Monday, November 21, 2016

गहने ...कुछ यूँ ही ...:))


पुरुष के गहने अलग होते हैं और स्त्रीओं के गहने अलग होते हैं । क्रोध , अहंकार / स्वाभिमान / अभिमान , युद्ध , ज़ुबान , छल इत्यादि पुरुष पर ही शोभा देते हैं । 'अभिमान' देखा है ? अमिताभ पर वह अभिमान शोभा देता है - जया ने उस अभिमान को कभी नहीं पहना - पूरे सिनेमा नहीं पहना । कभी किसी पुरुष को पूर्ण प्रेम करते नहीं देखा - कुछ न कुछ वो छल मिलाएगा ही ! वही छल एक स्त्री को आकर्षित करता है ! कल्पना कीजिए - कोई स्त्री छल सीख ले , फिर क्या होगा ? उसके पास प्रकृति ने एक ऐसी शक्ति दे रखी है - जिससे वो पुरे ब्रह्माण्ड के पुरुष को नियंत्रीत कर लेगी ! लेकिन पुरुष का छल उसे स्त्री का प्रेम लाता है वहीँ स्त्री का छल उसकी इज्जत खा जाती है ! मूलतः स्त्री 'फेक ओर्गेज्म' करती है - अपने पुरुष के अहंकार को शांत करने के लिए वहीँ पुरुष 'फेक रिलेशनशिप' रखते हैं - अपनी वासना के शिकार होने वाली स्त्री को करीब लाने के लिए ! पर कल्पना कीजिए - स्त्री फेक रिलेशनशिप बनाए और पुरुष फेक ओर्गेज्म रखे ...आप अन्दर तक हिल जायेंगे ! पर एक उम्र के बाद - पुरुष भी फेक ओर्गेज्म सीख जाते हैं और स्त्री भी फेक रिलेशनशिप सीख जाती है ! प्रकृति के विरूद्ध जा कर इंसान अपनी दिशा और दशा खुद तय करना चाहता है ! यह एक जिद है  जिद के बाद एक स्वभाव और उसके बाद संस्कार ! लेकिन स्त्री पुरुष एक दुसरे के गहने पहनने लगे - बड़े ही गंदे दिखेंगे ! 
प्रेम , ईर्ष्या , ग़ुरूर , माफ़ी इत्यादि स्त्रीओं के गहने हैं । कभी किसी पुरुष को ईर्ष्या करते देखा है ? अगर वो ईर्ष्यालु है तो उसे अन्य पुरुष अपनी जमात से निकाल देंगे । कभी किसी पुरुष को प्रेम करते देखा है ? प्रेम करेगा तो वह ख़त्म हो जाएगा , वह किसी भी काम लायक नहीं रह जाएगा । वह अपने अहंकार को झुकाता है - स्त्री के क़दमों तक अपने अहंकार को ले जाता है - लेकिन मारता नहीं है - स्त्रीप्रेम में वह मूलतः अपने अहंकार को झुका कर अपने अहंकार की ही तृप्ति करता है । स्त्री पर उसे अपने हुस्न का 'ग़ुरूर' शोभा देता है - अहंकार नहीं । अहंकार भद्द दिखता है - प्रकृति के ख़िलाफ़ दिखता है । स्त्री ज़ुबान की पक्की हो गयी तो उसका बहाव रुक जाएगा । नदी की शोभा तभी है जब तक वह बहती रहे । यह ज़रूरी नहीं कि आप सारे गहने पहन कर ही निकलें - लेकिन जो भी पहनिए - अपने हिसाब से पहनिए ...अपने उम्र , लिंग , सामाजिक स्तर ,कूल खानदान के हिसाब से पहनिए - सुन्दर दिखेंगे :)) 

@RR

Tuesday, October 18, 2016

नवरात्र 2015


आज से नवरात्र शुरू हो गया ! देवी के न जाने कितने रूप - जितने शक्ती के श्रोत - उतने ही देवी के रूप ! एक नर किस किस रूप की आराधना करे - किस किस रूप पर खुद को सम्मोहित करे - किस किस रूप की पूजा करे ...:)) थक हार कर एक नर देवी के तीन रूप - लक्ष्मी , सरस्वती और काली के इर्द गिर्द खुद को सौंप देता है ! और इन तीनो रूप में एक बनी - दुर्गा के चरणों में - नवरात्र शुरू हो जाता है ...:)) 
बगैर शक्ती तो इस संसार में एक पल भी रहना मुश्किल है ! शक्ती की क्या विवेचना की जाए? शक्ती है तभी तो कलम चल रही है - शक्ती है तभी तो आँखें खुली है - शक्ती है तभी तो दुनिया झुकी है ..:)) शक्ती के जितने रूप उतनी चाहतें ! अब यह आपके व्यक्तित्व पर निर्भर करेगा - आपको शक्ती का कौन सा रूप अपने अन्दर समाहित कर के खुद को पूर्ण करना है ! ज़िंदगी तो यही है न - खुद को पूर्णता के तरफ ले चलना ! खुद को खाली करना और हमेशा खुद को भरते रहना - पग पग / डेग डेग - हर पल एक कदम !
शक्ती अकेले नहीं आती - अपने साथ एक अहंकार को पीछे पीछे लाती है ! जब तक वह अहंकार पीछे पीछे घूमता है - शक्ती आपके अन्दर समाहित रहती है - जिस दिन वह अहंकार शक्ती के आगे खडा हो जाता है - दुर्गा उसी दिन आपके अन्दर से निकल जाती है ! शक्ती की शोभा तभी है जब अहंकार पीछे खडा हो ! अहंकार के बगैर भी शक्ती अपूर्ण है ! लेकिन पीछे खडा - शक्ती की सुरक्षा में ..:)) अहंकार को पीछे जीवित रखना और शक्ती के साथ इस जीवन को आनंदित रखना एक कला है या एक समझ है !
फिलहाल ...मै आनंदित हूँ ...जब जब फुर्सत मिलेगा ...कुछ लिखूंगा ...आपको भी फुर्सत मिले ...पढ़ते रहिएगा ...अपने अन्दर के शक्ती को जागृत किये हुए - इस नवरात्र ...:))
~ रंजन , 13 अक्टूबर - 2015

स्कूल के दिनों की एक बात याद आ रही है ! हम चार दोस्त एक बेंच पर बैठते थे - तीस साल पुरानी बात है ! मै , मृत्युंजय , दीपक अगरवाल , वर्मा और एक कक्कड़ ! कक्कड़ के पैरों में पोलियो की बीमारी थी ! वो बैसाखी के सहारे चलता था ! एकदम दिवार से सटे बैठता था ! पर उसकी भुजाओं में बहुत ताकत थी ! हाथ मिलाने वाले खेल में हम सभी उससे हार जाते थे ! चंद सेकेण्ड में परास्त कर देता था ..:)) काफी चौड़ा कन्धा भी था ! ईश्वर का खेल - जहाँ पैरों में कोई शक्ती नहीं वहीँ भुजाओं में असीम शक्ती ! शायद बैसाखी के सहारे चलने से उसकी भुजाओं में ताकत आ गयी थी ! जो भी हो - पर मुझे उसका ताकतवर होना बढ़िया लगता था !
शायद यही कुछ हमारे साथ भी होता है ! जीवन के इस उम्र में - मैंने यही पाया है की - कई मोड़ पर / कई जगह मै खुद को शक्तीविहीन पाता हूँ - बिलकुल असहाय ! वहीँ कई दुसरे जगह असीम ऊर्जा और शक्ती के साथ रहता हूँ - जैसे इस ब्रह्माण्ड में मेरे जैसा कोई नहीं !
ये क्या है ? ऐसा क्यों है ? वही इंसान एक जगह काफी कमज़ोर और दूसरी जगह बेहद मजबूत ! अब दिक्कत तब होती है - जब जीवन लगातार उन्ही रास्तों पर आपको धकेल दे - जहाँ आप खुद को कमज़ोर पाते हैं ! धीरे - धीरे आप खुद को शक्तीविहीन पाने लगते हैं ! इन्सान भूल जाता है - उसका एक और पक्ष भी है - जहाँ उसके जैसा कोई नहीं !
तब शायद अन्दर से एक आवाज़ उठती है या कोई इंसान मिलता है - जो आपके दुसरे मजबूत पक्ष को बताता है ! अन्दर से आवाज़ उठना या किसी ऐसे मित्र का मिल जाना - नियती भी हो सकता है ! तब आप अपना रास्ता बदलते हैं और अपने शक्ती को पहचानते हैं और वहीँ से ऊर्जा से ओत प्रोत एक सूरज आपके जीवन में सवेरा लेकर आता है !
मैंने हमेशा कहा है - शब्दों में बहुत ताकत होती है ! पर यह भी अचरज है - जो इंसान एक के लिए सकरात्मक ऊर्जा से भरपूर शब्द बोलता है - वही इंसान किसी दुसरे के लिए नकरात्मक शब्द बोलता है ! पर जो भी हो - शब्द में असीम शक्ती है - नकरात्मक और सकरात्मक दोनों ! सीता और गीता / राम और श्याम सिनेमा तो देखे ही होंगे - गौर से देखिएगा - शब्दों के ताकत का प्रभाव व्यक्तित्व पर नज़र आएगा ...:))
यूँ ही कुछ लिख दिया ...फुर्सत में ...दो बार पढियेगा ..:))
~ रंजन , 14 अक्टूबर 2015 

बचपन की बात है ! हमारे मुजफ्फरपुर घर / डेरा के ठीक बगल में कुम्हार 'रामानंद पंडित' का घर था ! वो बड़े बाबा के उम्र के थे और उनके लडके पापा - चाचा के उम्र के ! अक्सर उनके दरवाजे जाया करता था - उनको चाक चलाते देख बहुत बढ़िया लगता था ! 
पूजा के कुछ महिना पहले उनके लडके पापा के पास आते थे - शायद मूर्ती बनाने के लिए पैसों के इंतजाम के वास्ते - क़र्ज़ के रूप में ! फिर वो मुजफ्फरपुर ज़िला स्कूल के ठीक बगल में बीस - पच्चीस मूर्ती बनाते ! स्कूल आते जाते या फिर शाम को उनके पास जाता था ! बांह मोड़ के उनके मूर्ती के पास खडा हो जाता ! लकड़ी के सपोर्ट से धान के पुआल से - फिर हर रोज थोडा चिकनी मिट्टी लगाते - हर एक रोज मूर्ती के स्वरुप में बदलाव आता था ! मुझे रामानंद पंडित के परिवार द्वारा बनाए हुए मूर्ती से एक अपनापन महसूस होता ! फिर एक दिन किसी ठेला पर मूर्ती को जाते हुए देखता और एक दो मूर्ती बच जाती - जो बच गयी उसका पूजन वह कुम्हार परिवार खुद से करता था ! वो पूरा दृश्य अभी मेरे आँखों के सामने से गुजर रहा है ...एक एक दिन का वह बदलाव !
जब तीन साल पहले २०१२ में दुर्गा पूजा को लेकर खुद की अभिरुची जबदस्त ढंग से जागी - तो गूगल पर ही पढ़ा - महालया की रात कुम्हार दुर्गा की मूर्ती के आँखों में 'रंग' भरते हैं - यह जानकारी मेरे लिए किसी रोमांच से कम नहीं थी ! मैंने कल्पना किया - उस क्षण का जब एक कुम्हार अपने हफ़्तों की मेहनत की मूर्ती के आँखों में रंग भर के उसमे प्राण डालता होगा ! वो अमावास के मध्य रात्री का क्षण !
क्या कुम्हार को उस जीवित दुर्गा से प्रेम नहीं हो जाता होगा ? :) अन्तोगत्वा तो वह कुम्हार एक पुरुष ही होता है - खुद के ही बनाए उस भव्य रूप को को देख वह मोहित नहीं हो जाता होगा ! कभी सप्तमी के दिन किसी पंडाल में जाकर दुर्गा की आँखों में झांकियेगा ...:)) सब समझ में आ जायेगा ...प्रेम भाव के किस हद तक जाकर उस कुम्हार ने देवी की आँखों में सारी शक्ती डाल दी है ...:))
फिर इसी तीन साल के दौरान - अलग अलग बड़े बड़े पुजारी की रचनाओं को पढने का मौक़ा मिला ! कभी ललिता सहस्रनाम पढियेगा ! देवी के हर एक अंग की प्रसंशा की गयी है - जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका का करता है ! एक नारी अपने जितने गुणों के लिए जानी जायेगी - उन सभी गुणों का वर्णन है ..:))
ये क्या है ? कहीं यह एक सम्पूर्ण स्त्री की कामना तो नहीं ? कहीं यह वो स्त्री तो नहीं जो एक पुरुष की कल्पना में बसती है ? जो उसे प्रेम और सुरक्षा के घेरे में बाँध के रखती है ...
बहुत कुछ है - लिखने को ...बहत कुछ है समझने को ...:))
~ 15 Oct / 2015 

प्लस टू में रहे होंगे ! रीडर्स डाईजेस्ट का शौक चढ़ा ! किसी एक अंक में 'स्टीफें हॉकिंग' के बारे में छपा था ! मै हैरान था - कोई इंसान जो बोल नहीं सकता है - जो चल नहीं सकता है वह 'फिजिक्स' में दुनिया का बेहतरीन गुरु है !
ये क्या है ? शक्ती का यह कैसा वरदान है ? गजब ! 
मालूम नहीं शक्ती के कितने रूप हैं और यह किस कदर आती है - ईश्वरीय देन है या कर्मो से शक्ती का आगमन - शायद दोनों है ! इस संसार में दोनों को इज्जत है ! अगर कर्मरूपेण शक्ती और ईश्वरीय वरदान शक्ती दोनों का मिलन एक जगह हो जाए फिर तो वह इंसान साक्षात 'शिव' है ..:))
पर शक्ती कहाँ विराजती है - जहाँ 'आनंद' है ! आप लाख पढ़ लिख ले - अगर आपको अपने किसी कर्म में आनंद महसूस नहीं हो रहा है - आप खुद को शक्तीविहीन पायेंगे ! सामाजिक प्लेटफार्म के बड़े से बड़े ओहदे पर पहुंह कर भी बगैर आनंद वाली शक्ती की कोई पूछ नहीं है ! प्रेम और रिश्ते में भी शक्ती होती है - मगर आप उसमे 'आनंद' नहीं महसूस कर रहे हैं फिर वो रिश्ता एक मृतक शरीर की तरह बदबू के साथ एक बोझ बन जाता है ! 'आनंद' शक्ती का प्राण होता है ! यह आनंद 'मन' से कंट्रोल होता है ! कई बार ऐसा देखा गया है - मन दुखी तो आनंद गायब और जैसे ही मन खुश वहां उसी जगह वापस से आनंद आया !
मन - आनंद - शक्ती ! यही सार है ! यह एक योग है ! यह एक साधना है ! स्टीफेन हॉकिंग एक दिन में स्टीफेन हॉकिंग नहीं बने होंगे - जीवन को एक साधना बना लिए होंगे - एक दिशा में लगातार बढ़ाते रहने से - अपने चंचल मन पर काबू पाते हुए - अपनी तमाम शारीरिक कमजोरी पर विजय पाते हुए - स्टीफेन हॉकिंग ...आज दुनिया में अनोखा नाम हैं ! पर बगैर देवी के आशीर्वाद के - शायद यह दिशा भी उनको नहीं मिली होगी ! या फिर उनके एकाग्र मन को देख 'देवी' उनके रास्ते को आसान बनाते चली होंगी !
अगर शक्ती का एहसास करना है - फिर आनंद को तलाशिये ! जैसे - मै लिखता हूँ - मुझे लिखते वक़्त आनंद महसूस होता है - और शायद आप में से कई यह मानेंगे की यही मेरी शक्ती है !
जैसा की मैंने पहले दिन लिखा था - शक्ती के ठीक पीछे 'अहंकार' खडा होता है ! शक्ती की मादकता इतनी तेज होती है - न जाने कम उस बेहोशी में 'अहंकार' सामने आ खडा होता है - फिर आप अहंकार को एन्जॉय करने लगते है - हमको यही लगता है की यही अहंकार मेरी शक्ती है - पर इस भ्रम में न जाने कब शक्ती चुपके से निकल जाती है !
कभी ध्यान से सोचियेगा ...बगैर शक्ती तो कोई इंसान इस धरती पर नहीं होता - कब और कैसे आपका अहंकार आपकी शक्ती को ख़त्म कर दिया - अपने जीवन के सफ़र को एक नज़र देखिएगा !
सफ़र जारी है - एक समझ हो जाने के बाद - खुद को नियंत्रीत करना ही - शक्ती को वश में रखना है ...शिव तो वही है ..न ..जो शक्ती को अपने अन्दर वश में रखे ...बाकी तो महिशाशुर हैं - जिनके विनाश के लिए दुर्गा का जन्म होता है ...:)
~ 16 Oct / 2015 

ठीक दो साल पहले अपने पारिवारिक मित्र पंकजा से बात हो रही थी ! वो उस वक़्त तुरंत 'सेंसर बोर्ड' के चीफ / सीईओ से अपने तीन साल के कार्यकाल को समाप्त कर के फुर्सत में थीं ! उसी समय मैंने परोक्ष राजनीति में जाने का फैसला लिया था ! बात राजनीति से शुरू हुई और अचानक से मेरा एक प्रश्न - 'पावर ..क्या है ? ' ! पंकजा कुछ सेकेण्ड के लिए चुप हो गयीं फिर बोली - पावर यह नहीं है ..जो नज़र आ रहा है - फिर वो चुप हो गयी - फिरबोली- ये कुर्सी/ ओहदा / वर्दी पावर के प्रतीक हो सकते हैं लेकिन पावर नहीं , वर्दी , कुर्सी , ओहदा ख़त्म हो जाए फिर भी आपके ऊपर या आपके व्यक्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़े - वही असल पावर है - उनका इशारा साफ़ था - वो आंतरिक व्यक्तित्व की ओर इशारा कर रही थी !
एक महिला जो हमारी आपकी बैकग्राउंड से आती हैं - शादी के बाद परीक्षा दे कर 'आईपीएस' ( IPS ) के लिए चुनी जाए - सैकड़ों लोग चुने जाते हैं - फिर वहां से वो राजस्व सेवा ( IRS ) ज्वाइन करती हैं - फिर ऐसा संयोग बनता है वो सेंसर बोर्ड की सीईओ और वातावरण ऐसा की सारा बोर्ड उनके इर्द गिर्द ! मै उन्हें उस वक़्त - 'बॉलीवुड क्वीन' कहा करता था ! मुझे लगता है
- अपने कार्यकाल में वो सैकड़ों क्रिएटीव लोगों से मिली होंगी और उस दौरान वो खुद के स्तर पर वैसे लोगों के लिए अपने मन में एक इज्जत पैदा की होंगी - जहाँ से उन्हें यह महसूस हुआ होगा की - शक्ती कहाँ बसती है !
दस साल पुरानी जान पहचान है श्री अभय आनंद सर से ! साल में एक दिन हम उनसे मिलते हैं - काफी लम्बी और घंटो और वन टू वन बात होती है ! उनकी धर्मपत्नी डॉ नूतन भी बैठी होती है ! जब वो डीजीपी से हटे - मै उनसे मिलने गया ! वो होमगार्ड के डीजी थे ! उनसे भी मेरा वही सवाल - 'पावर ..क्या है ? ' ! वो भी चुप हो गए - पंकजा जैसा ही जबाब - 'पावर ..यह नहीं है ' ! मैंने उनसे पूछा - पावर ..किसके पास है ? वो बोले - जिसके पास है - या तो उसे पता नहीं है या वो खुद में उस पावर के साथ विलीन है ! :) खुद के आनंद में है !
फिर वो बोले - राजनेता के पास तो पावर होता ही नहीं है ! मैंने बोला - राजनेता को पावर का भ्रम होता है ! हम दोनों हंसने लगे ! पावर तो जनता के पास होती है !
अभी उनके घर गया - बातों बात अभय आनंद सर से बात वही - कौन शक्तीशाली ? दोनों पति पत्नी बैठे हुए थे ! मैंने कहा मैडम ज्यादा शक्तीशाली ! जबाब का कारण यही था - मै एक पैथोलोजिस्ट का बेटा - आजीवन पिता को सर्जन /.फिजिसियन / गायीनोकोलोजिस्त के इर्द गिर्द घुमते देखा ! मैंने तो डॉक्टर समाज को ही बड़ा माना ! पुलिस को क्यों नहीं ? मेरा जबाब सरल था - मेरे बाबा राजनीति में थे - जिले का पुलिस कप्तान उनको देख कुर्सी से उठ जाता था ! चाईल्ड साइकोलोजी ! मन में बस गया - सामाजिक वर्ण व्यवस्था में - राजनेता का कद बड़ा ! हा हा हा ...
आज पूरा विश्व अभय आनंद सर को सुपर थर्टी के जनक के रूप में जानता है - पुरे देश में घूम घूम कर पढ़ाते हैं - शायद वही असल पावर है :)
बात वही है - आप किस कोण पर खडा है और चीज़ों को कैसे देख रहे हैं ! जो किसी और के लिए शक्तीशाली है -आपके लिए नहीं ...
यूँ ही कुछ - कुछ ...:))
~ 17 Oct / 2015 

शक्ति की चाहत तो हर नर को होती है ! पर शक्ति के अनुरूप आपको 'शिव' बनना होगा ! शक्ति के आने का कोई फंडा नहीं है की सिर्फ शिव को ही शक्ति मिलेगी ! जो शिव का भेष-भूसा रखेगा - शक्ती उसके पास भी चली आयेगी ! जो उपासना करेगा - शक्ति वहां भी आ जायेगी ! 
पर दिक्कत तब होती है जब शक्ति के अनुरूप 'शिव' का कद नहीं है ! शक्ति को अपने अन्दर समाहित तो कर लेंगे लेकिन शक्ति का दम घुटेगा ! जैसे ..मेरी भुजाओं में ताकत नहीं है और मुझे 'टीपू सुलतान' का भारी भरकम तलवार मिल जाए ! फिर क्या होगा ? वो तलवार कहीं से भी मेरी रक्षा नहीं कर पायेगा ! वो वरदान मेरे लिए श्राप बन जाएगा या फिर किसी के लिए भी !
अगर आपको इस संसार का अनुभव हो तो देखे होंगे - कई बार ऐसे लोग भी मिले होंगे - जिनके सर के ऊपर लक्ष्मी आयी और देखते देखते पैर से निकल गयी ! कहाँ दिक्कत रही होगी ? दिक्कत उस व्यक्तित्व के साथ है ! कई बार ऐसा भी होता है - शक्ति आयी कुछ देर रुकी और उनके रुकने के क्रम ही उस इंसान ने अपने व्यक्तित्व में विस्तार किया और शक्ति लम्बे समय के लिए रुकी रही !
ऐसे कई उदहारण आपको 'राजनीति' में मिल जायेंगे !
ये सारी बातें - शक्ति के किसी भी रूप पर लागू हो सकती है ! आप जिस रूप को शक्ति मानते हैं - वही इन बातों को लागू कर के देखिएगा !
जब शक्ति समाहित हो जाए फिर शक्ति प्रदर्शन कम से कम होना चाहिए ! शक्ति नज़र आनी चाहिए - संसार को दिखनी चाहिए लेकिन उसका प्रदर्शन नहीं होना चाहिए ! शक्ति अन्दर की दुनिया में शोभा देती है और शिव बाहर की दुनिया में होते हैं ! शक्ति प्रदर्शन में ही शक्ती 'चौखट' पार कर देती हैं - वहीँ से फिर सारी दिक्कत शुरू हो जाती है ! यहीं पर शक्ति के अनुरूप आपको शिव बनना होगा ! वरना भटकी हुई शक्ति ही आपके विनाश का कारण बन सकती है !
इसलिए शक्ति की पूजा कीजिए ! उनका आशीर्वाद लीजिये ! अपने अन्दर समाहित कीजिए ! जब तक वो साथ हैं - उनका आनंद लीजिये ! थोड़ा दुनिया को झमकायिये - थोडा दिखाईये पर खुलेआम प्रदर्शन से बचिए ! खुले मैदान में आपसे बढ़ कर भी कोई दूसरा शिव मिल सकता है ...:))
~ 18 Oct / 2015 

आज महासप्तमी है ! आज सुबह के पूजन के साथ देवी का पट खुल गया ! शाम के समय पंडाल में विहंगम दृश्य के साथ देवी के दर्शन होंगे ! अदभुत होगा वो नज़ारा ! अब देखना है - किस कुम्हार ने देवी के आँखों में सारी शक्ती प्रज्वल्लित की है ..किस पुजारी ने वातावरण को एकदम पवित्र बनाया है ..और कौन है वह नर जो देवी की आँखों से निकल रही शक्ती को पलभर में अपने अन्दर समाहित कर ले ..:) सारा खेल तो उस शक्ती के संचार का ही है ! बाकी तो ताम झाम है ! 
बात देवी के रूप और स्वरुप की हो रही है ! जैसी भावना वैसा रूप नज़र आएगा ! नारी तो एक ही है - किसी के लिए माँ है , किसी के लिए बेटी है , किसी के लिए पत्नी / प्रेमिका है तो किसी के लिए कुछ भी नहीं - महज एक खिलौना है ! सारा कुछ तो देखने के नज़र पर है ! 
तीन साल पहले इसी दुर्गा पूजा और इसी जगह मैंने लिखा था - नारी के हर एक रूप की पूजा होती है - शायद तभी देवी के निर्माण के दौरान कुम्हार एक मुठ्ठी मिटटी शहर / गाँव के नृत्यांगना से भी मांगता है ! तब मैंने लिखा था - अद्भुत है - हमारी परंपरा ! शायद देवदास सिनेमा में इसको दिखाया भी गया है ! 
अभी कुछ दिन पहले इसी विषय पर एक मित्र से बात हो रही थी - सम्पूर्ण नारी का ! उसने कहा - जब सम्पूर्ण नारी की बात करते हो - तब एक मुठ्ठी वो वाला तत्व भी होना चाहिए जो दुर्गा पूजा में नृत्यांगना के आँगन से आता है ! उस तत्व के बगैर एक सम्पूर्ण स्त्री की कल्पना कहाँ ! पर उसकी मात्रा महज एक मुठ्ठी ही होनी चाहिए , ना तो उसकी अनुपस्थिती होनी चाहिए और ना ही वो मात्र एक मुठ्ठी से ज्यादा होनी चाहिए - दोनों हाल में वो अपूर्ण है ! उसी दुर्गा के हाथों में शस्त्र भे होना चाहिए ! वही दुर्गा शेर पर सवार भी होनी चाहिए - उसी दुर्गा के हाथों महिशाशुर का वध भी होना चाहिए ! 
और वही दुर्गा शक्ती बन के शिव में समाहित होनी चाहिए ....:))

~ 19 Oct / 2015 

करीब 25-26 साल बाद , आज सुबह तड़के पटना घुमा :) मेरा भी मन था और अचानक से दो दिन पहले 'पापा' भी बोल दिए - तुम्हारी माँ थी तो हमलोग सुबह में सबको घुमाते थे - बात भावनात्मक हो गयी ! 
पापा सुबह तीन बजे ही ..रंजू ..रंजू ..शुरू हो गए ! जीवन में आज तक पढ़ाई / परीक्षा के लिए सुबह नींद नहीं खुली लेकिन आज पापा के एक आवाज़ पर नींद खुल गयी ! हम अपना भी 'चेंगा - चेंगी' को जगाने का प्रयास किये - नहीं जागा ! मॉल संस्कृति में जन्म लिए हुए को 'मेला घुमने' में क्या मन लगेगा :( 
सुबह साढ़े तीन बजे हम और पापा निकल गए ! डस्टर को फर्स्ट गेयर में डाल दिए..:)) हम दोनों बाप बेटा थोड़ा 'भकुआयील' थे ! सबसे पहले डाकबंगला - सुन्दर मूर्ती - गजब का भीड़ ! पापा का एक फोटो लिए ! फिर बेली रोड होते हुए - सगुना मोड़ / दानापुर तक ! रास्ता भर पापा से डांट सुनते हुए - गाडी चलाने नहीं आता है ..फलना ..ढेकना ! एक चक्कर बोरिंग रोड भी ! 
लौटते वक़्त पापा 'अशोक राज पथ / मछुआटोली / कालीबाड़ी के लिए 'अड़' गए ! हमको ना हंसते बन रहा था और ना ही रोते ! गाडी को उस भीड़ में - पटना के उस तरह की संकरी गली और मोहल्लों में मोड़ दिया ! 
सब जगह उनको घुमाए - बहुत बढ़िया लगा ..:)) 
अपना टीनएज दिन याद आ गया ! पापा की मारुती होती थी ! सारा खानदान लदा गया ! हॉर्न बज रहा है - मेरा जुता का फीता बंधा रहा है ..बंधा रहा है ..बंधा रहा है ! चेक बैगी ट्राउजर और पावर का कत्थई टी शर्ट ! हॉर्न बज रहा है ...मेरे जुता का फीता बंधा रहा है ...बंधा रहा है ! अचानक पापा का फरमान जारी हुआ - तुम यहीं रहो ...मेरा चेहरा ऊपर से मायूस ..और अन्दर खुशी का फव्वारा ..खुशी खुशी पुरे खानदान को उस मारुती में 'कोंचे' ! और उधर - गेट के पास ढेर सारा दोस्त मेरे इंतज़ार में - अपना अपना साईकिल पर :P 
क्या मजा आता था ...निकलते निकलते कंघी से चार बार बाल झडाया - जैसे पटना के मछुआटोली में कोई सिनेमा का डाईरेक्टर मेरा इंतज़ार कर रहा हो :) रास्ता से उस टोली में और अन्य दोस्तों को जोड़ते हुए - किसी एक दोस्त के यहाँ सभी साईकिल 'लगा' दिया गया ! सब यार एक साथ निकल पड़े ! 
सुबह का नज़ारा - एक से एक फिएट वाली सब - पीछे के गेट का सीसा आधा खुला हुआ - गमकऊआ तेल लगा के - उस जमाने में कहाँ डीओ / फीओ होता था - भर मुह पोंड्स ड्रीमफ्लावर पाउडर लगा के - झक झक गोर नार दुर्गा जी लोग :) 
एक से एक मूर्ती बनता था - नारियल का मूर्ती - अमूल स्प्रे का मूर्ती और उसका अनाऊंसमेंट - 'देखिये ..देखिये ..पहली बार 'नवदुर्गा पूजा समिति ' के तरफ से 'अमूल स्प्रे' का मूर्ती - नजदीक जा कर देखे तो पता चला - मूर्ती बना के ऊपर से अमूल स्प्रे छिट दिया है ..हा हा हा हा ! अपना टोली में - एक आध 'मुह्बक्का' टाईप लड़का का हाथ छुट गया - उ मुह्बक्का किसी का मुह ताक रहा है ..हा हा हा हा ! अब वो असल दुर्गा के फिराक में - कहीं किसी 'पूजा समिति' के वोलनटियर से दू - चार हाथ खा चुका होता था ! ऐसे मौके पर - हम दोस्त उसको पहचानने तक से इनकार कर देते थे ...हा हा हा हा ! 
धांग देते थे - पूरा पटना को ! उफ्फ्फ्फ़ ...एक आध दोस्त 'इलीट' टाईप होता था ..जो 'शास्त्रीय संगीत' कम ..अगला दिन हांकने के लिए कॉलेजीयेट स्कूल के प्रोग्राम का हिस्सा होता था ! एक रात प्रोग्राम क्या देख लेता था - अगला दिन हमलोगों को किस्सा सूना सूना के कान पका देता था ! असल दर्द तब होता था - जब उसके किस्से में 'तीन साल सीनियर से तीन साल जूनियर' तक के असल दुर्गाओं के उस प्रोग्राम में उपस्थिती की चर्चा होती थी - कलेजा फट के हाथ में आ जाता ! हा हा हा हा हा ...
वक़्त कहाँ रुकता है - अपने साथ बहुत चीज़ों को बदल देता है - तब मूर्ती देखने जाते थे - अब उस मूर्ती में जान देखने जाते हैं - अपनी आत्मा को उस मूर्ती में तलाशने जाते हैं ...:)) 
विजयादशमी की शुभकामनाएं ...:))

~ 22 Oct / 2015

@RR

Thursday, October 6, 2016

नवरात्र और मेरा अनुभव ...:))

हम लोग मूलतः एक किसान परिवार से आते हैं ! गाँव - शहर दोनों जगह रहना हुआ है ! बाबा राजनीति में सक्रीय थे ! मेरे बचपन का बहुत बड़ा हिस्सा गाँव में बिता है ! बाबा हर दोपहर नहाने के बाद दुर्गापाठ करते थे और दुर्गा को अगरबत्ती दिखाते थे ! दुर्गा का प्रथम प्रभाव वहीँ से शुरू हुआ ! दुर्गा पूजा के दौरान - कलश स्थापना होती थी , ब्राह्मण देवता आते थे ! नौ दिन पाठ और नवमी को हवन ! बस ! थोडा बहुत दशहरा के दिन मेला शेला !
मैं बारहवीं में था ! अचानक मुझे दुर्गा पाठ की सूझी ! मैंने अपने कमरे में नवरात्र के दौरान ही दुर्गा पाठ शुरू कर दिया ! सच बोलता हूँ - तीसरे दिन ऐसा लगा की जैसे मैंने अपने से बहुत ज्यादा भारी कोई तलवार उठा ली है जो मुझसे नहीं उठ रहा है ! और चौथे दिन आते आते मैंने पूजा बंद कर दी ! मेरी हिम्मत नहीं रही ! ऐसा लगा की मेरे अन्दर अब कोई शक्ति नहीं रही - कोई मेरी सारी शक्ति निचोड़ लिया है ! अफ़सोस हुआ - लेकिन मै आगे नहीं कर पाया !
फिर आगे के सालों में नवरात्र मेरे लिए कोई मायने नहीं रखा ! गाँव की परंपरा अब शहर में भी आ गयी - गाँव से ब्राह्मण देवता पटना आते और कलश स्थापना होती ! कभी मै रहता तो कभी नहीं रहता !
इसी बीच नॉएडा शिफ्ट हुआ ! और वहां की कालीवाडी मंदिर में जाने लगा ! कुछ ऐसा संयोग हुआ की जितने साल वहां गया - जिस वक़्त पहुंचा ठीक उसी वक़्त वहां आरती होते रहती थी ! उस धूप आरती के बीच साक्षात् दंडवत के बाद जब मै जमीन से उठता - मेरी नज़र उस दुर्गा प्रतिमा पर पड़ती थी - उस वक़्त मुझे उनकी ओर एक जबरदस्त खिंचाव होता ! एक जबरदस्त आकर्षण ! ना तो माँ रूप में  , ना बहन , ना बेटी और ना ही पत्नी के रूप में ! फिर बात ख़त्म और अगला साल पूजा आ जाता ! फिर से वही भावना ! 
बारहवीं में ही मुझे अपने पुरे जीवन का एक आभास हुआ की मेरा आने वाला पचास साल कैसा होगा - एकदम धुंधला आभास ! इस आभास से यह हुआ की - जीवन कई उतार चढ़ाव से गुजरा , परिवार बेचैन हुआ लेकिन मेरे अन्दर कोई बेचैनी नहीं हुई ! जीवन की बड़ी से बड़ी खाई को उस वक़्त के हिसाब से बड़े ही मैच्युरेटी से संभाला ! 
लेकिन २०१२ में कुछ ऐसा हुआ की मै अचानक से उस नवरात्र दुर्गा में तल्लीन हो गया ! ना तो कोई पूजा आती थी , ना ही कोई मंत्र और ना ही कोई तंत्र ! बहुत सोचा - सोचने के बाद यही समझ में आया की - सारा खेल मन का ही है - क्यों न मन को ही एकाग्र कर दो ! पुरे नौ दिन मन को एकाग्र कर दिया ! अब बात दूसरी आई - शक्ति के किस रूप की आराधना - वह पहले से निर्णय ले चूका था - वह था - रचनात्मक रूप ! कहते हैं - देवी बलि मांगती है ! यह बात क्लियर थी ! बारहवीं में देख चूका था ! वह एक साक्षात अनुभव था ! तब मै कमज़ोर था , नाबालिग़ था ! इस बार जबरदस्त निश्चय था ! हुआ - मेरे इर्द गिर्द उसी नवरात्र कुछ हुआ - जिसका वर्णन मैंने उस वक़्त के सबसे करीबी मित्र को बताया ! उसे मै दाल भात का कौर लगता था तो शायद उसने मेरी बातों को मेरा झूठ समझ इनकार कर दिया !
क्या खेल है - एकाग्रता का ...गजब ! नवमी आते आते खुद के चेहरे पर मोहित हो गया ! कोई पूजा पाठ नहीं किया - बस एक ख़ास जगह मन को एकाग्र कर दिया ! पूजा का प्लैटफॉर्म फेसबुक को बना दिया ! और क्रियेटिविटी इस कदर बढ़ी ...हालांकि उसके बीज पहले से मौजूद थे ...पर जैसे किसी ने उन बीजों को पानी खाद देकर पौधा बना दिया !
अगले साल फ़रवरी में माँ का देहांत हुआ ! एक बहुत बड़ा निर्णय लिया - पटना वापस लौटने का ! लोगों ने अपने अपने समझ से इसकी व्याख्या की ! मुझे अन्दर से कोई फर्क नहीं पडा !
इस साल भी दुर्गापूजा आया ! मै अपने इंदिरापुरम आवास पर - अकेले ! ना किसी से मिलना और और ना ही कोई अन्य काम ! फिर वही मन के एकाग्रता का खेल ! वही ढंग ! लेकिन इस बार दुर्गा के लिए इन्तेंसिटी बहुत बढ़ गयी ! और उसी नवरात्र मेरे मन में राजनीति में जाने का ख्याल आया - देवी की कृपा - कहीं कोई रुकावट नहीं हुई - हर एक स्टेप के बाद दरवाजा खुद ब खुद खुलने लगा ...नवरात्र ख़त्म होते ही पटना गया और विधिवत राजनीति ज्वाइन किया ! सब देवी की कृपा थी !
एक बात - इन नौ दिनों मेरे इर्द गिर्द से लेकर अन्दर तक कुछ न कुछ ऐसा होता रहा जिसके चलते मन को और एकाग्र करने की तमन्ना जागी ! उन कारकों की चर्चा नहीं कर सकता - बस समझ लीजिये - जैसे आप पूजा पर बैठे हों और असुर शक्ति आपको दिक्कत पैदा कर रही हों ! फिर नौवें दिन - जो चमक और ओजस्व चेहरे पर और वाणी में आती है - इसका वर्णन तो वही कर सकता है - जिसने देखा या सुना और बहुत समझा ! लेकिन इसका असर मैंने दूसरों पर देखा ..:))
एक गलती अगले साल हुई ! मै देवघर गया ! वह १०० किलोमीटर की यात्रा मेरे लिए अत्यंत कष्टदायक हुई ! कुछ ऐसा हुआ की पुरे रास्ता मै लगभग मानसिक रूप से व्यथित रहा ! शिव में कोई आकर्षण नज़र नहीं आया !
राजनीति को त्यागने का निर्णय लिया - श्री नितीश कुमार के साथ चार घंटे की लम्बी अकेली में वार्ता और सुनहरा अवसर - मैंने बहुत ही शांत मन से त्यागा ! मै समझ चूका था - राजनीति बहुत बड़ी शक्ति है और मै इसके भार को वहन करने को तैयार नहीं हूँ ! कुछ ऐसा ही एहसास - बारहवीं में हुआ था ! तब मैंने अपनी आधी अधूरी तपस्या किसी और को देकर - उठ गया था !
शक्ति के किसी भी रूप को उठाने के जब तक आप स्वयं में तैयार नहीं हों - नहीं उठायें वर्ना आप उस भार के निचे दब के ख़त्म हो जायेंगे ! यह बात शुरू से क्लियर थी !
पिछले साल - पटना में ही था - कलश स्थापना और नवमी ! कुछ कुछ होता रहा !
इस साल फ़रवरी में - एक मोड़ आया - पत्नी के लगातार जिद के बाद बनारस गया ! काशी विश्वनाथ के दर्शन हेतु ! पत्नी वहां काशी विश्वनाथ मंदिर गृह में - अन्दर ही अचानक से फूट फूट कर रोने लगी ! कभी इस कदर उनको रोते हुए नहीं देखा ! फिर उन्होंने रुद्राक्ष का माला ख़रीदा और पहना दिया ! होटल में मैंने पूछा - आप इस कदर क्यों रो रही थी ? उन्होंने कहा - ऐसा लगा जैसे मै अपने पिता से मिली ! शादी के ठीक पहले वो इसी काशी विश्वनाथ मंदिर में गयी थी - उस वक़्त वो मेरे दिए हुए कपड़ों में थी ! इस बार वो मेरे साथ थी ! १९ साल बाद ! इस बीच मेरे सास ससुर गुजर चुके थे !
मार्च में मैंने शिव आराधना शुरू कर दी और शक्ति के प्रति जो जिस रूप में आशक्त था - वह आकर्षण भी कम होने लगा !
मै चैत नवरात्र में पूजा नहीं करता लेकिन इस बार किसी ने कह दिया - कुछ लिखो ! मैंने लिखा ! जो समझ में आया ! तभी कुछ एह्साह हुआ ! उसी दौरान एक बहुत ही पुराना मित्र जो किसी कष्ट में था - उसने अपने कष्ट को बताया - हालाकि उसका कष्ट मुझे डेढ़ साल से पता था लेकिन नवरात्र - फिर से उसने चर्चा की और मेरे मुंह से निकला - जाओ  सब ठीक हो जाएगा ! अगले ही दिन सकरात्मक जबाब आया ! तभी यह लगा - पांच बार लगातार पूजा के बाद अब उठने का समय आ गया है !
आप किसी भी तरह की शक्ति की उपासना करते हैं ! तपस्या करते हैं ! एक दिन या नौ दिन या आजीवन ! लेकिन उस तप का फल - किसी और को देना होता है ! यह सच है ! उस तप का फल आप खुद खाने लगे उसी दिन से शक्ति  क्षीण होने लगती है ! यहीं लालच को रोकना होता है ! और इंसान यहीं फंसता है ! हो सकता है - तप का फल किसी और के लिए रखा , और मिला किसी और को ! लेकिन जिसे जो तप देना होता है - आप दे चुके होते हैं ! आपको कुछ न कुछ बलि चढ़ाना होता है ! आप खुद के लिए कभी नहीं माँगते !
इस बार नवरात्र के पहले मैंने एक महिला ज्योतिष से बात किया - खुल कर ! उसको सारी घटना बताई ! उसने कहा - दुर्गा को प्रेमिका के रूप में पूजते हो , पत्नी शिव को उन्हें पिता रूप में और क्योंकि पत्नी ने पूजा की  तो तुम भी छः महिना से शिव को पिता रूप में जप ! यह गड़बड़ झाला है - फंस जाओगे ! माँ के रूप में पूजो ! अब यह कैसे संभव की जिसे आप कभी प्रेमिका रूप में पूजे - उसे फिर से माँ रूप में ? उस ज्योतिष ने कुछ जबाब नहीं दिया  लेकिन मैं चुपके से शिव को प्रणाम कर - नवरात्र शुरू कर दिया ! गड़बड़ झाला तो चूका था ! प्रायश्चित का समय है .... :))
लेकिन ये जप और तप वाली बात क्रिस्टल क्लियर हो गयी ! बिलकुल गंगोत्री की तरह साफ़ !
अगर आप इसे व्यापक तौर पर सोचें तो - आपके किसी भी तरह के जप / तप का फल जब तक दूसरों को नहीं मिले - वह आराधना सफल नहीं होती ! वह विज्ञान हो , कला हो , राजनीति हो - कहीं भी !
एक बात और समझ में आई - शक्ति आती है और शक्ति जाती है ! रूप बदलते रहती है ! उदाहरण के लिए - बचपन में आपकी मासूमियत ही आपकी शक्ति होती है , मासूमियत खोते हैं तब जवानी आती है और जब जवानी जाती है तब आप एक अलग शक्ति को समझते हैं ! यह क्रम है ! इसको समझना जरुरी है !
जीवन में एक ख़ास समय आता है - जब आपकी तमन्ना होती है - बाहरी दुनिया से अन्दर की दुनिया में जाते हैं फिर आप अन्दर की दुनिया से बाहर की दुनिया में आते हैं - हर तरह के अनुभव के साथ ...:)) मूलतः जीवन का सबसे बड़ी पूंजी यह अनुभव ही है !
लेकिन यह पूरा खेल - मन की एकाग्रता का ही है - जैसे आप एकाग्र होकर परीक्षा में बैठते हैं ....ख़ुशी तब होती है ...जितना सोचा उससे ज्यादा प्रश्न आपने हल किये ...तीन घंटा बिना सर उठाये ! असल तसल्ली वहीँ हैं ! रिजल्ट बहुत मायने नहीं रखता ...
यह पांचवीं बार शारदीय नवरात्र है ...देवी के उस रूप को प्रणाम ...जिस रूप की आराधना मैंने की थी !
विशेष अगले किस्तों में ..:))



@RR

Wednesday, October 5, 2016

नवरात्र - 2012


देवताओं का भी अजीब हाल है :( महिषासुर के एकाग्र ध्यान से प्रसन्न होकर उसको वरदान दे दिए ...फिर सभी देवताओं को हेडेक होने लगा ..मालूम नहीं ई महिषासुर इतनी शक्ती से क्या क्या न कर बैठे ...फिर 'देवी' की पुकार ...खुद क्यों नहीं आगे आये ...देवता हो ...इंसान की तरह वर्ताव क्यों ? इंसान और राक्षस में जब पहचान ही नहीं ...फिर देवता किस बात के ? जब तुम बुरे समय में ...तुम देवता होकर भी ...देवी के पास गए ...फिर हम जब तुमको बाईपास कर के ...देवी को पुकारें ...इतनी कष्ट क्यों ? हम भी तो देवता बन सकते हैं ...
~ इंसान

आज नवरात्र के छठे दिन 'माँ कात्यायनी' की पूजा होती है ! कहते हैं - माँ अपने पिता के घर जन्म लेने के बाद ..पति की गोत्र को न अपना कर अपने पिता की गोत्र को अपनाया - संभवतः यह 'पिता पुत्री' के बीच के उस भावुक सम्बन्ध को दर्शाता है - जिसे सिर्फ एक पिता और पुत्री ही समझ सकते हैं ! 
आप हिन्दू धर्म की कथाओं को पढ़ें - तब भी एक समाज होता था - ऋषी - मुनि / राजा / देव / असुर ....कहीं न कहीं ..कई कथाओं में ...एक पिता भी होता था ...लाचार ..मूक ! मैंने बहुत पहले लिखा भी था ...जब 'सीता' की अग्नी परीक्षा हो रही होगी ...तब अगर जनक जिन्दा होंगे ..उनपर क्या गुज़री होगी ..मौन ..मूक ..लाचार ! 
ऋषि खरे ने तीन चार दिन पहले दालान पर एक कमेन्ट किया - 'लक्ष्मी / सरस्वती / दुर्गा' तीनो के रूप को देखना चाहते हैं - एक पुत्री को सर्वगुण संपन्न बना दीजिये - सारे रूप वहीँ मिल जायेंगे !

हिन्दू माइथोलोजी विचित्र है - कोई भी भक्ती से शक्ती पा सकता है - फिर क्या ? फिर महिषासुर ..रावण ..लड़िये ... लड़ाई ..जब तक की वो एक कहानी ना बन जाए ! समुद्र मंथन में जो मिला ...देवता और दानव दोनों आपस में बाँट लिए - इंसान रह गया बीच में ....उसके अन्दर दोनों समा गए ..फंस गया इंसान ! इंसान देवता बनने की चाह पैदा करे तो उसके अन्दर का दानव अपनी शक्ती दिखा देता है ...अवकात में रहो ..देवता मत बनो ! दानव बनता है ..तो देवता उसकी शक्ती छीन लेते हैं ...इसी लड़ाई में ...एक दिन इंसान दम तोड़ ...कुल मिलाकर ...सार यही है ...जब आपको शक्ती मिले ..उसको इज्ज़त देना सीखिए ...जुबां से नहीं ...मन से ..श्रद्धा से ..वर्ना जिस गति से शक्ती आयी ...उसी गति से वापस ..
और ..शक्ती स्त्रीलिंग शब्द है ...!!!! 
और....शक्ती शिव के इर्द गिर्द घुमती हैं ...अबोध ..जिसे शक्ती का एहसास भी नहीं .... :))) 
है ..न ..विचित्र ...:))

19 Oct 2012 

आज नवरात्र के छठे दिन 'माँ कात्यायनी' की पूजा होती है ! कहते हैं - माँ अपने पिता के घर जन्म लेने के बाद ..पति की गोत्र को न अपना कर अपने पिता की गोत्र को अपनाया - संभवतः यह 'पिता पुत्री' के बीच के उस भावुक सम्बन्ध को दर्शाता है - जिसे सिर्फ एक पिता और पुत्री ही समझ सकते हैं ! 
आप हिन्दू धर्म की कथाओं को पढ़ें - तब भी एक समाज होता था - ऋषी - मुनि / राजा / देव / असुर ....कहीं न कहीं ..कई कथाओं में ...एक पिता भी होता था ...लाचार ..मूक ! मैंने बहुत पहले लिखा भी था ...जब 'सीता' की अग्नी परीक्षा हो रही होगी ...तब अगर जनक जिन्दा होंगे ..उनपर क्या गुज़री होगी ..मौन ..मूक ..लाचार ! 
ऋषि खरे ने तीन चार दिन पहले दालान पर एक कमेन्ट किया - 'लक्ष्मी / सरस्वती / दुर्गा' तीनो के रूप को देखना चाहते हैं - एक पुत्री को सर्वगुण संपन्न बना दीजिये - सारे रूप वहीँ मिल जायेंगे !

20 Oct 2012 

आज महासप्तमी ....देवी का पट खुलेगा या खुल गया होगा !
विराट ! 
मनोरम ! 
श्रद्धा ! 
विशाल !
जैसे इस रूप का ही इंतज़ार था ! देखते ही ..खुशी से मन ...कोई भय नहीं ...आँखें ऐसी जहाँ आप क्षण मात्र भी ठहर नहीं सकते ! विशाल रूप ....जैसे सभी देव स्तुति में लग गए ...धुप की खुशबू से पूरा पंडाल भर गया होगा ...आरती के वक्त ...श्रद्धा से पुरे शरीर में सिहरन ! देवी को साष्टांग दंडवत ! 
"शक्ती का पट तो खुल गया ...पर इनका ये विशाल रूप में स्वागत कौन करेगा ...किसकी हिम्मत जो इनके पास जाए ...इन्ही का कोई रूप जायेगा ...माताएं ..बहने ..बेटियाँ ..निकल गयी होंगी ...देवी के स्वागत में ..उस भव्य रूप के स्वागत में " - हम तो बस दूर से ..उस रूप में मंत्रमुग्ध ...
धन्य हो वो कुम्हार ...जिसने महालया के दिन ही देवी की आँखों में रंग भर दिया ...इस भव्यता ..इस रूप ..की खुशबू ..कहाँ से आई ..पूछिये उस कुम्हार से ..जिसने 'जहाँ' से मिटटी लायी ....
देवी को पुजिये ....किसी भी रूप में ....वो निर्मल है !

21 Oct 2012 


आज महाष्टमी है ! महागौरी का दिन ! महामाया के रूप में ! गौर वर्ण ! शांत चित ! अबोध बालिका के रूप में ! कहते हैं नारी जब इस रूप में आ जाए फिर वो पूज्यनीय हो जाती हैं ! तभी आज के दिन 'कुमार कन्या' ( कुंवारी ) को पूजा जाता है ! इस रूप को / इस कुमार कन्या को नर सबसे ऊँचा मानता है ! 
एक छोटा सा उदहारण देता हूँ - हिन्दू धर्म के अनुसार - आप अपने से ऊँचे / सर्वश्रेष्ठ को अपने दाहिने तरफ बैठाते हैं - सिंदूरदान के पहले.. 'कन्या' को दाहिने तरफ बैठाया जाता है - क्योंकी उसका स्थान वर से ऊँचा है ! सिंदूरदान के बाद ...दाहिने तरफ से बाएं ! 
धर्म कोई डर नहीं है - यह जीवन जीने का एक फिलोसोफी है - सभी धर्म लगभग एक जैसा ही आचरण बताते है - हाँ , एक सुपर शक्ती तो जरुर है ...कहीं न कहीं ! मानव ...जिद पर अड़ा...तुम कौन हो ..कहाँ हो ..इसी खोज में वो कोई भी धर्म को श्रद्धा से अपनाकर ..उस सुपर शक्ती की तलाश करता है ! 
बहुत कुछ है ...समझने को ...लिखने को ....और इस नवरात्र से बढ़िया अवसर क्या हो सकता है .. :)) महामाया की तलाश कीजिए ..कहीं मिल जाएँ तो मंत्रमुग्ध हो जाईये ...पूज्यनीय बना लीजिये ..अपने अन्दर के असुर को दबा के रखिये ..वर्ना ..महिषासुरवर्दिनी रूप में ...देवी को आने में ..ज्यादा समय नहीं लगेगा :))

22 Oct 2012 


महानवमी !! सिद्धिदात्री !! 
तीनो लोक देवी की अराधना में - क्या शिव , क्या ऋषि , क्या मानव ...सभी के सभी ! नौ दिन की भक्ती और देवी के सभी रूप की आराधना के बाद ...जैसे आज की शुभ घड़ी का इंतज़ार ! 
संसार 'शक्ती' को ही पूजता आया है - हजारो साल से चली आ रही इस व्यवस्था को हम और आप यूँ ही नहीं तोड़ सकते - देव तभी तक देव हैं जब तक उनके पास शक्ती है - अगर शक्ती न हो - क्या आप और हम उनको पूजेंगे ? :)) 
आज शाम 'दुर्गा पंडाल' जाईयेगा - आज की रात आपको बाकी सभी रातों से अलग नज़र आएगा - जैसे देवी की महिमा / उनका रूप / उनका आशीर्वाद / उनकी शक्ती - सबसे अलग - यह कहने की बात नहीं है - खुद महसूस करने की बात है ! 
देवी पूजन कोई नया नहीं है - हमारे घर घर में - कुलदेवी होती हैं - मिटटी से लेकर स्वर्ण रूप - जिस परिवार की जितनी शक्ती / भक्ती ! पर ..एक बात है ...कुलदेवी का कोई रूप नहीं होता ..जहाँ तक मैंने गौर किया है और वो सिर्फ परिवार तक ही सिमित होती हैं - और उस कुलदेवी से बढ़कर कोई और नहीं होता ! 
प्रणाम !

23 Oct 2012 

आज देवी की विदाई है - यह शब्द अपने आप में अश्रु से भींगा है - परंपरा है - विदाई तो होनी ही है ! इसपर कुछ भी विशेष लिखने की हस्ती मेरी नहीं है !
अब चलिए - 'रामायण' का रिविजन कर लिया जाए :- 
१. प्रेम : रामायण में लिखा है - राम ने सीता के स्वयंवर में जनक के धनुष को तोड़ा - मामूली बात है - प्रेम में डूबा / अँधा / जागा प्रेमी चाँद तारे तक तोड़ लाता है - धनुष तोड़ना तो बहुत छोटा काम था ! दरअसल सच्चे प्रेम में इतनी शक्ती होती है की वो कुछ भी करवा दे ! 
२. दुष्ट : रावण बहुत बड़ा ज्ञानी - प्रकांड विद्वान - शिव भक्त - पर संस्कार लेस मात्र भी नहीं - अगर आप थोडा डीटेल में पढेंगे तो पाएंगे की सिर्फ सीता के साथ ही नहीं उनके पूर्व जन्म एवं अन्य नारीओं के साथ उसने ऐसा ही व्यवहार किया था - दरअसल अहंकार / घमंड व्यक्ती को अँधा बना देता है और सम्पूर्ण विश्व उसे 'भोग' नज़र आने लगता है - लेकिन लेकिन और लेकिन ..एक छल उसके मौत का कारन - सब ठीक ..पर सोचिये ..इतना बड़ा ज्ञानी ..एक छल के कारण ..हिन्दू धर्म में जन्मा कोई भी व्यक्ती - अपने जन्म से ही रावण को विलेन के रूप में देखता है - इससे बड़ी सजा किसी प्रचंड ज्ञानी के लिए क्या हो सकती है :( 
३. नारी ह्रदय : कोमल ह्रदय और जिद - जब देवर मना कर के गए - रेखा खिंच दिए - फिर 'एक्सपेरिमेंट' क्यों ? इसका लोजिक कोई नारी ही दे सकती है - हमारे आपके वश में नहीं है - बेहतर है - पुरुष धर्म अपनाईये - रावण कहीं मिले उसे मार डालिए ! सीता से मत पूछिये - तुने लक्ष्मण रेखा क्यों पार किया ! 
४. सीता अग्नी परीक्षा : राम का दरबार - दोनों तरफ से तर्क वितर्क - प्रजा और सीता दोनों के वकील अपने अपने दलील - राम कुर्सी पर ! सीता को वो अग्नी परीक्षा से रोक भी सकते थे - पर 'करियर' का बात था - रिलेशनशिप गया तेल लेने - राजा का धर्म पहले - पति का बाद में ! आज भी यही होता है ! 
५. अश्वमेघ : कहते हैं - लव कुश ने अपने पिता राम के अश्वमेघ को रोक दिया ! बहुत सिंपल लॉजिक है - कोई भी पुत्र / पुत्री यह नहीं बर्दास्त करेगा की - बाप राजा बना रहे और माँ जंगल जंगल भटके - उस गुस्से में कोई भी साधारण पुत्र भी अश्वमेघ को रोक सकता है ! याद रखिये - जब आप घर में अपनी पत्नी पर गुस्सा कर रहे हैं - घर में चुप चाप बैठा पुत्र / पुत्री सारे बातों को सुन समझ ..आपके लिए एक जबरदस्त नफरत पैदा कर रहा है ..हो सकता है ..लोक लिहाज में ..वो आपसे बदला नहीं ले ...पर ...किसी दिन मौका मिला ..आपके अस्वमेघ को वो रोक देगा ..आपका ही खून ..आपको अवकात दिखा देगा :)) 
हैप्पी दशहरा !
24 Oct 2012 


@RR

Monday, September 26, 2016

सच का सामना - भाग सात

सच का सामना - भाग सात 
बात वर्षों पुरानी है । अपने विवाह के तुरंत बाद हनिमून पर नहीं गया था - सास ने वीटो लगा दिया , कहीं लड़का किसी पहाड़ से उनकी नाजूक बेटी को ठेल न दे 😐 
एक महीने बाद घूमने गए । एक शहर में एक बेहतरीन रेस्तराँ में डिनर कर रहे थे । पत्नी बेहतरीन सिल्क साड़ी में । हम भी चमक रहे थे । डिनर कर के जैसे ही रेस्तराँ से निकले - एक परिचित परिवार मिला । वहाँ एक परिचित चेहरा भी । हम ख़ुश होकर उनके टेबल के पास गए और सबसे अपनी पत्नी का परिचय करवाने लगे । 
वहाँ भूतों न भविष्यति टाइप एक अत्यंत ही ख़ूबसूरत कम्प्यूटर इंजीनियरिंग टॉपर लड़की बैठी थी , जिनसे पूर्व में महज़ दो बार मेरी बात हुई थी , हेमामलिनी की ख़ूबसूरती और भाग्यश्री की आवाज़ । पिता डॉक्टर , बाबा डॉक्टर , चाचा डॉक्टर , फुआ डॉक्टर । अपने शहर में पूरी गली का सारा प्लॉट उसके परिवार के नाम । ख़ूबसूरत भी अत्यंत । बस कह दिया ...हेमामालिनी ...:)) 
अब देखिए । वो लड़की अचानक से अपने टेबल से बाहर की तरफ़ रोते हुए निकली । हम कुछ समझते की मेरी पत्नी और ज़ोर से अपना हाथ मेरी कमर पर । इन दोनो महिलाओं की उस वक़्त की अभिव्यक्ति मुझे समझ में नहीं आयी । 
हम भी रेस्तराँ से बाहर हो गए । लेकिन उसका रोते हुए बाहर जाना - मेरे मन को पोक कर दिया । पत्नी ने एक सवाल मुझसे नहीं पूछा । अगर ऐसा ही कुछ मेरी पत्नी के साथ होता तो - हम उनका जीना हराम कर देते , कौन था - कहाँ का था - कब से जानता है , इत्यादि इत्यादि ...लेकिन मेरी पत्नी ने एक सवाल नहीं पूछा । कुछ महीनो बाद , मैंने पत्नी से पूछा तुमने कोई सवाल या हंगामा क्यों नहीं किया और उस वक़्त बड़े ज़ोर से ढीठ की तरह मुझे क्यों पकड़ ली ? पत्नी मुस्कुरा दी और बोली - यह दो औरत के बीच का संवाद था । हम माथा ठोक लिए - बियाह हुआ नहीं कि सिनेमा 'अर्थ' चालू 😳 
 समाज में इंटरनेट आया । मरद जात - कूकुर - सबसे पहले उस मोहतरमा का ईमेल खोजे और धड़ाम से एक ईमेल ठोक दिए । जबाब आने लगा । एक साल । बीच में हमको बेटा हुआ - नाम क्या रखा जाए , यह सलाह उनके तरफ़ से आया 😬😝 एकदम सात्विक दोस्ती । सिर्फ़ होटमेल पर । तब आर्ची कार्ड का ज़माना - न्यू ईयर पर , एक नहीं पूरा पाँच हज़ार का भेज दिए , अपनी पत्नी के हस्ताक्षर के साथ । 
एक साल बाद - हमको बर्दाश्त नहीं हुआ - हम पूछ दिए - आप उस रेस्तराँ में रोते हुए क्यों बाहर गयी ? ऐसा कुछ था तो पहले ही बोलना था - आपका ही माँग टीक़ देते 😝 हालाँकि मैंने महज़ मज़ाक़ किया था । 
ये क्या हुआ  ...मेरी ये बात उनके तथाकथित सेल्फ़ स्टीम को चोट पहुँचा गयी । ईमेल बंद । 
इस सच्ची घटना का कोई विश्लेषण नहीं कर रहा । लेकिन पोक उधर से ही हुआ था । मरद जात के सामने कोई औरत रो दे - उसके बाद यही सब होता है 😐 
वो एक कम्प्यूटर इंजीनियर होते हुए भी किसी भी सोशल मीडिया पर नहीं हैं । लेकिन यह पूरा सच नहीं था - शायद एक ज़बरदस्त म्यूचूअल क़्रश रहा हो । आदततन मैंने कभी उनका पीछा नहीं किया था लेकिन उनके रोने वाली घटना के बाद - मैं उनके मुँह से सच सुनना चाहता था । जीत उनकी हुई - उनकी ज़ुबान बंद ही रही लेकिन जब कभी आमना सामना होता था उनकी आँखें बहुत कुछ कह जाती थी । शायद उन्होंने वो क़र्ज़ लौटा दिया - जब मेरी आँखें उनको संदेश देती और उनकी ज़ुबान मुस्कुरा देती , सबसे छुपा कर - सबसे बचा कर । 
पर मेरा एक सवाल - आजीवन वाली दोस्ती तोड़ दी । मैं भी लाचार था - सवाल नहीं पूछता तो बेचैन रहता और पूछ दिया तो सम्बंध ख़त्म । 
अँतोगत्वा ...हम ख़ुद के दिल के लिए जीते हैं - कई बग़ैर जवाबों वाले सवाल के साथ ...पर सवाल बेचैन करते हैं - और इंसान उन सवालों के जबाब में कई हदें पार कर बैठता है ! 
हर रिश्ते का एक पडाव होता है या उसकी एक आयु होती है - जो उनमे से कोई एक तय करता है ! दिक्कत तब होती है - जब सामने वाला अपने उस हमसफ़र का हाथ पकड़ एक अन्धकार में चलता है और अचानक पता चलता है की - हाथ तो छुटा ही साथ में वो रिश्ता भी पल भर में मर गया ! पर वो रिश्ता अपनी आयु पूर्ण कर के मरा है  , बस यह बात किसी एक को पता होती है ! 

और कई बार रिश्तों का गर्भपात भी हो जाता है ...जिसे हमारा संकोच , लिहाज , भय , अहंकार , चीटिंग - इनमे से कोई गर्भपात करवा देते हैं ...यूँ कहिये तो हर रिश्ते का गर्भपात ही होता है ...कोई भी रिश्ता पूर्ण नहीं है ...अगर नहीं हुआ तो ...वक़्त उस रिश्ते को अपंग बना देता है ...कई बार भावनात्मक डोरी कमज़ोर हुई तो ...मर्सी किलिंग ...
कभी किसी रिश्ते का मर्सी किलिंग देखा है ...? धीरे धीरे मर रहे रिश्ते को अचानक से मार देना ...ताकि बाकी के लोग शान्ति से रह सकें ...आईसीयु में भर्ती रिश्ते का ...एक झटके में ...ओक्सीजन पाईप खिंच देना ...और चुपके से बाहर निकल जाना ....:)) ऐसा भी होता है ...और वो भी इंसान ही करता है ....कभी हम तो कभी सामने वाला ...

सॉरी ...एक गरिमा के साथ लिखने की कोशिश की है ...पत्नी खुद के लिए नहीं बल्कि आपके लिए ज्यादा चिंचित हैं ...पत्नी का आपके लिए चिंता ...फिर से मुझे कन्फ्यूज कर दिया ...महिलायें सोचती कैसे हैं ...:)) 

Tuesday, September 13, 2016

सच का सामना - भाग पांच और छः

बात वर्षों पुरानी है ! मै पटना में अपने कंप्यूटर सेंटर में बैठा था ! एक सुबह  एक सज्जन आये ! सफ़ेद कुरता और पायजामा में ! मुझसे उम्र में पांच - छः साल बड़े ! मैंने हेलो कह उन्हें अपने केबिन में बैठाया ! उन्होंने कहा - मै शिपिंग कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया में हूँ ! छुट्टी में अपने ससुराल आया हूँ  सोचा कंप्यूटर क्यों न सिख लिया जाए ! और भी बात हुई और बातों बातों में पता चला की उनका ससुराल मुझसे पूर्व परिचित है ! अगले दिन वो पति - पत्नी दोनों साथ आये ! बेहद स्मार्ट !
गप्पी हूँ ! फुर्सत में उनके साथ देश दुनिया की खबर पर चर्चा होने लगी ! बातों बातों में पता चला की वो भी मुजफ्फरपुर के रहने वाले हैं ! फिर मैंने अचानक से बोला - कहीं आप वो तो नहीं ................! वो सर झुका के बोले - हाँ , मै उसी परिवार से हूँ ! मैंने पूछा - क्या हुआ था , सच जानना है ! वो बोले - अगले इतवार फुर्सत में सब बताऊँगा !
" भैया इंजिनियर बना तो टाटा स्टील में नौकरी हुआ - शहर के सभी नामी लोग शादी के लिए आने लगे - जितने भी लोग आये - उसमे सबसे खुबसूरत मेरी भाभी थी - गोल्ड मेडलिस्ट और नामी डॉक्टर की बेटी ! भैया मुझसे भी हैंडसम था ! ऐसी जोड़ी कहीं नहीं देखी ! भईया का ससुराल भी शहर में ! तब मै नेतरहाट से टॉप करके - पटना के सायंस कॉलेज में था ! भैया , टाटा से आता जाता रहा ! भाभी कभी हमारे घर तो कभी अपने मायके तो कभी टाटा ! और एक दोपहर भाभी ने हमारे मुजफ्फरपुर आवास पर अपनी जिंदगी समाप्त कर ली ! दहेज़ कानून में भैया , माँ और पापा सभी जेल चले गए ! मै और छोटा भाई बच गए ! जग हंसाई अलग - बेहद खुश मिजाज भाभी का जाना अलग , पूरा परिवार जेल में ! भाभी के पिता जी और समाज हमारे परिवार के पीछे ! मै सायंस कॉलेज होस्टल में पढता रहा - उस हालात में भी आई आई टी और टी एस राजेंद्र दोनों जगह क्लियर किया ! लोगों ने कहा शिपिंग में जाओगे - जल्द पैसा मिलेगा - तभी परिवार को सहारा ! छोटे भाई का पढ़ाई डिस्टर्ब हो गया ! भईया हिम्मत नहीं हारा - जेल में रहकर भी वो गेट ( एम टेक प्रवेश परीक्षा ) में टॉप किया ! मै जल्द नौकरी में जाकर पैसा कमाने लगा ! इसी बीच पांच छ साल गुजर गए - सभी जेल में ! फिर किसी तरह कोर्ट कचहरी हुआ और अंत में पूरा परिवार बरी हुआ ! "
अब सवाल उठता है - हुआ क्या था ? उनकी भाभी ने आत्महत्या क्यों की - वो भी शादी के दो वर्षों बाद ? मै दिवंगत आत्मा पर कोई आरोप नहीं लगा रहा - जो परिवार वर्षों जेल में रहा - उसने भी उनकी इज्जत को बरक़रार रखा !
अक्सर खुबसूरत लड़किया - जवान होते ही - जिस किसी ने अप्रोच कर दिया - वो उसके साथ निभाती हैं - जबतक की परिवार वाले कहीं और शादी का न बोले ! लड़कियां प्रेम और शादी दोनों मामले में अलग ढंग से सोचती हैं - प्रेम एक लोफर सड़क छाप से भी हो सकता है पर शादी हमेशा सुरक्षित भविष्य को देख वो करती हैं ! कुछ ऐसा ही केस था ! संभवतः प्रेमी एक सड़क छाप था जिसके हाथ एक हीरा लग गया था ! हीरा हाथ से फिसल गया - वो बेचैन होकर लड़की की शादी के बाद तक उसका पीछा करता रहा ! अक्सर उसकी गली से गुजर जाता ! लड़की की नज़र पड़ी तो वो बेचैन ! और इसी बेचैनी में जब ग्लानी / गिल्ट हुई - घर अकेला - आत्महत्या का रूप ले लिया जिसमे एक परिवार झूलुस गया ! लड़का गीत गाता था - गली से गुजरते वक़्त वही तान छेड़ देता , जो लड़की माँ पसंदीदा ! उसने भी ख्वाब सजाये थे - बड़े घर की लड़की से बियाह और ऐशोआराम की ज़िन्दगी ! उसके सपने टूटे - उसने लड़की की लीला ही ख़त्म कर दी !
पुरुष ऐसे धोखे को 'कुंठा' में परिवर्तित कर देते हैं ! पुरुषों की कुंठा को एक दूसरा पुरुष ही समझ सकता है ! पुरुषों की कुंठा को समझ पाना - यह महिलाओं का वश नहीं ! छल उसी कुंठा का बाहरी रूप होता है ! मजबूरी और धोखा में अंतर होता है ! लड़की को एक दिन समाज को भी मुंह दिखाना है - अगर आप सक्षम नहीं है - प्रेम तो यही कहता है - चुपके से अपने प्रेम की सलामती का दुआ करते हुए - बाहर निकल जाईये ! पर ऐसा होता नहीं है ! ऐसे सम्बन्ध विच्छेद कहीं से धोखा नहीं है - यह एक सामाजिक मजबूरी है ! क्या वही इंसान अपने पचास के उम्र में - अपनी बेटी का वैसा सम्बन्ध स्वीकार करेगा ? कतई नहीं !

सच का सामना - भाग छः
अभी तीन साल पहले एक डॉक्टर मित्र ने एक सच्ची कहानी बताई ! बिहार के एक मेडिकल कॉलेज में - एक लड़का और एक लड़की पढ़ते थे ! दोनों हसीन और जवान ! लड़की कुछ ज्यादा ही सुन्दर थी ! पिता भी नामी डॉक्टर ! पर दोनों की शादी नहीं हुई ! लड़की की शादी दक्षिण भारत में पदस्थापित एक सिविल सर्वेंट से हुई ! प्रेमी शहर छोड़ विदेश चला गया ! लड़की अपने पति के साथ अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त ! बच्चे हुए ! बच्चे बड़े हुए ! इंटरनेट आया ! उस महिला को इंटरनेट पर पूर्व प्रेमी मिला ! 'हेलो ...ढक्कन ..कैसे हो' ! मस्त हूँ ! बीवी बच्चों का फोटो दिखाओ ! मैंने अभी तक शादी नहीं की ! महिला यह सुन ग्लानी / गिल्ट में चली गयीं ! अब रात दिन प्रेमी से बात का मन ! महिला डॉक्टर ने ठान ली ! वो एक ट्रेनिंग के बहाने विदेश गयीं ! वहां दोनों मिले ! यहाँ भारत में पति अपने बच्चे को संभालते हुए - अब पत्नी लौटेगी तो अब लौटेगी ! पत्नी नहीं लौटी ! बारहवीं के बच्चों की माँ नहीं लौटी ! विदेश में दोनों पूर्व प्रेमी पति पत्नी की तरह रहने लगे ! अब वादा निभाना था - मंगलसूत्र पहनना था ! छ महिना - एक साल हो चुके थे ! महिला को वहीँ नौकरी भी मिल गयी थी ! एक दिन अचानक वो प्रेमी महोदय गायब हो गए ! कुछ दिनों बाद पता चला - वो भारत लौट कहीं और भतीजी उम्र की लड़की से विवाह कर लिए !
और वो महिला डॉक्टर ? अपना मायके छोड़ दिया ! पति छुट गया ! बच्चे घृणा करने लगे ! पर वक़्त और फाइनेंसियल इंडीपेनड़ेंसी गजब की चीज़ होती है ! बड़े से बड़े जख्म को भर देती है ! मैं उस महिला का तस्वीर इंटरनेट पर देखा - चेहरे पर कोई ग्लानी नहीं थी - भले रातों को नींद नहीं आती होगी !
अब सवाल उठता है - वह इंसान इतने दिनों तक शादी क्यों नहीं किया ? क्या वह अपनी प्रेमिका का इंतज़ार कर रहा था ? शायद नहीं ! उसके पुरुष अहंकार को चोट लगी थी ! वह उस अहंकार को पाल पोश कर बड़ा किया - वक़्त ने भी उसके अहंकार को मदद किया ! जिस दिन उसके पुरुष अहंकार को शान्ति मिली - वह निकल पडा !
अजीब होता है - यह पुरुष अहंकार जो कुंठा में परिवर्तित हो जाता है ! बहुत करीब से देखने पर यह नज़र आता है ! बड़े से बड़े राजनेता और व्यापारी इसके रोगी होते हैं ! मैंने देखा है ! यही पुरुष अहंकार उन्हें चोटी तक ले जाता है ! पर यही कुंठा उनसे ऐसे घिनौने काम भी करवाता है !
प्रेम हर हाल में अपने प्रेम की सलामती चाहता है ! प्रेम कभी बदला ले ही नहीं सकता ! प्रेम कभी बदनाम नहीं कर सकता क्योंकि प्रेम में इतना ताकत होता है की वह कैसा भी दर्द बर्दास्त कर लेता है ! प्रसव पीड़ा कैसे कोई बर्दास्त कर लेता है - वह एक माँ का प्रेम होता है ...:))
प्रेम कीजिए ....लेकिन किसी के अहंकार और अहंकार से परिवर्तित कुंठा से बचिए ! ज़िन्दगी न मिलेगी दुबारा :))

@RR

Sunday, September 11, 2016

दो दुनिया - भाग दो

ईश्वर / प्रकृति जब इंसान का सृजन करती है - उसे दो हाथ , दो पैर , दो आँख इत्यादि के साथ इस धरती पर भेजती है ! लाख में किसी एक इंसान को ईश्वर दिव्यांग / विकलांग बना कर भेजता है ! लेकिन सभी इंसान एक जैसे ही होते हैं ! उसी में कोई लम्बा , कोई मोटा तो कोई दुबला ! 
यह तो है शारीरिक दुनिया जिसे हम बाहर की दुनिया कह सकते हैं ! ठीक इसी तरह हर एक इंसान की एक अन्दर की दुनिया होती है - जिसे हम मन या स्वभाव या उस इंसान की प्रकृति कह सकते हैं ! मैंने अपने इस उम्र तक यही पाया है की - स्वभाव के जितने गुण या अवगुण होते हैं - लगभग सभी गुण या अवगुण हर एक इंसान के अन्दर होता है ! हर एक इंसान के अन्दर प्रेम , छल , लालच , क्रोध , वासना , त्याग , भोग इत्यादि जितने भी गुण या अवगुण संसार में होते हैं - सभी के सभी एक इंसान के अन्दर होता है ! 
लेकिन दिक्कत तब होती है जब इन गुणों या अवगुणों के मिश्रण का अनुपात ज़माना या स्थान के हिसाब से  गड़बड़ा जाए ! उदहारण के लिए आपके कान जरुरत से ज्यादा बड़े हो जाएँ फिर आप भद्दे दिखेंगे और अगर कान नहीं हो तो भी आप अजीब दिखेंगे !
वैसा ही कुछ अन्दर की दुनिया या स्वभाव के साथ भी होता है ! आपके अन्दर क्रोध न हो - कई बार सामने वाले को बढ़िया लगेगा लेकिन कई बार आपके साथ वाले या आप स्वयं मुश्किल में फंस जायेंगे ! आपको सीमा पर लडाई लड़नी है और आपके अन्दर क्रोध नहीं पनप रहा - आप लड़ाई हार जायेंगे !
ठीक उसी तरह आपके अन्दर प्रेम नहीं है - या बहुत ज्यादा है - दोनों में मुश्किल है ! अगर नहीं है तो कोई करीब नहीं आएगा और अगर बहुत ज्यादा है तो वह छल का रूप ले लेगा क्योंकि ये सभी गुण या अवगुण बहुत एक्सक्लुसीव होते हैं - प्रेम हर किसी पर वर्षाने का चीज नहीं है ! क्रोध हर किसी को दिखाने का नहीं है - फिर आपके क्रोध का कोई महत्व ही नहीं देगा - आपका प्रेम किसी को सुख नहीं दे पायेगा !
आप खाना हाथ से ही खायेंगे - पैर से खायेंगे तो अजीब लगेगा ! जिसे आपको देखना है उसे आप सुन कर कोई निर्णय नहीं ले सकते ! कहाँ कान का महत्व है और कहाँ आँख का - यह समझना होगा  !
वासना को लेकर समाज हमेशा नकरात्मक रहा है लेकिन क्या हम वैसे लडके या लड़की से अपनी बेटी / बेटी की शादी कर सकते हैं जो बिलकुल वासनाविहीन हो ? कतई नहीं ! लेकिन यही वासना अनुपात से ज्यादा हो जाए फिर खुद को भी दिक्कत और समाज को भी दिक्कत !
समाज कहीं से भी किसी गुण या अवगुण को नकारता नहीं है बल्कि उन्हें नियंत्रण में रख सही जगह और सही समय पर - सही अनुपात में दिखाने या उपयोग करने को कहता है !
भय गुण है या अवगुण - कहना मुश्किल है ! भयमुक्त इंसान क्या क्या गलती कर बैठे - कहना मुश्किल है ! और भययुक्त इंसान के लिए एक कदम भी आगे बढ़ना मुश्किल है !
पूरी ज़िन्दगी इसी को सीखना है - कब और कैसे और किस अनुपात में हम अपने गुण या अवगुण का फायदा ना सिर्फ खुद के लिए या बल्कि परिवार और समाज के लिए उठायें ! जैसे हमें बचपन से ही प्रकृति / परिवार / समाज हमारे अंगों के सही इस्तेमाल को बताता है लेकिन कोई परिवार या समाज हमें अपने स्वभाव के गुण या अवगुण के इस्तेमाल को नहीं बताता है - कई बार हमें खुद के ज़िन्दगी से मिले फायदे या ठोकर से सीखना पड़ता है - कई बार सीखते सिखते देर हो जाती है तो कई बार बहुत जल्द आँखें खुल जाती है !
इस सामाजिक दुनिया में सबसे ज्यादा गाली 'अहंकार' को मिलती है क्योंकि इस अहंकार पर रिश्ते को बर्बाद करने का इलज़ाम लगता है ! लेकिन आप सभी लोग मुझे यह बताएं की - क्या बगैर अहंकार कोई जिंदा रह सकता है ? प्रेम का पहला शर्त ही है - अहंकार का पूर्ण समर्पण ! पर पूर्ण समर्पण के बाद इन्सान सामने वाले की नज़र में अपनी महत्व खो बैठता है - आकर्षण ख़त्म हो जाता है ! यह कैसी विडम्बना / पैराडॉक्स है की आपको रिश्ते में अहंकार नहीं चाहिए और जब कोई अपने अहंकार को ख़त्म कर दे तो आप उसकी महता खत्म कर दें - कुछ अजीब नहीं लगता ?
शायद यहीं से शुरू होता है - छल ! छल बिलकुल प्रेम सा दिखता है , वही आनंद देता है लेकिन छल पर आधारीत रिश्ते में एक झूठे अहंकार को समर्पित किया जाता है , जैसे ही मकसद पूरा हुआ - झूठे और झुके अहंकार की जगह असल अहंकार अपने फन से फुंफकारना शुरू कर देता है ! फिर हम शिकायत करते हैं - धोखा मिला ! धोखा तो प्रथम दिन से ही है बस सामने वाले इंसान के समझ का फेर है ! इसलिए कई बार लोग रिश्ते की बलिदान चढ़ा देते हैं लेकिन अपने अहंकार को झुकने नहीं देते ! कई बार यह अहंकार आत्म सम्मान का शक्ल ले लेता है !
क्या हम अपनी आत्मा के आईने के सामने अपने ह्रदय पर हाथ रख - यह कह सकते हैं की - हमने कभी किसी को धोखा नहीं दिया , हमारी वासना कभी नहीं जागी , हमारे अन्दर कोई लालच नहीं ! अगर हमारी आत्मा ऐसा कहती है तो इसका मतलब की हमरी अंतरात्मा मर चुकी है ! ऐसा हो ही नहीं सकता , क्योंकि ये सारे गुण या अवगुण ईश्वर ने हमें दिए हैं ! साथ में ईश्वर ने हमें अपनी समझ दी है - आप ज़िन्दगी में बगैर लालच किसी ट्रैप में नहीं फंस सकते - लालच अँधा बना देता है ! लेकिन क्या बगैर लालच हम किसी चीज को पा सकते हैं ? लालच भी जरुरी है ! पर सबका अनुपात ठीक होना चाहिए ! यह अनुपात आपका संघर्ष , अनुभव और समझ से ठीक होगा और जिस किसी इंसान के अन्दर यह अनुपात ठीक होगा - वही इंसान पूर्ण होगा ! अगर यह अनुपात गड़बड़ है - आप पूर्ण नहीं है ! एक गुण है - वफादारी ! अगर आप वफादारी से पूर्ण है तो भी यह गड़बड़ है - आप अपनी महता खो देंगे !
जिस तरह हम अपने शरीर की साफ़ सफाई करते हैं - आँखें कमज़ोर हो जाने पर चश्मा पहनते हैं ठीक उसी तरह अपने अपने अन्दर की दुनिया और सारे गुण / अवगुण का आत्म अवलोकन करना होता है ! कई गुण / अवगुण की जरुरत समय के हिसाब से ख़त्म हो जाती है - उन्हें बेवजह भी नहीं पालना चाहिए - जैसे जिद बचपन में शोभा देता है और बुढापा में रुसवाई ...:))
बहुत कुछ है लिखने को ...:))

क्रमशः 

@RR


Friday, September 2, 2016

सच का सामना



सच का सामना : 
बात वर्षों पुरानी है । मेरे गाँव घर पर कोई आयोजन था । बाबा ने हर किसी को न्योता भेजा था । आयोजन सफल रहा । 
कुछ दिनो बाद - मैं बाबा के साथ उनकी गाड़ी पर बैठ कहीं जा रहा था - अचानक उनकी कार के सामने एक महिला आयीं - उस वक़्त उनकी उम्र 40 रही होगी । बाबा अचानक से कार से निकले और हाथ जोड़ खड़े हो गए । उस महिला की शिकायत थी - सबको न्योता गया , आपने मुझे क्यों नहीं न्योता भेजा । बाबा हाथ जोड़ चुप थे । 
बाद में पता चला की वो हमारे इलाक़े की सबसे बड़े ख़ानदान की बिन ब्याही महिला थी । उनके पिता को ख़ुद की 800 एकड़ ज़मीन थी । अंग्रेज़ के ज़माने में मजिस्ट्रेट होते थे । विलासपूर्ण जीवन था । सब कुछ था पर मरने के पहले बेटी का बियाह नहीं कर पाए ।
इस घटना का मेरे ऊपर बहुत प्रभाव पड़ा । सर्वप्रथम वो ज़मींदार साहब मरने के बाद भी मेरी नज़र से गिर गए और दूसरी बात मैंने अपने जीवन में हर कार्य से ऊपर बेटी / बहन की शादी को माना । ख़ुद जब पीजी में था - परीक्षा के पहले वाले दिन भी बहन की शादी के लिए अकेले घुमा । कई ममेरी / फुफेरी / चचेरी बहनों की शादी में सारे मतभेद भुला आगे बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया । कई जगहों पर टूटते रिश्तों को बचाने के लिए ज़हर की तरह अपमान का घूँट पिया ।
अभी हाल में ही एक जानकारी मिली - बिहार के एक बड़े नामी परिवार में , पढ़े लिखे भाई ने अपने से आठ वर्ष छोटी बहन की शादी ही नहीं होने दिया क्योंकि 2005 के क़ानून के अनुसार बाप दादा की संपती में बहन का भी अधिकार हो जाता - वो बड़ा मकान दो हिस्सों में बँट जाता । बहन उम्र होते ही पगला गयी । समाज के सामने बोल दिया गया - इस पगली से कौन ब्याह करेगा ।
यह दोनो घटना सच है । दोनो परिवार मुझसे जुड़े हुए हैं । एक जगह बाप आजीवन शराब में डूबा रहा और दूसरी जगह भाई बड़े डिग्री और बड़ी कार में घूम अपनी ज़िम्मेदारी से बचता रहा ।
यह सच है । ईश्वर ऐसे सच से हम सबको बचाए ।


सच का सामना - भाग दो 
दुनिया का सबसे जटिल चीज़ है - इंसान का स्वभाव । लेकिन यह जटिलता भी एक फ़ोरम्युला पर आधारित है । जिसने इस जटिलता को समझ लिया वह विजेता है :)) 
एक उदाहरण देता हूँ - बिहार के जितने भी अपर मिडिल क्लास हैं - वहाँ हर एक घर में एक बूढ़ा और एक बुढ़िया मिल जाएगी । किसी के बच्चे साथ नहीं हैं । सबके बच्चे ख़ूब बढ़िया सेटल हैं । 
एक माँ बाप को अपने बच्चे को पैर पर खड़ा करने में कितना ताक़त लगाना पड़ता है वह एक माँ बाप ही समझता है । और चिड़िया को पर लग गए चिड़िया उड़ गयी । जिस माँ बाप ने जिस औलाद को मज़बूत किया वही औलाद एन वक़्त पर साथ छोड़ दी ...:))
यह दुनिया की रीत है । किसी भी रिश्ते में - आप जिस किसी इंसान को मज़बूत बनाते हैं वह इंसान सबसे पहले आपको ही धोखा देता हैं । वैवाहिक ज़िंदगी में भी ऐसा ही होता है - गोवा की राज्यपाल महोदया लिखती हैं - आएल बेटी गेल शृंगार , आएल सौत भेल शृंगार । मतलब की बेटी के आगमन के बाद शृंगार ख़त्म हो जाता है और उसी समय सौत प्रवेश करती है । वह औरत बेटी के लालन पालन से परिवार को मज़बूत कर रही होती है और उसी वक़्त उसे 'धोखा' मिलता है ..:)) बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री ने एक बयान दिया था - औरत भी तभी चिटिंग करती है जब मर्द परिवार के मज़बूती के लिए घर से बाहर कमाने जाता है ...:))
सीता भी रावण के चूँगल में तभी फँसी जब घर पर राम नहीं थे । आप रावण को भी दोष नहीं दे सकते - उसने अपने स्वभाव से अपना काम किया लेकिन राम की जवानी तो ख़त्म हो गयी । और हर पुरुष राम नहीं होता लेकिन हर पुरुष के अंदर एक रावण भी होता है ।
वैवाहिक चिटिंग को लेकर पुरुषों के ख़िलाफ़ कोरिया में बहुत ही कड़ा क़ानून था । लेकिन अब वो क़ानून हटा दिया गया । कारण टेक्नोलोजी के आने के बाद - शिक्षा और नौकरी ने महिलाओं को भी चिटिंग की आज़ादी दी । उनकी प्रतिशत पुरुषों के बराबर पहुँच गयी । क़ानून ही ख़त्म हो गया ।
लेकिन यहाँ प्रकृति सामने आती है । महिलाएँ चिटिंग को सम्भाल नहीं पाती हैं । क्योंकि पकड़ में आने के बाद पुरुष माफ़ नहीं कर पाते हालाँकि महिलाएँ माफ़ कर देती हैं । यहाँ भी दोनो की अलग अलग प्रकृति है - महिलाएँ अपने पुरुष के सेक्सुअल सम्बंध को माफ़ कर देती हैं लेकिन उनके भावनात्मक सम्बंध को लेकर भूल नहीं पाती - वहीं पुरुष अपनी महिला के भावनात्मक सम्बंध को तवज्जो नहीं देता है लेकिन शारीरिक सम्बन्ध को माफ़ नहीं कर पाता है । ऐसा जानवरों में भी देखा गया है ।
चिटिंग को पुरुष सम्भाल लेते हैं क्योंकि अधिकतर बार वो छल जैसा होता है लेकिन महिलाएँ एक जैसा प्रेम सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही पुरुष से कर पाती हैं और वो फँस जाती हैं ।
लेकिन यह स्वभाव दोनो में पाया जाता है - रिश्ते ऊब लेकर साँस लेते हैं - शायद इसी वजह से समाज स्त्री और पुरुष दोनो के लिए कुछ मज़ाक़िया रिश्ता बनाया है - जैसे देवर भाभी , जीजा साली इत्यादि लेकिन वो भी परिवार समाज के नज़र के सामने ।
ख़ैर ....


सच का सामना - भाग तीन 
एक घटना याद है ! मेरे पटना में दो दोस्त होते थे ! जबरदस्त दोस्ती ! एक दुबई चला गया और दूसरा पटना में रह गया ! कुछ समय बाद दुबई वाले ने एक बिजनेस सोचा और कंप्यूटर एजुकेशन का फ्रेंचईजी लेने का सोचा और अपने जिगरी दोस्त को बताया ! 
वो वापस दुबई चला गया ! वहीँ से अपने पटनावाले दोस्त के एकाऊंट में पैसे भेजने लगा ! कंप्यूटर सेंटर शुरू हो गया ! दो तीन साल बाद जब हिसाब किताब की बात आई तो पटना वाला पैसे लौटाने लगा - दुबई वाले को पता चला की कंप्यूटर सेंटर तो उसके नाम से है ही नहीं ! वो उसी क्षण पगला गया ! पैसे का धोखा दिल के धोखे से बड़ा होता है ! ( पटना के कुछ लोग इस कहानी को जानते होंगे )
अजीब बात है ! जहाँ विश्वास है वहीँ धोखा छुपा होता है ! जो धोखा देता है उसकी अपनी दलील होती है और जो धोखा खाता है वह बौखलाया हुआ - उलुल जलूल बोलता है और गुस्सा में अपना ही केस कमज़ोर करता है !
पटना वाले का नियत बदल गया था , वह दुबई वाले को पैसा लौटाने को तैयार था लेकिन प्रॉफिट में शेयर को तैयार नहीं था ! दुबई वाला अर्धविछिप्त हो गया !
अजीब है ये - विश्वास और धोखा का खेल ! मेरे एक चचेरे मामा होते थे , मेरी उम्र के - बहुत बढ़िया दोस्ती - हर पल साथ लेकिन मै उन पर विश्वास नहीं करता था क्योंकि वो मेरे महंगे खिलौने या कलम चुरा लेते थे ! लेकिन यह विश्वास था की कहीं बीच बाज़ार मार पीट हुई तो वो बचाने जरुर आयेंगे  एक ही इंसान पर विश्वास और अविश्वास दोनों :))
किसी भी इंसान पर यह विश्वास और अविश्वास दोनों हम अपने उस रिश्ते में अपने हाव भाव से तैयार करते है ! वहीँ कोई मेरा दोस्त कलम चुरा लेता तो मै उसे धोखा कहता लेकिन मामा वाले केस में वह धोखा नहीं कहलाता !
कोई आजीवन झूठ बोलता है वह धोखा नहीं कहलाता है लेकिन कोई पहली बार झूठ बोलता है तो वह धोखा कहलाता है - यह बिलकुल छवि का खेल है ! आप रिश्तों में एक छवि बनाते हैं , उस छवि के विपरीत अगर आप गए तो वही धोखा है !
खैर ...दलील के सामने विश्वास की धज्जी उड़ जाती है धोखा अपनी पताका लहराता है...पर ब्रह्माण्ड का भी खेल अजीब है...वही धोखा लौट कर उसी के पास एक दिन आता है...ब्याज के साथ...पात्र / रोल बदल जाते हैं...खेल वही रहता है...:))
खैर....

सच का सामना - भाग 4 
लगभग हर जागृत आत्मा की ज़िंदगी एक टनेल / गुफ़ा से होकर गुज़रती है । इस गुफ़ा की लम्बाई - उसके नसीब / कर्म / स्वभाव इत्यादि पर निर्भर करती है । यह आंतरिक / बाहरी / रिलेशनशिप / कैरियर / मानसिक / शारीरिक - किसी भी क्षेत्र में हो सकता है । 
हमारा धर्म भी यही कहता है कि राम और पांडव दोनो को वनवास हुआ था । इन दोनो कहानी में हमें स्ट्रगल की सलाह दी गयी है । 
वही इंसान जो सारे युद्ध में विजयी होता है - वही इंसान आगे का हर युद्ध हारते चला जाता है । हो सकता है - किसी की ज़िंदगी में यह गुफ़ा आए ही नहीं या फिर उसकी ज़िंदगी गुफ़ाओं से भरी पड़ी हो । अब वो इन गुफ़ाओं को कैसे महसूस करता है - यह उसके आंतरिक स्वभाव पर निर्भर करेगा । 
कई बार लोग इसी दौर में डिप्रेशन / अवसाद के शिकार होते हुए आध्यात्मिक हो जाते है । मूलतः प्रेम / छल भी इसी दौर का शिकारी होता है - क्योंकि अध्यात्म में हम किसी आत्मा से जुड़ते हैं । ज़्यादातर केस में इस दौर में महिला और पुरुष दोनो अलग अलग स्वभाव से गुज़रते है - महिलाओं का रिलेशनशिप और पुरुष का कैरियर कारक हो जाता है । महिलाओं को जैसे ही कोई प्रेमी मिल जाता है - उनके चेहरे की रौनक़ लौट आती है वहीं पुरुष को कुछ कमाने खाने को मिल गया तो वह इस गुफ़ा में सुबह की रौशनी देखने लगता है । 
मैंने कई लोगों को इस गुफ़ा में देखा है - गुफ़ा में सिसकते वक़्त उनकी फ़िलोसोफ़ी अलग होती है और गुफ़ा से बाहर निकलते ही एक यू टर्न । हैरान हो जाता हूँ । 
लेकिन मैं अपने बुरे समय को अपने तकिए के नीचे रखता हूँ जिससे वो समय मेरे अंदर Compassion / Empathy बरक़रार रखे । शायद यही वजह है - बहुत ज्ञानी नहीं होते हुये भी - मैं एक बढ़िया शिक्षक रहा । 
जो लोग गुफ़ा से बाहर आते ही अपनी फ़िलोसोफ़ी बदल लेते - उनसे मेरा एक सवाल है - तब आप क्या कहेंगे - जब फिर से कोई एक गुफ़ा आ गया ? 
😳


@RR


Monday, August 15, 2016

स्वतंत्रता दिवस - रंजन ऋतुराज के कुछ लेख


देश क्या है ? क्या है हमारा इसके साथ भावनात्मक सम्बन्ध ? करीब दस साल पहले मै सीतामढी के एक बहुत ही बड़े रईस एवं विद्वान श्री सरदेंदू बाबु के पटना आवास पर उनके साथ बैठा था - बातों बात में पता चला - वो आज़ादी के समय अमरीका से स्नाकोत्तर एवं पीएचडी कर के आये थे - कहने लगे - चार साल बाद जब दिल्ली एअरपोर्ट पर उतरते ही - धरती से लिपट गया ! 
सन चौरासी में शायद - राकेश शर्मा अंतरिक्ष में गए थे - श्रीमती गांधी से उनकी बात होने वाली थी - श्रीमति गांधी ने पूछा - कैसा लग रहा है अपना भारत ? राकेश शर्मा बोलने लगे - 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा' - आप में से कईयों को यह याद भी होगा ! 
आज सुबह सुबह जी न्यूज पर देखा - सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में तिरंगा के साथ - स्वंतंत्रता दिवस मना रही थी - विंडो से धरती को देख 'भारत' को खोज रही थी - अदभुत ! 
आप किसी को यह नहीं कह सकते - कोई कम देशभक्त है - हर किसी की अपनी क्षमता है - अलग अलग सिचुयेशन है - कोई सैनिक बन के सीमा पर लड़ता है - कोई डाक्टर बन के ओटी में - मेरे एक मित्र हैं - विदेश में रहते हैं - २५ जनवरी / १४ अगस्त देर रात चैट पर जरुर बोलते हैं - 'अपने बच्चों को मेरे तरफ से तिरंगा खरीद देना और बोलना चाचा की तरफ से है ' - भावनाओं में भींगे इन शब्दों को हम किस तराजू में तौल सकते हैं ? 
अमरीका में सदा के लिए बस गए मेरे एक वैज्ञानिक मित्र कहते हैं - जिस दिन वहाँ का नागरिकता मिला - जो कुछ मुझे शपथ में बोलना पड़ा - कई महीनो रोज रात रोता रहा - 
कोई यह कैसे कह देगा - तुम देशप्रेमी नहीं हो ....हमसभी अपने देश को उतना ही प्यार और इज्ज़त देते हैं - जितना की दूसरे मुल्क वाले - कौन कहता है - देश बंटा हुआ है ? ए आर रहमान को ऑस्कर मिला - टीवी देखते देखते - कुर्सी से उठ गया था - कब यह ख्याल आया की वो मुस्लिम हैं या तमिल ? 
देश ...देश है ....इस प्रेम को किस तराजू पर तौलें ! 
देश विदेश की बात छोडिये ...आज तो सुनीता ने अंतरिक्ष में अपना स्वतंत्रता दिवस मनाया ....
क्या अब भी मन नहीं भींगा ....
जय हिंद ! 


~ 15 Aug / 2012 

पिछले कुछ साल में - इंटरनेट के माध्यम से हज़ारों लोगों के बात चीत और उनके मनस्थिती को समझते हुए यही पाया हूँ की - देश या इस देश के इंसान अभी भी व्यक्तिवाद के पीछे पागल है ! मेरी यहाँ पर दूसरी राय है ! 
मैंने हमेशा संस्था को महत्वपूर्ण समझा है ! उस संस्था के शिखर पर बैठा इंसान का बहुत हद तक महत्व नहीं है क्योंक्की जब वह संस्था मजबूत होगी - कोई भी आये या जाए - बहुत फर्क नहीं पड़ता है ! 
परिवार से लेकर विश्व तक - हर एक नेतृतव का यह धर्म है की वह संस्था को मजबूत बनाए ! अम्बेडकर नहीं हैं लेकिन उनके द्वारा बनाई गयी संविधान ही है की - कभी एक अर्थशास्त्री भी देश का मुखिया बन जाता तो कभी एक घोर दक्षिणपंथी ! आप पुरे देश को गौर से देखियेगा तो - यह देश इतना मजबूत ही की नेतृतव परिवर्तन से बहुत हद तक बहुत फर्क नहीं पड़ता ! अगर आस पास के दुसरे देशों को देखें तो वहां नेतृतव परिवर्तन के साथ एक भूचाल आ जाता है ! कारण यह है की - संस्था मजबूत है ! 
कई बार एक मजबूत नेतृतव संस्था को मजबूत बनाने के बदले उसे कमज़ोर भी करने लगता है - कई राज्य जहाँ ऐसे मुख्यमंत्री बने वह इसके गवाह है ! पर संस्था इतनी मजबूत होती है की - एक हद के बाद वह खुद नेतृतव को बदल देती है ! 
हम आज है - कल नहीं ! देश कल भी था , देश आज भी है और देश कल भी रहेगा ! सवाल यही है - हमारा योगदान कितना है - हम इसे कितना मजबूत बना पाते है ! वही इतिहास होगा - वही भविष्य होगा ! 
जय हिन्द !


नेतृतव से भी बड़ा संस्था और संस्था को चलाने वाला सिस्टम होता है ! सिस्टम को बनाना , बिगड़ना , ट्यून करना इत्यादी ही नेतृतव का काम होता है ! 
एक उदहारण देता हूँ - घर में कोई एक अग्रज पढ़ाई लिखाई का सिस्टम बनाता है - उसकी जैसी सोच - फिर जब सिस्टम बन जाता है - घर का बच्चा खुद ब खुद पढ़ लिख कर आगे बढ़ जाता है ! उसी मेरिट का बच्चा किसी दुसरे तरह के सिस्टम में कुछ अलग रिजल्ट देगा ! 
लालू राज के दौरान - बिहार में सिस्टम चौपट होने लगा था ! भाजपा के समर्थन से नितीश जी ने नेतृतव संभाला और बहुत वर्ष लग गए उस सिस्टम को सुधारने में ! नितीश एक दिन में कोई नया और बड़ा सिस्टम नहीं बना दिए ! वो उसी सिस्टम से काम लिए जिसे लालू जी ने जंग लगा के रख दिया था ! हाँ , सिस्टम को सुधारते वक़्त कई बार आप उसमे अपने तरफ से भी योगदान करते हैं पर समय के साथ बहुत बड़े बन चुके सिस्टम में आपका योगदान बहुत छोटा होता है ! 
कई बार नेतृतव यहीं भूल कर बैठती है ! उसे लगता है वह है तभी सिस्टम है या वह सिस्टम से ऊपर है ! इसी लाल किला प्राचीर से पिछले साल मोदी जी ने 'स्वच्छता अभियान' की घोषणा की पर मेरा यह मानना है की इस अभियान को सफल बनाने के लिए उन्होंने सिस्टम को ठीक नहीं किया या फिर कोई सिस्टम नहीं बना सके ! हो सकता है उनके भक्तजानो को बुरा लगे ! पर इस सोशल मिडिया के काल में - लोग बहुत तेजी और बहुत पारदर्शिता मांग रहे हैं ! 
एक देश / राज्य के नागरिक होने के नाते - वर्तमान में एक गैर राजनीतिवाला होते हुए - मै चुनी हुई सरकार पर उंगली उठा अपने ओछापन को नहीं दर्शा रहा बल्की उन्हें सिस्टम में सुधार या मनमुताबिक बनने को कह रहा हूँ ! हाँ , समय लगेगा पर यह बात हर किसी को समझ में नहीं आता है और लोगों को समझाना भी आपके सिस्टम का काम है !


~ 15 Aug / 2015 
@RR