Monday, February 13, 2017

रेडिओ की याद ... World Radio Day




आज भी कान में गूंजता है - "ये आकाशवाणी है ..अब आप रामानन्द प्रसाद सिंह से समाचार सुनिए" ...
आज वर्ल्ड रेडिओ डे है - रेडिओ से जुडी कई यादें हैं - यूँ कहिये जिस जेनेरेशन से हम आते हैं - वो रेडिओ से ही शुरू होता है ..फिर रेडिओ से स्मार्टफोन तक का हमारा सफ़र ..:) 

बाबा पौने नौ वाला राष्ट्रीय समाचार जरुर से सुनते थे - फिर समाचार के वक़्त ही रात्री भोजन - बड़े वाले पीढ़ा पर बैठ कर - वहीँ बगल में हम भी उनके गोद में ..:) लगता था ..ये लोग कौन हैं ..जो 'समाचार पढ़ते' हैं ...बस एक कल्पना में उनकी आकृती होती थी ...साढ़े सात का प्रादेशिक समाचार ...फिर दोपहर का धीमीगती का समाचार ...हर घंटे समाचार ..:) 
रेडिओ विश्वास था - जब तक रेडिओ ने कुछ नहीं कहा - कैसे 'झप्पू भैया' का बात मान लें ...रेडिओ ने कह दिया ...जयप्रकाश नारायण नहीं रहे - स्कूल में छुट्टी ...रेडिओ अभी तक नहीं कहा ...छुट्टी नहीं हुई ...
कॉलेज में पढता था तो रोज शाम बीबीसी - हिंदी सेवा जरुर सुनता था ! भारत से लेकर पुरे विश्व की खबर ! तब अमेरिका , ऑस्ट्रेलिया , और अन्य देशों के हिंदी सेवा सभी के सभी के समय पता होते थे  ! घर में एक ग्रामोफोन होता था , जिसमे रिकॉर्ड प्लेयर और रेडिओ साथ साथ ! फिर पानासोनिक का बड़ा वाला टू इन वन ! मीडियम वेव , शोर्ट वेव और मालूम नहीं क्या क्या !
इलेक्ट्रोनिक्स और कम्युनिकेशन इंजिनियर होने के नाते एक बात बताता हूँ - सबसे मुश्किल काम होता है - एंटीना डिजाईन ! एंटीना दिखने में जितना सिंपल - उसका डिज़ाइन - उतना ही मुश्किल ! 
शौक़ीन ट्रांजिस्टर रखते थे - क्रिकेट की कमेंट्री कान में लगा कर , शाल ओढ़ कर छत पर ऐसे सुन रहे होते थे जैसे वो भी स्टेडियम में बैठों हो ! इंजीनियरिंग में मेरे लिए सबसे मुश्किल था - ट्रांजिस्टर कैरेक्ट्रिक्स समझना :( आज भी दिमाग में नहीं घुसता है :( 
कुछ चाचा / मामा टाईप आइटम होते थे ...कब किस स्टेशन से गीत आ रहा होगा ...एकदम से एक्सपर्ट ...रेडिओ हाथ में लिया और धडाक से वही स्टेशन ..हम बच्चे मुह बा के उनको देखते ...गजब के हाई फाई हैं ...फिर उन गीतों में फरमाईश ...क्या जमाना था ..लोग एक गीत सुनने के लिए ..पोस्टकार्ड पर पुरे गाँव / मोहल्ले का नाम लिख भेजते थे ...फलना पोस्टबैग नंबर ...दो नाम आज तक याद हैं - झुमरी तिलैया से सबसे ज्यादा चिठ्ठी आते थे और महाराष्ट्र के 'बाघमारे' परिवार पुरे खानदान का नाम लिख भेजते थे !
हिंदी मीडियम दस बजिया स्कूल में पढता था , स्कूल जाने के पहले विविध भारती पर नए गाने जरुर सुनता था ! तब श्रीदेवी और जितेन्द्र के गीत आते थे - ' एक आँख मारू तो ...' ! फिर गिरफ्तार का गीत - धुप में न निकला करो ...रूप की रानी :)
रेडिओ संग यादों की बहार लौट आई है ...देर रात विविध भारती पर किसी कहानी में पिरोये गीतों की माला ...सुनते सुनते सो जाना ..ऐसे जैसे वो कोई सच्ची कहानी हो :) 
अब कार में रेडिओ सुनते हैं ! एफएम पर ! पहली दफा - तीन साल पहले - रेडिओ मिर्ची वालों ने बुलाया था - स्टूडियो में घुसते ही रोमांचित और भावुक हो गया ! चार घंटे - पुरे बिहार को अपनी पसंद के गीत सुनाया ! खूब मजा आया :) 

रात के सन्नाटे में ....जब पूरा गाँव सो जाता था ...तब भी कहीं किसी के घर से देर रात तक रेडिओ से गीत बजता था ...किसी ने कहा ..'नयकी भाभी' हैं ..बिना गीत सुने नींद नहीं आती है ...'नयकी भाभी' को देखने उनके घर पहुँच गए ..पर्दा से उनको झाँक ...भाग खड़ा ...उन्होंने ने भी प्यार से बुलाया - बउआ जी ..आईये ...:)

फिर से एक रेडिओ खरीदने की तमन्ना जाग उठी है ...बुश या फिलिप्स की ...हॉलैंड वाली :) रेडिओ कल्पना शक्ति बढ़ाती थी ...रेडिओ पर अचानक से बजने वाले पसंदीदा गीत ...रूह को तसल्ली दे जाते हैं ...अचानक से ....:))

@RR 2014 - 2017 

Sunday, February 12, 2017

कमाल अमरोही की पाकीज़ा ....

सिनेमा - सिनेमा - "पाकीज़ा" 
अधिकतर दर्शक यही समझते हैं - इस सिनेमा में मीना कुमारी ही पाकीज़ा हैं - बल्की कहानी कुछ और है - बकौल कमाल अमरोही के पुत्र - 
सिनेमा के अंतिम दृश्यों में - जब राजकुमार मीना कुमारी को इज्जत के साथ विदा करने ले जाते हैं - उसी दृश्य में - एक छोटी सी टीनएजर लड़की पर कैमरा फोकस करता है - वो लड़की बारात को देख बहुत खुश होती है - उसे लगता है एक दिन उसके लिए भी बारात आयेगी और वो भी मीना कुमारी की तरह हंसी खुशी विदा लेगी - पर ऐसा नहीं है - वो लड़की उसी चुंगल में फंसने जा रही थी - जिस चुंगल मीना कुमारी आज़ाद होने वाली थी - "ट्रैप" ..! 
इस सिनेमा के एडिटर डी एन पाई ने लगभग इस दृश्य को उड़ा दिया था - जब कमाल अमरोही को पता चला - वो पाई साहब को समझाए - पाई साहब बोले - "यही लड़की पाकीज़ा है ..यह बात कौन समझेगा ? " कलाम अमरोही बोले - " अगर एक आदमी भी समझ गया - यही लड़की पाकीज़ा है - समझो मेरी मेहनत पुरी हुई - दिल को तसल्ली मिलेगी " ..:)
लगभग एक साल बाद - कमाल अमरोही को एक दर्शक का ख़त आया - जिसमे उस मासूम लड़की के पाकीज़ा होने का ज़िक्र था ! कमाल आरोही ने पाई साहब को बुलाया और ख़त दिखाया ...:) फिर उस दर्शक को पुरे देश के सिनेमा हॉल के लिए एक फ्री पास जारी किया ...अब वो दर्शक पुरे भारत के किसी भी सिनेमा हॉल में कमाल अमरोही के ख़ास गेस्ट बन पाकीज़ा को जब चाहें और जितनी बार चाहें देख सकते थे  ! :)



जब दो साल पहले मैंने यह पोस्ट लिखा तो पाठकों की डिमांड उस पाकीज़ा को देखने की हुई - युटुब पर इस सिनेमा को चला कर उस दृश्य तक पहुँच मैंने स्क्रीन शॉट लिया ..फिर कमेन्ट में इस तस्वीर को डाला ! यही है - कमाल अमरोही की पाकीज़ा ....!
रेडिओ मिर्ची पटना के पूर्व अधिकारी उत्पल पाठक ने एक बढ़िया कमेन्ट किया था -

आभार है सर , हमेशा की तरह बढ़िया लिखा है आपने , दर असल उस दिन मैंने बस इस फिल्म में हुयी मेहनत का एक उल्लेख किया था जहाँ एक गीत के फिल्मांकन के लिये भोर होने तक का इंतज़ार कई रातों तक किया गया था क्यूंकि निर्देशक चाहते थे भोर में जो ट्रेन गुज़रती है उसकी सीटी की वास्तविक आवाज़ गीत में रिकार्ड हो। अपने आप में अद्भुत अदाकारी और तालीम ओ तहज़ीब को बयान करती हुयी यह फिल्म कई मायनों में महत्वपूर्ण है। ऐसा भी कहा जाता है कि फिल्म के अधिकांश गीत मजरूह साहब को लिखने थे , इसी बीच उन्हें किसी मुशायरे का न्योता आ गया और उन्होंने वहां जाने की ताकीद की , लेकिन कमाल अमरोही साहब चाहते थे कि वो गेट पूरे करके जाएँ , लेकिन मजरूह साहब ने मुशायरे को प्राथमिकता दी और बाद में कैफ़ी साहब ने गीत लिखे। १९५८ में शुरू हुयी फिल्म को पूरा होकर रिलीज़ होने में १९७१ तक १७ साल का समय लगा जिसका बड़ा कारण मीना कुमारी और कमाल अमरोही के रिश्तों के कड़वाहट जो बाद में तलाक तक पहुँच गयी थी , लेकिन अपनी मृत्यु से ठीक पहले मीना जी फिल्म को करने के लिये राज़ी हो गयीं। फिल्म के एक गीत में नृत्य के कुछ भाव मीना उम्र और बीमारी के कारण पूरे कर पाने में असमर्थ हुयी तो पद्मा खन्ना को घूँघट पहना के उन दृश्यों को फिल्माया गया। 
फिल्म के रिलीज़ होने के बाद सामान्य नतीजे आ रहे थे लेकिन एक महीने बाद मीना जी इस फ़ानी दुनिया से विदा लेते हुये चल बसीं और ये उनकी आख़िरी फिल्म साबित हुयी , उनकी दुखद मृत्यु के बाद फिल्म की लोकप्रियता और बढ़ गयी।



कोई भी क्रिएटीव इंसान अपनी क्रेएटिविटी में कुछ अलग सन्देश देना चाहता है - जिसे बहुत कम लोग समझ पाते हैं - क्योंकी हर कोई उस नज़र से ना पढता है और ना ही देखता है ...और उसको असल मेहताना उसी दिन पूरा मिलता है - जिस दिन कोई उसके सन्देश को सचमुच में समझता है ...:)

@RR

गुलाब बस गुलाब होते हैं ...:))

यह गुलाब है । ऋतुराज वसंत के एक सुबह खिला हुआ गुलाब । गुलाब के साथ कोई विशेषण नहीं लगाते , गुलाब की तौहिनि होती है , बस इन्हें गुलाब कहते हैं । बड़ी मुश्किल से गुलाबी गुलाब दिखते है । इन्हें तोड़ना नहीं , मिट्टी से ख़ुशबू निकाल तुमतक पहुँचाते रहेंगे । 
गुलाब मख़मली होते हैं । गुलाब सिल्क़ी होते हैं । गुलाब ख़ुशबूदार होते हैं । बोला न ...गुलाब के साथ कोई विशेषण नहीं लगाते ...गुलाब बस गुलाब होते हैं ...उनकी ख़ूबसूरती और सुगंध बस महसूस किए जाते हैं ...:)) गुलाब तो बस माली का होता है ...दूर से माली गुलाब को देखता है और गुलाब अपने माली हो ...वही माली जो चुपके से गुलाब के पेड़ के जड़ में खाद पानी दे जाता है - गुलाब खिलता रहे तो खर पतवार को हटा देता है ...और खिला गुलाब मुस्कुराता रहता है ...
यह गुलाब है । ऋतुराज वसंत के एक सुबह खिला हुआ गुलाब ...कहीं ऐसा गुलाब देखा है ? 
अगर ऐसा गुलाब नहीं दिखा तो ख़ुद को आइना में देख लेना ...:)) तुम्हारी ख़ुशबू और तुम्हारे रंग वाला - गुलाबी गुलाब ...:)) 
( राष्ट्रपति भवन के मुग़ल गार्डन से हिंदुस्तान टाइम्स के लिए खिंचा हुआ - एक गुलाबी गुलाब ) 
~ फ़रवरी / 2016 


Thursday, February 9, 2017

एक छोटी सी कहानी - मेरी जुबानी

बात वर्षों पुरानी है ! धीरे धीरे कर के ,बंगलौर से सारे दोस्त विदेश या देश के दुसरे प्रांत जाने लगे थे ! हम अमित के साथ मल्लेश्वरम सर्किल पर रहते थे ! अमित को कलकत्ता में नौकरी लग गयी थी ! एक दोपहर उसको विदा करने बंगलौर स्टेशन पर जाना हुआ ! भारी मन से उसको विदा कर के प्लेटफार्म से बाहर निकला ही की नज़र पडी एक जानी पहचानी सूरत पर ! वो थे एक , बचपन के जान पहचान पर उम्र में एक दो साल छोटे , रिश्ते में चाचा / दादा कर के कुछ लगते थे लेकिन मै उनको नाम से ही पुकारता था ! गले मिले ! छोटा कद , काफी गोरा रंग और नीली आँखें , बेहद मीठी जुबान ! वहीँ भोजपुरी में ही बात चित शुरू हो गयी ! तुम कहाँ तो तुम कहाँ ! तुम कब से इस शहर में तो तुम कब से इस शहर में ! वो वहीँ के एक बेहतरीन विश्वविद्यालय में पढ़ते थे जो शहर से कुछ दूरी पर था ! 
अगले ही शाम महाशय मेरे डेरा / रूम पर पधार गए ! सुबह के बासी बचे अखबारों के पन्नों में उलझा हुआ था ! गप्प हुआ ! थोड़ा और शाम हुआ ! वो मेरे आगंतुक थे सो मैंने उन्हें डिनर पर इनवाईट किया ! उनको डिनर के लिए हाँ करने में माइक्रो सेकेण्ड भी नहीं लगा ! मैं अपना नया चमचमाता बजाज चेतक निकाला और वो भी बड़े हक से पीछे बैठ गए ! उनदिनों , इन्डियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साईंस के जिमखाना का रेस्त्रां मेरा पसंदीदा डिनर स्थल था ! कलेजी फ्राई , मटन के साथ कुछ एक वहीँ के एमटेक के विद्यार्थी दोस्त होते थे ! महाशय भी मेरे दोस्तों से मिल खुश हुए ! मेरे साथ वो भी कलेजी फ्राई चांपे ! फिर वो बस पकड़ अपने विश्वविद्यालय के लिए निकल पड़े और मै अपने रूम / डेरा पर ! 
अब धीरे - धीरे उनकी फ्रीक्वेंसी बढ़ने लगी ! कभी किसी इतवार वो सुबह ही आ जाते ! इतना मधुर बोलते ! मेरी बडाई में कोई कोई कसर नहीं छोड़ते ! एक आध सप्ताह बाद - बड़े कॉन्फिडेंस से वो मेरा स्कूटर भी उधार मांग लेते - एक सुबह लेकर जाते तो देर शाम लौटाते frown emoticon
पर बोलते इतना मीठा थे की मुझे लगता की वो मेरा स्कूटर लेकर मुझ पर कोई उपकार किये हैं ! मै अपने स्कूटर की चावी उनके हाथ में देते हुए बहुत खुश हो जाता था , कोई तो इस अनजान शहर में है जो मुझे इतना भाव देता है ! 
मेरी तनखाह सात तारिख को मिलती थी , एक सात तारीख वो शाम पदार्पण लिए ! थोड़े मायूस थे ! अचानक से वो मुस्कुराने लगे और सीधे बड़े हक से मुझसे पांच हज़ार मांग दिए ! संकोच / लिहाज से परिपूर्ण मेरा व्यक्तित्व ना नहीं कह सका और और अगले दिन मैंने उनको बैंक में बुला लिया ! मेरी ज्यादा दिन की नौकरी नहीं थी , घर परिवार में लोगों को मदद करते देखा था ! मुझे ऐसा महसूस हुआ - मै भी दो पैसा का आदमी हो गया हूँ - कोई मुझसे भी मदद मांग रहा है - इसी भावना से ओत प्रोत होकर मैंने उस जमाने में उनके हाथ में पांच हज़ार पकड़ा दिए ! वो उस दिन फिर से मेरा स्कूटर भी मांग लिए ! मै ना नहीं कह सका ! तीन दिन बाद स्कूटर लौटाए ! frown emoticon
उनदिनों अपने कॉलेज के दोस्तों के अलावा मै किसी और से ज्यादा और जल्दी नहीं खुलता था ! फिर भी एक रोज मैंने उनसे कहा - आप दिखने में किसी हीरो से कम नहीं , क्यों नहीं मोडलिंग करते हैं - साथ ही अपनी कुछ गीत / ग़ज़ल / नाटक की कहानी सुनायी ! जबाब आया - पिछले साल ही 'फेमिना' में मेरी फोटो छप चुकी है ! मै और खुश हुआ - जिस आदमी का फेमिना में फोटो छपी वो इंसान मेरे रूम पर इतनी आसानी से आ जा रहा है ! पैसा और स्कूटर को लेकर जो हलचल मेरे मन में हो रही थी - वो सब एक पल में ख़त्म हो गया ! लगा धन्य हो गया , ऐसे मित्र को पाकर :) 
एक दो महीने बीते , मेरा पैसा वापस नहीं हुआ ! मन में हल्की बेचैनी लेकिन 'फेमिना' के मॉडल के नाम पर , मेरे मन के बुरे ख्याल ख़त्म हो जाते ! यही सोचता - इतना हाई प्रोफाईल नौजवान - कितना झुक कर मुझसे मिलता है , जरुर से व्यक्तित्व बहुत बड़ा होगा ! 
फिर वो अचानक से एक दिन बोल बैठे - तुम्हारा भी फोटो फेमिना में छपवा देंगे ! मै एकदम से हडबडा गया ! अचानक से कल्पना की दुनिया में खो गया ! मुझे पटना के अपने जमाने की 'मुचुअल क्रश' , सब के सब देहाती लगने लगी ! अब मेरी तस्वीर वेल्हम, मेयो और ऋषि वैली के गर्ल्स होस्टल के दीवार पर लगेगी - 'जो जीता वही सिकंदर' की आयशा जुल्का की जगह पूजा बेदी ख्वाबों में नज़र आने लगी ! ऐसे न जाने कितने ख्याल हर पल आने लगे ! अब मै सड़क पर तन के भी चले लगा ! ऐसे वैसों से निगाहें मिलाने का ख्याल - मैं मन ही मन ही एक कुटील मुस्कान देने लगा  ! 'चल हट टाईप' एक्सप्रेशन मेरे चेहरे पर आ जाता ! सकरात्मक सोच में डूबा हुआ मै - नौकरी भी घटिया लगने लगी ! अब मै महज कुछ दिनों का मेहमान !
 फोटो सेशन का दिन तय हुआ - एक रविवार सुबह ! उन्होंने कहा की पहले राऊंड में वो खुद मेरी तस्वीर खींचेंगे , दुसरे राऊंड में फेमिना  का  फोटोग्राफर खिंचेगा  ! कैमरा का इंतेज़ाम भी वही करेंगे , बस रील का खर्च मुझे देना होगा ! मै एकदम से अक्षय कुमार के पोज में डेनिम जैकेट और टाई पहन बंगलौर विधानसभा और एमजी रोड पर - अनगिनत फोटो खिंचवाया , गजब गजब का पोज , ब्रिगेड रोड के मॉल में - कैप्सूल लिफ्ट में , कभी गर्दन टेढ़ा तो कभी गर्दन सीधा , कभी रेलिंग पकड़ के तो कभी किसी को घूरते हुए , कभी टाई तो कभी शर्ट का दो बटन खुला हुआ ! उसी झोंक में मैंने एक नया रे बैन भी ले लिया था , नौकरी के लिए निकलते वक़्त , माँ ने जो पैसे दिए थे वो रे बैन को भेंट चढ़ गया ! एक रेमंड का सूट का भी इंतजाम हुआ ! फोटो खिंचवाने के दिन सुबह चार बजे ही जाग गया था ! बूट पर - दे पॉलिश ...दे पॉलिश ...दे पॉलिश :) मेरी किस्मत जो खुलने वाली थी ! उस वक़्त उनको दिए हुए पांच हज़ार याद में आते तो मुझे खुद ग्लानी होती !
सुबह के वक़्त एमजी रोड पर फोटो खिंचवाते हुए , मुझे ऐसा लग रहा था जैसे की अब बस अगला साल सोनाली बेंद्रे मुझे प्रोपोज कर देगी ! तब वो बहुत बढ़िया लगती थी ! थोड़ा अलग सा क्लास नज़र आता था ! काल्पनिक व्यक्ती को और क्या चाहिए ! मन ही मन सोचता - वो महाशय मुझसे पांच हज़ार ही क्यों मांगे, मुझे लगा ऐसे महाशय के लिए तो दस बीस हज़ार भी कम हैं जो मुझे दुनिया की उस कक्ष में स्थापित करने को तैयार था - जो मेरी कल्पना से परे था ! अब वो मेरे लिए किसी भगवान् से कम नहीं थे ! 
अब वो रोज शाम आने लगे , हम भी थोड़े खुल गए ! हर शाम एक ठंडी बियर और चिकेन फ्राईड राईस और उनकी मीठी बोली ! हम हर वक़्त खुद को धन्य समझते जो इस अनजान शहर में , कोई तो मिला ! वरना दफ्तर में रोज मैनेजर की गाली ही मिलती ! रोज कल्पना करता - बड़ा मॉडल बन जाऊंगा तो एक दिन बड़ी गाडी से इसी दफ्तर में आऊँगा तो मेरा मेनेजर मुझे देख अपनी सीट खाली करेगा ! पटना जायेंगे तो घर में ही रहेंगे , कोई मोहल्ला - गली का चक्कर नहीं काटेंगे - जैसे ख्याल , ख्यालों की दुनिया ने मुझे अन्दर ही अन्दर वजनदार बना दिया था ! भगवान् की कृपा से नाक नक्श ठीक ही था , बस लम्बाई छः फीट वाली नहीं थी ! 
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माँ के मार्फ़त पिता जी को भी खबर भेजवा दिया - अभी कुछ दिन मेरी शादी की बात चीत रुकवा दी जाए और कम से कम पटना / बिहार में तो कदापि नहीं ! ...कहाँ मेरा लीग / क्लास / स्टैण्डर्ड और कहाँ पटना के लोग ! पिछले दस ग्यारह साल से आँखों से सामने से गुज़री सारी लड़की लोग - एक नज़र में आ जाती , फिर मै कुटील मुस्कान देता , आईना में खुद को देखता और सोनाली बेंद्रे का गीत मेरे टू इन वन पर बजता - 'संभाला है मैंने - बहुत अपने दिल को - जुबाँ पर तेरा ही नाम आ रहा है ' :) अब बस मंजील एक ही नज़र आती ! 
अब मेरा कॉन्फिडेंस भी जाग गया था ! वीकएंड में , जिस एमजी रोड पर , माइक्रो और मिनी के तरफ देखने की चाहत ही धड़कन बढ़ा देती थी , अब मै किसी पब में घुस आँख में आँख डाल कर मुस्कुराता ! फेमिना मैगज़ीन खरीदाने लगा ! कबाड़ी के यहाँ से पुराने एडिशन भी , पर वो वाला एडिशन नहीं मिला जिसमे उस महाशय का फोटो छपा था ! कभी कुछ शंका आती तो लगता - ऐसा आदमी झूट थोड़े न बोलेगा , ऐसी सोच मेरे मन में ग्लानी ला देती ! जो इंसान मुझे इतना बड़ा अवसर दे रहा है उस इंसान के बारे में , मै इतना गलत कैसे सोच सकता हूँ :( 

रील साफ़ हुआ , कुछ फोटो ठीक आये , कुछ में कैमरा हील गया , कुछ में आधा काला और सामने से धुप !किसी में पीछे कोई तो किसी में मेरा कन्धा झुका तो किसी में गर्दन टेढ़ा !  frown emoticon
मन दुखी हुआ , बहुत दुखी  ! संकोच से कुछ नहीं बोला और महाशय मेरा साफ़ किया हुआ रील लेकर निकल गए की फेमिना के लोकल फोटोग्राफर से बात करने ! फिर वो लौट कर कभी मेरे पास नहीं आये 21 साल पहले ...पांच हज़ार का कुछ तो महत्व रहा होगा ...कई ख्याल आये ! बाद में पता चला ...उनका मै ही सिर्फ अकेला शिकार नहीं था ...और लोग भी अलग अलग ढंग से हुए ...आज वो पांच हज़ार चक्रवृधी ब्याज की तरह ..मालूम नहीं कितना होता ...:) हा हा हा हा ....उसी दौर की एक तस्वीर ...बंगलौर विधानसभा के सामने से ...हा हा हा हा 

@RR

धरा , प्रकृति और वसंत की आहट - एक संवाद

धरा - सखी , ये किसकी आहट है ? 
प्रकृति - ये वसंत की आहट लगती है ..
धरा - कौन वसंत ? हेमंत का भाई ऋतुराज वसंत ? 
प्रकृती - हाँ , वही तुम्हारा ऋतुराज वसंत ...:)) 
धरा - और ये शिशिर ? 
प्रकृति - वो अब जाने वाला है ...
धरा - सुनो , मैं कैसी दिख रही हूँ ...
प्रकृति - बेहद ख़ूबसूरत ...
धरा - सच बोल रही हो ...न..
प्रकृति - मैंने कब झूठ बोला है ...
धरा - ऋतुराज के साथ और कौन कौन है ...
प्रकृति - कामदेव हैं ...
धरा - ओह ...फिर मुझे सजना होगा ...
प्रकृति - मैंने तुम्हारा शृंगार कर दिया है ...
धरा - वो कब और कैसे ...
प्रकृति - सरसों के लहलहाते खेतों से ..आम्र की मंजरिओं से ...
धरा - सुनो , फागुन भी आएगा ..न ...
प्रकृति - तुम बुलाओ और वो न आए ...:)) 
धरा - अबीर के संग आएगा ? 
प्रकृति - गुलाल के संग भी ...
धरा - सुनो ..मेरा और शृंगार कर दो ...
प्रकृति - सूरज की नज़र लग जाएगी ...
धरा - सुनो ..ये ऋतुराज वसंत कब तक रुकेंगे ? 
प्रकृति - कहो तो ...पूरे वर्ष रोक लूँ ...
धरा - नहीं ...नहीं...सच बताओ न ...
प्रकृति - चैत कृष्ण पक्ष तक तो रुकेंगे ही ...
धरा - कामदेव कहाँ हैं ? 
प्रकृति - तुम्हारे नृत्य का इंतज़ार कर रहे हैं ...
धरा - थोड़ा रुको ...कब है नृत्य...
प्रकृति - वसंत पंचमी को ...
धरा - सरस्वती पूजन के बाद ? 
प्रकृति - हां ...
धरा - सरस्वती कैसी हैं ? 
प्रकृति - इस बार बड़ी आँखों वाली ...
धरा - और उनका वीणा ? 
प्रकृति - उनके वीणा के धुन पर ही तुम्हारा नृत्य होगा ...
धरा - सुनो ...मेरा और शृंगार कर दो ...
प्रकृति - कर तो दिया ...
धरा - नहीं ...अभी घुँघरू नहीं मिले ...
प्रकृति - वो अंतिम शृंगार होता है ...
धरा - फिर अलता ही लगा दो ...
प्रकृति - सारे शृंगार हो चुके हैं ...
धरा - फिर नज़र क्यों नहीं आ रहा ...
प्रकृति - जब ऋतुराज आते हैं ...धरा को कुछ नज़र नहीं आता ...
धरा - कहीं मै ख्वाब में तो नहीं हूँ ...
प्रकृती - नहीं सखी ...हकीकत ...वो देखो तुम्हारा सवेरा ...
धरा - दूर से आता ...ये कैसा संगीत है ...
प्रकृती - कामदेव के संग वसंत है ...ढोल - बताशे के संग दुनिया है ...
धरा - मेरा बाजूबंद कहाँ है ...? 
प्रकृती - धरा को किस बाजूबंद की जरुरत ? 
धरा - नहीं ...मुझे सोलहों श्रृंगार करना है ..मेरी आरसी खोजो ..
प्रकृती - मुझपर विश्वास रखो - मैंने सारा श्रृंगार कर दिया है ...
धरा - नारी का मन ..कब श्रृंगार से भरा है ..
प्रकृती - चाँद से पूछ लो ...:))
धरा - सुनो ...ऋतुराज आयें तो तुम छुप जाना ...आँगन के पार चले जाना ...
प्रकृती - जैसे कामदेव में ऋतुराज समाये - वैसे ही तुम में मै समायी हूँ ...
धरा - नहीं ...तुम संग मुझे शर्म आएगी ...
प्रकृती - मुझ बिन ..तुम कुछ भी नहीं ...
धरा - सखी ..जिद नहीं करते ...
प्रकृती - मै तुम्हारी आत्मा हूँ ...आत्मा बगैर कैसा मिलन ..
धरा - फिर भी तुम छुप जाना ...मेरे लिए ...ऋतुराज वसंत के आगमन पर ....:))  
..................
~ RR / 09.02.2016 

Sunday, February 5, 2017

माँ ~ कुछ यादें ...कुछ शब्द


                                              माँ ( 8th May 1949 - 5th Feb 2013 ) 

माँ , 
आज शाम माँ अपनी यादों को छोड़ हमेशा के लिए उस दुनिया में चली गयीं - जहाँ उनके माता पिता और बड़े भाई रहते हैं ! 
पिछले बीस जनवरी को माँ का फोन आया था ...मेरी पत्नी को ...रंजू से कहना ...हम उससे ज्यादा उसके पापा को प्रेम करते हैं ...हम माँ से मन ही मन बोले ...माँ ..खून का रिश्ता प्रेम के रिश्ते से बड़ा होता है ...वो हंसने लगी ..अगले दिन भागा भागा उनके गोद में था ...जोर से पकड़ लिया ...माँ को रोते कभी नहीं देखा ...उस दिन वो रो दीं ...! आजीवन मुझे 'आप' ही कहती रहीं ....कई बार टोका भी ...माँ ..आप मुझे आप मत बुलाया कीजिए ...स्कूल से आता था ...शाम को ...चिउरा - घी - चीनी ...रात को चिउरा दूध ...मीठा से खूब प्रेम ...तीनो पहर मीठा चाहिए ...छोटा कद ..पिता जी किसी से भी कहते थे ...एकदम मिल्की व्हाईट ...रंजू के रंग का ....पटना पहुँचता था ...खुद से चाय ...कई बार बोला ..माँ आप कितना चाय पीती हैं ...मुझे भी यही आदत ...आठ साल पहले ...गर्भाशय का ओपरेशन ...होश आया ...जुबान पर ...रंजू ...पापा को चिढाया था ...माँ आपसे ज्यादा मुझसे प्रेम ....
शादी के पहले और शादी के बारह साल तक ..कभी प्याज़ लहसुन नहीं ....पापा अपनी गृहस्थी बसाए ...पहले ही दिन मछली ...माँ रोने लगीं ..कहने लगीं ...मछली की आँखें मुझे देख रही हैं ...करुना ...यह सब मैंने आपसे ही सिखा था ....
माँ...आपसे और क्या सिखा ...बर्दास्त करना ...मन की बात जुबान तक नहीं लाना ...किसी भी समस्या के जड़ पर पहुँच ...सामने वाले को माफ़ कर देना ...माँ ..आप मुझे हिंदी नहीं पढ़ाई ...पर खून को कैसे रोक सकती थी ...बहुत मन था ...जो लिखता हूँ ...आप पढ़ती ...फिर अशुद्धी निकालती ....फिर मेरी सोच देख बोलतीं ...रंजू आप कब इतने बड़े हो गए ...
आपका तानपुरा ...शास्त्रीय संगीत ...कुछ भी तो नहीं सिखाईं ...खून ..आ गया ...बिना सीखे ..संगीत की समझ ....
मेरी शादी के दिन आप कितना रोयीं थी ....आप उस दिन बड़ी हुई थीं ...आज आपको खोकर मै बड़ा हो गया ...माँ ..जाने के पहले एक बार भी मन नहीं किया ...रंजू से बात कर लें ...हमदोनो कितना कम बात करते थे ...याद है ...आपके साथ कितना सिनेमा मैंने देखा है ...जुदाई / आरज़ू / दिल ही तो है..जया भादुड़ी ...अभिमान का रिकोर्ड ..रोज सुबह बजाना .. ...सिर्फ आप और हम ...पापा को आप पर कभी गुस्साते नहीं देखा ...बहुत हुआ तो ...रंजू के महतारी ..एने वोने सामान रख देवे ली ...पापा तो सब कुछ छोड़ दिए आपके लिए ...आप उनको अकेला क्यों छोड़ दीं ...बोलिए न ....इस प्रेम के रिश्ते में बेवफाई कहाँ से आ गई...
 कई सवाल अभी बाकी है ...कल सुबह पूछूँगा ...

~  5 फ़रवरी , 2013 

हर किसी की एक 'माँ' होती है - मेरी भी माँ थीं ...पिछले साल आज के ही दिन वो मुझे छोड़ अपने माता - पिता - भाई के पास चली गयीं .....यादों के फव्वारे में जब सब कुछ भींग ही गया ...फिर इस कलम की क्या बिसात ...
माँ ने जो खिलाया ..वही स्वाद बन गया ..जो सिखाया वही आंतरिक व्यक्तित्व बन गया ...
'माँ' विशुद्ध शाकाहारी थी - दूध बेहद पसंद - दूध चिउरा / दूध रोटी और थोड़ा छाली ..हो गया भोजन :) सुबह चाय - शाम चाय - दोपहर चाय - जगने के साथ चाय - सोने के पहले चाय ..चीनी और मिठाई बेहद पसंद ...बचपन में मेरे लिए चीनी वाला बिस्कुट आता था - दोनों माँ बेटा मिल कर एक बार में बड़ा पैकेट ख़त्म :) बिना 'मीठा' कैसा भोजन ...:)) 
मात्र आठ - नौ साल की उम्र में वो अपने पिता को खो बैठीं - जो अपने क्षेत्र के एक उभरते कांग्रेस नेता थे - श्री बाबु के मुख्यमंत्री काल में - श्री बाबु के ही क्षेत्र में - उनके स्वजातीय ज़मींदार की हत्या अपने आप में बहुत बड़ी घटना थी - परिवार से लेकर इलाका तक दहल चूका था - मैंने 'माँ' के उस अधूरे रिश्ते को बस महसूस किया - कभी हिम्मत नहीं हुई - 'माँ' आपको तब कैसा लगा होगा ...यह बात आज तक मेरे अन्दर है - कभी कभी माँ हमको बड़े गौर से देखती थीं - फिर कहती थी - 'रंजू ..आपको देख 'चाचा' की हल्की याद आती है' ...वो अपने पिता जी को चाचा ही कहती थीं ...हम सर झुका कर उनके पास से निकल जाते थे ...प्रेम की पराकाष्ठा...स्त्री अपने पुत्र में ..पिता की छवी देखे ...
माँ तो माँ ही हैं ...किस पहलू को याद करूँ या न करूँ ...एक सम्पूर्ण प्रेम ...फिर एक पुरुष आजीवन उसी प्रेम को तलाशता है ...जहाँ कहीं 'ममता की आंचल' की एक झलक मिल गयी ...वह वहीँ सुस्ताना चाहता है ...
माँ ..आप हर पल जिंदा है ..मेरे अन्दर ...!!! 
मेरा खुद का भी पिछला एक साल बेहद कमज़ोर और उतार चढ़ाव का रहा है ...वो सारे लोग जो जाने अनजाने मेरी मदद को आगे आये..कमज़ोर क्षणों में भी मेरी उँगलियों को पकडे रहे ...उन सबों को ...मेरी 'माँ' की तरफ से धन्यवाद ...! 
और क्या लिखूं ....:))) 

~ 5 फ़रवरी , 2014 

माँ , 
कहते हैं - माँ अपने बच्चे को कभी अकेला नहीं छोड़ती - कभी गर्भ में तो कभी गोद में - कभी आँचल में तो कभी एहसासों में - कभी आंसू में तो कभी मुस्कान में ! औलाद भी तो कभी अपने माँ से अलग नहीं होती - कभी आँचल के निचे तो कभी ख्यालों में - कभी जिद में तो कभी मन में ...! 
माँ...बचपन में मेरे कान में दर्द होता था ...सारी रात एक कपडे को तावा पर गरम कर के ...आप मेरे कानो को सेंकती रहती थी ..अब मेरे कानों में दर्द नहीं होता ...क्योंकी अब आप नहीं...
माँ...आज आपका सारा पसंदीदा गाना सुना ...आम्रपाली का वो गीत ...'जाओ रे ..जोगी तुम जाओ रे ...' ऐसा लगा आप बोल उठेंगी ...रंजू ...फिर से दुबारा बजाईये ..न ...कोई बोला नहीं ...मैंने भी फिर से दुबारा बजाया नहीं...पर उस गीत के साथ आपकी गुनगुनाहट मैंने सुनी ...वहीँ धुन ...वही राग ...
माँ...सारा दिन आपके यादों से सराबोर रहा...पापा ठीक से हैं...अपने काम धाम में व्यस्त ...हाँ ...घर से निकलते वक़्त ...आपकी तस्वीर को देखना नहीं भूलते ...जैसे अब आप बस उस तस्वीर में ही सिमट के रह गयी हैं...आपके जाने के बाद ..आपके आलमीरा को मैंने नहीं खोला ...पापा को देखता हूँ...वही खोलते हैं ...शायद आपकी खुशबू तलाशते होंगे ...आपके पीछे में भी आपको 'रंजू के महतारी' ही कहते हैं ...उनके लिए आपका कोई नाम नहीं है...क्या...सिवाय चिठ्ठियों के...
माँ...कभी कभी लगता है ...आप कहाँ होंगी ...किस रूप में होंगी ...कैसी होंगी ...एक बार और ...फिर से ...आपको देखने का मन करता है...सच में ...बस एक बार और...

~  5 फ़रवरी , 2015 

माँ , 
माँ , आज आपको गए आज तीन साल हो गया । 
आज सुबह आपका काला शाल नज़र आया । ओढ़ लिया - बहुत सकून मिला । माँ , तीन साल हो गए लेकिन अभी भी उस शाल से आपकी ख़ुशबू नहीं गयी । फिर वापस रख दिया - आपके तकिए के नीचे । माँ , जब मन बहुत बेचैन होता है - वहीं आपके पलंग के आपके जगह पर सो जाता हूँ - दिन में नहीं सोता फिर भी सो जाता हूँ । हर साल कश्मीरी आता है - हर साल पूछता है - आंटी नहीं हैं - हर साल बोलता हूँ - नहीं हैं । भूल जाता है - इस बार नहीं पूछा - चुपके से एक काला शाल मेरे हाथों में रख दिया । 
शाम हो गयी गई है - चाय की याद आयी - मन किया आपके लिए भी एक कप बना दूँ - बिना चीनी वाली । 
आपके जाने के बाद - आपका आलमिरा नहीं खोला - हिम्मत नहीं हुई । शायद लॉक ही है - पापा को भी उस आलमिरा को खोलते कभी नहीं देखा । आपका एक पोंड्स ड्रीमफ्लावर पाऊडर कई महीने वहीं टेबल पर रखा नज़र आया , फिर लगता है - किसी ने उसे आपके आलमिरा में रख दिया । 
माँ , आपके जाने के बाद - ज़िंदगी पूरी तरह बदल गयी या जहाँ आप छोड़ कर गयीं - वहीं ठहर गयी - कुछ नहीं कह सकता । 
अब आप बेवजह परेशान होने लगी ....रुकिए ...जया भादुड़ी का एक गीत अपने यूटूब पर सुनाता हूँ ...नदिया किनारे हेरा आई ...

~ 5 फ़रवरी , 2016 



Monday, November 21, 2016

गहने ...कुछ यूँ ही ...:))


पुरुष के गहने अलग होते हैं और स्त्रीओं के गहने अलग होते हैं । क्रोध , अहंकार / स्वाभिमान / अभिमान , युद्ध , ज़ुबान , छल इत्यादि पुरुष पर ही शोभा देते हैं । 'अभिमान' देखा है ? अमिताभ पर वह अभिमान शोभा देता है - जया ने उस अभिमान को कभी नहीं पहना - पूरे सिनेमा नहीं पहना । कभी किसी पुरुष को पूर्ण प्रेम करते नहीं देखा - कुछ न कुछ वो छल मिलाएगा ही ! वही छल एक स्त्री को आकर्षित करता है ! कल्पना कीजिए - कोई स्त्री छल सीख ले , फिर क्या होगा ? उसके पास प्रकृति ने एक ऐसी शक्ति दे रखी है - जिससे वो पुरे ब्रह्माण्ड के पुरुष को नियंत्रीत कर लेगी ! लेकिन पुरुष का छल उसे स्त्री का प्रेम लाता है वहीँ स्त्री का छल उसकी इज्जत खा जाती है ! मूलतः स्त्री 'फेक ओर्गेज्म' करती है - अपने पुरुष के अहंकार को शांत करने के लिए वहीँ पुरुष 'फेक रिलेशनशिप' रखते हैं - अपनी वासना के शिकार होने वाली स्त्री को करीब लाने के लिए ! पर कल्पना कीजिए - स्त्री फेक रिलेशनशिप बनाए और पुरुष फेक ओर्गेज्म रखे ...आप अन्दर तक हिल जायेंगे ! पर एक उम्र के बाद - पुरुष भी फेक ओर्गेज्म सीख जाते हैं और स्त्री भी फेक रिलेशनशिप सीख जाती है ! प्रकृति के विरूद्ध जा कर इंसान अपनी दिशा और दशा खुद तय करना चाहता है ! यह एक जिद है  जिद के बाद एक स्वभाव और उसके बाद संस्कार ! लेकिन स्त्री पुरुष एक दुसरे के गहने पहनने लगे - बड़े ही गंदे दिखेंगे ! 
प्रेम , ईर्ष्या , ग़ुरूर , माफ़ी इत्यादि स्त्रीओं के गहने हैं । कभी किसी पुरुष को ईर्ष्या करते देखा है ? अगर वो ईर्ष्यालु है तो उसे अन्य पुरुष अपनी जमात से निकाल देंगे । कभी किसी पुरुष को प्रेम करते देखा है ? प्रेम करेगा तो वह ख़त्म हो जाएगा , वह किसी भी काम लायक नहीं रह जाएगा । वह अपने अहंकार को झुकाता है - स्त्री के क़दमों तक अपने अहंकार को ले जाता है - लेकिन मारता नहीं है - स्त्रीप्रेम में वह मूलतः अपने अहंकार को झुका कर अपने अहंकार की ही तृप्ति करता है । स्त्री पर उसे अपने हुस्न का 'ग़ुरूर' शोभा देता है - अहंकार नहीं । अहंकार भद्द दिखता है - प्रकृति के ख़िलाफ़ दिखता है । स्त्री ज़ुबान की पक्की हो गयी तो उसका बहाव रुक जाएगा । नदी की शोभा तभी है जब तक वह बहती रहे । यह ज़रूरी नहीं कि आप सारे गहने पहन कर ही निकलें - लेकिन जो भी पहनिए - अपने हिसाब से पहनिए ...अपने उम्र , लिंग , सामाजिक स्तर ,कूल खानदान के हिसाब से पहनिए - सुन्दर दिखेंगे :)) 

@RR

Tuesday, October 18, 2016

नवरात्र 2015


आज से नवरात्र शुरू हो गया ! देवी के न जाने कितने रूप - जितने शक्ती के श्रोत - उतने ही देवी के रूप ! एक नर किस किस रूप की आराधना करे - किस किस रूप पर खुद को सम्मोहित करे - किस किस रूप की पूजा करे ...:)) थक हार कर एक नर देवी के तीन रूप - लक्ष्मी , सरस्वती और काली के इर्द गिर्द खुद को सौंप देता है ! और इन तीनो रूप में एक बनी - दुर्गा के चरणों में - नवरात्र शुरू हो जाता है ...:)) 
बगैर शक्ती तो इस संसार में एक पल भी रहना मुश्किल है ! शक्ती की क्या विवेचना की जाए? शक्ती है तभी तो कलम चल रही है - शक्ती है तभी तो आँखें खुली है - शक्ती है तभी तो दुनिया झुकी है ..:)) शक्ती के जितने रूप उतनी चाहतें ! अब यह आपके व्यक्तित्व पर निर्भर करेगा - आपको शक्ती का कौन सा रूप अपने अन्दर समाहित कर के खुद को पूर्ण करना है ! ज़िंदगी तो यही है न - खुद को पूर्णता के तरफ ले चलना ! खुद को खाली करना और हमेशा खुद को भरते रहना - पग पग / डेग डेग - हर पल एक कदम !
शक्ती अकेले नहीं आती - अपने साथ एक अहंकार को पीछे पीछे लाती है ! जब तक वह अहंकार पीछे पीछे घूमता है - शक्ती आपके अन्दर समाहित रहती है - जिस दिन वह अहंकार शक्ती के आगे खडा हो जाता है - दुर्गा उसी दिन आपके अन्दर से निकल जाती है ! शक्ती की शोभा तभी है जब अहंकार पीछे खडा हो ! अहंकार के बगैर भी शक्ती अपूर्ण है ! लेकिन पीछे खडा - शक्ती की सुरक्षा में ..:)) अहंकार को पीछे जीवित रखना और शक्ती के साथ इस जीवन को आनंदित रखना एक कला है या एक समझ है !
फिलहाल ...मै आनंदित हूँ ...जब जब फुर्सत मिलेगा ...कुछ लिखूंगा ...आपको भी फुर्सत मिले ...पढ़ते रहिएगा ...अपने अन्दर के शक्ती को जागृत किये हुए - इस नवरात्र ...:))
~ रंजन , 13 अक्टूबर - 2015

स्कूल के दिनों की एक बात याद आ रही है ! हम चार दोस्त एक बेंच पर बैठते थे - तीस साल पुरानी बात है ! मै , मृत्युंजय , दीपक अगरवाल , वर्मा और एक कक्कड़ ! कक्कड़ के पैरों में पोलियो की बीमारी थी ! वो बैसाखी के सहारे चलता था ! एकदम दिवार से सटे बैठता था ! पर उसकी भुजाओं में बहुत ताकत थी ! हाथ मिलाने वाले खेल में हम सभी उससे हार जाते थे ! चंद सेकेण्ड में परास्त कर देता था ..:)) काफी चौड़ा कन्धा भी था ! ईश्वर का खेल - जहाँ पैरों में कोई शक्ती नहीं वहीँ भुजाओं में असीम शक्ती ! शायद बैसाखी के सहारे चलने से उसकी भुजाओं में ताकत आ गयी थी ! जो भी हो - पर मुझे उसका ताकतवर होना बढ़िया लगता था !
शायद यही कुछ हमारे साथ भी होता है ! जीवन के इस उम्र में - मैंने यही पाया है की - कई मोड़ पर / कई जगह मै खुद को शक्तीविहीन पाता हूँ - बिलकुल असहाय ! वहीँ कई दुसरे जगह असीम ऊर्जा और शक्ती के साथ रहता हूँ - जैसे इस ब्रह्माण्ड में मेरे जैसा कोई नहीं !
ये क्या है ? ऐसा क्यों है ? वही इंसान एक जगह काफी कमज़ोर और दूसरी जगह बेहद मजबूत ! अब दिक्कत तब होती है - जब जीवन लगातार उन्ही रास्तों पर आपको धकेल दे - जहाँ आप खुद को कमज़ोर पाते हैं ! धीरे - धीरे आप खुद को शक्तीविहीन पाने लगते हैं ! इन्सान भूल जाता है - उसका एक और पक्ष भी है - जहाँ उसके जैसा कोई नहीं !
तब शायद अन्दर से एक आवाज़ उठती है या कोई इंसान मिलता है - जो आपके दुसरे मजबूत पक्ष को बताता है ! अन्दर से आवाज़ उठना या किसी ऐसे मित्र का मिल जाना - नियती भी हो सकता है ! तब आप अपना रास्ता बदलते हैं और अपने शक्ती को पहचानते हैं और वहीँ से ऊर्जा से ओत प्रोत एक सूरज आपके जीवन में सवेरा लेकर आता है !
मैंने हमेशा कहा है - शब्दों में बहुत ताकत होती है ! पर यह भी अचरज है - जो इंसान एक के लिए सकरात्मक ऊर्जा से भरपूर शब्द बोलता है - वही इंसान किसी दुसरे के लिए नकरात्मक शब्द बोलता है ! पर जो भी हो - शब्द में असीम शक्ती है - नकरात्मक और सकरात्मक दोनों ! सीता और गीता / राम और श्याम सिनेमा तो देखे ही होंगे - गौर से देखिएगा - शब्दों के ताकत का प्रभाव व्यक्तित्व पर नज़र आएगा ...:))
यूँ ही कुछ लिख दिया ...फुर्सत में ...दो बार पढियेगा ..:))
~ रंजन , 14 अक्टूबर 2015 

बचपन की बात है ! हमारे मुजफ्फरपुर घर / डेरा के ठीक बगल में कुम्हार 'रामानंद पंडित' का घर था ! वो बड़े बाबा के उम्र के थे और उनके लडके पापा - चाचा के उम्र के ! अक्सर उनके दरवाजे जाया करता था - उनको चाक चलाते देख बहुत बढ़िया लगता था ! 
पूजा के कुछ महिना पहले उनके लडके पापा के पास आते थे - शायद मूर्ती बनाने के लिए पैसों के इंतजाम के वास्ते - क़र्ज़ के रूप में ! फिर वो मुजफ्फरपुर ज़िला स्कूल के ठीक बगल में बीस - पच्चीस मूर्ती बनाते ! स्कूल आते जाते या फिर शाम को उनके पास जाता था ! बांह मोड़ के उनके मूर्ती के पास खडा हो जाता ! लकड़ी के सपोर्ट से धान के पुआल से - फिर हर रोज थोडा चिकनी मिट्टी लगाते - हर एक रोज मूर्ती के स्वरुप में बदलाव आता था ! मुझे रामानंद पंडित के परिवार द्वारा बनाए हुए मूर्ती से एक अपनापन महसूस होता ! फिर एक दिन किसी ठेला पर मूर्ती को जाते हुए देखता और एक दो मूर्ती बच जाती - जो बच गयी उसका पूजन वह कुम्हार परिवार खुद से करता था ! वो पूरा दृश्य अभी मेरे आँखों के सामने से गुजर रहा है ...एक एक दिन का वह बदलाव !
जब तीन साल पहले २०१२ में दुर्गा पूजा को लेकर खुद की अभिरुची जबदस्त ढंग से जागी - तो गूगल पर ही पढ़ा - महालया की रात कुम्हार दुर्गा की मूर्ती के आँखों में 'रंग' भरते हैं - यह जानकारी मेरे लिए किसी रोमांच से कम नहीं थी ! मैंने कल्पना किया - उस क्षण का जब एक कुम्हार अपने हफ़्तों की मेहनत की मूर्ती के आँखों में रंग भर के उसमे प्राण डालता होगा ! वो अमावास के मध्य रात्री का क्षण !
क्या कुम्हार को उस जीवित दुर्गा से प्रेम नहीं हो जाता होगा ? :) अन्तोगत्वा तो वह कुम्हार एक पुरुष ही होता है - खुद के ही बनाए उस भव्य रूप को को देख वह मोहित नहीं हो जाता होगा ! कभी सप्तमी के दिन किसी पंडाल में जाकर दुर्गा की आँखों में झांकियेगा ...:)) सब समझ में आ जायेगा ...प्रेम भाव के किस हद तक जाकर उस कुम्हार ने देवी की आँखों में सारी शक्ती डाल दी है ...:))
फिर इसी तीन साल के दौरान - अलग अलग बड़े बड़े पुजारी की रचनाओं को पढने का मौक़ा मिला ! कभी ललिता सहस्रनाम पढियेगा ! देवी के हर एक अंग की प्रसंशा की गयी है - जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका का करता है ! एक नारी अपने जितने गुणों के लिए जानी जायेगी - उन सभी गुणों का वर्णन है ..:))
ये क्या है ? कहीं यह एक सम्पूर्ण स्त्री की कामना तो नहीं ? कहीं यह वो स्त्री तो नहीं जो एक पुरुष की कल्पना में बसती है ? जो उसे प्रेम और सुरक्षा के घेरे में बाँध के रखती है ...
बहुत कुछ है - लिखने को ...बहत कुछ है समझने को ...:))
~ 15 Oct / 2015 

प्लस टू में रहे होंगे ! रीडर्स डाईजेस्ट का शौक चढ़ा ! किसी एक अंक में 'स्टीफें हॉकिंग' के बारे में छपा था ! मै हैरान था - कोई इंसान जो बोल नहीं सकता है - जो चल नहीं सकता है वह 'फिजिक्स' में दुनिया का बेहतरीन गुरु है !
ये क्या है ? शक्ती का यह कैसा वरदान है ? गजब ! 
मालूम नहीं शक्ती के कितने रूप हैं और यह किस कदर आती है - ईश्वरीय देन है या कर्मो से शक्ती का आगमन - शायद दोनों है ! इस संसार में दोनों को इज्जत है ! अगर कर्मरूपेण शक्ती और ईश्वरीय वरदान शक्ती दोनों का मिलन एक जगह हो जाए फिर तो वह इंसान साक्षात 'शिव' है ..:))
पर शक्ती कहाँ विराजती है - जहाँ 'आनंद' है ! आप लाख पढ़ लिख ले - अगर आपको अपने किसी कर्म में आनंद महसूस नहीं हो रहा है - आप खुद को शक्तीविहीन पायेंगे ! सामाजिक प्लेटफार्म के बड़े से बड़े ओहदे पर पहुंह कर भी बगैर आनंद वाली शक्ती की कोई पूछ नहीं है ! प्रेम और रिश्ते में भी शक्ती होती है - मगर आप उसमे 'आनंद' नहीं महसूस कर रहे हैं फिर वो रिश्ता एक मृतक शरीर की तरह बदबू के साथ एक बोझ बन जाता है ! 'आनंद' शक्ती का प्राण होता है ! यह आनंद 'मन' से कंट्रोल होता है ! कई बार ऐसा देखा गया है - मन दुखी तो आनंद गायब और जैसे ही मन खुश वहां उसी जगह वापस से आनंद आया !
मन - आनंद - शक्ती ! यही सार है ! यह एक योग है ! यह एक साधना है ! स्टीफेन हॉकिंग एक दिन में स्टीफेन हॉकिंग नहीं बने होंगे - जीवन को एक साधना बना लिए होंगे - एक दिशा में लगातार बढ़ाते रहने से - अपने चंचल मन पर काबू पाते हुए - अपनी तमाम शारीरिक कमजोरी पर विजय पाते हुए - स्टीफेन हॉकिंग ...आज दुनिया में अनोखा नाम हैं ! पर बगैर देवी के आशीर्वाद के - शायद यह दिशा भी उनको नहीं मिली होगी ! या फिर उनके एकाग्र मन को देख 'देवी' उनके रास्ते को आसान बनाते चली होंगी !
अगर शक्ती का एहसास करना है - फिर आनंद को तलाशिये ! जैसे - मै लिखता हूँ - मुझे लिखते वक़्त आनंद महसूस होता है - और शायद आप में से कई यह मानेंगे की यही मेरी शक्ती है !
जैसा की मैंने पहले दिन लिखा था - शक्ती के ठीक पीछे 'अहंकार' खडा होता है ! शक्ती की मादकता इतनी तेज होती है - न जाने कम उस बेहोशी में 'अहंकार' सामने आ खडा होता है - फिर आप अहंकार को एन्जॉय करने लगते है - हमको यही लगता है की यही अहंकार मेरी शक्ती है - पर इस भ्रम में न जाने कब शक्ती चुपके से निकल जाती है !
कभी ध्यान से सोचियेगा ...बगैर शक्ती तो कोई इंसान इस धरती पर नहीं होता - कब और कैसे आपका अहंकार आपकी शक्ती को ख़त्म कर दिया - अपने जीवन के सफ़र को एक नज़र देखिएगा !
सफ़र जारी है - एक समझ हो जाने के बाद - खुद को नियंत्रीत करना ही - शक्ती को वश में रखना है ...शिव तो वही है ..न ..जो शक्ती को अपने अन्दर वश में रखे ...बाकी तो महिशाशुर हैं - जिनके विनाश के लिए दुर्गा का जन्म होता है ...:)
~ 16 Oct / 2015 

ठीक दो साल पहले अपने पारिवारिक मित्र पंकजा से बात हो रही थी ! वो उस वक़्त तुरंत 'सेंसर बोर्ड' के चीफ / सीईओ से अपने तीन साल के कार्यकाल को समाप्त कर के फुर्सत में थीं ! उसी समय मैंने परोक्ष राजनीति में जाने का फैसला लिया था ! बात राजनीति से शुरू हुई और अचानक से मेरा एक प्रश्न - 'पावर ..क्या है ? ' ! पंकजा कुछ सेकेण्ड के लिए चुप हो गयीं फिर बोली - पावर यह नहीं है ..जो नज़र आ रहा है - फिर वो चुप हो गयी - फिरबोली- ये कुर्सी/ ओहदा / वर्दी पावर के प्रतीक हो सकते हैं लेकिन पावर नहीं , वर्दी , कुर्सी , ओहदा ख़त्म हो जाए फिर भी आपके ऊपर या आपके व्यक्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़े - वही असल पावर है - उनका इशारा साफ़ था - वो आंतरिक व्यक्तित्व की ओर इशारा कर रही थी !
एक महिला जो हमारी आपकी बैकग्राउंड से आती हैं - शादी के बाद परीक्षा दे कर 'आईपीएस' ( IPS ) के लिए चुनी जाए - सैकड़ों लोग चुने जाते हैं - फिर वहां से वो राजस्व सेवा ( IRS ) ज्वाइन करती हैं - फिर ऐसा संयोग बनता है वो सेंसर बोर्ड की सीईओ और वातावरण ऐसा की सारा बोर्ड उनके इर्द गिर्द ! मै उन्हें उस वक़्त - 'बॉलीवुड क्वीन' कहा करता था ! मुझे लगता है
- अपने कार्यकाल में वो सैकड़ों क्रिएटीव लोगों से मिली होंगी और उस दौरान वो खुद के स्तर पर वैसे लोगों के लिए अपने मन में एक इज्जत पैदा की होंगी - जहाँ से उन्हें यह महसूस हुआ होगा की - शक्ती कहाँ बसती है !
दस साल पुरानी जान पहचान है श्री अभय आनंद सर से ! साल में एक दिन हम उनसे मिलते हैं - काफी लम्बी और घंटो और वन टू वन बात होती है ! उनकी धर्मपत्नी डॉ नूतन भी बैठी होती है ! जब वो डीजीपी से हटे - मै उनसे मिलने गया ! वो होमगार्ड के डीजी थे ! उनसे भी मेरा वही सवाल - 'पावर ..क्या है ? ' ! वो भी चुप हो गए - पंकजा जैसा ही जबाब - 'पावर ..यह नहीं है ' ! मैंने उनसे पूछा - पावर ..किसके पास है ? वो बोले - जिसके पास है - या तो उसे पता नहीं है या वो खुद में उस पावर के साथ विलीन है ! :) खुद के आनंद में है !
फिर वो बोले - राजनेता के पास तो पावर होता ही नहीं है ! मैंने बोला - राजनेता को पावर का भ्रम होता है ! हम दोनों हंसने लगे ! पावर तो जनता के पास होती है !
अभी उनके घर गया - बातों बात अभय आनंद सर से बात वही - कौन शक्तीशाली ? दोनों पति पत्नी बैठे हुए थे ! मैंने कहा मैडम ज्यादा शक्तीशाली ! जबाब का कारण यही था - मै एक पैथोलोजिस्ट का बेटा - आजीवन पिता को सर्जन /.फिजिसियन / गायीनोकोलोजिस्त के इर्द गिर्द घुमते देखा ! मैंने तो डॉक्टर समाज को ही बड़ा माना ! पुलिस को क्यों नहीं ? मेरा जबाब सरल था - मेरे बाबा राजनीति में थे - जिले का पुलिस कप्तान उनको देख कुर्सी से उठ जाता था ! चाईल्ड साइकोलोजी ! मन में बस गया - सामाजिक वर्ण व्यवस्था में - राजनेता का कद बड़ा ! हा हा हा ...
आज पूरा विश्व अभय आनंद सर को सुपर थर्टी के जनक के रूप में जानता है - पुरे देश में घूम घूम कर पढ़ाते हैं - शायद वही असल पावर है :)
बात वही है - आप किस कोण पर खडा है और चीज़ों को कैसे देख रहे हैं ! जो किसी और के लिए शक्तीशाली है -आपके लिए नहीं ...
यूँ ही कुछ - कुछ ...:))
~ 17 Oct / 2015 

शक्ति की चाहत तो हर नर को होती है ! पर शक्ति के अनुरूप आपको 'शिव' बनना होगा ! शक्ति के आने का कोई फंडा नहीं है की सिर्फ शिव को ही शक्ति मिलेगी ! जो शिव का भेष-भूसा रखेगा - शक्ती उसके पास भी चली आयेगी ! जो उपासना करेगा - शक्ति वहां भी आ जायेगी ! 
पर दिक्कत तब होती है जब शक्ति के अनुरूप 'शिव' का कद नहीं है ! शक्ति को अपने अन्दर समाहित तो कर लेंगे लेकिन शक्ति का दम घुटेगा ! जैसे ..मेरी भुजाओं में ताकत नहीं है और मुझे 'टीपू सुलतान' का भारी भरकम तलवार मिल जाए ! फिर क्या होगा ? वो तलवार कहीं से भी मेरी रक्षा नहीं कर पायेगा ! वो वरदान मेरे लिए श्राप बन जाएगा या फिर किसी के लिए भी !
अगर आपको इस संसार का अनुभव हो तो देखे होंगे - कई बार ऐसे लोग भी मिले होंगे - जिनके सर के ऊपर लक्ष्मी आयी और देखते देखते पैर से निकल गयी ! कहाँ दिक्कत रही होगी ? दिक्कत उस व्यक्तित्व के साथ है ! कई बार ऐसा भी होता है - शक्ति आयी कुछ देर रुकी और उनके रुकने के क्रम ही उस इंसान ने अपने व्यक्तित्व में विस्तार किया और शक्ति लम्बे समय के लिए रुकी रही !
ऐसे कई उदहारण आपको 'राजनीति' में मिल जायेंगे !
ये सारी बातें - शक्ति के किसी भी रूप पर लागू हो सकती है ! आप जिस रूप को शक्ति मानते हैं - वही इन बातों को लागू कर के देखिएगा !
जब शक्ति समाहित हो जाए फिर शक्ति प्रदर्शन कम से कम होना चाहिए ! शक्ति नज़र आनी चाहिए - संसार को दिखनी चाहिए लेकिन उसका प्रदर्शन नहीं होना चाहिए ! शक्ति अन्दर की दुनिया में शोभा देती है और शिव बाहर की दुनिया में होते हैं ! शक्ति प्रदर्शन में ही शक्ती 'चौखट' पार कर देती हैं - वहीँ से फिर सारी दिक्कत शुरू हो जाती है ! यहीं पर शक्ति के अनुरूप आपको शिव बनना होगा ! वरना भटकी हुई शक्ति ही आपके विनाश का कारण बन सकती है !
इसलिए शक्ति की पूजा कीजिए ! उनका आशीर्वाद लीजिये ! अपने अन्दर समाहित कीजिए ! जब तक वो साथ हैं - उनका आनंद लीजिये ! थोड़ा दुनिया को झमकायिये - थोडा दिखाईये पर खुलेआम प्रदर्शन से बचिए ! खुले मैदान में आपसे बढ़ कर भी कोई दूसरा शिव मिल सकता है ...:))
~ 18 Oct / 2015 

आज महासप्तमी है ! आज सुबह के पूजन के साथ देवी का पट खुल गया ! शाम के समय पंडाल में विहंगम दृश्य के साथ देवी के दर्शन होंगे ! अदभुत होगा वो नज़ारा ! अब देखना है - किस कुम्हार ने देवी के आँखों में सारी शक्ती प्रज्वल्लित की है ..किस पुजारी ने वातावरण को एकदम पवित्र बनाया है ..और कौन है वह नर जो देवी की आँखों से निकल रही शक्ती को पलभर में अपने अन्दर समाहित कर ले ..:) सारा खेल तो उस शक्ती के संचार का ही है ! बाकी तो ताम झाम है ! 
बात देवी के रूप और स्वरुप की हो रही है ! जैसी भावना वैसा रूप नज़र आएगा ! नारी तो एक ही है - किसी के लिए माँ है , किसी के लिए बेटी है , किसी के लिए पत्नी / प्रेमिका है तो किसी के लिए कुछ भी नहीं - महज एक खिलौना है ! सारा कुछ तो देखने के नज़र पर है ! 
तीन साल पहले इसी दुर्गा पूजा और इसी जगह मैंने लिखा था - नारी के हर एक रूप की पूजा होती है - शायद तभी देवी के निर्माण के दौरान कुम्हार एक मुठ्ठी मिटटी शहर / गाँव के नृत्यांगना से भी मांगता है ! तब मैंने लिखा था - अद्भुत है - हमारी परंपरा ! शायद देवदास सिनेमा में इसको दिखाया भी गया है ! 
अभी कुछ दिन पहले इसी विषय पर एक मित्र से बात हो रही थी - सम्पूर्ण नारी का ! उसने कहा - जब सम्पूर्ण नारी की बात करते हो - तब एक मुठ्ठी वो वाला तत्व भी होना चाहिए जो दुर्गा पूजा में नृत्यांगना के आँगन से आता है ! उस तत्व के बगैर एक सम्पूर्ण स्त्री की कल्पना कहाँ ! पर उसकी मात्रा महज एक मुठ्ठी ही होनी चाहिए , ना तो उसकी अनुपस्थिती होनी चाहिए और ना ही वो मात्र एक मुठ्ठी से ज्यादा होनी चाहिए - दोनों हाल में वो अपूर्ण है ! उसी दुर्गा के हाथों में शस्त्र भे होना चाहिए ! वही दुर्गा शेर पर सवार भी होनी चाहिए - उसी दुर्गा के हाथों महिशाशुर का वध भी होना चाहिए ! 
और वही दुर्गा शक्ती बन के शिव में समाहित होनी चाहिए ....:))

~ 19 Oct / 2015 

करीब 25-26 साल बाद , आज सुबह तड़के पटना घुमा :) मेरा भी मन था और अचानक से दो दिन पहले 'पापा' भी बोल दिए - तुम्हारी माँ थी तो हमलोग सुबह में सबको घुमाते थे - बात भावनात्मक हो गयी ! 
पापा सुबह तीन बजे ही ..रंजू ..रंजू ..शुरू हो गए ! जीवन में आज तक पढ़ाई / परीक्षा के लिए सुबह नींद नहीं खुली लेकिन आज पापा के एक आवाज़ पर नींद खुल गयी ! हम अपना भी 'चेंगा - चेंगी' को जगाने का प्रयास किये - नहीं जागा ! मॉल संस्कृति में जन्म लिए हुए को 'मेला घुमने' में क्या मन लगेगा :( 
सुबह साढ़े तीन बजे हम और पापा निकल गए ! डस्टर को फर्स्ट गेयर में डाल दिए..:)) हम दोनों बाप बेटा थोड़ा 'भकुआयील' थे ! सबसे पहले डाकबंगला - सुन्दर मूर्ती - गजब का भीड़ ! पापा का एक फोटो लिए ! फिर बेली रोड होते हुए - सगुना मोड़ / दानापुर तक ! रास्ता भर पापा से डांट सुनते हुए - गाडी चलाने नहीं आता है ..फलना ..ढेकना ! एक चक्कर बोरिंग रोड भी ! 
लौटते वक़्त पापा 'अशोक राज पथ / मछुआटोली / कालीबाड़ी के लिए 'अड़' गए ! हमको ना हंसते बन रहा था और ना ही रोते ! गाडी को उस भीड़ में - पटना के उस तरह की संकरी गली और मोहल्लों में मोड़ दिया ! 
सब जगह उनको घुमाए - बहुत बढ़िया लगा ..:)) 
अपना टीनएज दिन याद आ गया ! पापा की मारुती होती थी ! सारा खानदान लदा गया ! हॉर्न बज रहा है - मेरा जुता का फीता बंधा रहा है ..बंधा रहा है ..बंधा रहा है ! चेक बैगी ट्राउजर और पावर का कत्थई टी शर्ट ! हॉर्न बज रहा है ...मेरे जुता का फीता बंधा रहा है ...बंधा रहा है ! अचानक पापा का फरमान जारी हुआ - तुम यहीं रहो ...मेरा चेहरा ऊपर से मायूस ..और अन्दर खुशी का फव्वारा ..खुशी खुशी पुरे खानदान को उस मारुती में 'कोंचे' ! और उधर - गेट के पास ढेर सारा दोस्त मेरे इंतज़ार में - अपना अपना साईकिल पर :P 
क्या मजा आता था ...निकलते निकलते कंघी से चार बार बाल झडाया - जैसे पटना के मछुआटोली में कोई सिनेमा का डाईरेक्टर मेरा इंतज़ार कर रहा हो :) रास्ता से उस टोली में और अन्य दोस्तों को जोड़ते हुए - किसी एक दोस्त के यहाँ सभी साईकिल 'लगा' दिया गया ! सब यार एक साथ निकल पड़े ! 
सुबह का नज़ारा - एक से एक फिएट वाली सब - पीछे के गेट का सीसा आधा खुला हुआ - गमकऊआ तेल लगा के - उस जमाने में कहाँ डीओ / फीओ होता था - भर मुह पोंड्स ड्रीमफ्लावर पाउडर लगा के - झक झक गोर नार दुर्गा जी लोग :) 
एक से एक मूर्ती बनता था - नारियल का मूर्ती - अमूल स्प्रे का मूर्ती और उसका अनाऊंसमेंट - 'देखिये ..देखिये ..पहली बार 'नवदुर्गा पूजा समिति ' के तरफ से 'अमूल स्प्रे' का मूर्ती - नजदीक जा कर देखे तो पता चला - मूर्ती बना के ऊपर से अमूल स्प्रे छिट दिया है ..हा हा हा हा ! अपना टोली में - एक आध 'मुह्बक्का' टाईप लड़का का हाथ छुट गया - उ मुह्बक्का किसी का मुह ताक रहा है ..हा हा हा हा ! अब वो असल दुर्गा के फिराक में - कहीं किसी 'पूजा समिति' के वोलनटियर से दू - चार हाथ खा चुका होता था ! ऐसे मौके पर - हम दोस्त उसको पहचानने तक से इनकार कर देते थे ...हा हा हा हा ! 
धांग देते थे - पूरा पटना को ! उफ्फ्फ्फ़ ...एक आध दोस्त 'इलीट' टाईप होता था ..जो 'शास्त्रीय संगीत' कम ..अगला दिन हांकने के लिए कॉलेजीयेट स्कूल के प्रोग्राम का हिस्सा होता था ! एक रात प्रोग्राम क्या देख लेता था - अगला दिन हमलोगों को किस्सा सूना सूना के कान पका देता था ! असल दर्द तब होता था - जब उसके किस्से में 'तीन साल सीनियर से तीन साल जूनियर' तक के असल दुर्गाओं के उस प्रोग्राम में उपस्थिती की चर्चा होती थी - कलेजा फट के हाथ में आ जाता ! हा हा हा हा हा ...
वक़्त कहाँ रुकता है - अपने साथ बहुत चीज़ों को बदल देता है - तब मूर्ती देखने जाते थे - अब उस मूर्ती में जान देखने जाते हैं - अपनी आत्मा को उस मूर्ती में तलाशने जाते हैं ...:)) 
विजयादशमी की शुभकामनाएं ...:))

~ 22 Oct / 2015

@RR

Thursday, October 6, 2016

नवरात्र और मेरा अनुभव ...:))

हम लोग मूलतः एक किसान परिवार से आते हैं ! गाँव - शहर दोनों जगह रहना हुआ है ! बाबा राजनीति में सक्रीय थे ! मेरे बचपन का बहुत बड़ा हिस्सा गाँव में बिता है ! बाबा हर दोपहर नहाने के बाद दुर्गापाठ करते थे और दुर्गा को अगरबत्ती दिखाते थे ! दुर्गा का प्रथम प्रभाव वहीँ से शुरू हुआ ! दुर्गा पूजा के दौरान - कलश स्थापना होती थी , ब्राह्मण देवता आते थे ! नौ दिन पाठ और नवमी को हवन ! बस ! थोडा बहुत दशहरा के दिन मेला शेला !
मैं बारहवीं में था ! अचानक मुझे दुर्गा पाठ की सूझी ! मैंने अपने कमरे में नवरात्र के दौरान ही दुर्गा पाठ शुरू कर दिया ! सच बोलता हूँ - तीसरे दिन ऐसा लगा की जैसे मैंने अपने से बहुत ज्यादा भारी कोई तलवार उठा ली है जो मुझसे नहीं उठ रहा है ! और चौथे दिन आते आते मैंने पूजा बंद कर दी ! मेरी हिम्मत नहीं रही ! ऐसा लगा की मेरे अन्दर अब कोई शक्ति नहीं रही - कोई मेरी सारी शक्ति निचोड़ लिया है ! अफ़सोस हुआ - लेकिन मै आगे नहीं कर पाया !
फिर आगे के सालों में नवरात्र मेरे लिए कोई मायने नहीं रखा ! गाँव की परंपरा अब शहर में भी आ गयी - गाँव से ब्राह्मण देवता पटना आते और कलश स्थापना होती ! कभी मै रहता तो कभी नहीं रहता !
इसी बीच नॉएडा शिफ्ट हुआ ! और वहां की कालीवाडी मंदिर में जाने लगा ! कुछ ऐसा संयोग हुआ की जितने साल वहां गया - जिस वक़्त पहुंचा ठीक उसी वक़्त वहां आरती होते रहती थी ! उस धूप आरती के बीच साक्षात् दंडवत के बाद जब मै जमीन से उठता - मेरी नज़र उस दुर्गा प्रतिमा पर पड़ती थी - उस वक़्त मुझे उनकी ओर एक जबरदस्त खिंचाव होता ! एक जबरदस्त आकर्षण ! ना तो माँ रूप में  , ना बहन , ना बेटी और ना ही पत्नी के रूप में ! फिर बात ख़त्म और अगला साल पूजा आ जाता ! फिर से वही भावना ! 
बारहवीं में ही मुझे अपने पुरे जीवन का एक आभास हुआ की मेरा आने वाला पचास साल कैसा होगा - एकदम धुंधला आभास ! इस आभास से यह हुआ की - जीवन कई उतार चढ़ाव से गुजरा , परिवार बेचैन हुआ लेकिन मेरे अन्दर कोई बेचैनी नहीं हुई ! जीवन की बड़ी से बड़ी खाई को उस वक़्त के हिसाब से बड़े ही मैच्युरेटी से संभाला ! 
लेकिन २०१२ में कुछ ऐसा हुआ की मै अचानक से उस नवरात्र दुर्गा में तल्लीन हो गया ! ना तो कोई पूजा आती थी , ना ही कोई मंत्र और ना ही कोई तंत्र ! बहुत सोचा - सोचने के बाद यही समझ में आया की - सारा खेल मन का ही है - क्यों न मन को ही एकाग्र कर दो ! पुरे नौ दिन मन को एकाग्र कर दिया ! अब बात दूसरी आई - शक्ति के किस रूप की आराधना - वह पहले से निर्णय ले चूका था - वह था - रचनात्मक रूप ! कहते हैं - देवी बलि मांगती है ! यह बात क्लियर थी ! बारहवीं में देख चूका था ! वह एक साक्षात अनुभव था ! तब मै कमज़ोर था , नाबालिग़ था ! इस बार जबरदस्त निश्चय था ! हुआ - मेरे इर्द गिर्द उसी नवरात्र कुछ हुआ - जिसका वर्णन मैंने उस वक़्त के सबसे करीबी मित्र को बताया ! उसे मै दाल भात का कौर लगता था तो शायद उसने मेरी बातों को मेरा झूठ समझ इनकार कर दिया !
क्या खेल है - एकाग्रता का ...गजब ! नवमी आते आते खुद के चेहरे पर मोहित हो गया ! कोई पूजा पाठ नहीं किया - बस एक ख़ास जगह मन को एकाग्र कर दिया ! पूजा का प्लैटफॉर्म फेसबुक को बना दिया ! और क्रियेटिविटी इस कदर बढ़ी ...हालांकि उसके बीज पहले से मौजूद थे ...पर जैसे किसी ने उन बीजों को पानी खाद देकर पौधा बना दिया !
अगले साल फ़रवरी में माँ का देहांत हुआ ! एक बहुत बड़ा निर्णय लिया - पटना वापस लौटने का ! लोगों ने अपने अपने समझ से इसकी व्याख्या की ! मुझे अन्दर से कोई फर्क नहीं पडा !
इस साल भी दुर्गापूजा आया ! मै अपने इंदिरापुरम आवास पर - अकेले ! ना किसी से मिलना और और ना ही कोई अन्य काम ! फिर वही मन के एकाग्रता का खेल ! वही ढंग ! लेकिन इस बार दुर्गा के लिए इन्तेंसिटी बहुत बढ़ गयी ! और उसी नवरात्र मेरे मन में राजनीति में जाने का ख्याल आया - देवी की कृपा - कहीं कोई रुकावट नहीं हुई - हर एक स्टेप के बाद दरवाजा खुद ब खुद खुलने लगा ...नवरात्र ख़त्म होते ही पटना गया और विधिवत राजनीति ज्वाइन किया ! सब देवी की कृपा थी !
एक बात - इन नौ दिनों मेरे इर्द गिर्द से लेकर अन्दर तक कुछ न कुछ ऐसा होता रहा जिसके चलते मन को और एकाग्र करने की तमन्ना जागी ! उन कारकों की चर्चा नहीं कर सकता - बस समझ लीजिये - जैसे आप पूजा पर बैठे हों और असुर शक्ति आपको दिक्कत पैदा कर रही हों ! फिर नौवें दिन - जो चमक और ओजस्व चेहरे पर और वाणी में आती है - इसका वर्णन तो वही कर सकता है - जिसने देखा या सुना और बहुत समझा ! लेकिन इसका असर मैंने दूसरों पर देखा ..:))
एक गलती अगले साल हुई ! मै देवघर गया ! वह १०० किलोमीटर की यात्रा मेरे लिए अत्यंत कष्टदायक हुई ! कुछ ऐसा हुआ की पुरे रास्ता मै लगभग मानसिक रूप से व्यथित रहा ! शिव में कोई आकर्षण नज़र नहीं आया !
राजनीति को त्यागने का निर्णय लिया - श्री नितीश कुमार के साथ चार घंटे की लम्बी अकेली में वार्ता और सुनहरा अवसर - मैंने बहुत ही शांत मन से त्यागा ! मै समझ चूका था - राजनीति बहुत बड़ी शक्ति है और मै इसके भार को वहन करने को तैयार नहीं हूँ ! कुछ ऐसा ही एहसास - बारहवीं में हुआ था ! तब मैंने अपनी आधी अधूरी तपस्या किसी और को देकर - उठ गया था !
शक्ति के किसी भी रूप को उठाने के जब तक आप स्वयं में तैयार नहीं हों - नहीं उठायें वर्ना आप उस भार के निचे दब के ख़त्म हो जायेंगे ! यह बात शुरू से क्लियर थी !
पिछले साल - पटना में ही था - कलश स्थापना और नवमी ! कुछ कुछ होता रहा !
इस साल फ़रवरी में - एक मोड़ आया - पत्नी के लगातार जिद के बाद बनारस गया ! काशी विश्वनाथ के दर्शन हेतु ! पत्नी वहां काशी विश्वनाथ मंदिर गृह में - अन्दर ही अचानक से फूट फूट कर रोने लगी ! कभी इस कदर उनको रोते हुए नहीं देखा ! फिर उन्होंने रुद्राक्ष का माला ख़रीदा और पहना दिया ! होटल में मैंने पूछा - आप इस कदर क्यों रो रही थी ? उन्होंने कहा - ऐसा लगा जैसे मै अपने पिता से मिली ! शादी के ठीक पहले वो इसी काशी विश्वनाथ मंदिर में गयी थी - उस वक़्त वो मेरे दिए हुए कपड़ों में थी ! इस बार वो मेरे साथ थी ! १९ साल बाद ! इस बीच मेरे सास ससुर गुजर चुके थे !
मार्च में मैंने शिव आराधना शुरू कर दी और शक्ति के प्रति जो जिस रूप में आशक्त था - वह आकर्षण भी कम होने लगा !
मै चैत नवरात्र में पूजा नहीं करता लेकिन इस बार किसी ने कह दिया - कुछ लिखो ! मैंने लिखा ! जो समझ में आया ! तभी कुछ एह्साह हुआ ! उसी दौरान एक बहुत ही पुराना मित्र जो किसी कष्ट में था - उसने अपने कष्ट को बताया - हालाकि उसका कष्ट मुझे डेढ़ साल से पता था लेकिन नवरात्र - फिर से उसने चर्चा की और मेरे मुंह से निकला - जाओ  सब ठीक हो जाएगा ! अगले ही दिन सकरात्मक जबाब आया ! तभी यह लगा - पांच बार लगातार पूजा के बाद अब उठने का समय आ गया है !
आप किसी भी तरह की शक्ति की उपासना करते हैं ! तपस्या करते हैं ! एक दिन या नौ दिन या आजीवन ! लेकिन उस तप का फल - किसी और को देना होता है ! यह सच है ! उस तप का फल आप खुद खाने लगे उसी दिन से शक्ति  क्षीण होने लगती है ! यहीं लालच को रोकना होता है ! और इंसान यहीं फंसता है ! हो सकता है - तप का फल किसी और के लिए रखा , और मिला किसी और को ! लेकिन जिसे जो तप देना होता है - आप दे चुके होते हैं ! आपको कुछ न कुछ बलि चढ़ाना होता है ! आप खुद के लिए कभी नहीं माँगते !
इस बार नवरात्र के पहले मैंने एक महिला ज्योतिष से बात किया - खुल कर ! उसको सारी घटना बताई ! उसने कहा - दुर्गा को प्रेमिका के रूप में पूजते हो , पत्नी शिव को उन्हें पिता रूप में और क्योंकि पत्नी ने पूजा की  तो तुम भी छः महिना से शिव को पिता रूप में जप ! यह गड़बड़ झाला है - फंस जाओगे ! माँ के रूप में पूजो ! अब यह कैसे संभव की जिसे आप कभी प्रेमिका रूप में पूजे - उसे फिर से माँ रूप में ? उस ज्योतिष ने कुछ जबाब नहीं दिया  लेकिन मैं चुपके से शिव को प्रणाम कर - नवरात्र शुरू कर दिया ! गड़बड़ झाला तो चूका था ! प्रायश्चित का समय है .... :))
लेकिन ये जप और तप वाली बात क्रिस्टल क्लियर हो गयी ! बिलकुल गंगोत्री की तरह साफ़ !
अगर आप इसे व्यापक तौर पर सोचें तो - आपके किसी भी तरह के जप / तप का फल जब तक दूसरों को नहीं मिले - वह आराधना सफल नहीं होती ! वह विज्ञान हो , कला हो , राजनीति हो - कहीं भी !
एक बात और समझ में आई - शक्ति आती है और शक्ति जाती है ! रूप बदलते रहती है ! उदाहरण के लिए - बचपन में आपकी मासूमियत ही आपकी शक्ति होती है , मासूमियत खोते हैं तब जवानी आती है और जब जवानी जाती है तब आप एक अलग शक्ति को समझते हैं ! यह क्रम है ! इसको समझना जरुरी है !
जीवन में एक ख़ास समय आता है - जब आपकी तमन्ना होती है - बाहरी दुनिया से अन्दर की दुनिया में जाते हैं फिर आप अन्दर की दुनिया से बाहर की दुनिया में आते हैं - हर तरह के अनुभव के साथ ...:)) मूलतः जीवन का सबसे बड़ी पूंजी यह अनुभव ही है !
लेकिन यह पूरा खेल - मन की एकाग्रता का ही है - जैसे आप एकाग्र होकर परीक्षा में बैठते हैं ....ख़ुशी तब होती है ...जितना सोचा उससे ज्यादा प्रश्न आपने हल किये ...तीन घंटा बिना सर उठाये ! असल तसल्ली वहीँ हैं ! रिजल्ट बहुत मायने नहीं रखता ...
यह पांचवीं बार शारदीय नवरात्र है ...देवी के उस रूप को प्रणाम ...जिस रूप की आराधना मैंने की थी !
विशेष अगले किस्तों में ..:))



@RR

Wednesday, October 5, 2016

नवरात्र - 2012


देवताओं का भी अजीब हाल है :( महिषासुर के एकाग्र ध्यान से प्रसन्न होकर उसको वरदान दे दिए ...फिर सभी देवताओं को हेडेक होने लगा ..मालूम नहीं ई महिषासुर इतनी शक्ती से क्या क्या न कर बैठे ...फिर 'देवी' की पुकार ...खुद क्यों नहीं आगे आये ...देवता हो ...इंसान की तरह वर्ताव क्यों ? इंसान और राक्षस में जब पहचान ही नहीं ...फिर देवता किस बात के ? जब तुम बुरे समय में ...तुम देवता होकर भी ...देवी के पास गए ...फिर हम जब तुमको बाईपास कर के ...देवी को पुकारें ...इतनी कष्ट क्यों ? हम भी तो देवता बन सकते हैं ...
~ इंसान

आज नवरात्र के छठे दिन 'माँ कात्यायनी' की पूजा होती है ! कहते हैं - माँ अपने पिता के घर जन्म लेने के बाद ..पति की गोत्र को न अपना कर अपने पिता की गोत्र को अपनाया - संभवतः यह 'पिता पुत्री' के बीच के उस भावुक सम्बन्ध को दर्शाता है - जिसे सिर्फ एक पिता और पुत्री ही समझ सकते हैं ! 
आप हिन्दू धर्म की कथाओं को पढ़ें - तब भी एक समाज होता था - ऋषी - मुनि / राजा / देव / असुर ....कहीं न कहीं ..कई कथाओं में ...एक पिता भी होता था ...लाचार ..मूक ! मैंने बहुत पहले लिखा भी था ...जब 'सीता' की अग्नी परीक्षा हो रही होगी ...तब अगर जनक जिन्दा होंगे ..उनपर क्या गुज़री होगी ..मौन ..मूक ..लाचार ! 
ऋषि खरे ने तीन चार दिन पहले दालान पर एक कमेन्ट किया - 'लक्ष्मी / सरस्वती / दुर्गा' तीनो के रूप को देखना चाहते हैं - एक पुत्री को सर्वगुण संपन्न बना दीजिये - सारे रूप वहीँ मिल जायेंगे !

हिन्दू माइथोलोजी विचित्र है - कोई भी भक्ती से शक्ती पा सकता है - फिर क्या ? फिर महिषासुर ..रावण ..लड़िये ... लड़ाई ..जब तक की वो एक कहानी ना बन जाए ! समुद्र मंथन में जो मिला ...देवता और दानव दोनों आपस में बाँट लिए - इंसान रह गया बीच में ....उसके अन्दर दोनों समा गए ..फंस गया इंसान ! इंसान देवता बनने की चाह पैदा करे तो उसके अन्दर का दानव अपनी शक्ती दिखा देता है ...अवकात में रहो ..देवता मत बनो ! दानव बनता है ..तो देवता उसकी शक्ती छीन लेते हैं ...इसी लड़ाई में ...एक दिन इंसान दम तोड़ ...कुल मिलाकर ...सार यही है ...जब आपको शक्ती मिले ..उसको इज्ज़त देना सीखिए ...जुबां से नहीं ...मन से ..श्रद्धा से ..वर्ना जिस गति से शक्ती आयी ...उसी गति से वापस ..
और ..शक्ती स्त्रीलिंग शब्द है ...!!!! 
और....शक्ती शिव के इर्द गिर्द घुमती हैं ...अबोध ..जिसे शक्ती का एहसास भी नहीं .... :))) 
है ..न ..विचित्र ...:))

19 Oct 2012 

आज नवरात्र के छठे दिन 'माँ कात्यायनी' की पूजा होती है ! कहते हैं - माँ अपने पिता के घर जन्म लेने के बाद ..पति की गोत्र को न अपना कर अपने पिता की गोत्र को अपनाया - संभवतः यह 'पिता पुत्री' के बीच के उस भावुक सम्बन्ध को दर्शाता है - जिसे सिर्फ एक पिता और पुत्री ही समझ सकते हैं ! 
आप हिन्दू धर्म की कथाओं को पढ़ें - तब भी एक समाज होता था - ऋषी - मुनि / राजा / देव / असुर ....कहीं न कहीं ..कई कथाओं में ...एक पिता भी होता था ...लाचार ..मूक ! मैंने बहुत पहले लिखा भी था ...जब 'सीता' की अग्नी परीक्षा हो रही होगी ...तब अगर जनक जिन्दा होंगे ..उनपर क्या गुज़री होगी ..मौन ..मूक ..लाचार ! 
ऋषि खरे ने तीन चार दिन पहले दालान पर एक कमेन्ट किया - 'लक्ष्मी / सरस्वती / दुर्गा' तीनो के रूप को देखना चाहते हैं - एक पुत्री को सर्वगुण संपन्न बना दीजिये - सारे रूप वहीँ मिल जायेंगे !

20 Oct 2012 

आज महासप्तमी ....देवी का पट खुलेगा या खुल गया होगा !
विराट ! 
मनोरम ! 
श्रद्धा ! 
विशाल !
जैसे इस रूप का ही इंतज़ार था ! देखते ही ..खुशी से मन ...कोई भय नहीं ...आँखें ऐसी जहाँ आप क्षण मात्र भी ठहर नहीं सकते ! विशाल रूप ....जैसे सभी देव स्तुति में लग गए ...धुप की खुशबू से पूरा पंडाल भर गया होगा ...आरती के वक्त ...श्रद्धा से पुरे शरीर में सिहरन ! देवी को साष्टांग दंडवत ! 
"शक्ती का पट तो खुल गया ...पर इनका ये विशाल रूप में स्वागत कौन करेगा ...किसकी हिम्मत जो इनके पास जाए ...इन्ही का कोई रूप जायेगा ...माताएं ..बहने ..बेटियाँ ..निकल गयी होंगी ...देवी के स्वागत में ..उस भव्य रूप के स्वागत में " - हम तो बस दूर से ..उस रूप में मंत्रमुग्ध ...
धन्य हो वो कुम्हार ...जिसने महालया के दिन ही देवी की आँखों में रंग भर दिया ...इस भव्यता ..इस रूप ..की खुशबू ..कहाँ से आई ..पूछिये उस कुम्हार से ..जिसने 'जहाँ' से मिटटी लायी ....
देवी को पुजिये ....किसी भी रूप में ....वो निर्मल है !

21 Oct 2012 


आज महाष्टमी है ! महागौरी का दिन ! महामाया के रूप में ! गौर वर्ण ! शांत चित ! अबोध बालिका के रूप में ! कहते हैं नारी जब इस रूप में आ जाए फिर वो पूज्यनीय हो जाती हैं ! तभी आज के दिन 'कुमार कन्या' ( कुंवारी ) को पूजा जाता है ! इस रूप को / इस कुमार कन्या को नर सबसे ऊँचा मानता है ! 
एक छोटा सा उदहारण देता हूँ - हिन्दू धर्म के अनुसार - आप अपने से ऊँचे / सर्वश्रेष्ठ को अपने दाहिने तरफ बैठाते हैं - सिंदूरदान के पहले.. 'कन्या' को दाहिने तरफ बैठाया जाता है - क्योंकी उसका स्थान वर से ऊँचा है ! सिंदूरदान के बाद ...दाहिने तरफ से बाएं ! 
धर्म कोई डर नहीं है - यह जीवन जीने का एक फिलोसोफी है - सभी धर्म लगभग एक जैसा ही आचरण बताते है - हाँ , एक सुपर शक्ती तो जरुर है ...कहीं न कहीं ! मानव ...जिद पर अड़ा...तुम कौन हो ..कहाँ हो ..इसी खोज में वो कोई भी धर्म को श्रद्धा से अपनाकर ..उस सुपर शक्ती की तलाश करता है ! 
बहुत कुछ है ...समझने को ...लिखने को ....और इस नवरात्र से बढ़िया अवसर क्या हो सकता है .. :)) महामाया की तलाश कीजिए ..कहीं मिल जाएँ तो मंत्रमुग्ध हो जाईये ...पूज्यनीय बना लीजिये ..अपने अन्दर के असुर को दबा के रखिये ..वर्ना ..महिषासुरवर्दिनी रूप में ...देवी को आने में ..ज्यादा समय नहीं लगेगा :))

22 Oct 2012 


महानवमी !! सिद्धिदात्री !! 
तीनो लोक देवी की अराधना में - क्या शिव , क्या ऋषि , क्या मानव ...सभी के सभी ! नौ दिन की भक्ती और देवी के सभी रूप की आराधना के बाद ...जैसे आज की शुभ घड़ी का इंतज़ार ! 
संसार 'शक्ती' को ही पूजता आया है - हजारो साल से चली आ रही इस व्यवस्था को हम और आप यूँ ही नहीं तोड़ सकते - देव तभी तक देव हैं जब तक उनके पास शक्ती है - अगर शक्ती न हो - क्या आप और हम उनको पूजेंगे ? :)) 
आज शाम 'दुर्गा पंडाल' जाईयेगा - आज की रात आपको बाकी सभी रातों से अलग नज़र आएगा - जैसे देवी की महिमा / उनका रूप / उनका आशीर्वाद / उनकी शक्ती - सबसे अलग - यह कहने की बात नहीं है - खुद महसूस करने की बात है ! 
देवी पूजन कोई नया नहीं है - हमारे घर घर में - कुलदेवी होती हैं - मिटटी से लेकर स्वर्ण रूप - जिस परिवार की जितनी शक्ती / भक्ती ! पर ..एक बात है ...कुलदेवी का कोई रूप नहीं होता ..जहाँ तक मैंने गौर किया है और वो सिर्फ परिवार तक ही सिमित होती हैं - और उस कुलदेवी से बढ़कर कोई और नहीं होता ! 
प्रणाम !

23 Oct 2012 

आज देवी की विदाई है - यह शब्द अपने आप में अश्रु से भींगा है - परंपरा है - विदाई तो होनी ही है ! इसपर कुछ भी विशेष लिखने की हस्ती मेरी नहीं है !
अब चलिए - 'रामायण' का रिविजन कर लिया जाए :- 
१. प्रेम : रामायण में लिखा है - राम ने सीता के स्वयंवर में जनक के धनुष को तोड़ा - मामूली बात है - प्रेम में डूबा / अँधा / जागा प्रेमी चाँद तारे तक तोड़ लाता है - धनुष तोड़ना तो बहुत छोटा काम था ! दरअसल सच्चे प्रेम में इतनी शक्ती होती है की वो कुछ भी करवा दे ! 
२. दुष्ट : रावण बहुत बड़ा ज्ञानी - प्रकांड विद्वान - शिव भक्त - पर संस्कार लेस मात्र भी नहीं - अगर आप थोडा डीटेल में पढेंगे तो पाएंगे की सिर्फ सीता के साथ ही नहीं उनके पूर्व जन्म एवं अन्य नारीओं के साथ उसने ऐसा ही व्यवहार किया था - दरअसल अहंकार / घमंड व्यक्ती को अँधा बना देता है और सम्पूर्ण विश्व उसे 'भोग' नज़र आने लगता है - लेकिन लेकिन और लेकिन ..एक छल उसके मौत का कारन - सब ठीक ..पर सोचिये ..इतना बड़ा ज्ञानी ..एक छल के कारण ..हिन्दू धर्म में जन्मा कोई भी व्यक्ती - अपने जन्म से ही रावण को विलेन के रूप में देखता है - इससे बड़ी सजा किसी प्रचंड ज्ञानी के लिए क्या हो सकती है :( 
३. नारी ह्रदय : कोमल ह्रदय और जिद - जब देवर मना कर के गए - रेखा खिंच दिए - फिर 'एक्सपेरिमेंट' क्यों ? इसका लोजिक कोई नारी ही दे सकती है - हमारे आपके वश में नहीं है - बेहतर है - पुरुष धर्म अपनाईये - रावण कहीं मिले उसे मार डालिए ! सीता से मत पूछिये - तुने लक्ष्मण रेखा क्यों पार किया ! 
४. सीता अग्नी परीक्षा : राम का दरबार - दोनों तरफ से तर्क वितर्क - प्रजा और सीता दोनों के वकील अपने अपने दलील - राम कुर्सी पर ! सीता को वो अग्नी परीक्षा से रोक भी सकते थे - पर 'करियर' का बात था - रिलेशनशिप गया तेल लेने - राजा का धर्म पहले - पति का बाद में ! आज भी यही होता है ! 
५. अश्वमेघ : कहते हैं - लव कुश ने अपने पिता राम के अश्वमेघ को रोक दिया ! बहुत सिंपल लॉजिक है - कोई भी पुत्र / पुत्री यह नहीं बर्दास्त करेगा की - बाप राजा बना रहे और माँ जंगल जंगल भटके - उस गुस्से में कोई भी साधारण पुत्र भी अश्वमेघ को रोक सकता है ! याद रखिये - जब आप घर में अपनी पत्नी पर गुस्सा कर रहे हैं - घर में चुप चाप बैठा पुत्र / पुत्री सारे बातों को सुन समझ ..आपके लिए एक जबरदस्त नफरत पैदा कर रहा है ..हो सकता है ..लोक लिहाज में ..वो आपसे बदला नहीं ले ...पर ...किसी दिन मौका मिला ..आपके अस्वमेघ को वो रोक देगा ..आपका ही खून ..आपको अवकात दिखा देगा :)) 
हैप्पी दशहरा !
24 Oct 2012 


@RR