Tuesday, September 23, 2014

मन ....

मन की बातें - मन ही जाने - मन पवित्र - मन अपवित्र - मन साफ़ - मन गन्दा - मन हैवान - मन भगवान् - मन शुद्ध - मन अशुद्ध - मन में शक्ती - मन में भक्ती - मन से प्रेम - मन से घृणा - मन से दुलार - मन से फटकार - मन में सब कुछ - मन में कुछ नहीं ....
ये मन क्या है ...दिल / दिमाग / आत्मा ...ये है ..क्या ? कभी ये इतना चंचल ...सागर के तूफ़ान जैसा तो कभी झील के पानी सा शांत ...कभी ये मेरे वश में ...कभी इसके वश में हम ...मन में विचार - मन में सुविचार - मन में कुविचार ...मन की बातों को जुबान मिल जाए ..जीवन में भूकंप आ जाए ...जुबान न मिले ...अन्दर भूकंप आ जाए ...मन से मानो तो पत्थर भी देवता ...मन से ना मानो तो देवता भी पत्थर ...मन..मन..रे मन ...मन में छुपा ...मन से बाहर ...मन में तुम ...मन में हम ....
जो है ..मन से योगी ...वही है ..असल योगी ...मन को बाँध दिया ...जगत बंध गया ...मन खुला रहा गया ...जीवन को ही चर गया ...मन से अर्पण किया - मन से समर्पण किया - कोयला भी हीरा बन गया ...मन वहीँ बस गया ...जहाँ उसको सुकून मिल गया ...
@RR
~ 29 November 2013
दुनिया में सबसे आज़ाद क्या है - आपका 'मन' ! क्या क्या सोचता है और क्या क्या नहीं सोचता है  कहाँ नहीं जाता है और कहीं नहीं रुकता है ! जहाँ आप नहीं जा सकते - आपका आज़ाद मन क्षण में चला जाता है - है कोई जो रोक सके .. :)) कौन बाँध पाया है ..इस मन को - कौन रोक पाया है - इस मन को ! 
मन से राजा - मन से दरिद्र - मन से अपना - मन से पराया - मन से दुश्मन - मन से साथी - मन से नफरत - मन से श्रद्धा ! 
ऐसा लगता है ...जब सब कुछ ...ये मन ही है ...फिर बाकी क्या है ?? :))) 
~ RR
~ २९ सेप्टेम्बर - २०१२ 


कभी कभी एक लम्बी छुट्टी पर जाने को मन करता है ...कहीं किसी पहाड़ पर ...एक रूम वाले गेस्ट हाउस में ...जिसकी खिड़की एक हरे भरे पहाड़ की तरफ खुलती हो ...बारिश का मौसम हो ...और मेरे संग कोई न हो ! एक कमरा ...जिसमे सैकड़ों हिंदी साहित्य और जीवन दर्शन की किताबें ...कमरे में एक तरफ एक खूब ऊँचा ...पलंग ...पलंग में सालों भर लटका हुआ एक मच्छरदानी ....एक तरफ महोगनी की रीडिंग टेबल और कुर्सी ....और एक रामू काका टाईप खानसामा ...जो हर शाम शुद्ध भोजन दें ! 
एक देर सुबह हो ....इतनी देर हो ...जब तक तीन कप चाय ठंडी न हो जाए ....फिर बालकोनी में बैठ ...खूब देर तक पहाड़ों की हरियाली को ताकना ....गर्म चाय के बड़े प्याली को दोंनो हाथ से पकड़ ...कई घंटे पहाड़ों को देखना ...वो हरे भरे पहाड़ और उनके पेड़ जो हलके बारिश की फुहार में भींगे खड़े हैं .....
@RR
20 April 2013 

इश्क .....

....बहुत दबंग होता है ..इश्क ...दरवाजा बंद कर दोगे ...रोशनदान से घुस आएगा ....नहीं घुसने दोगे ....चौखट पर सातों जनम गुजार देगा ...बेहतर है ...उस इश्क को इज्जत के साथ ..अन्दर आने दो ...महसूस करो ....चुप चाप बैठा रहेगा ...कभी कुछ मांगे तो पूछना ...तुम तो इश्क हो ...और इश्क को क्या चाहिए ...या तो सबकुछ या फिर कुछ नहीं ...:)))
वर्ना ...दिल्लगी का ..कोई पहर नहीं होता ...@RR
24 September - 2014
इश्क एक ख़ूबसूरत एहसास है ! मन एक शांत झील की तरह है – तुम्हारी खुबसूरत निगाहें उस पत्थर की तरह हैं जो झील में जाते ही ‘इश्क’ की तरंग पैदा करती है – मै झील के किनारे से उन तरगों को देख खुश हो जाता हूँ – फिर वो तरंग खुद ब खुद शांत हो जाती है – फिर झील के दूसरे किनारे से किसी और ने एक पत्थर फेंक दिया ..ये क्या हुआ ..कह कर झील से दूर चला जाता हूँ .....बहुत दूर ..उस पर्वत पर् ..जहाँ से कोई झील नज़र ना आये ....
@RR
21 फरवरी - २०१४
'इश्क की चाशनी' में डूबे रहते हो ..
ए अजनबी ..बोलो..तुम कौन हो ..
कभी जाने तो कभी अनजाने लगते हो ..
ए अजनबी ..बोलो..तुम कौन हो ..
@RR
१० मार्च - २०१२

Monday, September 22, 2014

आओ ...शब्दों का एक चौपड हो जाए....

आओ ...शब्दों का एक चौपड हो जाए ...कुछ शब्द तुम फेंको ..कुछ मैं फेंकता हूँ ....कुछ बाज़ी तुम हारो ...कुछ मैं हारता हूँ ....कुछ मेरे शब्द.... तुम्हारे जुबान से ...कुछ तुम्हारे शब्द ..मेरी जुबान से...इन शब्दों से बनते रिश्ते को.... सुबह हम पूजे तो ....शाम तुम पूजो ...आओ ...शब्दों का एक चौपड हो जाए...कब सुबह आये ..कब शाम आये ....जो भी आये ..इन शब्दों में लिपटा आये ...आओ ...शब्दों का एक चौपड हो जाए ...इस बार ना तुम हारो ..ना मैं ...ना तुम जीतो ..ना मैं ...
~ दालान
३१ दिसंबर २०१४ 

बरसता तो भादों है ..:))

सावन तो बस मिजाज़ बनाता है - बरसता तो भादों है ..:)) हाँ..मेरे शहर पटना में आज सुबह से ही बारिश हो रही है ..जबरदस्त ...:)) सुबह सुबह वो हलके भींगे अखबार ....बालकोनी के किसी कोने में पड़े ...फिर उन्हें बिछावन पर पसार ...पंखे में सुखा ...पढना ...गाँव से 'मन्टू' आया है ...हर एक घंटे पर बढ़िया दार्जिलिंग चाय बना के दे जा रहा है ....! बच्चे स्कूल नहीं जाना चाह रहे थे ...ठेल ठाल के स्कूल बस पर बैठा दिया ...इस दिलासा के साथ ...स्कूल में बहुत कम बच्चे आयेंगे और जब तुम इस बारिश में भी स्कूल जाओगे ...बढ़िया लगेगा ...दोस्तों से ढेर सारे गप्प का समय मिलेगा ...:))
बारिश भी अलग अलग तरह की होती है ....कई बार आप पलंग पर लेट ...खिड़की से बरसती बूंदों को देखना पसंद करते हैं ...कई बार साईकिल से बारिश में निकल घूमना पसंद करेंगे ...तो कई बार अपने कार से ...तेज रफ़्तार से चल रही वाइपर और आप थोड़े आगे की तरफ झुके ...कई बार आप अपनी बाईक पर ...अकेले या दुकेले ...बारिश की तीखी बूंदों से अपने चेहरे को बचाते ....पीछे बैठी प्रेमिका के दुपट्टे से आप दोनों खुद को समटते ...:)) कई बार अपने बालकोनी के झुलुआ पर बैठे ....एकटक बरसती बूंदों को देखते ....
बारिश तो बारिश ही है ....जैसा आपका मिजाज़ ...बारिश का वैसा मजा ...:))

~ १२ अगस्त २०१४ 

तेरे बड़े ओसारे में .................

बारिश की बूंदों में ....एक छतरी के निचे ....आज फिर तेरी गली - घर का एक चक्कर लगा आया हूँ ...तेरे बड़े ओसारे में रखी ...उस भींगी अकेली कुर्सी पर ...पल भर के लिए अपनी रूह को बैठा आया हूँ ...कुछ तो तुमने भी महसूस किया होगा ...मै फिर से सरेआम भींग आया हूँ ...
~ RR

बारिशों का मौसम.....

आइये मेरे पटना में - बारिशों का मौसम है ..:)) जबरदस्त बारिश हो रही है - मेरे पटना में ...
छाता ....पहले लकड़ी वाला छाता होता था ...जैसा छाता वैसा उस इंसान का हैसियत ...कलकत्ता से छाता आता था ...एक फेमस ब्रांड होता था ...नाम भूल रहा हूँ ...स्प्रिंग एकदम हार्ड ...सब अजिन कजिन उस छाता को खोलने का प्रयास ...किसी का उंगली 'चिपा' गया ...बाकी सब फरार ..:)) फिर आया ..स्टील वाला छाता ...नेपाल से ...बटन वाला....कोई गेस्ट अगर वैसा छाता के साथ आ गया ...इतना न उसका बटन 'पुट-पुटाते' थे ...जैसे ही बटन दबाते वो छाता खुलता ...चेहरे पर एक विजयी मुस्कान ...:)) फिर उसको बंद करो ...फिर बटन दबाओ ...फिर उस छाते को गीली जमीन में उल्टा कर के धंसा देना ...लगता था ..जैसे वहां कोई किला फतह कर लिए ..:)) फिर आया 'लेडिज छाता' फोल्ड वाला ...लाल - नीला - अलग अलग रंग वाला ....घर में छाता नहीं मिल रहा ...कोई हाथ में 'लेडिज छाता' थमा दिया ...बहुत बेइज्जती जैसा लगता था ....हूँ...रोड पर लेडिज छाता लेकर जायेंगे ...हुंह ...कोई देखेगा तो क्या बोलेगा ...हा हा हा हा ...अब वो फोल्ड हो जाने वाला छाता काला मिलने लगा ...यूनिसेक्स हो गया ...एक ही छाता सब लोग यूज करने लगे ...
सीढीघर में ...रेलिंग के सहारे खडा वो छाता ...बूँद - बूँद टपक रहा ..वो छाता ...कोई आया है ...मेरे गाँव से ...

~ १३ अगस्त २०१२ 

..................

तेरी खिड़की से ....देर शाम ....वो जो आधा चाँद दिखता है ....क्या वो तेरी तरह पिघलता भी है ...
~ RR
आज की रात...घुल जाएगा ...वो मीठा मीठा सा चाँद....नमकीन समंदर के साथ ....:)) 
~ RR
किसी रात .....एक रात के साथ ....जाग के देखो ....सुनो ...क्या क्या कहती है ...वो रात ...सारी रात ....
~ RR
२५ अगस्त २०१४
ख्वाब एक आसमां हैं ...
ख्वाब मुठ्ठी में चंद सितारे हैं ...
ख्वाब एक चाँद हैं ...
ख्वाब चेहरे पे फ़ैली चांदनी है ...
ख्वाब एक गुलाब है ...
ख्वाब महकता बाग़ है ...
ख्वाब एक रात है ...
ख्वाब बेफिक्र नींद है ...
~ RR
२८ अगस्त २०१४

दिन का चाँद ....:))

बहते ख्वाब भी कहीं रुक से जाते हैं - थोड़ी देर के लिए ही सही - तेरी आखों में डूब जाते हैं - थर्राते होठों से कुछ निकल पड़ते हैं - रात का इंतज़ार कौन करे ..चाँद भी कभी कभी दिन के नीले आसमां में निकल आता है ...
फिर ...फिजाओं में.. ..कुछ गुलाबी ख्वाब तेरी खुशबू से महक जाते हैं ....:))
~ २५ दिसंबर २०१३ 

पिघलता चाँद .....

नीले आसमां का वो नीला नीला सा प्यारा चाँद... 
सावन पूनम की रात वो कुछ गीला गीला सा चाँद ...
बादलों के संग पुरी रात बूँद बूँद पिघलता वो चाँद ...
सावन पूनम की रात झूले पर संग बैठा वो मेरा चाँद ....:)) 
~ RR

चाँद यूँ खिला ....:))

सुबह होते ही चाँद ओझल हो जाता है ..और सूरज दिन भर खुद की आग में जलता है ....थक - हार ...चाँद के इंतज़ार में ...हर रोज सूरज ..हर शाम ढल जाता है ...
फिर ..रात में ..चाँद ..हर रात सूरज के इंतज़ार में ..निकलता है ...चाँद है ...वो भी थकने लगता है...पर धीरे धीरे..थोडा थोड़ा हर रोज मध्यम ...फिर अमावस्या की रात ओझल ...फिर हिम्मत बाँध ..अगले दिन ..चुपके चुपके ...थोडा ..थोड़ा ..फिर पूनम की रात ...सज धज के ...अपने सूरज के इंतज़ार है ...सूना है ..लोग कहते हैं ...वर्ष के वर्ष बीत गए ...ना वो थका ..ना ये हारा ...सलाम है ...@RR 5 November - 2012 

ए मेरे चाँद ...
ए मेरे फागुन के चाँद ...
आ ..अब धरती पर उतर आ ...
आ.. तेरे गोरे गालों पर थोडा अबीर लगा दूँ ...
आ.. तेरे नीले आसमां को और गहरा कर दूँ .
~ 16 March 2014 



आज पूनम की रात है ..सुना है चाँद हमसे बेहद करीब है ..उसे कुछ कहना है .हमें भी तो कुछ सुनना है ..आज की रात ना हम सोयेंगे ...ना ही हमारा चाँद सोयेगा ..सारी रात एक दूसरे को देखते रह जायेंगे ..मालूम नहीं फिर कब मुलाकात हो ...आज पूनम की रात है ..सुना है चाँद हमसे बेहद करीब है ..उसे कुछ कहना है .हमें भी तो कुछ सुनना है ..
@RR 
31 अगस्त 2012 

गुलज़ार .....

" सब कहते हैं ....मैंने अस्सी वसंत देखे हैं ...कोई ये नहीं कहता - मैंने अस्सी पतझड़ भी देखे हैं ....सभी कहते हैं ....मैंने अस्सी सावन देखे हैं ....कोई ये भी तो कह दो - मैंने अस्सी जेठ की दुपहरिया भी देखा है ....हाँ ..मैंने देखा है ....वसंत के बहार को ...खिलखिलाते फूलों को ....पर मैंने उन्ही फूलों के पत्तों को झरते भी देखा है .....हाँ ...मैंने सावन को बरसते देखा है ....पर उसके पहले की प्यासी जल रही धरती को भी देखा है " 
~ इन्ही शब्दों के साथ "गुलज़ार साहब" को उनके जन्मदिन पर दालान और पाठकों की तरफ से शुभकामनाएं ....:))
१८ अगस्त - २०१४ 

जेठ में बारिश .....

सावन की बारिश क्या बुझाती और बरस के कैसी आग लगाती है - इसकी चर्चा सावान में - पर ये जो तपती जेठ की बारिश जब आती है - किस कदर बरसती है - बस ये धरती ही समझे ....कितना भी बरसे ...कम ही बरसे ...
~ RR
27 May 2012 

आज सावन गिरा ...

आज सावन गिरा ...क्या गिरा ..खूब गिरा ...खूब भींगा ...दिलभर - मनभर - जीभर !
मन नहीं माना तब बेटा का साइकिल निकाल सड़क पर् निकल पड़ा ...वर्षों पहले खुद के साइकिल पर् इसी तरह भींगा था ...
मन तब भी वही था ..मन आज भी वही है :)) 
मालूम नहीं बारिश की पहली फुहार इतनी अच्छी क्यूँ लगती है ...मिट्टी की खुशबू जो आती है ...बेचैन और तपती धरती ...सूरज के घमंड को तोडता बादल ....सचमुच मजा आ गया :))
~ RR
6 जुलाई - २०१२ 

शिव का महिना ....

ये जो सावन का महिना है ..न ...शिव का है...शिव के भोले रूप का ...उस आदिगुरु का ...उस महान योगी का ...उस त्यागी का ...
ये जो सावन का महिना है ..न ...भींगा भींगा सा है ...गरजते बादलों का ...बादलों के बीच छुपे चाँद का ...बरसती बूंदों का ...खेतों की हरियाली का ...प्यासी धरती का 
ये जो सावन का महिना है ..न ...मधुर गीतों का है ...झूलों का ...फुहारों का ...मोर के नृत्य का ...प्रकृती का ....:))
मेरा वश चले तो ....साल की शुरुआत ही 'सावन' से हो ....क्यों 'दालान' पर मेरा वश तो चल सकता है ..न ...फिर ...
भींगे - भींगे से ...शब्दों के साथ ....'सावन' की शुभकामनाएँ ...:))
~ RR
१३ जुलाई - २०१४ 

भींगे शब्द ......

सावन का ...हर पहर...हर पल...कुछ भींगा भींगा सा रहता है...कल के भींगे ख्वाब आज भी भींगे हुए हैं ...सूख जाएँ तो इन्हें पहन लूँ ...फिर से भींग जायेंगे ...कुछ बूँदें मेरी कलम की स्याही में जा मिले हैं ...अब सारे शब्द भी कुछ भींगे - भींगे से दिखते हैं ...फुर्सत में पढना ...मेरे कुछ भींगे शब्द ....
~ RR
१८ अगस्त , २०१३ 

सावन के शब्द ......भींगे शब्द ...

तुम्हे पता होगा .... सावन में मेरे शब्द भींग जाते हैं ...हल्की फुहार में भी ...इनको टंगनी पर सुखने को मत डालना ...किसी कठोर क्लिप से इनको चांप मत देना ...कितना भी सुखाओगे ...हलके गीले रह ही जायेंगे ...सावन के शब्द वैसे ही अच्छे लगते हैं ...हलके गीले ....थोड़े वजन में ....
~RR
२९ जुलाई - २०१३ 

शब्दों का गज़रा ....:))

सुबह तड़के ...पौ फटने से भी पहले ...सूरज की पहली किरण के साथ ...शब्दों की बाग़ से ...तेरे लिए कुछ शब्द अपनी टोकरी में ले आता हूँ ...वो ओस की बूंदों में भींगे शब्द ...चमेली चंपा सी खुशबू लिए शब्द ...गुलाब से महकते शब्द ...इत्र की खुशबू को लपेटे वो मासूम शब्द ...तुम भी तो मेरे शब्दों की टोकरी के सामने ही बैठ जाते हो ..कहते हो ..अपने शब्दों का एक गजरा बना दो ..मेरे बालों में सजा दो ...चंपा - चमेली की खुशबू लिए मेरे शब्दों का गजरा ...मन कब भरता है ...अंत में कह ही देते हो ...ये शब्दों की टोकरी ..मुझे दे दो ...दाम क्या लोगे मुझे बता दो ..मै निःशब्द ...मन ही मन कहता हूँ ...कब किसी ने पुरी टोकरी इतने हक़ से माँगा ...दुनिया तो एक गजरे में ही खुश हो जाती है ....ये हक़ ही दाम है ...
कभी आना मेरे शब्दों के बाग़ में ...:))
~ RR
4 September , 2013 

Thursday, September 18, 2014

जोगी .....

गाँव में दोपहर के समय या शाम को 'जोगी' आते थे - भीख माँगते हुए - सारंगी बजाते हुए - बिरहा के गीत गाते हुए - गेरुआ कुरता , गेरुआ मुरेठा और बढ़ी हुई दाढ़ी - उम्र तीस से कम ! उनके गीत को सुन डर जाता था - दरवाजे ( दुआर ) से भाग आँगन में दादी की आंचल में छुप जाता था - फिर जंगला ( खिडकी ) से उनको चुपके चुपके देखना ! जब वो चले जाते - हम चचेरे भाई - बहन उनके बारे में चर्चा करते - कहते थे - ये 'जोगी' बारह साल की उम्र में घर छोड़ - अगले बारह साल सारंगी बजाते हुए - भीख माँगते हुए काटते थे - देस बिदेस घुमते हुए - अंतिम साल वो अपनी माँ से भीख माँगने पहुंचते थे - कहते हैं - जब 'माँ' बिना पहचाने उस 'जोगी' पुत्र को भीख दे दे ..जोगी की जोग सफल मानी जाती थी ! 
कई बार 'माँ' पहचान जाती थी फिर .....कितना दर्द है ...! 
जीवन के कई रंग हैं ....मालूम नहीं यह कैसा रंग है ....ऐसा लग् रहा है ..दरवाजे पर् अभी अभी कोई जोगी आया है ..अपनी सारंगी बजाते हुए ...बिरहा के गीत गाते हुए ....

Wednesday, September 17, 2014

निर्णय


आईक्यू के एक ख़ास बैंडविथ में - करोड़ों लोग होते हैं पर सामाजिक पटल पर उनके जीवन में बहुत अंतर होता है - उसकी एक ख़ास वजह होती है - 'निर्णय' ! जीवन एक सफ़र है और यह एक ऐसा सफ़र होता है - जिसमे 'मंजिल' नाम की कोई चीज़ नहीं होती - जहाँ तक जैसे पहुंचे - वही आपकी मंजिल हो जाती है ! पर हर चार कदम पर एक चौराहा होता है और उस चौराहे से किधर मुड़ना है - वहीँ आपका 'निर्णय' निर्धारीत करता है आप किधर की ओर रुख कर रहे हैं ! कई बार एक छोटी सी निर्णय आपके पुरे ज़िंदगी को बदल देती है - ये निर्णय सिर्फ इंसान को ही नहीं बड़े से बड़े संगठन से लेकर समूह तक को प्रभावित करती है ! 
एक उदहारण देता हूँ - अज़ीम प्रेम जी खाने वाले तेल के व्यापार से थे - एक निर्णय लिया - मुझे आईटी में जाना है - विप्रो को दुनिया जान गयी - अम्बानी ने लेट कर दिया - एअरटेल कहाँ से कहाँ पहुँच गयी ! इंसान वही है - उसकी आतंरिक मेरिट भी वही है - उसकी क्षमता भी वही है - बस एक निर्णय उसे आसमां तक पहुंचा सकता है - अगर बात सामाजिक पटल की हो तो ! 
कई बार निर्णय लेते वक़्त 'स्टेकहोल्डर' का भी ध्यान रखना होता है - इंसान कभी अकेला नहीं होता - यह एक भ्रम है की वो अकेला है और उसकी ज़िंदगी सिर्फ उसी की है - कई और लोग उसकी ज़िंदगी से जुड़े होते हैं - जितना बड़ा व्यक्तित्व उतने ज्यादा स्टेकहोल्डर - कई निर्णय में सबका ध्यान रखना होता है - कई बार बिना कुछ सोचे समझे निर्णय ले लिया जाता है - जो होगा देखा जायेगा - इसके लिए अन्दर से बहुत हिम्मत चाहिए होता है - ऐसे ही निर्णय में - हमें कई बार किसी ख़ास की जरुरत होती है - जो हमें बस यह दिलासा दे सके - जाओ आगे बढ़ो - तुम्हारा निर्णय सही है ! 
कई बार हमें अपने निर्णय के सकरात्मक और नकरात्मक दोनों के अंत तक सोच कर रखना चाहिए - सिर्फ एक पक्ष सोच लेने से - बाद में दिक्कत हो सकती है ! निर्णय और उसके फल में सिर्फ आप नहीं शामिल होते हैं - उसमे कई और लोग भी शामिल होते हैं - वो आपको मदद भी पहुंचा सकते हैं या फिर आपको कमज़ोर भी कर सकते है ! 
पर किसी भी हाल में ...निर्णय लेते रहिये ...ज़िंदगी आगे बढ़ते रहने का ही नाम है ...:))

अहंकार

अहंकार तुम्हारा शस्त्र है
उसके बगैर जीना व्यर्थ है ...
शस्त्र के साथ हर जगह नहीं ...
इसके बगैर भी हर जगह नहीं ....
अहंकार अग्रज के साथ नहीं ....
कुचल दिए जाओगे ...
अहंकार अनुज के साथ नहीं ...
घृणा के पात्र बन जाओगे ....
अहंकार प्रेम में नहीं ...
दफ़न हो जाओगे ....
अहंकार गुरु के साथ नहीं ...
कफ़न में लिपट जाओगे ....
आत्म सम्मान पर जब चोट लगे ...
सब भूल जाओ ...
अहंकार को कवच बना
खुद को जलाओ ...
मानव ही धरती को रौंदता है ...
है हिम्मत तो शेर भी डरता है ...
यह जीवन बार बार नहीं आता है ...
है हाथ में लगाम तो आसमान भी झुकता है ...
जीवन अगर युद्ध है ...
तुम्हारा अहंकार ही वो अश्व है ...
जब अश्व पर चाबूक लगेगा ...
हवा के संग बातें करेगा ....
जीने की कला सिखाएगा ....
कुचले हुए आत्म सम्मान को उठाएगा ....
कहाँ शस्त्र उठाना है ....
कहाँ शस्त्र गिराना है .....
यही सिखना जीवन है .....
प्रेम और युद्ध दोनों के बगैर जीवन अधूरा है ....
~ RR

मटन की खुशबू

छोटे शहरों की छोटी गलीओं के किसी घर से किरासिन तेल वाले स्टोव पर कूकर के सीटी के साथ पक रहे "मीट / मटन" की खुशबू के आगे दुनिया की सारी खुशबू फेल है ...वहीँ उस संकरी गली में खड़े होकर ...आँख बंद करके ...एक लम्बी सांस और खड़े गरम मसाला में पक रहे 'मीट / मटन' की सारी खुशबू ...एकदम से दिल में घुस जाता है ...और उसके बाद जो बेचैनी होती है ...मत पूछिए ...हा ..हा...हा...हा ...
"मीट / मटन" की खुशबू आयी ??? ...:))

हिंदी किसके कन्धों पर ?

हिंदी की जिम्मेदारी किन कन्धों पर होनी चाहिए - यह महत्वपूर्ण है ! सबसे ऊपर हैं - हिंदी के पत्र पत्रिका और पत्रकार - ये वो हैं जिन्हें हम हर रोज सुनते पढ़ते हैं - हिंदी को आकर्षक बनाने की जिम्मेदारी इन कन्धों पर है - जब तक यह आकर्षक नहीं बनेगी तब तक यह जन मानस को अपील नहीं करेगी और समाज हमेशा अपनी खूबी और गन्दगी दोनों ऊँचे तबके से लेता है - "बहाव हमेशा ऊपर से निचे होता है "- हिंदी को समाज के उस तबके में अपनी पैठ बढानी होगी ! कई बेहतरीन पत्रिका बिलकुल नीरस हो चुकी हैं - कालिदास / दिनकर / निराला / जयशंकर प्रसाद को लोग हर रोज नहीं पढ़ते हैं -
दूसरी बात - साहित्य / सिनेमा इत्यादी हमेशा काल को दर्शाता है - आज के दौर के बच्चों को प्रेमचंद के किस्से की कल्पना में ढालने में बहुत दिक्कत होगी - जुम्मन शेख जैसे पात्र जब तक उनके आँख के सामने नहीं आयेंगे - वो कहानी का मर्म नहीं समझ पाएंगे - समाज का एक बड़ा तबका शहरों और विदेशों में पल बढ़ रहा है - यह वही तबका है जो हर चीज़ों का मापदंड निर्धारीत करता है - दुसरे भी उसी को फौलो करते हैं - निराला / दिनकर इत्यादी के अलावा भी कई साहित्यकार हैं जिन्हें पढ़ा जाता है - उनको जमाने के हिसाब से अपनी कथाएं लिखनी होंगी ..लिखी भी जा रही हैं ...पर मौलिकता के चक्कर में वो कभी कभी गंदी भी दिखने लगती हैं ....
कई बार समाज लिड करता है - कई बार समाज को दिशा दिखानी पड़ती है - हिंदी अखबारों के पत्रकारों के लिए यह बहुत आसान है - पर दुःख है - अंग्रेज़ी की नक़ल में वो बड़े बेढंगे दिखते हैं और तब एक दर्द होता है ! जो बढ़िया लेख हैं - समाज में जो कुछ असल में हो रहा है वो सब उसी रूप और रंग में हिंदी में भी नज़र आनी चाहिए !
हाँ ...पढने वालों को भी अपनी परीपक्वता बढानी होगी ...और मेरा यह मानना है ...परिपक्वता पढ़ते पढ़ते बढ़ जायेगी ....

Monday, February 10, 2014

सरस्वती वंदना

हे वीणावादिनि....
तुम तो देवी हो ..न ...हम एक इंसान हैं ..
तुम पूर्ण हो ...हम अपूर्ण हैं ...
तुम तृप्त हो ...हम अतृप्त हैं ...
तुम ज्ञान की सागर हो ...हम जन्मो के प्यासे हैं ...
तुम तो देवी हो ..न ..
याचना नहीं आती हमें ...आराधना आती है ...
स्तुती नहीं आती हमें ...पूजा आती है ...
कुछ भी नहीं ..फिर भी चाहत बेशुमार है ..
जुबान नहीं ...पर एक निर्मल मन है ...
शब्द नहीं ...पर भावविभोर एक प्रेम हैं ..
तुम तो देवी हो ..न ...
हे वीणावादिनि ...अब तो वर दे ...
अब नज़र उठाओ ...
अपने ज्ञान से मेरे मन को भर दे ...
हे वीणावादिनि ...अब वर दे ...
अपने संगीत और सरिता से ...
इस जीवन में एक वसंत दे ...
तुम तो देवी हो ..न ..
हे वीणावादिनि ...अब वर दे ... 



रंजन ऋतुराज 

हे ..ऋतुराज ...


हे ऋतुराज वसंत ...
कौन दिशा आते हो ...
शिशिर के घमंड को तोड़...
किस रंग में हमें रंग जाते हो ...
हे ऋतुराज वसंत ...
तेरे आने की खबर हमें कौन दे जाता है ...
खेतों में लहलहाते सरसों के फूल ...
या कोयल की मधुर बोल ...
"हे ऋतुराज वसंत ...
तुम्हारे इंतज़ार में ...ठिठुरती धरती भी ...
तेरे आगमन से...थोडा इठलाती है ...
परागों के यौवन को देख ...'प्रकृती' भौरों में समा जाती है ..."
~  
रंजन ऋतुराज 

Friday, October 18, 2013

चाँद है ....तुम हो ....ये धरती है ...और मै हूँ ...:))

सोलह कलाओं से परिपूर्ण ...चाँद ...आज की रात ...अपने धरती से बेहद करीब ...और चांदनी इस कदर ....धरती पर बिखरे ..जैसे 'अमृत वर्षा' ....:)) और श्री कृष्ण ...अपनी राधा के संग ...आधी रात ...यमुना तट पर ....रास ....गोपियाँ घेर लें ...और तमन्ना करें....हर रात ...ऐसी हो हो ....पर हर रात ऐसी कहाँ आती है ...बरस में सिर्फ एक बार ही तो आती है ....जब चाँद अपनी घूँघट से बाहर निकल ...खुद को परिपूर्ण बताये ...और कल्पना कीजिए ...धरती की ...चांदनी में नहाई ...वो चांदनी अमृत ही तो है ....तभी तो ..दोनों ने इस अमृत प्रेम को चख ...अमर हैं ...श्रीकृष्ण और राधा की तरह ...:)) 



रंजन ऋतुराज - पटना 

Thursday, October 17, 2013

तेरी रूह ....:))

मंदिर तो वहीँ हैं ...जहाँ तेरी रूह बसती है ...जलती है ...उस कमरे को रौशन करती है ...सुगन्धित करती है ...इस जहान में ...सबकुछ तो पत्थर ही है ...बस तेरी 'केफी' की इबाबत ने ...उस आवारे पत्थर को खुदा बना दिया ...
मंदिर तो वहीँ हैं ...जहाँ तेरी रूह बसती है ...
~ RR

चाँद डूबा है ....:))

कब समुन्दर में चाँद डूबा है 
कब बेचैन लहरों को चाँद मिला है 
आसमां का मुसाफिर है 
आसमां में ही जागता है 
आसमां में ही सोता है 

समुन्दर की लहरों की आगोश 
ज्वारभाटा है 
जो पूनम की रात आती हैं 
अमावास की रात खुद में ही बह जाती हैं 

यह खेल सदीओं पुराना है
प्रकृती को कौन जीत पाया है
कब चाँद पृथ्वी में समाया है

फिर भी उसकी जिद है
यही उसकी प्रकृती है
ना कल थका था
ना कल थकेगा
हर पूनम की रात
अपनी चांदनी के साथ
अपनी पृथ्वी के करीब आएगा
ना कुछ बोलेगा
ना कोई ख़त लिखेगा
सारी रात यूँ ही जागेगा
फिर सुबह होते ही
न जाने किस आसमां में
अगली रात तक के लिए
खो जायेगा ...
धीरे धीरे मध्यम होता जायेगा ..
अमावास की रात
दीपक के हवाले पृथ्वी को छोड़ जायेगा ..
थका हारा ..फिर एक एक रात
धीरे धीरे जागेगा ...

यही उसकी प्रकृती है
यही उसकी जिद है ...
"जिद के आगे प्रकृती भी झुकती है"
एक रात चुपके से
पृथ्वी भी अपने चाँद से मिलती है ...
और
उसके संग
उसकी चांदनी में नहाती है....:))
~ RR



रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !

Wednesday, October 16, 2013

चित्त तो चंचल है ....:))

बकरीद की शुभकामनाएं ...:)) 
अल्लाह को प्यारी है ..कुर्बानी ! 
कोई भी धर्म हमें यही कहता है ..हम ईश्वर से प्रेम करें ! और प्रेम ..बिना त्याग / समर्पण / कुर्बानी के सफल नहीं होता - चित्त चंचल है - कई तरह के विश्वासों और अविश्वासों के बीच चित्त अपनी चंचलता नहीं छोड़ता और चंचल चित्त से प्रेम कभी सफल नहीं होता - फिर कुर्बानी / त्याग / समर्पण हमें एक शांत चित्त की तरफ ले जाता है ! 
इंसान अपने आप में अतृप्त है ! वह भौतिक दुनिया का बेताज बादशाह है ! एक इंसान दुसरे इंसान को ही प्रेम करे और उससे ही प्रेम पाए - यही कामना उसके अन्दर होती है - पर यह आसान नहीं होता - गुलर के फूल की तरह या मृगमरीचिका ! इंसान इंसान से प्रेम करेगा ..उसकी चाहतें / अपेक्षायें बढेंगी ..फिर वो टूटेंगी - यह इंसान की प्रकृती है !
फिर ईश्वर आता है ...हमें जिस तरह से पाला पोषा गया है ...जो हमें सिखाया गया है ...वहां हम ईश्वर को सिर्फ प्रेम करते हैं ..उससे कोई अपेक्षा नहीं रख पाते ...सुख दुःख ..पाप पुण्य ..जो कुछ ईश्वर हमें देता है ...हम उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण कर लेते हैं ...शायद यही प्रेम है ! इंसान इंसान से कई शिकायतें रखता है ...ईश्वर से कभी कोई शिकायत नहीं रखता ..:)) जैसे एक माँ अपने बच्चे से ..कभी कोई शिकायत नहीं रखती ...वो बस प्रेम करती है ...!
पर क्या ...इंसान इस ईश्वरीय प्रेम से खुद को तृप्त कर पाता है ..? थोडा ..ध्यान से सोचियेगा ...
इंसान को इंसान से ही प्रेम चाहिए ...और जिद यही की ..उस प्रेम में उसे ईश्वरीय आनंद की अनुभूती हो ...:)) मृगमरीचिका ..:))
पल भर के लिए ...यह आनंद मिल सकता है ..बशर्ते ...वह प्रेम एक त्याग / समर्पण / कुर्बानी के आधार पर खडा हो ...और उस त्याग / समर्पण / कुर्बानी की महता हो ...!
जैसे हम ईश्वर के सामने बिलकुल अपनी नंगी आत्मा लेकर खड़े होते हैं ...ठीक उसी प्रकार ..एक इंसान दुसरे इंसान के सामने ..अपने अहंकार की कुर्बानी देना चाहता है ...और जब वो अपने अहंकार की कुर्बानी देकर ..आपके सामने खड़ा हो ...ईद मिलन की तरह ..एक बार प्रेम से गला मिल के देखिये ...उसकी 'कुर्बानी' सफल हो जायेगी ..:))
फिर से एक बार ...बकरीद की शुभकामनाएं ..:))

Monday, December 24, 2012

संगमरमर में तेरे... वो निशाँ मेरे हैं ...


तन्हाईओं में तेरे... अब सारे सवाल मेरे हैं ...

चाहतों में तेरे ...सारे ख्याल मेरे हैं ...
संगमरमर में तेरे... वो निशाँ मेरे हैं ...
पिघलते रूह के ...चश्म - ए - सैलाब में 
... जब तुम देखते हो...मुझे यकीन है....

...वहां सिर्फ हम ही हम हैं .........
 ~~ RR

१६ दिसंबर - २०१२
 
कभी पूछना चाँद से 
वो पिघलता क्यों है ...
कभी पूछना आसमान से 
वो झुकता क्यों है ..
कभी पूछना गुलाब से 
वो महकता क्यों है ...
कभी पूछना सूरज से 
वो तपता क्यों है ...
कभी पूछना रात से 
वो इतना जागता क्यों है ...

कभी पूछना अपने दिल से
उसमे बसता कौन है ..
कभी पूछना अपने ख्वाबों से
उसमे आता कौन है ...

कभी पूछना अपने खुदा से
वो रहता कहाँ है ... :))
~~ RR



१४-१५ अक्टूबर , २०१२
ऐरावत से न पूछना ....तुम इतने विशाल क्यों हो ...
शिव न पूछना ...तुम नीलकंठ क्यों हो ...
दुर्गा से न पूछना ...तेरी शक्ती कहाँ से आयी ...
मुझसे न पूछना ...मेरी भक्ती कहाँ से आयी ...
~~RR


१ अगस्त - २०१२

उस चाँद को कैसे आदाब करूँ ...
जो पास आकार भी बादलों की ओट में छुप गया ....
उस चांदनी में कैसे खुद को जगमगाऊं....
जो पास आकार भी बादलों में बिखर गयी .....
~~RR

१ अगस्त - २०१२ 

कब माँगा तुझको तुझसे 
कब माँगा तुझको रब से 
माँगा तो ...कुछ 
तेरे एहसास खुद के लिए 
तेरी धडकन खुद के लिए 
तेरी चाहत खुद के लिए 
कब माँगा तुझको तुझसे 
कब माँगा तुझको रब से 
माँगा तो ...कुछ 
तेरी वफाई खुद के लिए 
तेरा जागना खुद के लिए 
तेरे ख्याल खुद के लिए 
बोलो 
कब माँगा तुझको तुझसे 
कब माँगा तुझको रब से 
~~ RR




शब्द चोट देते हैं ! शब्द मरहम लगाते हैं ! शब्द तुम्हारे पास खिंच लाते हैं ! शब्द तुमसे दूर ले जाते हैं ! लाल सूरज से लेकर चमकते चाँद तक मेरे शब्द ....अमावास की रात सितारों से जगमाते हमारे शब्द ... ...जो शब्द तुम्हे पसंद हो खुद ही चुन लेना ..कुछ मैंने भी चुने हैं ...कुछ तुम भी चुन लो ...

~~ रंजन 

Friday, December 21, 2012

सारी रात मेरे शब्द जलते रहे ...तुम पत्थर से मोम बनते रहे


२२  फरवरी - २०१२ 

इश्क एक ख़ूबसूरत एहसास है ! मन एक शांत झील की तरह है – तुम्हारी खुबसूरत निगाहें उस पत्थर की तरह हैं जो झील में जाते ही ‘इश्क’ की तरंग पैदा करती है – मै झील के किनारे से उन तरगों को देख खुश हो जाता हूँ – फिर वो तरंग खुद ब खुद शांत हो जाती है – फिर झील के दूसरे किनारे से किसी और ने एक पत्थर फेंक दिया ..ये क्या हुआ ..कह कर झील से दूर चला जाता हूँ .....बहुत दूर ..उस पर्वत पर् ..जहाँ से कोई झील नज़र ना आये ....

२३ फरवरी - २०१२

किसी सुनसान जगह पर् बनी एक मंदिर के बड़े चबूतरे पर् सो जाने को मन करता है ! नीचे से हल्की ठण्ड मिलती रहे और ऊपर से सूरज की गर्मी ! धूप जब आँखों को बर्दास्त न् हो फिर बगल के बरगद के नीचे बेफिक्र होकर सुस्ताने को जी चाहता है ! फिर अचानक उठ उन खेतों की हरियाली के बीच बिना किसी सफर के भी चलते जाने को मन करता है ! 
इस् अन्जान शहर में अन्जान चेहरों के बीच अपनी एक पहचान बनाते बनाते थक गया हूँ ! अजीब शहर है ! सुबह से शाम हो जाती है - उन अन्जान लोगों से एक रिश्ता बनाने में - फिर अगली सुबह वो फिर से अन्जान नज़र आते हैं ! यह खेल रोज का हो गया है - अब इस् खेल से मन घबराता है !

२३ फरवरी - २०१२ 

सारी रात मेरे शब्द जलते रहे ...तुम पत्थर से मोम बनते रहे .....

२५ फरवरी - २०१२ 

जाओ ..सितारों से कह दो ..आज पूनम की रात है ...

२५ फरवरी - २०१२

चमकते चाँद के घमंड को देख - सूरज रात में क्या सोचता होगा ?? करवटें बदल बदल सुबह का इंतज़ार करता होगा :-)

७ मार्च - २०१२

आज चाँद बेहद ख़ूबसूरत नज़र आ रहा है - एक बार देखा तो देखता ही रह गया ! सफ़ेद - सफ़ेद ! दिल कहता है - उस सफ़ेद चाँद को रंग में भिंगों दूँ ...हरा - नीला - पीला - लाल - गुलाबी ..कल होली है ...कल चाँद सतरंगी हो जायेगा ..

११ मार्च - २०१२

बहुत कुछ लिखने को दिल करता है - पर् मालूम नहीं कब वो शब्द आपस में मिलकर तुम्हारी तस्वीर बना देते है -जैसे मेरे शब्दों को सब कुछ पता है - फिर मेरे शब्दों से बनी तुम्हारी तस्वीर बोंल उठती हो ..कहती हो  ..कुछ देर और मुझे चादर में ही रहने दो ..
१२ मार्च - २०१२ 
ए उम्र थोडा धीरे चलो ना ...तुम्हारे साथ दौड़ते - दौड़ते थक गया हूँ ..तेरी तेज रफ़्तार मुझे बेदम कर देती हैं ..देखो ना ..जीवन के इस् खूबसूरत मोड़ पर् कितना बढ़िया नज़ारा ..तू आगे बढ़ ..मै यहीं थोडा रुक जाता हूँ ..मालूम नहीं तू कब बोंल दे ...सफर अब खत्म हुआ ..ए उम्र थोडा रुक ..न् !

१५ मार्च - २०१२ 

बर्फ पर् वो तस्वीर बनाने चला था ..........पिघल गयी ....

२४ मार्च - २०१२

आदमी विचित्र जानवर है ! जिस प्रकृति ने उसको जन्म दिया - वो ताउम्र उसी प्रकृति से लड़ता है - खुद को खुद में ही कैद कर लेता है - फिर खुद से लड़ता है - फिर एक दिन इसी प्रकृति को खुद को सौंप - विदा हो जाता है - पर् लड़ता जरुर है - बिना लड़े उसे चैन नहीं - लड़ते लड़ते जब दम घूंटने लगता है तो वो अपनी प्रकृति को खोजता है - पर् वो भी क्षण भर के लिये-फिर उस क्षण के लिये अपना सब कुछ दाँव पर् लगा देता है - इस् लड़ाई में जो कुछ जीता - वो एक तरफ और वो क्षण एक तरफ - फिर हर एक क्षण के लिये तरसता है - प्रकृति हँसती है - हँस के आदमी को अपने गोद सुला लेती है - कहती है - आदमी हो - ये लड़ाई तुम्हारे वश का नहीं - आओ ..फिर से उसी प्रकृति में समा जाओ -
कभी आपने जाना ? आपकी प्रकृति क्या कहती है ? :))
~ RR

२५ मार्च - २०१२

पत्थरों को सिर्फ कागजों पर् ही पिघलते देखा है ....
~ RR

" जब हम सितारों से मिलेंगे ...उस तन्हा चाँद को भी याद करेंगे ...." 
~ RR

२९ मार्च - २०१२

यादों के कब्र पर् ....अब तेरे नाम का भी एक दीया जला करेगा ....
~ RR
३१ मार्च - २०१२

"तेरे रूह की खुशबू से तरबतर इस् कलम पर् कुछ हक तो तेरा भी बनता है "
~ RR
८ अप्रैल -२०१२ 
जब कभी जी भर के देखना चाहा ...
एहसास - ए - जुर्म हुआ ..
~ RR

१६ अप्रैल - २०१२ 

एक जागती "भोर" से ज्यादा ताजगी कहीं नहीं है .....और एक ढलती 'सांझ' से खुबसूरत कोई नहीं है ...
~ RR

२२ अप्रैल - २०१२ 

तेरे दिए हुए ..दर्द की स्याही सूख चली है ..अब कलम कुछ और ही लिखते हैं ..
~ RR
२० मई - २०१२ 
एक दीवार कमज़ोर दिखता है ! दरार आ गयी है ! हर सुबह उस दरार पर् नज़र पड़ जाती है ! फिर दिन भर काम धंधे में इतना व्यस्त हो जाता हूँ - उस दरार को भूल जाता हूँ ! फिर शाम वही दरार फिर से नज़र आ जाती है ! उस दरार और दीवार को देखते देखते रात गुजर जाती है !
इस् दीवार पर् एक इमारत खड़ी है और इमारत के छत के नीचे मेरी जिंदगी बसर करती है !

२८ जून - २०१२

पत्थर तो पिघल जायेगा ..लेकिन मोम सा मेरा दिल ..तेरे सीने में जल के राख हो जायेगा ..
@RR

९ जुलाई - २०१२
फकीरी से बड़ी बादशाहत क्या होगी ? 
@RR

१० जुलाई - २०१२
आज भी याद है ...बस की खिडकी से आती ...बारिश की तेज बुँदे ...तुम्हारा खिडकी से हाथ निकाल उन बूदों को महसूस करना ...फिर एक तिरछी नज़र ..और फिर मेरी झुकी नज़र ..जैसे मैंने कुछ देखा ही नहीं ....बस उन बूदों को तुम्हारे साथ मैंने भी महसूस किया था !
आज फिर बारिश हुई है ...जब मैंने अपने तलहटी को बालकोनी से बाहर किया ...दो बूँद टपक पड़े थे ...शायद तुमने भी महसूस किया होगा ..!
@ RR
१० जुलाई - २०१२
जब अपनी मिट्टी पुकारती है ....जब अपना लहू बुलाता है ....दूर ...दूर कहीं बैठा आदमी सारे बंधन तोड़ चला आता है !
@RR


Sunday, July 22, 2012

धन्यवाद ...आप सभी का !

आजकल फेसबुक पर लिखने लगा हूँ ! वहाँ बहुत कम शब्दों में ही लिखना पड़ता है - लोगों के पास समय कम है - उन्हें कुछ क्रिस्पी चाहिए - पढ़े - लाइक बटन दबाये और चल दिए ! मालूम नहीं मेरे शब्द कितनो को याद रहता है - पर मुझे लिखना पसंद है - शब्दकोष कमज़ोर है - इसलिए थोड़ी दिक्कत होती है !

अब सोचा हूँ - अगर इतवार को फुर्सत रहा तो - यहीं ब्लॉग पर लिखूंगा - कम शब्दों में लोग बातों को समझ नहीं पाते हैं - जिसको फुर्सत होगा वो यहाँ आकर पढ़ लेगा !

हिंदी साहित्य एक बचपन से ही पसंद है ! रांची में रहता था - कभी कभी मौसी के साथ इटकी चला जाता लौटते वक्त फिरायालाल चौक पर एक पोप्पिंस और एक पराग ! अम्पक - चम्पक / चाचा चौधरी लगभग नहीं पढ़ा - उम्र सात - आठ साल रही होगी !

ननिहाल में साहित्य का चलन था - प्लस टू में था तो करीब आठ - दस साल बाद एक मामूजान के यामाहा मोटरसाइकिल पर लटक कर - ननिहाल गया था - गाँव - हैरान था - माँ के बचपन का 'पराग' और ढेर सारी पत्रिकाएं - माँ ने खुद हिंदी साहित्य से हैं और संगीत से भी उनका जुडाव रहा है - तानपुरा बजाती थी -  बड़ा तानपुरा देखा है मैंने - ननिहाल के खंडहर में ! पर माँ ने मुझे कोई ट्रेनिंग नहीं दिया - कुछ आया होगा उनसे तो वो 'खून' से ही आया होगा ! ननिहाल बुरी तरह बर्बाद / खत्म हो चुका है - लिख नहीं सकता - किसी से कह नहीं सकता - दर्द और दुःख दोनों है ! मेरे जेनेरेशन में कुछ पढ़ लिख कर - देश विदेश में नाम कमा रहे हैं - पर उन बच्चों से मेरा अपना कोई व्यक्तिगत लगाव नहीं है - ननिहाल / ममहर - तभी तक जब तक नाना - नानी / मामा ! बस ! पर आधा खून तो वहीँ का है ..न ...वो तो बोलेगा ही ! खून नहीं बोलेगा तो क्या पानी बोलेगा ?? :))

मुजफ्फरपुर में रहने के दौरान - बाबु जी एक बहुत बढ़िया काम किये - ढेर सारी मैग्जीन ! उसमे से एक था  - सारिका - आजभी उस साहित्य मैग्जीन की याद है ! बाबु जी भी पढते थे और हम भी ! बहुत ही कम उम्र में बड़े ही परिपक्व कहानीओं से पाला पड़ा ! छठी - सातवीं क्लास में खूब पढ़ा ! धर्मयुग / साप्ताहिक हिन्दुस्तान की कहानी / कादम्बिनी ! कुछ ऐसा ही पढ़ने का शौक मेरी बहन को भी है - दस साल पहले वो अमरीका गयी तो वहाँ कादम्बिनी खोजी - याद है - फोन पर बोली थी - भईया ..यहाँ कादम्बिनी मिल गयी ! :))

मैट्रीक की परीक्षा पास करने के बाद - याद है - बाबू जी बोले थे - पटना कॉलेज में एडमिशन ले लो - एक दिन वो काउंसेलिंग भी किये - हम कहाँ मानने वाले थे - जब आदमी जिद पर अडा हो - पाँव पर कुल्हाड़ी मारने के लिए - फिर कौन रोक सकता है ! फिर ..प्लस टू को बुरी तरह तहस नहस करने के बाद - एक मौक़ा और था - वापस आर्ट्स पढ़ने के लिए - पर नसीब में कुछ और लिखा था - जीवन के सफर को लेकर बुरी तरह डर चुका था ...इस डर में ही न जाने कितने साल सोया रहा ....जागा तब तक ...शाम हो चली है ....अब रात का भय सताता है ...!

प्लस टू में था तो एक मामा जान हैं / थे - यामहा मोटर साइकिल और हाथ में रीडर्स डाइजेस्ट ! हमको भी शौक हुआ - ताज्जुब है ..अंग्रेज़ी गोल होते हुए भी ..रीडर्स डाइजेस्ट से आज तक प्यार है ! खुशी तब होती है - जब आज के दिन रीडर्स डाइजेस्ट आता है - पुत्र महोदय भी उसी चाव से पढते हैं !

कॉलेज के जमाने पास - फेल में ही व्यस्त रहा ! अंतिम वर्ष में 'निखरने' का मौका मिला - एक गीत खुद से लिखा - बाबा सहगल का प्रभाव था - वो भी इंजिनियर थे - फिर क्या 'धूम' ! अत्लाफ असलम को देख वो सारे दृश्य याद आते हैं ! वो एक स्टारडम था - कुछ पल का - शोर - वन्स मोर का - आप सफ़ेद फ्लोपी शर्ट - काला जींस - काला वेस्ट कोट पहन स्टेज से कूदते हैं - जिससे आज तक कभी नैनो को छोड़ बात नहीं किया - उसका जुबान पहली और अंतिम दफा खुलता है - वन्स मोर ..मेरे लिए ! कहानी समाप्त !

शादी विवाह / नौकरी छोड़ भगोरा / बिजनेस डूब जाना - परेशान हो गया था - पिता जी का प्रेशर - उनका इज्जत - दस साल पहले नॉएडा आ गया ! उस साल एक बढ़िया काम हुआ - एक नया कंप्यूटर मेरे केबिन में लग गया - मालूम नहीं मेरे तब के एच ओ डी मुझे क्यूँ बहुत मानते थे - किसी से उनको कहते सुना था - रंजन इज अ हम्बल गाई ..वेरी सोबर ...! :( नो आइडिया ! इंटरनेट से जुडा था - पर यहाँ तब ढेर सारे याहूग्रुप से जुड गया ! कुछ बदमाशी सूझी = मैंने अपना आईडी "मुखिया जी" रखा ! फिर ..धडाम ..धडाम मेल लिखने लगा ...मेरे गहरे मित्र 'सर्वेश उपाध्याय' ने एक दिन मुझसे कहा ....रंजन जी ..उस दौर में ..आपके मेल पढ़ने के पहले ..लोग हनुमान चालीसा पढ़ लिया करते थे ! हा हा हा ...सर्वेश खुद कई ग्रुप के मोडरेटर होते थे ...मुझे ब्लोक करते करते थक चुके थे ...पर दोस्ती और एक दूसरे के लिए बहुत आदर और स्नेह ..टचवूड !

इसी बीच ..मैंने 'लोहा सिंह - रामेश्वर सिंह कश्यप' से मिलाता जुलता कुछ लिखा - रोमन लिपि में - हिंदी में - संजीव कुमार राय भैया बहुत पसंद किये - पीठ ठोक दिए ! वो खुद साहित्य के प्रेमी हैं ...! फिर मैंने एक कहानी लिखी - 'विजय बाबु की कहानी' जो  अमरीका के सुलेखा डॉट कौम पर आया - पर रोमन लिपि में ही था - कितनो को पसंद आया - पता नहीं ! फिर दूसरी कहानी - टूनटून बाबु की कहानी - फिर संजीव भैया पीठ थपथपा दिए ! फिर होली दीपावली छठ को लेकर लिखने लगा - याहूग्रुप पर - एक दिन लिखा - मैट्रीक परीक्षा पर - संजीव भैया को भेज दिया - उधर से जबाब आया - देवनागिरी में लिखो - ब्लॉग खुल गया :))

ब्लॉग खुलने के बाद - सर्वेश जी और संजय शर्मा भैया जी तोड़ मेहनत किये - कैसे इसकी लोकप्रियता बढाई जाए :)) सच में - दालान उनलोगों का कर्ज़दार है - संजय भैया खुद भी बहुत बढ़िया लिखते हैं - सहारा में काम करते हैं - साहित्य को बहुत पढ़े हैं !

फेसबुक को समझते - समझते में ही दो आईडी बर्बाद हो गए :( जब समझ में आया - सावधान हो गया ! दो साल पहले मैने  एक सीरीज शुरू की - 'मेरा गाँव - मेरा देस' ! पहला पोस्ट में ही देश के विख्यात पत्रकार 'विनोद दुआ' साहब फेसबुक पर कमेन्ट कर गए - बहुत बढ़िया लिखते हो - खूब लिखो ! यह कमेन्ट एक जादू था - आप अपने परिवार के बारे में लिख रहे हैं और आपका पीठ ऐसा आदमी थपथपा रहा है - जिसको टीवी पर देख आप बड़े हुए हैं ! आज भी मेरी नज़र में वो टीवी के हिंदी में सबसे बढ़िया पत्रकार हैं - पर दुर्भाग्य वश - मै उनसे उलझ गया - दुःख है पर मेरे पास कोई और चारा नहीं था ! पर सर मै आज भी आपकी बहुत इज्जत करता हूँ !

फिर पटना के हिन्दुस्तान दैनिक समाचार पत्र ने पटना में एक परिचर्चा की - वहाँ के पत्रकार 'प्रशांत कक्कर ' जी ने मुझे भी न्योता भेजा - कमलेश वर्मा सर ने मेरी बातों को छाप दिया - मेरा शहर मुझे लौटा दो :)) पुरे एक पेज में !

यह एक आम आदमी की सोच है - कोई भी आम इंसान खुद को अखबार में देख खुश होना लाजिमी है - जब तक उस परिचर्चा में शहर के नामी गिरामी लोगों के साथ बैठे हों और संपादक आपके शब्दों को ऊपर उठा दे - अजीब सी अनुभूती होती है !

रवीश कुमार उनदिनो दिल्ली हिंदुस्तान के लिए लिखते थे - एक दिन वो भी छाप दिए ! गौरव की बात थी ! फिर एक दिन - कमलेश सर का फोन आया मुझसे दालान के बारे में कुछ पूछे - अगले दिन पटना के प्रथम पृष्ठ पर - दालान की चर्चा - रवीश कुमार के ब्लॉग के बाद दूसरा सबसे लोकप्रिय ! अब मेरे लिए रुकना मुश्किल था - लिखता गया - आम लोगों की कहानी - लोग खुद को मेरे शब्दों में खोजने लगे !

छठ पूजा के दौरान - मैंने छठ पूजा पर लिखा - लिखते - लिखते रोने लगा - लिखता गया ! फिर शांत मन से पोस्ट किया - शैलेन्द्र भारद्वाज सर का कमेन्ट आया - साक्षात सरस्वती आपके कलम पर हैं ! यह एक ऐसा कमेन्ट था - जिसे किसी भी मेरे जैसे आम आदमी के लिए भूलना मुश्किल है - शैलेन्द्र भारद्वाज सर खुद हिंदी के जानकार हैं और हिंदी में ही यूपीएससी कम्पीट किये ! बेहद शालीन व्यक्तित्व ! छठ वाले पोस्ट को पढ़ - पत्नी भी रोने लगी थी - तब मुझे समझ में आया था - शब्द कहाँ तक पहुँच सकते हैं !

'मेरा गाँव - मेरा देस' को लेकर कुछ नेगेटिव प्रतिक्रिया भी आई - फिर लिखना कम हो गया ! खुद के लिखे शब्दों को मशहूर करने का फेसबुक ही एक जरिया था / है - पर वहाँ लोग कम समय के कारण - लिंक कम खोलते हैं - सो छोटा - छोटा लिखने लगा ! कई बात समझने के लिए - लोगों के ऊपर ही छोड़ देता हूँ !

गाँव में घुमने वाले जोगी और उनकी माँ के दर्द को लेकर बहुत कम शब्दों में कुछ लिखा था - कई लोग पसंद किये - उसपर एक कहानी भी लिखी जा चुकी है - इस पर चर्चा बाद में ...पर बेहद खुशी हुई / है !

संकोची हूँ - बहुत कुछ खुल कर नहीं लिख पाता - सिवाय झगडा होने पर - एक पत्थर उठा के देखिये - अभी पत्थर आपके हाथ में ही रहेगा - इधर से इतनी बौछार होगी की ...आप भूल जायेंगे ..ये वही 'सोबर आदमी' है - संकोची ! इस चक्कर में कई बढ़िया रिश्ता खराब हो जाता है :((

खैर ..आदमी हर वक्त क्रिएटिव नहीं रह सकता ..सो कभी कभी बहुत बेकार लिखना पड़ता है - समाज है - समाज में हर तरह के लोग होते हैं - और 'दालान' का दायरा बहुत बड़ा है !

पर अन्तोगत्वा ..मेरे जैसे लेखक को ...टीआरपी चाहिए ...प्रशंशक चाहिए ....प्रसंशा / पैसा सबको पसंद है ....मै कोई अपवाद नहीं !


करीब चार महीनो बाद लंबा पोस्ट लिख रहा हूँ ..मालूम नहीं ...इन्स्टैंट राइटर हूँ ...बिना कुछ सोचे समझे ...एक सांस में लिख देता हूँ ...संडे है ..फुर्सत मिले तो ..एक लाइक / कमेन्ट :))


दालान - इंदिरापुरम !