा ने मुसलमानों को बुला उनसे चंदा दिलवा - एक छोटी मस्जिद भी बनवा दी ! 'दान' दी हुई चीज़ थी - सो परिवार में किसी को कभी कोई लालच नहीं हुआ - अब वो पुरे गाँव का हो गया था ! पर , ठेकेदार एक दिन मछली मारने पहुंचा ! 'मेरा पूरा गाँव' हल्ला बोल दिया ! कागज़ी तौर पर वो मजबूत था - पर गांव को ये मंजूर नहीं था ! कोर्ट - कचहरी शुरू हुआ ! गाँव के हर घर पर उसकी आमदनी के अनुसार चंदा बाँध दिया गया ! सभी मंजूर कर लिए ! और ये 'मुकदमा' हारते - जीतते अंततः "पोखर" सार्वजनिक घोषित हुआ !

मैंने समाजशास्त्र किसी किताब में नहीं पढ़ी है ! १९८७ के बाद शायद की कोई किताब इन विषयों की पढ़ी हो ! पर , समाज के साथ रहा हूँ - पला बढ़ा हूँ , सो जो महसूस करता हूँ - लिखता हूँ !

मनोविज्ञान को भी नहीं पढ़ा ! पर इसी छोटी उम्र में हजारों लोगों से मिल चूका हूँ ! लोग किस किस अवस्था में कैसे सोचते हैं - पता है ! 

मैंने पहले भी कहा है - मंगल ग्रह पर कोई भी आदमी 'पृथ्वी' का अपना लगेगा ! अमरीका में बैठा 'पाकिस्तानी' करीबी लगेगा ! बंगलौर में 'यू पी ' वाला भाई लगेगा ! दिल्ली में 'बिहार के किसी भी जिले' का कोई भी अपना लगेगा ! बिहार में अपना जिला वाला प्यारा लगेगा ! अपने जिला में अपना गाँव वाला सब से नजदीकी होगा ! अपने गाँव में अपना घर वाला सब से निकट का महसूस होगा ! और परिवार के अंदर - अपनी बीवी - बाल बच्चों के हित में सोचूंगा और बीवी से झगडते वक्त - अपनी दलील पर कायम रहूँगा :)

इन्ही शब्दों के साथ ....

रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Sunday, June 6, 2010

मेरा गांव - मेरा देस - ( सिनेमा - सिलेमा ) भाग सात

अभी अभी 'प्रकाश झा' की "राजनीति" देख लौटा हूँ ! शाम को फेसबुक पर बैठ - इस कोठी का चाऊर उस कोठी कर रहा था - तब तक एक मित्र ने फोन कर दिया की - 'सिनेमा चलना है - फिर क्या था :) झटपट जींस चढ़ाया - एक सफ़ेद टी पहना और चल दिया - घर के बिलकुल पास में ही 'शिप्रा मॉल' है ! खैर , मनोज वाजपेयी बेहतरीन दिखे ! ज्यादा क्या लिखूं ? बहुत लोग हैं - लिखने वाले ! चलिए आपको अपने युग में ले चलता हूँ :)

हलकी याद 'एक फूल दो माली' की है ! पर उस ज़माने में 'मध्यम वर्ग' फिल्म्ची होता था ! मुजफ्फरपुर में उस ज़माने में 'राजा हरिश्चंद्र' लगा था - बड़े बाबा को छोड़ हम सभी गए थे ! इस सिनेमा का प्रभाव और बाबु जी के डान्ट ने मुझे 'झूठ' बोलना छुडवा दिया :) बात १९७९ की रही होगी ! मुजफ्फरपुर में एक बहुत बड़ा सिनेमा हॉल बना था - " जवाहर पिक्चर पैलेश" - उसमे एक साथ - दो सिनेमा हौल होते थे - जवाहर डिलक्स और जवाहर मिनी - किसी बड़े व्यापारी ' राम उदार झा जी' का था ! उस सिनेमा हॉल की - पहली पिक्चर थी - " दुनिया मेरी जेब में " :) इंटरवल में जब 'ठंडा' बेचने वाला 'ओपनर' से सभी बोतलों पर आवाज़ निकलता था - मन ललच जाता था :) एक चाचा की शादी हुई थी - हर सफ्ताह सिनेमा का प्रोग्राम बनता था - बाबु जी के कई ममेरे - फुफेरे भाई बहन भी वहीँ साथ में रहते थे ! किसी को साइकील से दौड़ा दिया जाता था - टिकट कटा कर रखना ! सुबह में ही मोहल्ले के रिक्शा वाले को बोल दिया जाता और वो सिनेमा शुरू होने के एक घंटा पहले रिक्शा लगा देता था - माँ - फुआ - चाची लोग रिक्शा पर और हम बाबु जी के 'लैम्ब्रेटा' पर :)
सिनेमा खत्म होने के बाद - मन भारी हो जाता - कई सिनेमा तो सो कर ही निकाल दिए ! बाहर आते ही - सिनेमा के गाना का 'किताब' मिलता था !
एक दूर के फूफा जी होते थे - उनका टेंट हॉउस होता था - सो उनको सिनेमा हॉल वाले 'पास' देते थे ! धीरे - धीरे बाबु जी सिनेमा कम जाने लगे और हम सभी मुफ्त का 'पास' का आनंद उठाने लगे ! मेरा एक पसंदीदा स्वेटर होता था - 'मुकद्दर का सिकंदर' देखते वक्त 'हॉल' में ही छूट गया ! क्रांति आयी थी - ओफ्फ्फ ...कितना भीड़ था ..'शेखर टॉकिज' में ! ९ बजे वाला शो ११ बजे शुरू हुआ ! रात दो बजे हम सभी लौटे थे ! कभी कभी इतवार को "एक टिकट में दो शो" का भी ओफ्फर आता था ! हम ये अवसर कभी नहीं पा सके :(  उस वक्त की कई सिनेमा याद है - त्रिशूल , एक दूजे के लिए , दोस्ताना , जुदाई , लव स्टोरी और मालूम नहीं कितने !

एक दिक्कत और थी ! गाँव से कोई भी आता - वो शाम को गायब हो जाता - बाद में पता चलता की वो 'सिलेमा' देखने गया था :) एक दो सिनेमा ऐसे लोगों के साथ पर्दा के सबसे पास वाले सीट पर भी बैठ कर देखा है ! ब्लैक में टिकट लेना कभी शर्म तो कभी शान हुआ करती थी :) हमारे यहाँ "डी सी , बी सी , फर्स्ट क्लास , सेकंड और थर्ड क्लास होता था !

पटना आया तो - "उमा सिनेमा " के ठीक पीछे "नाना जी" का घर था ! रात में मामू जान लोग के साथ - शो मार दिया करता ! फिर कंकरबाग आया तो - "वैशाली" ! कई पुराने सिनेमा "वैशाली" में देखा - आरज़ू , दिल ही तो है और मालूम नहीं कितने और :) 

नौवीं में चला गया - दोस्तों ने जोर दिया - अमित जी का 'गिरफ्तार' आ रहा है - टिकट का इंतज़ाम हो जायेगा - चलना है ! किसी तरह "माँ" को मनाया - माँ ने बाबु जी को मनाया फिर बाबु जी ने माँ को हाँ कहा - माँ ने मुझे हाँ कहा तब जा कर 'मै' बड़ा हुआ और दोस्तों के साथ 'सिनेमा' देखा :)

टी वी भी आ चूका था ! सिनेमा की जरुरत भी कम हो गयी थी ! + २ में गया तो दोस्तों के साथ - एक ही स्कूटर पर पांच लोग सवार होकर 'मोना' का मोर्निंग शो देखने गए थे ! एक ने सिगरेट जला ली - कश पर कश दिए जा रहा था - मुझे बार बार अपने पिछडेपन का एहसास होता :(  खैर इसी बीच आ गए -"आमिर खान" साहब और "सलमान खान" - "क़यामत से क़यामत" करीब ८ बार तो जरुर देखी होगी ! ३-४ बार .."मैंने प्यार किया" ! इन दोनों सिनेमा का कैसेट भी खरीदाया ! अब के दौर में - वी सी आर - आने लगा ! वी सी आर - दहेज का प्रमुख आइटम हो गया ! "विडियो कोच" की इज्ज़त और डिमांड बढ़ गयी !

स्नातक में गया तो .. :) हर परीक्षा के तुरंत बाद पूरा का पूरा बैच 'सिनेमा हौल' में ! जिन दोस्तों की गर्ल फ्रेंड होती - वो हमें चिढाने के लिए  जरुर आते :(  सड़ा - गला किसी भी तरह का सिनेमा - पूरा हॉल 'धुंआ' से भर जाता ! आमिर - सलमान - शाहरुख को देखते देखते स्नातक गुजर गया ! कभी कभी मेस के टेबल पर ही सिनेमा का प्लान बन जाता :) दोस्तों के कमरे में 'बॉलीवुड' के पोस्टर लगने लगे ! 'फिल्म फेयर , मूवी ' सिनेब्लित्ज़ , स्टार डस्ट् और मालूम नहीं क्या क्या ...जैकी चान की आदत भी अभी ही लगी थी ! सिनेमा के गाने के कैसेट आदान - प्रदान होने लगे :)

बंगलौर में नौकरी करता था - इतवार को 'तेलगु - तमिल' कोई भी सिनेमा देख लेता ! वहाँ का पब्लिक सही है - एकदम मस्त ! संतोष सिनेमा हौल सब से प्रिये था ! एक शायद 'अभिनव' भी था !

नॉएडा आया तो २ साल तक कोई सिनेमा 'हौल' में नहीं देखा ! मल्टीप्लेक्स के दामों को सुन हिम्मत नहीं होती ! एक सम्बन्धी आये - फिल्म्ची थे - जिद पर अड् गए - जाना पड़ा :( ..फिर तो ....शुरुआत हो ही गयी :)  अब तो ऐसे जगह पर रह रहा हूँ ..जहाँ आधा किलोमीटर के अंदर ३-४ मल्टीप्लेक्स हैं - यहाँ नहीं तो वहाँ ..कहीं न कहीं टिकट तो मिल ही जायेगा !


मालूम नहीं क्या क्या लिख दिया :) पढ़ लीजिए ..कुछ यादें आपकी भी हों तो कम्मेंट दे दीजिए ..अभी फुर्सत है ..तो ब्लॉग छप रहा है ! :)






रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Thursday, June 3, 2010

मेरा गाँव - मेरा देस ( राजनीति ) - भाग छह

प्रकाश झा साहब की फिलिम 'राजनीति' रिलीज होने वाली है ! सन १९८४-८५ में उनकी 'दामुल' दूरदर्शन पर देखी थी ! एक सांस में देख लिया था :)  उनकी लगभग सभी फिल्मे देख चूका हूँ ! 'राजनीति' भी देख लूँगा :) मै 'फिलिम्ची' नहीं हूँ - सिनेमा देखते वक्त 'निर्देशक' की भूमिका में खुद को पाता हूँ तो और भी दिक्कत होती है :(  इसलिए सिनेमा और टी वी के रिपोर्टस को लगभग कोशिश करता हूँ - ना देखूं !

खैर , एक पोस्ट में आप सभी ने पढ़ा होगा - कैसे मै पहली दफा 'श्रीमती गाँधी' को रांची में देखा ! तब से उनका मै फैन हो गया :) १९७७ का चुनाव याद नहीं है पर उनका चुनाव चिन्ह 'गाय और बछड़ा' के बैच कई सालों ताक मेरे 'दराज' में मेरे खिलौने के पार्ट हुआ करते थे ! सन १९८० के आम चुनाव के वक्त मै मुजफ्फरपुर में हुआ करता था - 'राजनीति' खून में थी ! कॉंग्रेस जेहन में थी ! मुजफ्फरपुर के सब से बड़े व्यापारी 'श्री रजनी रंजन साहू' कॉंग्रेस के उम्मीदवार हुआ करते थे ! बड़े दादा जी से जिद  किया तो कॉंग्रेस के कुछ झंडे घर' के छत पर टांग दिए गए :) इंदिरा गाँधी से प्रभावित होकर - मैंने भी अपनी एक 'वानर सेना' बना ली थी ! :) मोहल्ले के ही सभी थे ! जॉर्ज साहब भी चुनाव लड़ रहे थे ! जॉर्ज साहब एक चुनावी सभा को संबोधित करने वाले थे - हम सभी ने प्लान बनाया की वहाँ हम पत्थर फेंकेंगे :) खैर , अब याद आती है तो बहुत हंसी भी छूटती है :) मोहल्ले के कुछ लोगों ने 'जॉर्ज साहब' के पक्ष में एक छोटा सा प्रदर्शन टाईप का करने वाले थे - मुझे जब पता चला - मै बेचैन हो गया था - बड़े बाबा के पास गया और रोने लगा :) शाम को वो प्रदर्शन हमारे घर के सामने से ही होकर जाने वाला था - मै शाम को ही तीर धनुष लेकर उनको रोकने को तैयार था :) मेरी 'वानर सेना' गायब थी - राजनीति का पहला सबक :)

वोट कैसे गिराते हैं - नहीं पता था ! बाबु जी और बड़े बाबा - चाचा सभी लोग पास के ही एक महिला कॉलेज जो की मतदान केंद्र हुआ करता था - वहाँ जाने वाले थे - जिद पर अड् गया - बाबु जी के लैम्ब्रेटा पर पहले से ही जा कर बैठ गया :) वहाँ गया - तब तक एक 'जीप' आई और उससे एक दूसरी पार्टी के उम्मीदवार उतरे - बाबु जी ने मुझे इशारा किया की "प्रणाम' करो !मैंने नहीं किया ! बाद में पता चला की वो वहाँ से लगातार चार बार जीत चुके और 'लंगट सिंह' के पौत्र 'दिग्विजय' बाबु थे और हमारी जाति के ही थे - शायद मेरे घर वालों ने उनको ही वोट दिया था - रात भर नींद नहीं आयी - विश्वास टूट चूका था - राजनीति का दूसरा सबक :)

सन १९८० के विधानसभा चुनाव के समय 'गांव' पर था ! बाबा को टिकट मिलने की खबर 'अखबार' में छप चुकी थी - ऐसा ही कुछ उनके साथ १९६२ में भी हुआ था पर वहाँ के तत्कालीन सांसद 'श्री नगीना राय' ऐसा नहीं चाहते थे सो अंतिम समय में 'टिकट' कट गया ! हम सभी बहुत दुखी थी - डॉक्टर जगनाथ मिश्र गाँव पर आये - और कुछ बड़ी चीज़ का वादा कर के गए :) बाबा कॉंग्रेस के थे - कॉंग्रेस ने बहुत ही कमज़ोर कैंडिडेट को उतरा था - बेवकूफ जैसा था - हर सुबह अपनी जीप लेकर हमारे दरवाजे आ जाता था ! हम और हमारे बाबा दिन भर कॉंग्रेस की जीप में घुमते :) पर , अचानक मुझे पता चला की बाबा ने उनदिनो बिहार के समाजवादी नेता 'श्री कपिल देव बाबु ' को चिठ्ठी भेज कर अपने एक आदमी को 'जनता पार्टी' का टिकट दिलवा दिया था ! 'कपिल देव बाबु सम्बन्धी लगते थे ! चुनाव के ठीक पहले अचानक बाबा सक्रिए हो गए - उनके सारे लोग - उस 'अपने आदमी' के लिए काम करने लगे :) पर जीप अभी भी वही 'कॉंग्रेस' की थी ! घर में झंडे 'कॉंग्रेस'   के ही लगे थे ! खैर , न तो कॉंग्रेस जीता और न ही वो अपना 'आदमी' - राजनीति का तीसरा सबक बहुत महत्वपूर्ण हो गया !

फरवरी १९८४ में दिल्ली आया था ! राज्यभर के कॉंग्रेसी आये थे ! मै भी बाबा के साथ 'लटक' गया ! दिल्ली का पहला दौरा था ! २६ , महादेव रोड पर नगीना राय के डेरा पर रुके थे ! हर शाम - पालिका बाज़ार घूमने जाता था ! जिस दिन इंदिरा गाँधी से मिलने जाना था - उसके ठीक एक दिन पहले मैंने 'पालिका बाज़ार' से एक 'कैमरा खरीदा' - अगले दिन मैंने अपनी जिंदगी की पहली तस्वीर श्री मति गाँधी का लिया - सफ़ेद अम्बैस्डर में सवार ! सर पर पल्लू ! कॉंग्रेस के कई दिगज्जों के रूबरू ! ढेर सारे 'आशीर्वाद' समेटा !

१६ अक्टूबर १९८४ , श्रीमती गाँधी से अंतिम मुलाकात ! सत्येन्द्र बाबु उर्फ छोटे सरकार का कॉंग्रेस में वापसी का दिन ! श्री कृष्ण मेमोरियल में ठीक उनके सामने बैठा हुआ - मै :) बिहार के सभी कॉंग्रेसी दिग्गज के बीच में - मै एक टीनएजर कॉंग्रेसी :) ताकत का एहसास होता था ! स्कूल में गप्प देने के ढेर सारे मसाले मेरे पास हुआ करते थे ! पर मेरे मसाले में मेरे किसी दोस्त को 'इंटरेस्ट' नहीं होता था ! :(  अब कोई मुझसे 'राजनीति' पर कुछ पूछता है य बहस करता है - मै सिर्फ मुस्कुराता हूँ !

इंदिरा गाँधी का क़त्ल हो गया ! चुनाव हुए ! हमारी वार्षिक परीक्षा खत्म हो चुकी थी - बाबा ने अपने बौडी-गार्ड को मुझे गोपालगंज बुलाने के लिए - पटना भेजा था ! बाबु जी 'दांत' पीसते रह गए और मै - चुनाव के मजे लेने के लिए 'पटना' से फरार हो गया ! :) नगीना राय के खिलाफ उनके ही शागिर्द 'काली पाण्डेय' चुनाव लड़ रहे थे - राजनीति का यह अजीब सबक था - अवसरवादिता का ! चुनाव प्रचार में ३०-४० गाडिओं का काफिला - हर गाड़ी में - ढेर सारे - रायफल - बन्दूक ! चुनाव का दिन - अजीब सा टेंशन ! नगीना राय बुरी तरह हार गए ! कुख्यात 'काली पाण्डेय' जीत गया !

धीरे धीरे राजनीति में हम अस्तित्व खोते गए ....

..........जो कुछ बचा ...लालू ने कुचल - मसल दिया ! थोड़ी सी जो दम अभी सांस गिन रही थी - उस पर 'नीतिश कुमार' ने अंतिम वार कर दिया है ! जान छटपटा रही है ....कोई आस पास भी नहीं है ..जो इस जाती हुयी जान को चुल्लू भर पानी पीला दे ............!

पर 'राजनीति' तो खून में है - अभी हमारा 'अंतिम वार' बाकी है - इन्ही उम्मीदों के साथ ...

रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Wednesday, June 2, 2010

मेरा गाँव - मेरा देस ( लगन 'टाईट' बा ) - भाग - पांच

एक जमाना था - लड़का ने 'मैट्रिक' का फॉर्म नहीं भरा की 'बरतुहार' ( अगुआ - शादी विवाह वाले , लडकी वाले ) आना शुरू कर देते थे ! गाँव या टोला में एकता है तो जल्द 'शादी' ठीक हो जाती वर्ना ..लड़का बी ए फेल भी कर जाता और शादी नहीं हो पाती थी ! इन दिनों 'बियाह-कटवा' भी सक्रिय भूमिका में आ जाते हैं ! जब तक वो 'बरतुहार' को आपके दरवाजा से भगा नहीं देते ..उनको चैन नहीं आता है ! तरह तरह के 'बियाह कटवा' .... जैसे एन बारात लगने के समय हल्ला कर दिया या चुपके से 'लडकी वाले' को बोल दिया की ..'लड़का तो ......' अब हुआ हंगामा ...' हंगामा खड़ा कर के वो गायब :) या फिर जब दरवाजे पर 'लडकी वाले ' आये हुए हैं तो ..कुछ ऐसा बोल देना की ..'लडकी वाले ' के मन में कुछ शंका आ जाए ! ऐसे 'बियाह कटवा ' गाँव - मोहल्ला - टोला के बाज़ार पर बैठे मिल जाते हैं - जैसे कोई 'बर्तुहार' गाँव - मोहल्ला में घुसा नहीं की उसके पीछे पीछे चल देना ! होशियार 'लडका वाला ' लगन के पहले इस 'बियाह कटवा' को 'सेट' कर के रखता है ताकि वो कुछ कम नुक्सान कर पाए !



खैर , बियाह तय हो गया - अब बात आयी - लेन - देन की , यहाँ भी कुछ कुशल कारीगर होते हैं - आपकी 'कीमत' से बहुत कम में आपका 'माल' बिकवा देंगे :( और खैनी ठोकते आपका ही नमक खा कर - मुस्कुराते चल देंगे ! ऐसे लोगों के दबाब से बचने के लिए - लड़का वाला बंद कमरा में 'कीमत' तय करने लगा वरना वो एक जमाना था तब जब समाज के बड़े बुजुर्ग के बीच में सब कुछ तय होता था ! अच्छे लोग - तिलक - दहेज का पूरा का पूरा लडकी को 'सोना' के रूप में 'मडवा' ( मंडप) पर चढा देते थे - अब 'बैंक' में रख सूद खाते हैं !



अब लडका वाला तिलक - दहेज और अपनी हैशियत के मुताबिक 'ढोल बाजा' आर्तन - बर्तन , कपड़ा - लत्ता ' खरीदने की तैयारी शुरू कर देता है ...अब फिर से कुछ 'आईटम' लोग आपके पीछे लग जायेंगे ! आपका 'बजट' पांच हज़ार का ही तो वो उसको पन्द्रह हज़ार का करवा देंगे - अब 'बेटा' का बियाह है - लोक - लज्जा की बात है - आप बस थूक घोंटते नज़र आयेंगे ! पब्लिक समझेगा की 'फलना बाबु ' तो तिलक लेकर धनिक हो गए - जबकि सच्चाई यह है की - आपकी जमा पूंजी भी 'इज्ज़त ' के चक्कर में लग जाती है !

अब बारात कैसे जायेगा - आप मन ही मन 'बस' का सोच रहे होंगे - आपके शुभ चिन्तक आपको इज्ज़त का हवाला देकर १०-२० कार ठीक करवा देंगे - कार जीप भी ठीक करने वो ही जायेंगे - "सट्टा बैना" भी वही लिखेंगे - जब आप कुछ कम भाडा की बात करेंगे - तो आपके शुभचिंतक बोलेंगे की - अरे ..लईका के बियाह है ...कोई नहीं .फिर से एक बार थूक घोंट लीजिए ! :)

बारात में 'नाच - पार्टी' कैसा जायेगा ? इसका टेंशन एक खास किस्म के लोगों को रहता है - उनको सब डीटेल पता रहता है की ..कहाँ का कौन सा 'नाच' कैसा है ? वैसे लोगों को खबर जाता है - वो बहुत आराम से दोपहर का खाना खाते हुए ..लूंगी में धीरे धीरे टहलते ...खैनी ठोकते ..आयेंगे ! अब वो डिमांड करेंगे ..अलग से गाड़ी घोडा का ..भाई ..नाच ठीक करने जाना है :) कोई मजाक थोड़े ही है :)

फलदान में - तिलक में - कैसा 'कुक' आएगा ? यह एक अलग किस्म का टेंशन है - कोई सलाह देगा - दोनों कुक अलग अलग होना चाहिए - कोई कहेगा - मुजफ्फरपुर से आएगा - 'फलना बाबू ' के बेटा के बियाह में 'बनारस से ही नाच और कुक' दोनों आया था - अब वो जैसे ही 'फलाना बाबु ' का नाम लिया नहीं की आप भरपूर टेंशन में नज़र आ जायेंगे - बेटा का बियाह और इज्ज़त - जो न करवाए !

अब चलिए ..गहना पर ! घर की महिलायें 'जीने' नहीं देंगी ! अक्सर यहाँ एकता देखा जाता है - आप मन ही मन ५० भर सोना चढाने को सोच रहे होंगे - तब तक कोई बोलेगी - मेरे बियाह में '२०० भर' सोना चढा था - अब देखिये - यहीं पर आपका बजट चार गुना हो गया ! कोई कहेगी - मुजफ्फरपुर का 'सोनार' सब ठग है - अमकी 'पटना ' से खरीदायेगा - अब हुआ टेंशन - पूरा 'बटालियन' पटना जायेगा ! १०० भर सोना के साथ साथ ५-१० नकली अशर्फी - गिन्नी खरीद लेगी सब ! एक सुबह से शाम तक ..सोनार इनको '३ बोतल ' कोका कोला पीला के ..२-४ लाख का सोना बेच देता है और दूकान के सामने 'बलेरो' जीप में बैठा मरद का ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ रहता है !

बनारसी साड़ी का भी एक अलग टेंशन है - मालूम नहीं वो 'लडकी' फिर कब इतना भरी साड़ी दुबारा कब पहनेगी :( कोई कहेगा १०१ साड़ी जायेगा ...फिर बजट हिलेगा डूलेगा ! फिर टेंशन होगा - अटैची - सूटकेस का ! सब खर्च हो गया - पर ये सूटकेस आर्मी कैंटीन से ही आएगा :)

कैसा लगा ? बताएँगे :)

रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Tuesday, June 1, 2010

मेरा दिल - मेरा बचपन - मेरी जवानी ( भाग - चार )

रांची याद आ गया ! 'नाना जी ' उन दिनों वहाँ 'जिला & सत्र न्यायधीश' हुआ करते थे ! 'डोरंडा' के पास - नेपाल हॉउस में वो रहते थे ! घर में बड़ा ही 'इंटेलेक्चुअल' माहौल था ! सब के आँखों पर चश्मा और सभी के पास वकालत की डिग्री :) हर शाम दिल्ली वाला 'टाइम्स ऑफ इंडिया' सुतरी में लपेटा हुआ आता था ! तब तक मै दोपहर की एक नींद मार चूका होता और अखबार की तरफ टूट पडता था ! आर के लक्ष्मण की कार्टून और इंदिरा गाँधी - शायद उन दिनों 'श्रीमति गाँधी ' रांची आने वाली थीं - मैंने 'नानी' से काफी जिद की - तो 'नाना जी' मुझे पैदल ही श्रीमती गाँधी को दिखने में रोड तक ले गए थे !  यह वक्त था ..१९७६ का ! नाना जी रिटायर हो गए - रांची के अशोक नगर में उन्होंने ने घर बनाया - फिर से दुबारा  हम लोग रांची गए !

ननिहाल में अपने पीढ़ी में सब से बड़ा मै ही था - सभी मामा और मौसी लोग मेरे हर एक जिद को पूरा करने को बेताब ! शायद एक रात मैंने एक जिद कर दी और एक मामू जान ठीक उसी वक्त साइकील से मेरे जिद को पूरा करने के चक्कर में अपना घुटना तुडवा लिए :( हॉस्पिटल में भर्ती हो गए - मै हर रोज एक दूर दराज के मामू के साथ 'बुल्लेट' पर बैठ कर हॉस्पिटल जाता था - बुल्लेट वाले शायद वन पदाधिकारी थे - अब सुना हूँ - बहुत पैसा कमाए हैं - :) हॉस्पिटल में उन दिनों मरीजों को काफी कुछ मिलता था - मामू जान जो मेरे कारण ही घुटना तुडवा चुके थे - मेरे लिए हर रोज हॉस्पिटल से मिले 'सेब' रखते थे ! मुझे सोफ्टी का बहुत शौक था - दूसरे 'हीरो टाईप' मामू जान लोग हर शाम मुझे अशोक नगर से 'फिरायालाल' तक पैदल ले जाते :( मै भी एक सोफ्टी के चक्कर में उनके पीछे 'लटक' जाता था ! बाबु जी नाना जी की बड़ी इज्जत करते थे - जब वो 'रांची' आते ..नाना जी से बहुत कम बोलते थे ! नाना जी 'माँ' को बहुत मानते थे ! बहुत ! नाना जी को सभी घर में 'दादा जी' कहते थे - वो घर में खादी का कुरता - धोती और खडाऊं पहनते थे ! मौसी - मामू लोग के पास एक कैमरा होता था - जिसमे जब कभी भी 'इंदु' फिल्म्स डाला जाता - सब से ज्यादा मेरी ही तस्वीर खींची जाती थी :)

हर शाम 'सौफ्टी' खिलाने के पीछे एक राज हुआ करता था - मामू लोग कभी कभी सिगरेट भी पीते थे - यह बात मै जान चूका था - किसी और को पता नहीं चले - के कारण बेचारे 'मामू जान लोगों ' को मेरी हर बात माननी पडती थी !

नाना जी के घर के ठीक सामने कुछ दूरी पर - अन्धों का एक स्कूल होता था - मै वहाँ जाया करता था - घंटो उनके पास बैठता था ! फिर उदास हो कर वापस लौट आता ! उसमे से कई मेरे दोस्त भी बन गए थे - मालूम नहीं अब वो लोग कहाँ हैं ?

मौसी को नौकरी लगी थी - वहीँ पास में 'ईटकी' नाम के जगह में ! मौसी और मेरे बाबु जी दोनों ने एक ही कॉलेज से स्नातक किया था - जब दोनों मिलते - खूब बहस होती ! एक खासियत थी - नाना जी के यहाँ सब अंग्रेज़ी में ही 'बहस' करने वाले होते थे - हम दोनों बाप बेटा को एक दूसरे का मुह ही ताकते :) खैर , बाबू जी तो बहुत कम ही बार रांची आये ! मुझे याद है - बाबु जी 'स्नाकोत्तर प्रवेश परीक्षा' देने रांची आये थे और मौसी - मामा लोग मेरा 'जन्मदिन' मनाये थे ! केक कटा था :) हम लोग ये 'केक और अंग्रेज़ी' से बहुत दूर रहने वाले परिवार से आते थे :)

१९७९ के जनवरी में चाचा आये थे - हम लोगों को मुजफ्फरपुर ले जाने ! मै दुखी था - नाना - नानी - मामा - मौसी सभी उदास थे ! नानी ने मेरे पॉकेट न जाने कितने पैसों से भर दिया था - रास्ता में सब ..चाचा ने ले लिया था :(

कई वर्ष बाद मेरी दादी ने बताया की ...जज साहब मेरे अपने नाना नहीं हैं ..मेरे नाना के बड़े भाई हैं ...मन बेचैन हो गया था ..मेरे नाना की हत्या को उनके खेतों की रखवाली करने वाले और उनके ही जाति के लोगों ने कर दी थी ..जब मेरी माँ मात्र '४-५' साल की थीं और मेरी नानी की मृत्यु मेरे जनम के ठीक बाद हो गयी  ! कई दिनों तक मै यह जान बेचैन रहता था ... पर वो असीम प्यार कैसे भूल पाता ! पर 'माँ' से या किसी से आज तक नहीं पूछा की ' मेरे नाना ' की हत्या कैसे हुयी ..हिम्मत नहीं हुयी !

अब बहुत कुछ बिखड़ गया ...सब अलग अलग हो गए ...मेरे साथ तो बस कुछ यादें ही रह गयी हैं ..!

हाँ ...लिखना है ..बहुत कुछ !!


रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Saturday, May 29, 2010

मेरा गाँव - मेरा देस - ( मेरा पटना ) - भाग ३

सातवीं की परीक्षा 'जिला स्कूल - मुजफ्फरपुर ' से पास कर लिया ! परबाबा से लेकर मुझ तक हम चार पीढ़ी इस स्कूल में पढ़ लिए :) गौरव की बात है , न ! वार्षिक परीक्षा चल रही थी - तभी बाबु जी का ट्रांसफर 'मुजफ्फरपुर' से 'पटना' हो गया ! नाना जी , बड़े बाबा के पास आये थे - मै खेल रहा था - बड़े बाबा से पूछा - नाना जी क्यों जल्द आ कर चले गए - बड़े बाबा ने पूछा - वो इजाजत लेने आये थे - मैंने पूछा - कैसी इजाजत ? , बड़े बाबा बोले - जब तक तुम्हारे 'पिता जी ' अपनी गृहस्थी' पटना में बसा नहीं लेते - तब तक हम सभी 'ननिहाल वाले पटना डेरा में रह सकते हैं' !

पटना हम पहले भी जाते थे ! पटना होकर ही ननिहाल जाना होता था ! गंगा बिहार को दो भाग में बांटती है ! हम 'गंगा पार' के थे - ये अक्सर विवाद का विषय होता - कौन 'गंगा पार का :) इधर वाले के लिए हम 'गंगा पार' वाले - उधर वाले के लिए 'मगध' गंगा पार :) खैर !

हम स्टीमर से पटना आते थे ! महेन्द्रू घाट पर उतर कर 'रिक्शा' से 'कदम कुआं' जाना - बड़ा ही आनंददायक होता था ! गाँधी मैदान के चारो तरफ से घुमते - रिजर्व बैंक का बिल्डिंग - सब कुछ बड़ा बडा लगता था ! 'हम लोग एक छोटे शहर पर उत्तर बिहार की राजधानी 'मुजफ्फरपुर' से पटना आते थे - तो ये पटना हम लोगों के लिए किसी 'विदेश' से कम नहीं होता ! 

माँ - बाबु जी और छोटी बहन सब पटना आ गए - नाना जी के डेरा में ! बड़ी कोठी पर बड़ी संकरी गली !  बाबा को लाल बत्ती वाली 'अम्बैस्डर' मिली थी - संकरी गली के कारण वो अपने 'ठस' से समधियाना तक गाड़ी में पहुँच नहीं पाते - थोडा दुःख मुझे भी होता ! एक महीने बाद मै भी पटना आ गया था !

पटना आने पर मेरी मुलाकात हुई - इंडिया टूडे से ! मामा लोग दिल्ली में 'कुछ' पढते थे वो पटना आते तो हाथ में 'इंडिया टूडे' होती ! फिर शाम को 'दिल्ली' वाला टाइम्स ऑफ इंडिया ! खैर , पटना लौटने पर सब से बड़ी दिक्कत हुई - मेरे किसी स्कूल में अड्मिशन की ! बाबु जी तो खुद बहुत अनजान थे - नाना जी ने बोला - मै कोशिश करता हूँ - बाबु जी को ऐसा लगा की कोई लौटरी लग गयी - मालूम नहीं 'नाना जी ' ने कहाँ कहाँ और किस - किस से 'चिठ्ठी ' लिखवाई और मेरा एक स्कूल में अड्मिशन हो गया ! मोहल्ले के कई दोस्त साथ साथ स्कूल जाने लगे - रास्ते भर 'कपिल देव वस्  गावस्कर ' बहस होते जाती ! रास्ता में जन संपर्क विभाग का एक कार्यालय होता था - मै वहाँ कुछ देर रुक - हिंदी अखबार पढता था - दोस्त मुझ से चीढ़ते थे :) पटना आ कर - पहली दफा ऐसा लगा - हम जैसे बहुत लोग हैं और हमारी 'अवकात' कुछ नहीं है - ये एक एहसास ऐसा था - जो काफी दिन तक मुझे परेशान किया करता था - कोई भाव देने को तैयार नहीं और हम बिना भाव जीने के आदी नहीं थे :)

नाना जी के यहाँ बिना लहसुन - प्याज वाला खाना बनता और हम दोनों 'बाप बेटा ' पक्के मांसाहारी :) कितने दिन तक बर्दास्त करते - एक शाम बाबु जी ने मुझे अपने पास बुलाया और बोला - जल्द तैयार हो जाओ - एक मित्र के यहाँ जाना है - मै कुछ बोलता तब ताक वो बोले - हम और तुम जायेंगे सिर्फ - घर में कोई कुछ पूछे तो बोल देना - पापा के दोस्त के यहाँ जाना है ! बाबु जी ने रिक्शा लिया और हम दोनों चल पड़े - रिक्शा एक साधारण से 'होटल' ( रेस्टोरेंट) के सामने रुका - हम आ चुके थे - पटना के मशहूर 'महंगू होटल' में ! दोनों 'बाप - बेटा' जी भर खाए - सब कुछ ! 'गोली - बगेरी - मटन दो पयज़ा ' और न जाने क्या क्या :) मै बहुत खुश था ! खुशी बर्दास्त नहीं हुई - एक दो मामू जान को बता ही दिया - फिर वो सभी बाबु जी से मजाक शुरू कर दिए !

नाना जी के यहाँ कुल छह महीने ही रहे ! बाबु जी बड़े ही 'स्वाभिमानी' हैं - हर रोज शाम मकान खोजने निकल पड़ते !  मुजफ्फरपुर में बाबु जी काफी बढ़िया प्रैक्टिस हो चुकी थी और पटना एक मुश्किल शहर था ! पर बाबू जी प्रयास में लगे थे ! कंकडबाग के 'डॉक्टर कॉलोनी' में डेरा मिल गया - हम सभी बड़े खुश थे !

....जारी है ....





रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Thursday, April 22, 2010

मेरा गाँव - मेरा देस - भाग 'दो' ( शादी विवाह )

बचपन के दिन याद आ गए ! घर - परिवार - ननिहाल में शादी होता था - हम सभी पन्द्रह दिन पहले ही गांव पहुँच जाते थे ! पहला रस्म होता था - 'फलदान' - लडकी वाले कुछ फल इत्यादी लेकर 'वर' के घर जाते थे ! बहुत दिनों तक - बहुत ही कम लोग आते थे - पर धीरे - धीरे यह एक स्टेटस सिम्बल बन गया - लडकी वाले १०० -५० की संख्या में आने लगे ! गांव भर से चौकी , जाजिम , तकिया , तोशक मांगा कर 'दालान' में बिछा दिया जाता था ! मेरे खुद के परिवार  में - मुझे याद है - खुद का 'टेंट हॉउस' वाला सभी सामान होता था ! कई जोड़े 'पेट्रोमैक्स' , टेंट , बड़ी बड़ी दरियां , शामियाना - पर दिक्कत होती थी - चौकी की सो गांव से चौकी आता था और चौकी के नीचे य बगल में 'आलता' से उस चौकी के मलिक का नाम लिखा जाता था ! समय पर लाना और समय पर पहुंचवा देना किसी एक खास मुंशी मैनेजर की जिम्मेदारी होती थी ! मुंशी - मैनेजर के आभाव में गांव घर के कोई चाचा या बाबा !

जैसा 'वर' का हैशियत वैसा 'लडकी वाला' सुबह होते होते लडकी वाले पहुँच जाते ! हम बच्चे बार बार 'दालान' में झाँक कर देखते और 'दालान' की खबर 'आँगन' तक पहुंचाते थे ! ड्राम में 'शरबत घोला जाता था ! हम बच्चे 'ड्राम' के आगे पीछे ! दोपहर में गरम गरम 'गम्कऊआ भात' पात में बैठ कर खाना और आलू का अंचार , पापड़ - तिलौडी और ना जाने क्या क्या ! लडकी का भाई 'फलदान' देता था - उस ज़माने में 'लडकी' को दिखा कर शादी नहीं होती थी सो अब लडकी कैसी है यह अंदाजा उसके 'भाई' को देख लगाया जाता था ! आँगन से खबर आती - जरा 'लडकी' के भाई को अंदर भेज दो -  माँ - फुआ - दादी टाईप लोगों को जिज्ञासा होती थी !

शाम को मुक्त आकाश में खूब सुन्दर तरीके से 'दरवाजा ( दुआर) ' को सजाया जाता ! ५-६ कम ऊँची चौकी को सजा उसके ऊपर सफ़ेद जाजिम और चारों तरफ पुरे गाँव से मंगाई हुई 'कुर्सीयां' ! मामा , फूफा टाईप लोग परेशान कर देते थे - एक ने पान माँगा तो दूसरे को भी चाहिए - किसी को काला - पीला तो किसी को सिर्फ 'पंजुम' , किसी को सिर्फ कत्था तो किसी को सिर्फ चुना वाला पान ! जब तक 'पन्हेरी' नहीं आ जाता - हम बच्चों को की 'वाट' लगी रहती थी !

गांव के बड़े बुजुर्ग धीरे धीरे माथा में मुरेठा बंधे हुए लाठी के सहारे आते और उनकी हैशियत के मुताबिक उनको जगह मिलती थी ! होने वाले 'सम्बंधिओं' से परिचय शुरू होता ! फिर , 'आँगन से सिल्क के कुरता या शेरवानी ' में 'वर' आता ! साथ में 'हजाम' होता था - जिसका काम था - 'वर' का ख्याल रखना - जूता खोलना , हाथ पकड़ के बैठना इत्यादी इत्यादी ! दोनों तरफ के पंडीत जी बैठ जाते - उनमे आपस में कुछ नोक - झोंक भी होती थी जिसको गांव के कोई बाबा - चाचा टाईप आईटम सुलझा देते ! इस वक्त 'लडकी वालों ' के बिच कुछ खुसुर फुसुर भी होती थी - 'वर' की लम्बाई - चेहरा मोहरा इत्यादी को लेकर !

फिर 'फलदान' का प्रोसेस शुरू होता और कुछ मर मिठाई - अर्बत - शरबत भी चालू हो जाता ! फलदान होते ही 'हवाई फायीरिंग' भी कभी कभार देखने को मिला - जब लडके और लडकी वाले आपस में तन गए - मेरा यह मानना है की फलदान होते ही सामाजिक तौर पर दोनों परिवार बराबर के हो गए - तिलक - दहेज की बात अब इसके बाद नहीं होती !

फलदान में लडकी वाला अपनी हैशियत के हिसाब से लडके को देता था ! कुछ कपड़ा या कुछ दर्जन 'गिन्नी- अशर्फी' !

फिर , दोनों पक्ष दालान में बैठ कर आगे का कार्यक्रम बनाते ! तिलक में कितने लोग आयेंगे - बरात कब पहुचेगी - विदाई कब होगा - किसको किसको दोनों तरफ से 'कपड़ा' जायेगा ! तब तक शाम हो जाती ....

और हम बच्चे .."पेट्रोमैक्स' के इर्द - गिर्द गोला बना के बैठ जाते - उसको जलने वाला भी एक व्यक्ति विशेष होता - जो हम बच्चों को बड़ा ही 'हाई - फाई' लगता ! :)

क्रमशः


रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

Tuesday, April 20, 2010

मेरा गांव - मेरा देस - भाग - एक !! ( परिवार )

मंगलवार को थोडा कम काम होता है - सो 'समय' मिल जाता है ! सुबह सुबह एक दोस्त को फोन किया - वो मुझे अपना दोस्त नहीं मानता पर मै मानता हूँ - गाँव वाला जो हूँ ! बातों ही बातों में 'गांव' की बात आ गयी और नॉएडा में बैठे बैठे अपना 'गांव' याद आ गया !

समझ नहीं आ रहा - कहाँ से शुरू करूँ ! कुछ अमिट छाप हैं - कुछ यादें हैं -

बचपन याद आ रहा है - बाबा ( दादा जी ) का वो बड़ा सा कांसा वाला- 'लोटा' ! सुबह सुबह वो एक लोटा पानी पीते थे - इनार का ! तब तक 'माँ' उनके और दीदी ( दादी ) के लिए 'चाय' बना देती थीं ! लकड़ी का चूल्हा होता था ! बाबा चाय पीने के बाद खुद से पान बनाते - पंजुम और रत्ना छाप जर्दा खा के - खेतों के तरफ निकल पड़ते थे ! सारे खेतों से घुमते हुए वो करीब एक दो घंटे में लौटते ! तब तक मै उनकी बिछावन पर सोया रहता ! बड़ी अच्छी खुशबू आती थी - जर्दा की ! बाबा के लौटते - लौटते दरवाजे पर एक भीड़ जमा हो जाती थी ! कोई साईकिल से तो कोई 'राजदूत मोटर साईकिल' से ! कुर्सियां सज जाती थी ! ढेर सारे 'नौकर - चाकर' मुंशी मैनेजर' होते थे ! खपडा वाला मकान होता था - अब भी है ! और एक दालान ! दालान में बड़ी बड़ी आरामदेह कुर्सियां और इंदिरा गाँधी का एक बड़ा सा फोटो !

मेरे पर दादा जी बहुत ही  'दूरदर्शी' थे ! १९२७ में कोल्कता विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद अंग्रेजों की पुलिस वाली  नौकरी ठुकराने के बाद वो 'मुजफ्फरपुर शहर' में बस गए - वहाँ उन्होंने ने अपने ननिहाल वालों से 'ज़मींदारी' खरीदी और अपने इलाके के सभी विद्यार्थिओं को अपने खर्चे पर पढाना - लिखाना शुरू किया ! मुजफ्फरपुर के रईसों के साथ उठाना - बैठना और फिर गांधीवादी होना साथ ही साथ घर परिवार के बहुत कुछ करना ! शायद कुछ दिनों तक वो 'मुख्तार' भी रहे ! सो , बिहार में हमारा दो जगह घर हो गया ! सारण और मुजफ्फरपुर ! सारण में 'गांव' और मुजफ्फरपुर में शहर ! परदादा जी को समय की पहचान थी ! मुजफ्फरपुर के केंद्र 'कल्याणी चौक' पर भी उन्होंने कुछ ज़मीन जायदाद खरीदी और एक 'विशाल स्टोर' भी खोला ! जमींदारी खरीदने के अलावा उस ज़माने में हमारा 'परिवार' बिहार के बड़े बड़े जमींदारों को क़र्ज़ पर पैसे भी देता था ! परदादा जी और परदादी जी का एक ही दिन 'टी वी' के कारण 1943 में मृत्यु हो गयी ! परिवार में एक 'यु टर्न' आ गया ! परदादा जी जिस तेज़ी से आगे बढ़ रहे थे - शायद हम अपनी बिरादरी में बिहार में प्रथम परिवार होते ! उनका एक सपना था - मेरे बाबा को 'कलक्टर' बनाने का ! मेरे बाबा 'मुजफ्फरपुर जिला स्कूल' के सब से तेज विद्यार्थी थे ! 'लाट साहब' ( गवर्नर) के हाथों उनको अपने स्कूल के सब से तेज विद्यार्थी का ख़िताब मिल चूका था ! परदादा की मृत्यु के समय वो नौवीं कक्षा में थे ! परदादा के बड़े भाई को कोई संतान नहीं थी सो मेरे बाबा अपने चाचा जी के साथ 'गांव' ( सारण  ) लौट आये ! और मेरे बड़े दादा जी 'मुजफ्फरपुर शहर' में ही रह गए ! परिवार में विभाजन नहीं हुआ था पर शहर की सैकड़ों एकड़ जमीन मेरे परदादा की अर्जित की हुई थी सो वो ज़मीन सम्मलित परिवार के लोगों में १९४९ में बंट गयी ! पर 'मालिकाना' मेरे दादा दोनों भाईओं की ही रही ! परिवार के अन्य लोगों को वो 'मुफ्त' में मिली थी सो उन्हें भी उस ज़मीन जायदाद की ज्यादा चिंता नहीं थी ! बड़े दादा जी बड़े ही आराम से 'मुजफ्फरपुर' में अपनी जिंदगी गुजारी ! परिवार में शांती थी - शहर की ज़मीन - अपने चचेरे भाईओं में बांटने में मेरे दादा जी लोगों को थोड़ा भी कष्ट नहीं हुआ ! बाबा दोनों भाई बहुत कम उम्र में छोटे मोटे ज़मीदार बन गए ! मेरे बाबा 'गांव' में और बड़े बाबा - शहर में ! प्रख्यात पत्रकार 'नलिनी सिंह' के ससुर 'सर सी पी एन सिन्हा' का मुजफ्फरपुर घर भी हमारी जमींदारी में आता था ! रहते लोग 'शहर' में थे पर रहन - सहन 'गांव वाली ही रही ' ! मुजफ्फरपुर का जिला स्कूल 'खानदानी स्कूल' हुआ करता था ! हम चार पीढ़ी उस स्कूल  में पढ़ चुके हैं - इसका मुझे गर्व है !

हमारे कई या लगभग बहुत सारे सम्बन्धी हम से भी ज्यादा 'धनिक' थे ! पर , उनके रहन सहन और हमारे रहन सहन में बहुत का अंतर था ! वो , पैसों को दांत से पकडते थे और हम 'आराम' से रहते थे - 'इज्जत' बहुत बड़ी चीज़ होती थी ! सम्मलित परिवार और ज़मींदारी का बंटवारा १९४९ में हुआ और इतनी शांती से हुआ की किसी को कानो कानो तक खबर नहीं पहुंची !  कई चीज़ नहीं बंटे - जिसमे एक था - हाथी और हथ्सार , कई बगीचे और फुलवारियां ! लालू के आने तक हम उसी अंदाज़ में जीते रहे ! समय बदलता रहा - 'हम इज्जत को ढोते रहे' !

मेरे बाबा 'गांव' लौटने के बाद १९४६ में कॉंग्रेस के मेंबर बन गए ! जिला स्तर से राज्य स्तर तक मेंबरशिप और महत्वपूर्ण जगह मिलती गयी ! पर गृहक्षेत्र से कॉंग्रेस ने कभी 'टिकट' नहीं दिया ! बाबा  जिंदगी भर 'कॉंग्रेस' का झोला और झंडा ढोते रहे  - इसका मलाल मुझे आज तक है और रहेगा ! एक बार 'लालू के एक काबिना मंत्री ' ने मुझ से कहा - 'तुम्हारे बाबा जिदगी भर कॉंग्रेस का झोला उठाया - क्या मिला ? हमको देखो - हमने राजनीति तुम्हारे बाबा से सीखी और अब काबिना मंत्री बन गए ! अब मै उस काबिना मंत्री को क्या कहता - की राजनीति हमारी शौक हुआ करती है - पेशा नहीं !

बाबा के चाचा जी ही घर के अभिभावक थे ! बड़े ज़मींदारों को क़र्ज़ देने का सिलसिला जारी था ! अँगरेज़ १९४० के बाद धीरे धीरे वापस लौटने लगे थे ! अंग्रेजों की सैकड़ो एकड़ में कोठिया होती थी ! मेरे परिवार के लोगों ने भी २ कोठीओं का सौदा कर लिया - एक में एक हज़ार एकड़ ज़मीन और एक में ४०० एकड़ ! पैसे देने के लिए - बोरा में पैसा दाल के 'हाथी' पर लाद दिया गया ! अब घर में एक भी पैसा नहीं बचा था - घर के किसी सदस्य ने बोला - अगर कोई बड़ा ज़मीदार आएगा और पैसे मांगेगा - तो हम क्या बोलेंगे ? "इज्जत , चला जायेगा " ! 'इज्जत बचाने के चक्कर में अंग्रेजों की कोठियां नहीं खरीद पाए " ! एक भी खरीद लिए होते तो - शायद 'चम्पारण और सारण' के सब से धनिक 'भूमिहारों' में गिनती होती !

ज़मींदार थे ! ज़मीन का टैक्स वसूलते थे ! यह एक प्रकार का 'ठिकेदारी' था ! विशुध्द ज़मींदार होने कारण खुद के नाम ज़मीन बहुत ही कम था !  १९५८ में ज़मींदारी प्रथा खत्म हो गयी ! अचानक से परिवार में दिक्कते आ गयीं ! ज़मीन बहुत कम था - बहुत ही कम ! जो सगे सम्बन्धी कल तक - धनी होने के वावजूद सर उठा कर बात नहीं करते थे - अब वो अचानक से बड़े लगने लगे ! कष्ट का दौर शुरू हो गया ! घर की लड़किओं की शादी 'पहाड़' लगने लगी !

अब बस एक ही उपाय रह गया - बच्चों को शिक्षा दो और बढ़िया 'नौकरी' में भेजो ..

क्रमशः ...


रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !