रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !
Tuesday, April 20, 2010
मेरा गांव - मेरा देस - भाग - एक !! ( परिवार )
रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !
Wednesday, March 31, 2010
अब 'मंगला' पढ़ेगा !!
रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !
Thursday, March 11, 2010
बिहार सरकार का विज्ञापन !
एन डी टी वी के वरिष्ठ पत्रकार ‘रवीश कुमार’ लिखते हैं - पटना में जिस भी पत्रकार से मिला,सबने यही कहा कि ख़िलाफ़ ख़बर लिखियेगा तो नीतीश जी विज्ञापन रोक देते हैं। अगर उनके साथ रहिये तो सरकारी विज्ञापनों का पेमेंट जल्दी मिल जाता है। सरकार विरोधी मामूली ख़बरों पर भी दिल्ली से अख़बारों के बड़े संपादकों और प्रबंधकों को सीएम के सामने पेश होना पड़ा है। पंद्रह साल के जंगल राज को खतम करने में पत्रकारों की संघर्षपूर्ण भूमिका रही थी। नीतीश को नहीं भूलना चाहिए। अभिव्यक्ति की आज़ादी का ही लाभ था कि उनकी सरकार बन पाई। समझना मुश्किल है कि जिस सीएम को जनता सम्मान करती है,लोग उसके काम की सराहना करते हैं, मीडिया भी गुणगान करती है, उसे एकाध खिलाफ सी लगने वाली खबरों से घबराहट कैसी? कोई अच्छा काम करे तो जयजयकार होनी भी चाहिए लेकिन आलोचना की जगह तब भी बनती है जब बिहार में कोई स्वर्णयुग आ जाएगा। पटना के पत्रकार कभी इतने कमज़ोर नहीं लगे।
एक दूसरे पत्रकार दबी जुबान कहते हैं – गुजरात में विकास है पर वहाँ दंगे हुए , बिहार में विकास हो रहा है लेकिन यहाँ जाति के नाम पर ‘प्रतिभा’ का क़त्ल किया जा रहा है ! सभी प्रमुख पदों पर एक य दो जाति के ही लोग बैठे हैं ! उसका इशारा साफ़ साफ़ था !
घमंड का ही अगला रूप ‘अहंकार’ होता है और भगवान का भोजन ‘मनुष्य’ का अहंकार है ! नीतीश कुमार भी एक मनुष्य ही हैं – भगवान नहीं !
रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !
Saturday, February 13, 2010
कौन बोलेगा की हम ‘बिकाऊ’ हैं
रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !
Thursday, February 4, 2010
भ्रष्टाचार की जरूरत !
Wednesday, February 3, 2010
बिहार बदल रहा है !
Monday, February 1, 2010
राजा शयन-कक्ष में आराम हेतु चले गए हैं !
Friday, January 29, 2010
नितीश को बैसाखी की जरुरत नहीं रही ...
क्रमशः..
रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !
Thursday, January 28, 2010
नितीश कुमार दूध के धुले हैं - बाकी सब चोर !!!
हुज़ूर , ऐसा कहा जाता है की आपके शासन काल में जिला के कलक्टर और पुलिस कप्तान जब तब बदल दिए गए ! क्या आप यह दावा कर सकते हैं के इस तरह के तबादला बिना किसी लेन देन या जातिगत दुराग्रह के बिना किया गया ! पटना के कई 'मलाईदार' जगहों पर सिर्फ और सिर्फ एक ही जाति और क्षेत्र से आते हैं ! क्या यह सही नहीं है की - आपका एक पुलिस कप्तान जब तक पटना में रहा - खुलेआम कुछ ख़ास जातिओं को गाली देता फिरता था ! क्या ब्राह्मण , राजपूत , भूमिहार में जनम लेना अपराध है ? अगर यह है तो कृपया कोई ऐसा कानून लायें - जिससे इनका जात बदला जा सके !
क्या यह सही नहीं है की आप 'बटाईदार' कानून लाने को बेताब हैं - फिलहाल के लिए यह ठन्डे बसते में दाल दिए हैं - पर जैसे ही आप अगला चुनाव जीतेंगे - यह ठंडा बस्ता से गरम बस्ता में आ जायेगा ! यह कानून बहुत जरुरी है - पर क्या यह आपके गृह जिले में भी लागू होगा ! वहां मत कीजिएगा - वरना हर बार की भांति आप अपने जिले में भी चुनाव हार सकते हैं ! अब राजा हारने के लिए थोड़े ही राजा बना है ?
क्या यह सही नहीं की - पटना जिला के एक ख़ास इलाके में एक ख़ास जाति के जमीन कौड़ी के दाम सरकार ने हजारों एकड़ के रूप में ख़रीदा है - आज ये किसान खुश हैं - लेकिन ये पैसा जैसे ही ख़त्म होगा - ये अस्तित्व विहीन हो जायेंगे - जड़ विहीन भी ! आपने पुनपुन और फतुहा के इलाकों के ज़मीन का अधिग्रहण इसलिए नहीं किया क्योंकि वहां आपके जाति के लोगों की जनसँख्या ज्यादा है !
क्या यह सही नहीं है की एक राष्ट्रीय राजमार्ग का रास्ता सिर्फ और सिर्फ इसलिए बदल गया की आपका घर और आपका कुछ जमीन भी अधिग्रहण हो रहा था ! और करीब चालीस किलोमीटर तक 'सवर्ण' जातिओं के जमीन के दाम बढ़ रहे थे ! या फिर उनके रोजगार के अवसर ! सिर्फ चालीस किलोमीटर के चक्कर में आप ने राष्ट्रीय राजमार्ग का १०० साल पुराना इतिहास और भूगोल बदल दिया !
क्रमशः
रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !
Thursday, January 7, 2010
रविश कुमार
Monday, October 26, 2009
अब डाकिया चिठ्ठी नहीं लाता !
रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !
Friday, October 23, 2009
आज खरना है - कल्ह सँझिया अरग !!!
बड़ा ही महातम का पर्व है - बच्चों को अपने संस्कृति और सभ्यता से वाकिफ कराने को तत्पर रहता हूँ - डर लगा रहता है -
रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !
Thursday, July 30, 2009
दलाली - एक राष्ट्रिये पेशा !
रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !
Tuesday, July 21, 2009
१० बजिया स्कूल और नौकरी !
बच्चा लोग को स्कूल बस में चढाओ के आओ तो खुद भी तैयार होना है - उम्र हो गयी - रोज शेविंग करो फिर आठ बजे तक तैयार भी होना है - जब तक हम तैयार होकर ब्रेकफास्ट टेबल पर् बैठ नहीं गए - तब तक 'झिक झिक' ! सड़ा - गला जो मिल गया चुप चाप खा लीजिए !
हम लोग १० बजिया स्कूल में पढ़ते थे ! सुबह आराम से उठा - नास्ता वैगरह किया और चटाई / चौकी पर पालथी मार के - २ दूना २ हिसाब बनाया ! आराम से 'हर - हर गंगे' कहते हुए नहाये ! तब तक 'कूकर' वाला गरम गरम भात तैयार हो गया ! आराम से पालथी मार् के खाये - बाबु जी के साथ - वो उधर निकले - हम इधर साइकिल पर् पैडल / या अधिकतर दिन पैदल ! रास्ता भर - राष्ट्रपति से लेकर गावस्कर - कपिलदेव का डिस्कशन ! राजेन्द्र नगर 'गुमटी' को पार किये ! कहीं कोई मदारी मिल गया तो थोडा देर उसको देखे - कहीं कोई ठेला पर् 'ताश' का जुआ दिखा रहा तो उसको देखे - फिर 'वैशाली' सिनेमा हौल को निहारते - पहुँच गए 'स्कूल' ! भर दम पढ़े - गप्प किये - खेले फिर शाम चार बजे वापस ! चार बजे - फटा हुआ ग्लव्स / टूटा हुआ बैट लेकर खेल के मैदान में ! नौवा - दसमा में गए तो शाम को 'मोहल्ला' में घूम 'छत - बालकोनी' भी देखने लगे ! :) फिर शाम को सात बजे से नौ बजे तक बाकी का सब्जेक्ट या फिर कोई चाचा - मामा टाइप आईटम आया हुआ हो तो उसका गप्प सुनना ! पौने नौ बजे उधर टीवी / रेडियो पर् समाचार शुरू हुआ - इधर जोर से भूख लगा - किचेन में जाकर खडा हुए ! रोटी दूध खाए फिर सूत गए !
पटना में दस बजिया नौकरी भी मस्त होता है ! दस बजे आराम से खा कर - वेस्पा स्कूटर से निकल जाईये ! रास्ता में दो खिल्ली पान खाईये और चार खिल्ली पैक करवा लीजिए - टकधूम - टकधूम करते ओफ्फिस ! अब तो बाबु जी पटना के मशहूर एक प्रोफेशनल कॉलेज में पिछले नौ साल से एच ओ डी हैं - मैंने पूछा - बाबु जी , जो लोग लेट आते हैं या जल्द जाते हैं - उनको कैसे इजाजत मिल जाती है - बाबु जी बोले - कुछ नहीं - जैसे वो डिपार्टमेंट में घुसा - मेरे सूट की बडाई करने लगेगा - हम समझ जाते हैं - आज ये लेट आया है या फिर जल्दी भागेगा ! बिहार सरकार का दस बजिया नौकरी मस्त है - आप इसी नौकरी में बेटा के परीक्षा के बाद 'कॉपी' के पैरवी कर सकते हैं - सगे सम्बन्धी के बाल बच्चा के बियाह का बरतुहारी कर सकते हैं - ये सब यहाँ 'मेट्रो' में पोस्स्बिल नहीं है - जमाना हो गया - किसी का 'बारात' गए हुए - सारे सगे सम्बन्धी से लगभग दुश्मनी हो चुकी है - मालूम नहीं कौन आएगा ..मेरे बाल बच्चा के बियाह में ! :(
खैर ..मेट्रो में बियाह - शादी में ज्यादा हेडक नहीं है - किराया पर् 'मामा - फूफा' लोग मिल जाते हैं ! कुछ साल पहले प्रगति मैदान में एक बियाह में गए - बहुत देर तक बारात नहीं लगा तो मैंने पूछा - क्या हुआ भाई - पता चला - 'फूफा-मामा' के लिये जिस टेंट हाउस वाला को बोला गया था ..उसका मोबाईल स्विच ओफ्फ है और किराया पर् बढ़िया 'मामा-फूफा' लाने के लिये पैसा एडवांश में दे दिया गया था - थोड़ी देर बाद - एक बढ़िया फोर्ड कार में मामा - फूफा आये - धीरे से बोला 'एक दूसरी बारात' अटैंड कर रहा था - पटना का सुल्तानगंज का बैंड बाजा वाला सब याद आ गया - एक लगन में तीन बारात वो सब अटैंड करता था - वही हाल मेट्रो में 'मामा-फूफा' लोग का है ! ये एकदम सच घटना है ! हम उस पूरी रात सो नहीं सके - लगा जैसे अब मेरे 'अस्तित्व' पर् डाका पड़ने को है !
और क्या लिखूं ..परेशान हूँ ..!
रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !
Monday, May 18, 2009
ले लीजिये न , प्लीज !!!
लालू जी : ये मैडम , प्लीज , ले लीजिये न हमारा समर्थन ! देखिये न , हम तीनो भाई लोग एकदम लाईन में खडा हैं ! रात से खाना नहीं खाए हैं - एकदम भूखे हमर पेट फूल के ढोलक हो गया है ! आप समर्थन ले लीजिये गा ता हम कुछ खायेंगे पीयेंगे ! ए , रघुवंश बाबु , जगातानंद बाबु , ए उमाशंकर जी - आप लोग कहे नहीं अपना जात भाई - दिघ्घी राजा को कुछ समझाते हैं ! का दो का दो - कलह से बकर बकर बोले जा रहे हैं ! कहिये ना - लालू जी अब हम तीनो लोग के नेता हैं ! ए अमर भाई - का ई आप इगो धर लिए हैं - जाईये , दिघ्घी रहा के गोर धरिये ! "राजा ता राजा ही नु रहेगा " ! जब हम मैडम का गोर धर सकते हैं ता आप को कहे लाज लगता है ! बुरबक - राजमहल से खाली हाथ लौटेगा ?
दिघ्घी राजा : हा हा हा हा !
मुलायम : ये तो पुरे रावन की तरह हंस रहे हैं !
लालू : ( मुलायम के कान में ) : एकदम आप उत्तर प्रदेश के पक्का अहीर रह गए ! देखिये 5 साल हम दिल्ली में रह कर कितना बदल गए ! आप लोग एकदम से मेरा चांस डूबा दीजिए गा !
मुलायम : लालू जी , आप बहुत फालतू बोलते हैं - इस कारन से ही आपके यहाँ हम सम्बन्ध नहीं किये !
दिघ्घी राजा : अरे आप लोग लड़िये नहीं ! सब बात मैडम के ड्राइंग रूम तक जा रहा है ! अच्चा ये बताएं - आप दो तो नज़र आ रहे हैं - तीसरा कौन है - लाइन में ?
लालू : ए हो , ए हो देवेगौडा भाई ? किधर गए ? धत् , ई जतरा पहर - चाय पीने चले गए का ? बेटा जो न करावे ?:( राजा जी , ई अपना देवेगौडा भाई भी हैं - तीन थो साथ में हैं ! ई भी कर्नाटका के अहीर हैं !
मुलायम : अमर जी , किधर गए ? अरे भाई , जयाप्रदा कहीं भागी नहीं जा रही है - इधर - राजा साहेब से बात फाइनल कीजिए और मैडम से टाइम ले लीजिये , मिलाने का ! ( लालू जी को ड्राप भी किया जा सकता है - कान में )
लालू : हमको सब सुनायी देता है ! राजा बाबु - ई ड्राइंगरूम में मैडम इतना देर से किस से फ़ोन पर बात कररही हैं ?
दिघ्घी राजा : हा हा हा हा हा हा हा हा ! कोई है , आपके प्रदेश से !
Tuesday, May 5, 2009
हमारी बहने और बेटियाँ
दोपहर में भोजन करने गया तो रजत शर्मा वाले न्यूज़ चैनल पर इनके बारे में थोडा डिटेल से दिखाया जा रहा था ! बेटी और बीबी दोनों ध्यान से देख और सुन रहे थे और मै कनखियों से !
कुछ दिन पहले मेरे एक दोस्त ने कहा था - "किसी भी समाज के स्तर को जानना है तो उस समाज में औरत की क्या स्थिति है - वो पता करो " ! कहने का मतलब - किसी भी परिवार , गाँव , जात , शहर , राज्य या देश की सही मायने में उन्नत्ती पता करना चाहते हैं तो हमें यह देखना होगा की - वहां की औरत को कितना सम्मान और अधिकार मिला है !
बचपन दिन याद आ गया - जहाँ कहीं भी अपने अधिकार के लिए कोई महिला पाई गयी - उसको इंदिरा गाँधी की संज्ञान दे दी गयी ! दूर से ही लोग उसे इंदिरा गाँधी बोलने लगते थे ! अब कोई भी इन महिलाओं को इंदिरा गाँधी नहीं कहता - या यूँ कहिये - स्वीकार कर लिया है !
किसी परिवार में किसी महिला का राज चलता था तो उसे "पेटीकोट" राज कहते थे - अब ऐसे शब्द सुनायी नहीं देते हैं - सिवाय भारतीये जनता पार्टी के नेतागण के मुह के अलावा !
अब "इंदिरा गाँधी " और "पेटीकोट राज " की जगह - इंदिरा नूयी , कल्पना चावला और अब शुभ्रा सक्सेना जैसी महिलाओं ने ले लिया है ! लेकिन इस परिवर्तन को आने में काफी वक़्त लग गया ! और अभी बहुत कुछ बाकी है !
आर्थीक रूप से अगडा पंजाब में सब से ज्यादा "भ्रूण" हत्या होती है - यह या इस तरह का समाज कभी भी सही अगड़ा का पहचान नहीं हो सकता ! इससे लाख गुना बेहतर बिहार के गाँव का वोह गरीब है - जिसके यहाँ कन्या पूजा का प्रचलन है !
हमारे हिन्दू समाज में कन्या को हमेशा देवी का अवतार माना गया है - मसलन - शादी के समय - सिन्दूर दान के ठीक पहले - कन्या - वर के दाहिने तरफ बैठती है - मतलब वोह पुजनिये और आदरनिए है !
कुछ लोग समाज में बढ़ते तलाक़ को महिलाओं की प्रगती से जोड़ कर देखते हैं - मै ऐसा नहीं मानता - महिला तो मानसिक रूप से आगे बढ़ गयी - लेकिन में पुरुष अभी भी वहीँ है - फिर खुद अपने पैरों पर खडी महिला - कब तक अत्याचार सहेगी ?
अब अपनी सोच में बदलाव लायें - और बहन - बेटी को समोचित स्थान दें - अभी भी समय है -
श्रीमती शुभ्रा सक्सेना इंदिरापुरम में ही रह कर पुरे भारत में सर्वोच्य स्थान प्राप्त किया - उनका प्रारंभिक पढाई - लिखाई - बोकारो के इर्द गिर्द हुयी - जो इनके प्रेरणा श्रोत हैं - और आशा है - वोह भारत की ग्रामीण परिवेश को भली भांती समझते हुए - समाज कल्याण में खुद को समर्पित करेंगी !
Friday, April 24, 2009
देश का बीमा कैसे होगा ?
विनोद दुआ मेरे सब से पसंदीदा पत्रकार है ! सन १९८४ से उनको देखता आया हूँ - जब उनकी और कोट वाले प्रणय रोंय दोनों का कद लगभग बराबर होता था ! अब प्रणय रोंय के लिए विनोद दुआ एक बेहतर इमानदार ढंग से काम करते हैं !
विनोद दुआ के कल वाले प्रोग्राम में अपूर्वानंद जी आये थे - कुछ ४-५ वाक्य ही बोल पाए की समय ख़तम हो गया - जो कुछ वो बोले - बहुत सही बोले - नेता अब जनता से दूर हो गए हैं - भारतीय जनता पार्टी और खानदानी कौंग्रेस को छोड़ किसी के पास देश के लिए नीति नहीं है - बाकी के क्षेत्रीय दल बस "सियार" की भूमिका में शेर के शिकार में अपना ज्यादा से ज्यादा हिस्सा मात्र की खोज में हैं , कोई दलगत नीति नहीं है !
अब इस हाल में देश का कौन सोचेगा ? देश को एक रखने में धर्म का बहुत बड़ा रोल है ! देश का विभाजन १९४७ में धरम के आधार पर हुआ क्योंकि एक ख़ास जगह हिन्दू और मुस्लिम का जमावाडा हो गया था ! अब ऐसा लगभग नहीं है - हिन्दू मुस्लिम दोनों देश के हर प्रान्त और हर गाँव में हैं - और यही डोर देश को बंधे रखे हुयी हैं और भारतीय जनता पार्टी को भी अपनी रणनीति बदलने से मजबूर कर दी !
विकास ही हर वक़्त मुद्दा नहीं होता है - ऐसा होता तो "दलालों" से भरपूर पिछली सरकार सन २००४ में नहीं हारती ! विकास का सही मायने में अर्थ चमकता दिल्ली और बंगलुरु नहीं है - जहाँ वहां एक भाई - बड़ी गाडी में घूम रहा है और दूसरा भाई खेतों में भूखा मर रहा है ! इस मामले में सानिया गाँधी बधाई के पात्र हैं !
संजय शर्मा भैया कहते हैं - हम भारतीय भावुक होते हैं - बस , इंतज़ार है - प्रियंका गाँधी के राजनीती के मैदान में कूदने का - फिर देखियेगा ! उनका इशारा बिलकुल ही साफ़ था की कैसे फूंक फूंक के , देश को एक रखने के लिए सानिया गाँधी अपने बच्चों में परिपक्वता ला रही हैं और सही समय का इंतज़ार कररही हैं !
वोह आगे कहते हैं - क्या अडवाणी अगर प्रधान मंत्री नहीं बन पाए तो भारतीय जनता पार्टी का क्या होगा ? क्या नरेन्द्र मोदी जैसे कट्टर हिन्दू पुरे देश को स्वीकार होंगे ? क्या राजनाथ सिंह जैसे लोग बुध्दिमान अरुण जेटली को स्वीकार होंगे ? अगर आडवानी प्रधानमंत्री नहीं बन पाए तो ??? भारतीय जनता पार्टी का क्या होगा ?
देश के सुरख्सित बीमा के लिए - कौंग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों का जिन्दा रहना बेहद जरूरी है - ताकी - देश को क्षेत्रीय "सियारों" से बचाया जा सके !
Thursday, April 23, 2009
रेलगाडी का अपहरण
बच्चा थे त चरी सुने थे , फिर डकैती कैसे होता है सुने और देखे भी ! हम लोग का बाल बच्चा सब त जनम से ही आतंकवाद , नकसलवाद सुन रहा है ! बाबु , जमाना अडवांस हो गया है !
अब कुछ दिन में सुनियेगा की पटना का अपहरण हो गया :( एक पत्रकार बोला , बबुआ लालू जी त १५ साल से पूरा बिहार का ही अपहरण किये हुए थे ! वाह ! भाई वाह ! तले दुसर पत्रकार बोला की - महाराज ई नेता सब त पूरा देश का ही अपहरण कर लिया है ! हो गया शुरू - बहस !
ई सब लोगिक सुन के लगा की रेलगाडी का अपहरण त कुछ नहीं है :( सब कोई लुटने पर लगा हुआ -लगता है बहुत कुछ हाथ से फिसल गया ! दुःख हुआ - टेंशन में नींद आ गया !
सुबह नींद खुला त सुने की शर्मा जी का गाडी चोरी हो गया ! वाइफ बोली की - बीमा से पैसा उनको मिल जायेगा - आप जाईये और कुछ लूट कर लाईये तब घर में कुछ चूल्हा चौकी जलेगा !
बेटा सब बात चित सुन रहा था - हंसने लगा - और गाने लगा -
यह देश है वीर लुटेरों का ,
Wednesday, April 22, 2009
मुसलमानों को भी जीने दो !!
मई ऐसा इसलिए महसूस कर रहा हूँ की ऐसा मेरी जाती के साथ भी पत्रकार और बाकी के नेता करते आ रहे हैं - वैशाली से रघुवंश बाबु खडा है - कोई पत्रकार उनकी जाती नहीं लिखेगा लेकिन उनके खिलाफ लड़ रहे - मुन्ना शुक्ल को भूमिहार बाहुबली जरुर बोला और लिखा जायेगा ! अजीब तमाशा है - भाई ? रविश जैसे पत्रकार भी खुलेआम हमला बोल देते हैं !
ऐसा लगता है की बाहुबली भूमिहारों का और नचनिया बजनिया - कायस्थों का प्रयाय्वाची शब्द बन गए हों ! वैसा ही तो मुसलमानों को भी लगता होगा ! क्या उनका वोट सिर्फ लालू-मुलायम को सता की गाडी तक पहुचने के लिए है ? क्या वोह कभी इस देश के मुख्या धरा में शामिल नहीं होंगे ? क्या हमेशा उनको वोट बैंक से ज्यादा कुछ नहीं समझा जायेगा ?
क्यों नहीं जीने देते उनको - क्यों नहीं उनको बच्चों को यह महसूस करने देते हो की वोह भी एक भारतीये हैं ? क्या गुनाह किया है उन्होंने ?
रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !
Tuesday, April 21, 2009
चुनाव और लगन !!
बचपन का दिन याद है - चुनाव में "खड़ा" कैसे हुआ जाता है - समझ में नहीं आता था - फिर लोग चुनाव में "बैठ" कैसे जाता है ? कौंग्रेस और इंदिरा गाँधी पसंदीदा थी ! अब कभी कभी टी वी वाला सब इंदिरा गाँधी का विजुअल दिखता है तो बचपन याद आ जाता है !
चौधरी चरण सिंह ने एक बार कहा था - देश का प्रधान मंत्री - वही बन सकता है - जो दिल्ली में रहेगा ! बाबु जी हमको दिल्ली भेज दिए ! यहाँ त अजब का हिसाब किताब है - कोई नेता १००-२०० करोड़ से कम का अवकात ही नहीं रखता है ! कल रविश भाई का स्पेशल रिपोर्ट देख रहा था - मंत्र मुग्ध हो गया - रविश भाई पसंदीदा हैं - लेकिन अंत में जब वोह बिहार और अपनी जात का दरद - अपनी लेखनी में लिखते हैं तो दुःख होता है - ऊंचाई के साथ साथ आपको बहुत कुछ छोड़ना होता है ! खैर !
पहला चरण के बाद - लालू जी को पसीना आ गया फिर क्या रातों रात , कल तक उनका जूठा खाने वाले पत्रकार भी बदल गए ! नीतिश भी वैसे पत्रकारों को आँख तरेर दिया ! अब मरता दलाल - क्या न करता :(
लेकिन प्रधान मंत्री कौन बनेगा ? देवेगौडा जैसा प्रधानमंत्री बनाने से अच्छा है की साल भर के अन्दर दूसरा चुनाव ! सवाल और भी हैं ? अडवानी बाबा का क्या होगा ? उनका पार्टी का क्या होगा ? कुकुर के भांती सब लडेगा ! डूब जायेगा ! और भारतीय राजनीती को सियार सब खा जायेगा !
रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !
Saturday, April 4, 2009
चुनाव स्पेशल : - देश का दुर्भाग्य !
मालूम नहीं कब और कैसे धीरे धीरे क्षेत्रीय राजनितिक दल दिल्ली की कुर्सी अपने अपने हाथों से हिलाने लगे और कुर्सी दिन बा दिन कमज़ोर होती गयी ! वाजपयी जी तो आंध्र के चन्द्र बाबु नायडू के शिकार बने तो मन मोहन के चारों तरफ लालू - मुलायम और पासवान जैसे लोग थे !
हम वोटर भी अजीब हैं ! लोकसभा का चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ता देखना चाहते हैं ! साडी धोती की गठ जोड़ की तरह वोट देते हैं ! जात पात में पूरा देश बटा हुआ है ! कोई भी अछूता नहीं है ! अगर कोई खुद को कहता है की मई इस तरह के जात पात से अलग हूँ - तो वोह सफ़ेद झूठ बोलता है ! भले ही वोह ब्राहमणों के द्वारा चलाया जा रहा इंफोसिस में काम कर रहा हो या किसी न्यूज़ चैनल का खुख्यत या विख्यात पत्रकार !
बिहार में नीतिश कुमार ने ब्राह्मणों को टिकट नहीं दिया - अब देखिये - इसका दर्द रविश जैसे पत्रकार पर भी पड़ने लगा ! भले वोह मुह से नहीं करह रहे हों लेकिन दर्द तो चेहरा पर नज़र आ ही जाता है - जैसे मुहब्बत को आप छुपा नहीं सकते !
कौंग्रेस भी अजीब है - बिहार में भूंजा की तरह टिकट को बांटा है ! कभी कभी लालू की बी टीम की तरह नज़र आता है ! कहीं वोट कटवा तो कहीं परंपरा को ढ़ोने की तरह !
कुछ भी हो - हमें वोट राष्ट्रीय दलों को ही देना चाहिए ! विधान सभा चुनाव में क्षेत्रीय दल ठीक हैं लेकिन लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दल को वोट देने का मतलब - आने वाले समय में देश को बांटना है !
वहीँ अजीत जो अमेरिका में हैं - जो बिहार के सभी पत्रकारों से हमेशा संपर्क में रहते हैं - कहते हैं - अगर मै चुनाव लडूं - तो मुझे मेरे घर वाले भी वोट नहीं देंगे ! समाज सेवा करने के और भी विकल्प हैं !
अब आप क्या कहते हैं ?
रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !
Tuesday, February 24, 2009
अमिताभ और जया बच्चन से एक सवाल !
जया जी का एक बयान आया है ! स्लाम्डाग विदेशी फ़िल्म है - भारत में इतना शोर क्यों हैं ? बात में दम है ! अमिताभ जी सन १९८४ में एक चुनाव लड़े थे - अलाहाबाद से लोकसभा चुनाव ! पर उनके जितने की खुशी में "मुजफ्फरपुर" में मिठाई बटी थी ! वोह भी खासकर एक जाती विशेष के द्वारा ! पटना में भी बटी थी ! इसमे कोई अजीब बात नही है ! हम हर कोई कहीं न कही एक दुसरे से जुड़े हैं ! मेरी पहचान मेरे घर में "रंजन" व्यक्ति विशेष से है ! घर से बहार मेरी पहचान मेरे परिवार से जुडी है ! दुसरे गाँव में मै फलाना गाँव का कहलाता हूँ ! दिल्ली में बिहारी कहलाता हूँ और बंगलुरु और मुंबई में उत्तर भारतीय ! वहीँ अमरीका में एक एशियन और मंगल ग्रह पर एक पृथ्वी वासी ! और जब अमेरिका में कोई भारतीय मिलेगा तब हम उसका जात नही पूछेंगे जैसा की हम बिहार में कोई बिहारी मिले तो ऐसा कर सकते हैं ! अगर मुजफ्फरपुर के कायस्थ जाती के लोग अमिताभ की १९८४ की अल्लाहबाद की जीत में अपनी खुशी खोज सकते हैं फिर हम सब भारतीय "रहमान , गुलज़ार और पुत्तोकोटी " में अपनी जीत क्यों नही ?
ठीक उसी तरह यह सिनेमा को बनाया तो विदेशी लोग हैं - लेकिन इस सिनेमा में कई कलाकार या सभी सभी के कलाकार भारतीय हैं संगीत भारतीये हैं और अधिकतर तकनिकी लोग भारतीये हैं ! रहमान साहब और बोब्बी जिंदल में फरक है ! रहमान साहब विशुध्ध भारतीय हैं और हम सबको उनको नाज़ है ! वैसे उन्होंने ने कई सिनेमा में बहुत ही बढ़िया संगीत दिया है !
हर कलाकार और तकनिकी लोग अपने आप में सम्पूर्ण हैं - यह सौभाग्य है की सब को एक ऐसे छत के नीचे काम करने का अवसर मिला - जहाँ से एक राह निकली और "ऑस्कर" ..."ऑस्कर" और नई पीढी को प्रेरणा !
जहाँ तक गरीबी को दिखने से लोगों को ऐतराज है फ़िर तो हमारे अधिकतर सिनेमा गरीबी और भ्रष्टाचार के इर्द गिर्द ही घुमते हैं !
चलिए गुलज़ार साहब के गीत से इस लेख को समाप्त करते हैं -
"आपकी आंखों में कुछ महके हुए से राज हैं ...आप से भी ख़ूबसूरत आपके अंदाज़ हैं ....."
और सुभास घई की सलाह "जय हो " शब्द को इस गीत से जोड़ना सचमुच कमाल हो गया !
Saturday, February 21, 2009
श्री नीतिश कुमार की विकास यात्रा समाप्त हुयी !
Friday, February 13, 2009
पप्पू न बने - वोट दें !

Thursday, February 12, 2009
"चलनी हंसली सूप के - तोरा में बड़ा छेद "
एक शाम ८.३० में आता है - विषय था - " भारत में मनोरोग" ! देखा बहुत अछ्छा लगा ! मजा आ गया ! लगा की कितना अच्छा प्रोग्राम बनाते हैं - ये लोग ! तभी तो बिना टीआरपी के भी ये चॅनल सब से अच्छा है ! थोड़ी देर बाद सुबह की बासी अखबार उठाया ! अरे ये क्या ? "भारत में मनोरोग " तो टाईम्स ऑफ़ इंडिया ne सुबह तड़के ही छाप दिया ! धत् तेरे की - मै बेवजह बासी समाचार पर ताली पीट रहा था !
अब चलिए - इनके दुसरे प्रोग्राम पर ! एंकर हैं - भोजपुरी मिक्स बिहारी टोन में हिन्दी बोलने वाले ! वैसे इनकी बोली और घबराहट में बहुत सुधार हुआ है ! रिपोर्ट का विषय था - " कोला वार" ! बहुत बढ़िया प्रस्तुति ! मजा आ गया ! अपने मनपसंदीदा एंकर को देख मन प्रफुल्लित हो गया ! बेटा को बोला - देखो , ये भी अपने गाँव तरफ़ के ही हैं ! बहुत पैसा मिलता है ! बड़ा गाडी है ! बहुत बड़े सोसाइटी के टॉप पेंट हाउस में रहते हैं ! और मेरी तरह ये भी "ब्लॉग" लिखते हैं ! बेटा भी मन ही मन सोचा होगा की उसके बाबु जी भी 'बड़े लोग" के बारे में कुछ जानते हैं ! प्रोग्राम ख़त्म हुआ और मै फ़िर एक बार अखबार की तरफ़ मुडा ! धत् तेरे की - यह प्रोग्राम तो सुबह की बासी इकनॉमिक टाईम्स के पहले पन्ने पर छापा "कोला वार " की हु बहु कॉपी है !
घर से लंच कर के अभी अभी लौटा हूँ - वहां समाचार चल रहा था और कुछ बेहतर एन डी टी वी - इंडिया देख रहा था - दोपहर के समाचार में "बापू के चश्मे की नीलामी " का रिपोर्ट चल रहा था ! यह रिपोर्ट आज के टाईम्स ऑफ़ इंडिया के पहले पन्ने पर छपा है !
क्या यही आपकी अवकात है ?
रंजन ऋतुराज सिंह !
Thursday, February 5, 2009
कुछ सफ़ेद बाल !
@RR
Friday, January 23, 2009
तुझको मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ ?
Thursday, January 15, 2009
मेरी मर्ज़ी !
Saturday, December 20, 2008
महबूब कैसा हो ? पार्ट -४
तेरी बाहों में है जानम , मेरे जिस्म-ओ-जान पिघलते !कहानीकार के रूप में ख़ुद को विख्यात बनाने वाले "जावेद अख्तर " साहब इस सिनेमा में पहली बार "गाना" लिखे जिसे अमिताभ और लता दीदी ने अपनी आवाज़ दी है - " यह रात है .........यह कहाँ आ गए हम ..यूँ ही साथ चलते चलते ...." प्रख्यात संतूर वादक और वान्सुरी वादक श्री शिव और हरिप्रसाद चौरसिया जी ने संगीत क्या दिया - ये संगीत आज भी जवान है !
रेखा अमिताभ से १०-१२ साल छोटी हैं और इस सिनेमा को बनते हुए वक्त उन दोनों का प्रेम अपने चरम सीमा पर रहा होगा ! सिनेमा देख ऐसा लगता है - जैसे अमिताभ के लिए वक्त ठहर गया हो ! 36-37 वर्षीय अमिताभ सचमुच में एक मर्द नज़र आ रहे हैं - जिससे कोई भी "रेखा" निकल आए !
रंजन ऋतुराज सिंह , इंदिरापुरम
Friday, December 19, 2008
नीतिश कुमार ने "ललकार" दिया है !
पत्रकार लोग से इमानदार ऑफिसर को धमकी भेज्वाते हैं ! वाह ! भाई वाह ! चमचागिरी सब राजा को पसंद है ! कहे की मतलब की आप राजा हो ही गए ! बधाई हो ! ई सब खेला १,अन्ने मार्ग का है - जो वहां जाता है - राजा बन जाता है !
रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडा
Wednesday, December 17, 2008
महबूबा कैसी हो ? पार्ट - ३
अब जरा इनसे पूछिये की महबूबा कैसी हो ? चंदर से चाँद बन गए और फिजा को अपना लिया ! साली , मुहब्बत चीज़ ही कुछ ऐसी है ! वोह वाला गाना याद आ गया - 'ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नहीं ' ! जब स्वप्नसुंदरी मेनका सामने हो फिर 'विश्वामित्र' की क्या औकात ? पर , विश्वामित्र बनने को कौन बोलता है ? चंदर बन जाईये ! एक से मुक्ति पायें और दुसरे को अपना लें ! सिनेमा में मुहब्बत बहुत अच्छा लगता है और हकीकत में समाज गाली देता है ! "शिल्पा शेट्टी" और कंगना राउत वाला "लाइफ इन मेट्रो " देखा है , न ! बेहद ख़ूबसूरत और दिल के करीब ! पर हकीकत में ऐसा कुछ हो जाए तो मेरे जैसा "बिहारी" को फांसी पर लटका दिया जाए ! समाज न तो जीने देता है और न ही मरने ! बहुतों की फिदरत में घुट घुट के मरना नहीं लिखा होता है - सो वोह अपना रास्ता खुद ही बना लेते हैं ! रंजन ऋतुराज सिंह , इंदिरापुरम !
Tuesday, December 9, 2008
मतवाला हाथी !
रंजन ऋतुराज सिंह ,
Wednesday, December 3, 2008
बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ !
अंत में हम आपको बता दें . हम चौबीसों घंटे तीन पाँच करते रहते हैं . क्या दिखाया जाय क्या नही दिखाया जाय उसकी समझ न होते हुए भी लोकतंत्र का सबसे समझदार स्तभ का तगमा अपने गले लटकाय रहता हूँ. और आपको हम ये भी बता दे कि ये देखने की चीज थी इसलिए ही बार बार दिखाया गया ,लगातार दिखाया गया ।
हर बार यह अपराध हमसे हो जाता है । आपकी नज़रें वो सब कुछ नही देख पाती जो मुझमे समाहित है .
Tuesday, November 25, 2008
रंग रसिया

Wednesday, November 5, 2008
Thursday, September 11, 2008
स्काईलैब की याद
रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडा
Tuesday, September 9, 2008
नीतिश भैया, सुनीता मर गयी
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रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडा
Monday, September 8, 2008
बाढ़ मदद मे आगे आए बिहार के आई टी प्रोफ़ेशनल्स (Bihari IT professionals unite together to help their motherland)
मैं खुद बहुत सारे याहूग्रुप के सहारे आई टी प्रोफ़ेशनल्स के संपर्क मे हुं. इस कार्य मे बिहार से संबंधित सारे याहूग्रुप्स के सदस्य एकजुट होकर बिहार के मदद मे जुट गये हैं. खास कर बिहारी(http://www.bihari.org/) याहूग्रुप (सबसे पुराना), वर्ल्ड बिहारी फ़ोरम , कुल बिहार , बिहार ब्रेन इत्यादी एक जुट होकर ग्राउंड ज़ीरो पर उपस्थित अपने सदस्यो के द्वारा बाढ रिलिफ़ मे लग गये हैं। सबसे मजेदार बात है कि हमसभी अपने कार्यों एवम खर्च का व्योरा अपने ब्लाग (http://biharfloodrelief2008.blogspot.com/) के सहारे मददगारों को अवगत कराते रहतें है। इस ब्लाग पर balance sheet जो कि गुगल पेज पर है के द्वारा एक एक पैसे का हिसाब दर्शाता है। हमारा उद्देश्य है दुनिया भर मे प्रलय की जनकारी देना और लोगो को बाढ़ मदद मे आगे आने के लिये प्रोत्साहित करना। लोगो को ये बताना है कि अगर आपको नहीं मालुम है कि कहां डोनेट करें तो चिफ मिनिस्टर फंड मे जमा कर दें.
हम सभी दुनिया भर के आई टी कंपनियों को इमेल लिख कर बाढ़ राहत मे आगे आने के लिये अनुरोध कर रहे हैं. बहुत सारी आई टी कंपनियां अपने अपने कंपनी मे बाढ़ राहत के लिये समान के अलावा फंड जमा कर रहीं हैं.
अब समय आ गया है कि हमलोग भी अपने मातृभूमी के सेवा मे कुछ कर सकें। इस दुख की घड़ी मे हम सभी एन आर बी (Non resident Biharis) बिहार की जनता के साथ हैं।
कुछ निउज कवरेज यहां पर भी पढा जा सकता है
Bihar Flood Relief – Your Contribution will save life
Bihari techies unite to help motherland
धन्यवाद
सर्वेश कुमार उपाध्याय
बंगलोर
Wednesday, August 6, 2008
ग़ज़ल की यादें
पर मेरे पसंदीदा मेंहदी हसन साहब है ! गला में बीमारी की वजह से शायद अब वोह नही गाते हैं - " उसने जब मेरी तरफ़ प्यार से देखा होगा - मेरे बारे में बड़े गौर से सोचा होगा " मेरी पसंदीदा है ! फ़िर से वोह वाला ग़ज़ल - " मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो - मुझे तुम कभी न भुला पाओगे "
और अंत में
"वादा कर के अगर आप नही आयेंगे - नाम बदनाम ज़माने में वफ़ा का होगा "
रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडा
Saturday, August 2, 2008
सावन से सावन, एक साल हो गए !
Friday, August 1, 2008
स्वावलंबी बनने की राह पर बिक्रम की महिलाएं
साभार : दैनिक जागरणगौरतलब बात है कि ये महिलाएं खुद हल भी चला रही हैं। बिक्रम के विभिन्न गांवों में महिलाओं ने समूह बनाकर किसानों से पट्टे पर जमीन ली और स्वयं मेहनत कर फसल उगाना शुरू कर दिया। बिक्रम प्रखंड के उदचरक गांव की मीना देवी ने बताया कि महिलाओं ने पहले महिला एकता मंच का गठन किया और फिर 20-20 महिलाओं का समूह बनाकर खेती शुरू की। उन्होंने बताया कि सामूहिक खेती से लाभ होने का अनुमान है। वे कहती है कि इस प्रकार की खेती के गुर आसपास की महिलाओं को भी सिखाए जाएंगे। सुंदरपुर गांव की हीरामनी देवी का कहना है कि इस कार्य से वे स्वावलंबी हो सकती है। यदि उन्हें बैंकों द्वारा आर्थिक सहायता प्रदान की गई तो वे उन्नत खेती करने में भी सक्षम हो सकती है। वे कहती है कि हम महिलाएं किसी से कम नहीं है। हम सिर्फ घर का काम ही नहीं खेतों का काम भी कर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकती है।
सामूहिक खेती के लिए इन महिलाओं को प्रेरणा देने का काम प्रगति विकास समिति द्वारा किया गया है। समिति के सह संयोजक उमेश कुमार बताते है कि उनकी योजना सभी गांवों को जोड़ने की है, जिससे आसानी से महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाया जा सके। इच्छाशक्ति और उत्साह से परिपूर्ण मनेर गांव की धर्मशीला का कहना है कि सरकार बड़े किसानों को तो बीज उपलब्ध कराती है, लेकिन जमीन नहीं होने के कारण वह इस योजना से दूर ही है। यदि उन्हे खेती का प्रशिक्षण, उचित साधन एवं बढि़या बीज उपलब्ध कराए जाएं, तो एक एकड़ में 45 क्विंटल तक धान का उत्पादन किया जा सकता है। बताया जाता है कि बिहटा प्रखंड के बारा, सुंदरपुर, चिहटा, पड़रियांवा, शिवगढ़, महजपुरा, मनेर और तेलपा जैसे गांवों में महिलाएं सामूहिक खेती कर रही है।
Thursday, July 17, 2008
माँ और भूख !
" पत्थर उबालती रही एक माँ तमाम रात ,
Friday, July 4, 2008
अच्छा लगता हूँ !
शब्द ज़माने का .वाक्य बन गया मेरे से . सो सर्वाधिकार सुरक्षित कैसे हो ? इन बने -बिगडे वाक्य को कविता, गीत ,गजल,या छंद क्या कहा जाय ,मालूम नही .
बस अच्छा लगता हूँ
दर्द जो सीने से उठकर, चेहरे पर गिरती है।
जो ख़त्म न हो इन्तजार उसका शौक पाला है ।
व्यस्क हो चले ज़ख्मी दिल का खुराक भी बढ़ा है।






