Wednesday, February 20, 2008

बिहार चलो !!!

बिहार चलो ! ४ लाठी राज ठाकरे दिया नही की बिलबिलाने लगे की "बिहार चलो" ! कमज़ोर जीन ! मजदूर ! बिहारी को कितना भी पढ़ा लिखा दीजिए - २-४ करोड़ पाकिट मे दे दीजिए ! मानसिक स्तर पर यह मजदूर ही रहते हैं ! समाजवाद इनके खून मे बसा है ! लोहिया , जे प्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर की मानसिकता से बिल्कुल जकडे हुए हैं ! जात पात खून के अंतिम लेअर तक है ! रहेगा अमेरिका मे और सोचेगा जहानाबाद की तरह !
हम बचपन मे देखा करते थे की - लोग अमेरिका या ब्रिटेन पढ़ने के लिए जाते थे - कमाने के लिए नही ! समाज का कमज़ोर तबका कलकत्ता , दिल्ली या मुम्बई कमाने के लिए जाता था ! जिसका पेट बिहार मे नही भरता था वह "बेचारा" बन के परिवार से हजारों मील दूर "पेट भरुआ" बन के जीवन चलता था ! क्या पढ़ा लिखा और क्या अनपढ़ सब के सब मेरे तराजू मे एक ही थे ! कोई जनरल bogee मे तो कोई वातानुकूलित मे ! सफर के ट्रेन और मंजिल तो एक ही थी और साथ ही साथ मकसद भी एक ही ! फिर कैसा फरक ? एक जमाना वह भी था जब डाक्टर लोग ब्रिटेन से पढ़ लिख कर सीधे पटना रुकता था या दरभंगा - मुजफ्फरपुर ! अब यह वर्ग दिल्ली मे निवेश करता है !
इन सब के लिए समाज जिम्मेवार है ! मैंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद - पटना मे कंप्यूटर का व्यापार शुरू किया ! साले ससुराल वाले और इर्द गिर्द के समाज वाले जीना मुहाल कर दिए थे ! हुर्केच हुर्केच के मेरे रातों का नींद गायब कर दिए थे ! फलाना का बेटा - मुम्बई मे फलाना कम्पनी मे है - चिलाना का बेटा अमेरिका जा रहा है ! धेकाना का दामाद दिल्ली मे फ्लैट ले लिया है ! अरे मेरे बाप - यह सभी " पेट भरुआ" हैं ! मुझे इस झमेला मे नही डालो ! मुझे "पटना " पसंद है और मुझे "पटना" मे ही रहना है ! मुझे "बड़ा" नही बनाना है ! मुझे द्वितीये स्तर का नागरीक बन के पेट नही भरना है ! पब्लिक कहाँ maanane वाली थी !
बिहारी लोग समाजवाद और सामंतवाद दोनों को आदर्श मानते हैं ! मैंने कई कम्पनी के बड़े अधिकारीओं को डिप्रेशन मे देखा है ! दिल मे सामंतवाद और जुबान मे समाजवाद ! बढ़िया नौकरी - बढ़िया पैसा और पातर पातर अंग्रेज़ी बोलने वाली बीबी फिर भी दिल उदास है - क्योंकि कोई "pahchaan" नही है ! अब मुम्बई और दिल्ली मे आप ५० लाख की गाडी पर चढें आपको कोई सलाम कयों करेगा ? दिल मे तो सामंतवाद है ! बचपन मे दादा - दादी के मुह से जिला जवार के बड़े बड़े सामंती लोगों की जीवन शैली को देखा और सुना है !
दिल्ली के एक बहुत बड़े बिहारी का फोन आया - बेटी का बियाह है - "अपने" लोग आते तो अच्छा रहता ! शादी बियाह के मौके पर लोक गीत का आनंद ही कुछ और है ! अब भाई जी दिल्ली आकर करोड़पति तो बन गए लेकिन अपने लोग "बिहार" मे ही छुट गए - मामा - फूफा की जगह "दिल्ली" के dalalon ने ले ली है !
खैर , जब सब बिहारी "बिहार" चला जाएगा तो ई नीतिश और लालू का क्या होगा ?
रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडा

Friday, February 15, 2008

नीतिश कुमार की बकरी !!

लालू जी को अपनी 'भैंस' के कारण नाम और बदनाम दोनों मिला ! अब भला नीतिश जी क्यों पीछे रहे ? उन्होंने एक 'बकरी' पाल रखा है ! जहाँ कहीं भी जाते हैं - अपनी ' बकरी' को साथ मे ले जाते हैं ! 'बकरी' की शिक्षा - दीक्षा काफी अच्छे स्कूल कॉलेज मे हुई है ! लेकिन यह बकरी जब "नालंदा' वाली मगही मे " मेमीआती" तो नीतिश जी का दिल बाग़ बाग़ हो जाता है ! "बिहार" नालंदा है और "नालंदा" ही बिहार है ! मुझे कई पत्रकार बोले की - हर जनता दरबार मे इस बकरी को बगल मे बिठा - पूरे राज्य को यह संदेश देना चाहते हैं की - अब बिहार मे बकरीवाद ही चलेगा ! "बकरीवाद" के चलते - राज्य के मुठ्ठी भर 'शेर' परेशान हैं ! ( गौर तलब है - नीतिश जी बिहार के "सवर्ण" समुदाय को "मुठ्ठी भर लोग " कह कर बुलाते हैं )
नीतिश के कुछ चमचों बेलचों सलाह दी की किसी बकरे को "शेर" की शक्ल दे दी जाए ! नीतिश जी के ख़ास 'बकरी' के चहेते 'बकरे' को रंगा - पोता गया - 'शेर' की शक्ल दी गयी और राजधानी की सुरक्षा मे लगा दिया गया ! अब यह नादान बकरा उछल कूद कर हर रोज "मुठ्ठी भर " लोगों को चुन चुन कर मारता है ! मारना भी चाहिए - जब तक मुठ्ठी भर लोग ख़त्म नही होंगे - बिहार मे "बकरीवाद " कैसे आएगा ?

दिल्ली के समीप "नॉएडा" मे करोड़ों की लागत से नीतिश की बकरी का महल तैयार हो रहा है ! कई और बकरी हैं जिनके पैसे इंदिरापुरम और नॉएडा के बड़े बड़े प्रोजेक्ट मे लगे है ! भाई , यह सब नीतिश राज मे शाकाहारी भोजन से बचाए हुए पैसे हैं !

नीतिश जी बहुत इमानदार हैं ! अब्दुल कलाम के नालंदा दौरे मे "सिंगुर" वाली समस्या हो गयी ! ख़बर को कम महत्वपूर्ण और दबाने के मे कई 'पत्रकार' भाई मालामाल हो गए ! "नालंदा" की उपजाऊ जमीन को जबरदस्ती लिया गया ! कीमत भी बाज़ार से कई गुना कम ! जाती गत आधार पर "गाओं" का "गाओं" साफ किया गया !

नीतिश जी मुस्कुराते हैं ! मंद मंद ! और अपनी बकरी को शाकाहारी घास फूस देते हैं !

लिखने को बहुत कुछ है - धीरे धीरे - ! चलिए तबतक हम कुछ मांसाहारी भोजन कर आयें !


रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडा

Monday, February 11, 2008

Tuesday, February 5, 2008

ठीक हो रहा है !

टीवी पर बिहारियों को पीटाते देख थोडा सुकून हुआ ! लेकिन थोडा और हंगामा होना चाहिऐ था ! जम के ! दहशत का माहौल भी खड़ा होना चाहिऐ ! "अपना घर" बर्बाद हो रहा है और चले हैं दूसरों के घर को सजाने के लिए ! "दूसरा" हमेशा से ही दूसरा ही होता है !
ऐसी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है ! उदाहरण के तौर पर - हम लोग करीब १०० साल से मुजफ्फरपुर शहर मे बसे हैं ! दादा-परदादा की जमींदारी थी ! घर - परिवार के लोग मुजफ्फरपुर से ही पढे लिखे हैं ! लेकिन आज तक "तिरहुत" वाले महीन लोग हमलोगों को अपना नही सके ! आज भी हम सभी "छपराहिया " ( छपरा जिला का रहने वाला ) ही कहलाते हैं ! हम भी अडे हैं - अपनी भाषा "भोजपुरी" ही बोलते हैं !
अगर आप - गाँव के रहने वाले हैं तो देखा ही होगा की किस कदर बाहर से आ कर बसे हुए लोगों को तंग किया जाता है ! खासकर " तड़का" वाले केस मे ! जहाँ " दामाद" को अपने ससुराल मे सम्पति मिलता है ! लोग अपने भागिना - नाती को अपना लेते हैं लेकिन "दामाद" को हमेशा से ही पराया समझा जाता है !
बहुत साल पहले - मैंने अपने गृह जिला "गोपालगंज" मे एक स्कूल मालिक के यहाँ गया ! वह केरल राज्य के रहने वाले थे ! उनका स्कूल काफी पैसा कम रह था ! पर स्कूल मालिक का जीवन शैली काफी निम्न था ! मैंने मजाक मजाक मे ही कुछ पूछ दिया - उन्होने जबाब दिया की - वह केरल मे एक माकन बना रहे हैं और फिर अपने माकन का फोटो दिखाया - फोटो देख कर मुझे ऐसा लगा की वह केरल मे कई करोड़ का मकान बना रहे हैं !
"बाबा" आये हुए थे - कह रहे थे की "खेत" मे काम करने को नही मिलता है - सभी के सभी "पंजाब" "दिल्ली" और गुजरात" चले जाते हैं ! पटना के एक तकनिकी कॉलेज के मालिक ने कहा - कोई पढ़ने वाला नही मिलाता है ! बिहार सरकार के एक उच्च पधाधिकारी से मेरी बात हो रही थी - बता रहे थे की पटना के सड़क पर आपको एक भी युवा नही मिलेगा ! या तो २० बरस से कम उमर वाले या फिर ४५ से ज्यादा वाले !
चलो "बिहारियों" - घर चलो ! जब हम सभी दूसरों का घर स्वर्ग बना सकते हैं तो फिर अपना क्यों नही ?


रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडा

Monday, February 4, 2008

राज ठाकरे को "मीडिया" की मदद

आज जो भी बवाल मुम्बई मे हो रहा है - उसमे राज ठाकरे से ज्यादा मीडिया की भूमिका है ! "दलाली" की हद कर दी आप सभी ने ! दरअसल इलेक्ट्रोनिक मीडिया मे अत्यंत ही घटिया और कमज़ोर मानसिकता वाले लोगों का जमावडा हो गया है ! ऊपर से नेताओं के लगे पैसा का दबाब - कचरा को पेश किया जा रहा है ! उलुल - जलूल खबरों को महताव्पूर्ण बना देना और पूरे देश को उसमे झोंक देना - यह गलत ही नही अपराध है !
राज ठाकरे का बयां इतना महताव्पूर्ण नही था जिसको इस कदर दिखाया जाये ! वह बिल्कुल ही एक छोटी सभा मे कुछ उलुल जुलूल बक रह था ! मीडिया ने इतना महाताव्पूर्ण बना दिया की - टीवी पर दिखने के चक्कर मे बेचारे "पूर्वांचल" के लोग अब पीट रहे हैं !
देश को पूरी तरह "दलालों" के हाथ मे हम सभी ने दे दिया है ! आज तक यह दलाल समाज की आबरू को बेच रहे थे - अब यह खुद की आबरू की दाम लगायेंगे ! "पैसा-पैसा" के इस खेल मे हम सभी इतने व्यस्त हो चुके हैं की हमे यह नही पता चल रहा है की हम आने वाले पीढी के लिए कैसा समाज बना रहे हैं !
सैफ और करीना की खबर - देश की प्रगति की खबर से ज्यादा "important" बन जाती है !
आप सभी से मेरा निवेदन है की आपको जहाँ भी इस तरह के " इलेक्ट्रोनिक जर्नलिस्ट " मिले , मेरे तरफ से इनको समझायें ! विनम्र निवेदन करें ! अगर फिर भी नही सुधारें तो " चार" लात दीजिए ! फिर देखिए - कैसे यह अपनी आबरू को बेचेंगे !
मुझे जया बच्चन का बयां ज्यादा पसंद आया की - राज ठाकरे कौन है ? बात ख़त्म !
खैर , राज ठाकरे कौन हैं यह सबको पता है ! इनके असली पिता कौन हैं यह भी सबको पता है !



रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडा