Saturday, September 27, 2014

नवरात्र - २०१३ ( Navratra )


"शक्ती"

                                                                  
आज महालया है ! देवी भक्त उनका आह्वान करेंगे ! अमावास की रात उनको पुकारेंगे ! अगले दस दिन देवी कई रूप में आयेंगी - जिस रूप की कल्पना एवं आह्वान आपने किया है - वही रूप / आकार आपके मन में बैठ जायेगा - उसी रूप की पूजा आप अपने मन से करेंगे ! 

शक्ती में भी कोमलता है या फिर कोमलता भी शक्ती हो सकती है - हम और आप सिर्फ व्याख्या ही कर सकते हैं - इन सबों से ऊपर होता है - श्रद्धा / भाव - जहाँ सारे शब्द एक तरफ और आपके मन में क्या है वो एक तरफ ! सारा खेल तो इसी मन का ही है - चलिए ..फिर एक बार मन से देवी का आह्वान करते हैं ...जीवन है ...उबड़ - खाबड़ / टेढ़े - मेढ़े रास्ते और लोग मिलते रहेंगे ...हम कितने मजबूत हैं...यानी हमारा मन कितना मजबूत ..सबकुछ इसी पर निर्भर करेगा ...:)) 
महालया की शुभकामनाएं !!! ...:)) 

~ 4 October 2013 



नवरात्र की शुभकामनाएं ....:)) 
नवरात्र के साथ ही शीत ऋतू के वसंत का आगमन होता है ...सुबह की हल्की ठंडी बयार भी आपके मन को एकाग्रचित करने में मदद करती है ! शक्ति की आराधना और फिर शक्ती को पाना - पूर्ण शक्ति का एहसास ही आपको अन्दर से 'कोमल - निर्मल - शांत - शीतल' बनाता है ! यह प्रक्रिया आसान नहीं है - सबसे कमज़ोर मन होता है या सबसे मजबूत मन ही होता है - जब सारी शक्ति इस मन में आकर समा जाती है - जब हम सचमुच में पूर्ण शक्ति का एहसास करते हैं - यह एहसास ही अपने आप पूर्ण है ! 
हम सभी एक भौतिक दुनिया में रहते हैं - जहाँ मन हमेशा चंचल है - स्नान ध्यान / पूजा पाठ / ईश्वर का रूप - आकार / धुप - अगरबत्ती - यह सब कुछ इस कमज़ोर / चंचल / मजबूत मन को एकाग्र करने को ही बनाया गया है ! 
और जब मन शांत होता है - मन निर्मल होता है - मन कोमल होता है - मन शीतल होता है - मन एकाग्र होता है - मन केन्द्रित होता है - पूर्ण शक्ति वहीँ विराजमान होती हैं ! 
कहते हैं ..न ..मन से पुकार लो ...शक्ति का दर्शन / एहसास हो जायेगा ...:)) 
~ 5 October 2013 

धर्म एक विशुद्ध फिलोसोफी है - जीवन को जीने का आधार ! जीवन में मजबूत और कमज़ोर दोनों तरह के समय आते हैं - मजबूत इंसान वही है जो इन दोनों समय में धर्म को जीवन दर्शन समझ खुद को मजबूत बनाए रखे ! 
ईश्वर तो एक ही है - यह सत्य है ! आम इंसानों के वश का बात नहीं जो बिना आकार वाले एक सत्य को स्वीकार कर सके ! जब यह सत्य आप स्वीकार कर लेंगे - कई चीज़ों से ऊपर उठ सकते हैं - मसलन लिंग / जाति इत्यादी ! 
पर जीना तो हमें इस धरती पर ही एक आम इंसान के रूप में है - फिर हमें एक 'जीवन दर्शन' चाहिए ! यहाँ धर्म हमें सहारा देता है ! 
इस नवरात्र हम शक्ति की पूजा करते हैं - शक्ति के हर रूप की पूजा करते हैं - जहाँ कहीं भी हमें शक्ति का आभास हुआ - उसको हमने पूज दिया ! और यह प्रक्रिया सिर्फ एक दिन की नहीं है - हज़ारों साल से चली आ रही इस प्रक्रिया में हम आप जैसे लोग कुछ न कुछ जोड़ते चले आ रहे हैं ! 
दरअसल यह पूजा 'स्त्री के स्वाभिमान' की होती है - प्रकृती ने पुरुष को बलशाली बनाया - उसको भक्षक बनाया - उसको रक्षक भी बनाया - फिर 'स्त्री के स्वाभिमान' की रक्षा का कर्तव्य / धर्म भी उसका ही है ! महिषासुर भक्षक प्रवृती को दर्शाता है - वहीं वो सारे देव जिन्होंने 'दुर्गा' को सजाया - वह एक रक्षक प्रवृती को दिखाता है ! 
पर पुरुष तो बलशाली है - अहंकारी है - स्त्री को पुजेगा - उसके स्वाभिमान की रक्षा भी करेगा - पर ...किस रूप में ..:)) ? कौन से रूप के आगे वो नतमस्तक होगा ? ...जब स्त्री उसके जीवन में एक माँ के रूप में आती है ....बात यहाँ कोख की नहीं है ...कहते हैं ..न ...एक पत्नी / प्रेमिका को अपने पुरुष के लिए वो सारे रूप दिखाने होते है ...और अंत में माँ के रूप में भी ..आकर ...पुरुष को हमेशा के लिए झुका देना होता है ...और जब तक अहंकार नतमस्तक नहीं हुआ ...पूजा तो शुरू ही नहीं हुई ....:))

~ 6 October 2013 


..तो बात हो रही थी ... मन / ईश्वर / शक्ति की ...अब 'शक्ति' शब्द ही स्त्रीलिंग है ...फिर क्या उपाय है ...अब उस शक्ति को पूजना है तो अहंकार / बल को तो उस 'शक्ति' के चरणों में डालना ही होगा ...शक्ति आपके अन्दर समाए ...फिर आपको तो शिव बनना ही होगा ...:)) 
अब यह शक्ति कहाँ रहती है ? आपकी भुजाओं में ? आपकी इन्द्रीओं में ? मालूम नहीं - पर असल शक्ति तो 'मन' में ही रहती है - और जब 'मन में शक्ति' नहीं - सारे बल / कौशल / विद्या धरे के धरे रह जाते हैं ...सिनेमा तो देखते ही होंगे ...सीता और गीता / राम और श्याम टाईप - एक ही कोख से - एक ही समय में - जन्मे दो इंसान - एक का मन मजबूत तो उसके तेवर अलग और दुसरे का मन कमज़ोर तो उसका तेवर अलग  

इसी बात पर एक दोस्त ने एक कहानी सुनायी थी - कैसे हाथी के मन को भी कमज़ोर कर दिया जाता है - हाथी को फंसाने के बाद - उसे जंजीर से लपेटा जाता है - फिर जब वो बंधन तोड़ पाने में असफल हो जाता है - उसका मन कमज़ोर हो जाता है - उसे एक पतले रस्सी से भी बाँधा जा सकता है - उतना बलशाली हाथी भी अपना मन हार - कभी भी उस रस्सी / पतले सिकड़ को तोड़ नहीं पाता है ..:(( 
अब आप जीवन को कैसे देखते हैं - यह पुरी तरह इस पर निर्भर करता है - आप कितनी उंचाई पर हैं - जैसे पेरिस के एफिल टावर के पहली मंजिल से दुनिया अलग ढंग की नज़र आयेगी - उपरी छोर से एक विहंगम दृश्य नज़र आएगा - अगर आपको उस विहंगम दृश्य का नज़ारा लेना है - खुद को ऊपर की तरफ खींचना होगा - इसके लिए - फिर से आपको "शक्ति" की जरुरत पड़ेगी ! शायद ...मन की शक्ति को ही आत्म विश्वास कहते हैं ...आत्म विश्वास बनाये रखिये ...एक दिन वो विहंगम दृश्य भी नज़र आएगा ...और आप भाव विह्वल हो जायेंगे ...उसी दृश्य की कामना कर के - हम सभी एक अनजान शक्ति के चरणों में खुद को 'समर्पित' कर देते हैं ...!!! 
और 'शक्ति' एक स्त्रीलिंग शब्द है ...एक आशीर्वाद की तमन्ना कीजिए ...मन खुद ही प्रफुल्लित हो जायेगा ...और जब मन प्रफुल्लित हो जाए ...समझ लीजिये ..आशीर्वाद मिल चूका ....अब आगे बढिए ...जीवन के संघर्ष में झूज जाईये ....:))

~ 7 October 2013 


शक्ति मनुष्य का वो अंश है जो उसे उर्जा से पूर्ण और निडर बनाती है. हमारे धर्म मे इसे 'स्त्री' रूप या 'देवी ' रूप मे क्यों पूजा जाता है ये मुझे नही मालूम.
विनाश के विक्राल रूप मे 'काली' और 'चंडी' ,बलशाली दानव पर विजय पाने के लिये 'दुर्गा' का रूप दर्शाया जाता है....
शक्ति अपना कार्य कर के फिर से शिव मे समा जाती है ....
शिव फिर से ध्यान मग्न हो जाते है...
बचपन की यादों मे कुछ ऐसा ही समझाया गया,जहाँ तक मुझे याद है !!! 
गाँव घर में भी यही देखा - कुल देवी भी 'शक्ति' रूप में ही - मेरे परिवार की कुलदेवी 'परमेश्वरी' है - जिन्हें हम 'भंसा घर' ( किचेन ) में रखते हैं - हर शादी विवाह / जनेऊ में उनकी पूजा होती है ! सब कुछ एक तरफ 'कुलदेवी' की इज्ज़त / मर्यादा एक तरफ ! यही तो एक बचपन से हमने देखा और सूना है ! 
जैसा की मैंने पिछले साल भी लिखा था - हर पुरुष की आकांक्षा होती है - दुर्गा - लक्ष्मी - सरस्वती - तीनो की शक्ति को अपने अन्दर समा सके - पर इन तीनो को संभाल पाना - किसी भी पुरुष के लिए संभव नहीं - शायद देवों के लिए भी नहीं - उतनी श्रद्धा और विशालता लाना संभव ही नहीं ....और यहीं आजीवन हम इन्ही के इर्द गिर्द घूमते रह जाते हैं ...:)) 
~ 8 October 2013 

आज नवरात्र का पांचवा दिन है - आज के दिन 'स्कन्दमाता' की पूजा होती है - जो सिंह पर सवार हैं और उनके गोद में स्कन्दकुमार बैठे हुए हैं ! यह 'शक्ति' का ममतामयी रूप है और 'स्कन्दमाता' को ज्ञान की देवी भी कहा जाता है - कई कहानी और मिथ्य है - कहते हैं शक्ति के इसी रूप की आराधना कर के 'कालीदास' ने रघुवंशम एवं मेघदूत की रचना की ! विधोतमा ने जरुर ही किसी 'शुभ घड़ी' कालीदास को धिक्कारा होगा ..:)) 
शक्ति के कई रूप है - अनन्त ! सोचने की शक्ति - समझने की शक्ति - याद करने की शक्ति - लिखने की शक्ति - किसी के मन को पढ़ लेने की शक्ति मालूम नहीं क्या क्या और कहाँ नहीं - अपमान सहने की भी शक्ति ...:)) 
नर यो या नारी - हर इंसान अन्दर से पूर्ण होना चाहता है - इसी पूर्णता को पाने की चाहत में वो 'शक्ति' का आह्वान करता है - कई बार वो उसे पा भी लेता है - एक तपस्या है - पर 'शक्ति' का दुरूपयोग इंसान को क्षण भर में शक्तिविहीन भी बना देता है ...
और वो इंसान ही इंसान क्या ...जिसे अपने 'शक्ति' का 'अहंकार' नहीं ...और दुर्गा का आहार ..मनुष्य का अहंकार ही तो है ...:)) 
~ 9 October 2013 

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
आज नवरात्र के छठे दिन 'माँ कात्यायनी' की पूजा होती है ! कहते हैं - माँ अपने पिता के घर जन्म लेने के बाद ..पति के गोत्र को न अपना कर अपने पिता के गोत्र को अपनाया - संभवतः यह 'पिता पुत्री' के बीच के उस भावुक सम्बन्ध को दर्शाता है - जिसे सिर्फ एक पिता और पुत्री ही समझ सकते हैं ! 
आप हिन्दू धर्म की कथाओं को पढ़ें - तब भी एक समाज होता था - ऋषी - मुनि / राजा / देव / असुर ....कहीं न कहीं ..कई कथाओं में ...एक पिता भी होता था ..! मैंने कई बार लिखा है ...जब 'सीता' की अग्नी परीक्षा हो रही होगी ...तब अगर जनक जिन्दा होंगे ..उनपर क्या गुज़री होगी ..! 
जैसा की मैंने कल भी लिखा - इंसान सम्पूर्णता की तरफ बढ़ना चाहता है - भावनाओं की भी सम्पूर्णता होती है - उसी में एक भाव है - एक पुत्री का पिता होना और उस पुत्री को 'देवी' रूप में पूजन - यह पूजन किसी मंदिर में नहीं होता - यह एक पुरुष अपने मन में करता है और हर पल करता है ! 
मैंने गरीब से गरीब और अमीर से अमीर के यहाँ भी देखा - पिता - पुत्री के बीच भावनाओं का एक जबरदस्त बंधन - बिना कुछ कहे - बिना कुछ बोले - अपनी पुत्री की बात समझ लेना या अपने पिता की बात को समझ लेना ! 
पुत्र अपने पिता के तरफ उंगली उठा कई बातें कह सकता है - पर एक पुत्री ....जो उसे 'खोईंचा' में मिला ...आजीवन उसे बिना किसी शिकायत अपने पास रखती है ! 
मैंने अपने व्यक्तिगत जीवन में किसी भी पुत्री को अपने पिता से कोई शिकायत होते नहीं देखा है - कभी नहीं - और फिर एक बार 'देवी के इस रूप' के आगे .....पुरुष का अहंकार नतमस्तक होता है .....
और क्या लिखें ....
~ 10 October 2013 
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
हे देवी ...हमें सभी तरह के भय से मुक्त करो ... !! 
आज महासप्तमी ....देवी का नेत्रपट खुल गया ...
विराट ! मनोरम ! श्रद्धा ! विशाल ! भव्य !!! 
जैसे इस रूप का ही इंतज़ार था ! देखते ही ..खुशी से मन ...कोई भय नहीं ...मोटी काजलों से अपनी तरफ एक जबरदस्त आकर्षण पैदा करती वो आँखें ....जहाँ आप क्षण मात्र भी ठहर नहीं सकते ! विशाल रूप ....जैसे सभी देव स्तुति में लग गए ...धुप की खुशबू से पूरा पंडाल भर गया होगा ...आरती के वक्त ...श्रद्धा से पुरे शरीर में सिहरन ! देवी को साष्टांग दंडवत ! 
"शक्ति का पट तो खुल गया ...पर इनका ये विशाल रूप में स्वागत कौन करेगा ...किसकी हिम्मत जो इनके पास जाए ...इन्ही का कोई रूप जायेगा ..घर की महिलायें.. ..निकल गयी होंगी ...देवी के स्वागत में ..उस भव्य रूप के स्वागत में " - हम तो बस दूर से ..उस रूप में मंत्रमुग्ध ...
धन्य हो वो कुम्हार ...जिसने महालया के दिन ही देवी की आँखों में रंग भर दिया ...इस भव्यता ..इस रूप ..की खुशबू ..कहाँ से आई ..पूछिये उस कुम्हार से ..जिसने 'जहाँ' से मिटटी लायी ...देवी को पुजिये ....किसी भी रूप में ....वो निर्मल है ! एक पुरुष इसी भव्यता की कामना रखता है ...जहाँ वो मंत्रमुग्ध हो जाए ...अपने प्रेम को श्रद्धा से परिपूर्ण करे ...बस नज़र का फेर है ...कुम्हार की नज़र अलग है ...पुजारी की नज़र अलग है ...और मेरी नज़र अलग है ...मूरत तो एक ही है ...:))
~ 11 October 2013 
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
... हे माँ, मुझे सुख-समृद्धि प्रदान करो...
'अष्टवर्षा भवेद् गौरी' - अर्थात इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गयी है और तपस्या के कारण इनका वर्ण गौर हो गया ! 
संभवतः यही एक कारण होगा - आज इनकी 'कन्या रूप' की पूजा की जाती है ! मैंने पिछले साल भी लिखा था - हमारे यहाँ कुंवारी कन्या पूजन का प्रचलन है - हालांकी यह सृष्टी पुरुषों के अहंकार के मनमुताबिक रची गयी - फिर भी कुंवारी कन्या को पुरुष अपने से श्रेष्ठ मानता है - और संभवतः यही कारण होना चाहिए की - विवाह में - सिंदूरदान के पहले - मंडप पर कन्या वर के दाहिने तरफ बैठती है - जो हमारे सभ्यता में है - हम अपने से श्रेष्ठ को अपने दाहिने तरफ बैठाते हैं ..!
भौतिक दुनिया में 'समाज' ही सबसे उंचा है - सबसे शक्तिशाली है और समाज अपना मार्गदर्शन 'धर्म' के अनुसार करता है और समाज का संचालन 'राजनीति' करती है - जो इस भौतिक दुनिया की सबसे केन्द्रित शक्ति है !
अक्सर राजनेता देवी के जबरदस्त भक्त होते हैं - हालांकी सार्वजनिक जीवन व्यतीत करने के कारण उनके पास समय का आभाव होता है - फिर कई राजनेता देवी के किसी साधक के काफी करीब हो जाते हैं और उनके आशीर्वाद से देवी की शक्ति को प्रसाद के रूप में ग्रहित करते हैं !
..शक्ति आती है ..और शक्ति क्षीण भी होती है ..जब शक्ति का एहसास हो ..सुकर्मो से शक्ति अपनी आयु से ज्यादा दिन ठहर सकती है ..अब सुकर्म की परिभाषा 'समाज' तय करता है ..काल के हिसाब से परिभाषा बदलती रहती है ..अब आप किस काल में जन्म लिए हैं ...उस वक़्त के समाज के हिसाब से आपको अपने कर्म करने होंगे ..यह मान कर 'समाज' ही सर्वशक्तिमान है ..हर इंसान का कर्त्तव्य है ...वो जिस समाज से आता है ..उसको वो अपने कर्मो से मजबूत बनाए ..
कर्त्तव्य ही असली शक्ति है ...
~ 12 October 2013 




या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।
महानवमी !! माँ सिद्धिदात्री !! 
आज की रात माँ अपने साधकों को आठ सिद्धि - अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व से परिपूर्ण करती हैं ! इसके बाद साधक को किसी भी चीज़ की कामना नहीं रह जाती - वह खुद को पूर्ण महसूस करता है ! 
पर इस सिद्धि को पाया कौन ? किसने चेहरे पर कभी कोई कामना नज़र नहीं आयी - कभी फुर्सत में 'शिव' की कल्पना कीजिएगा - कामनाविहीन - एक शुन्य में -"शिव" !! शक्ति बगैर शिव एक शव हैं !
इस शक्ति को सच में अपने अन्दर समाहित करने के लिए - शिव बनना होगा - जो इंसान के वश में नहीं है - फिर भी हर इंसान के अन्दर से एक 'शिव' है - जो शक्ति के आने से जागता है - जो देर तक जगाये रखा - वही साधक है ...:))
प्रेम में .."शिव - शक्ति" से बड़ा कोई उदहारण नहीं है ..शिव का शक्ति के लिए बेचैन होना और शक्ति का शिव के लिए सबकुछ त्याग करना !
आसान नहीं है - इस ब्रह्माण्ड के सच को एक ही जनम में समझ लेना - तभी तो 'सात जनम' लेने पड़ते हैं ....
बढ़िया लगा ...इस नवरात्र आप सभी तक अपने मन की बात को कहना ....!!
शिव और शक्ति दोनों आप सभी के अन्दर समाहित हों ...इन्ही "शब्दों" के साथ ....
~ 13 October 2013 
रंजन ऋतुराज

Friday, September 26, 2014

बड़ी आरजू है ..

बड़ी आरजू है ..
तेरे बाज़ार में ..
बिन मोल बिक जाने की ..
बिन तौल बिक जाने की ..
हीरा भी एक पत्थर है ..
पारस भी एक पत्थर है ..
बड़ी आरजू है ..
तेरे बाज़ार में ....
एक पत्थर बन के ...
बिक जाने की ...
इश्क एक फकीरी है ...
बड़ी आरजू है ..
तेरी झोली में ..
पत्थर बन के छिप जाने की ...
हमेशा के लिए ..
तेरे हाथों बिक जाने की ...
~ RR
~ 25 October - 2013

शक्ती शिव के इर्द गिर्द घुमती हैं.....

हिन्दू माइथोलोजी विचित्र है - कोई भी भक्ती से शक्ती पा सकता है - फिर क्या ? फिर महिषासुर ..रावण ..लड़िये ... लड़ाई ..जब तक की वो एक कहानी ना बन जाए ! समुद्र मंथन में जो मिला ...देवता और दानव दोनों आपस में बाँट लिए - इंसान रह गया बीच में ....उसके अन्दर दोनों समा गए ..फंस गया इंसान ! इंसान देवता बनने की चाह पैदा करे तो उसके अन्दर का दानव अपनी शक्ती दिखा देता है ...अवकात में रहो ..देवता मत बनो ! दानव बनता है ..तो देवता उसकी शक्ती छीन लेते हैं ...इसी लड़ाई में ...एक दिन इंसान दम तोड़ ...कुल मिलाकर ...सार यही है ...जब आपको शक्ती मिले ..उसको इज्ज़त देना सीखिए ...जुबां से नहीं ...मन से ..श्रद्धा से ..वर्ना जिस गति से शक्ती आयी ...उसी गति से वापस ..
और ..शक्ती स्त्रीलिंग शब्द है ...!!!! 
और....शक्ती शिव के इर्द गिर्द घुमती हैं ...अबोध ..जिसे शक्ती का एहसास भी नहीं .... :))) 

है ..न ..विचित्र ...:))
~ १९ अक्टूबर - २०१२ 

देवता और इंसान ....

देवताओं का भी अजीब हाल है  महिषासुर के एकाग्र ध्यान से प्रसन्न होकर उसको वरदान दे दिए ...फिर सभी देवताओं को हेडेक होने लगा ..मालूम नहीं ई महिषासुर इतनी शक्ती से क्या क्या न कर बैठे ...फिर 'देवी' की पुकार ...खुद क्यों नहीं आगे आये ...देवता हो ...इंसान की तरह वर्ताव क्यों ? इंसान और राक्षस में जब पहचान ही नहीं ...फिर देवता किस बात के ? जब तुम बुरे समय में ...तुम देवता होकर भी ...देवी के पास गए ...फिर हम जब तुमको बाईपास कर के ...देवी को पुकारें ...इतनी कष्ट क्यों ? हम भी तो देवता बन सकते हैं ...
~ इंसान
~ १८ अक्टूबर - २०१२ 

श्रद्धा सुमन.....

नर्म रुई के फाहों से.....
रूह में भींगे ....
इस श्रद्धा सुमन को ...
अपने एहसासों को समर्पित करता हूँ ....
वो एहसास जहाँ एक हसीन ...
अपने ख़ूबसूरत आत्मा के साथ ..
देवी रूप में...
बैठी है ...
सिर्फ मेरे लिए ...
उसके द्वार खुले हैं ...
दीप जले हैं ...
जलाये रखेंगे ...
अखंड ज्योति को ...
~ ranju
~ १८ अक्टूबर - २०१२ 

अवकात .....


बचपन की बातें हैं - बडका भईया का छोटका साला - गुड्डू - उम्र में तीन साल बड़ा होगा - भौजी जब कभी मायके जाती - हम भी साथ हो जाते - गुड्डू 'गुड्डी' उड़ाने में उस्ताद - हम दिन भर उसके पीछे - पीछे ! गुड्डू गरमी / जाड़ा की छुट्टी में भी हमारे गाँव आता था - कभी लटटू का माहौल तो कभी 'गोली' ( कंचे ) - कभी गुल्ली - डंडा तो कभी कबड्डी ! पढ़ने में एकदम बुरबक - कहानी गढ़ने में उस्ताद - आज भी याद है - पहली दफा उसने ही झूठ बोलना सिखाया था - घर में सब कहते 'गुड्डूआ' के चक्कर में हम बर्बाद हो रहे हैं ! पास - फेल करते करते - गुड्डू भी मेरी ही क्लास में आ गया ! मैट्रिक में हम टॉप किये तो गुड्डू घींच घांच के पास ! फिर मेरे सहारे ही वो 'इंटर' किया ! मै मेडिकल स्कूल में गया और गुड्डू पास वाले इंजीनियरिंग में ! फिर हम दोनों साथ ही पास किये - गुड्डू विदेश निकल गया - मै बिहार सरकार ज्वाइन कर लिया ! फिर कभी मुलाकात नहीं हुई - यादों पर् पर्दा गिर गया ! 
एक देर रात दरवाजे पर् खट खट की आवाज़ हुई ! दरवाजा खोला तो गुड्डू - बाहर एक टैक्सी खड़ी थी - गुड्डू लाल सूट - बूट में खडा ! धम्म से मेरे सीसम वाली कुर्सी पर् बैठ गया ! हाथ में एक बड़ा सा सूटकेस था - मेरे मुह से कुछ नहीं निकल पा रहा था - फिर वो बोला - 'होटल' के लिये निकल रहा हूँ - ये सूटकेस अपने पास रखो - सुबह आकर ले लूँगा - मै बिलकुल निशब्द था - गुड्डू के रूप - हाव भाव को देखकर ! वो उसी टैक्सी से निकल गया ! 
बहुत देर तक मै गुड्डू के सूटकेस को देखता रहा - फिर थोडा नोर्मल हुआ तो गुड्डू के सूटकेस को खोलने की चाहत हुई - सोचा बंद होगा - लॉक होगा - फिर मन नहीं माना - एक ट्राई किया - अरे..ये क्या ..कोई लॉक नहीं ...धीरे से सूटकेस को दीवान पर् रखा और खोल दिया ....ये क्या ...पुरे पचास हज़ार डॉलर ...और दो चार कपडे ..बस ! मै उस खुले सूटकेस को यूँ ही छोड़ वापस कुर्सी पर् बैठ गया ...और पूरा बचपन फ्लैश बैक में दिखने लगा ! 
समझ गया ...गुड्डू ने जानबूझ कर सूटकेस को खुला रख छोड़ा था ...एक बड़ा सा आइना मेरे सामने खडा कर दिया ..जिसमे मुझे अपनी अवकात नज़र आ रही थी ...पूरी रात उसी सीसम वाली कुर्सी पर् ही निकल गयी ! 
[ यह सच्ची कहानी है ..पात्र और सम्बन्ध भी वहीँ हैं ..बस कहानी तीस - चालीस साल पुरानी है ] 
~ 9 Feb - 2012 

इक पल का इंतज़ार ......

कुछ तमन्नाएँ ...तमन्नाएँ ही रह जाएँ ... उनकी खुशबू आपके जीने का सहारा ...इत्र की उस सीसी की तरह ...जिसे देख कर ही आप खुश है ...! आप वर्षों उस इत्र को बचा के रखते हैं ...
कुछ ख्वाब ...ख्वाब ही रह जाएँ ...पर इक पल के लिए ...हकीकत ...एक तरफ वो पल और एक तरफ आपकी सारी जिन्दगी ....फिर भी वो पल इतना भारी ...जैसे जीने का मकसद ही वो इक पल था ...

हर पल ...उसी इक पल का इंतज़ार .....
~ 27 October 2012 

सिनेमा - सिनेमा

#. सिनेमा - सिनेमा 
बचपन में सिनेमा देखते थे - लगता था - हीरो गा रहा है - क्या गा रहा है - हीरोईन गा रही है - थोडा बड़ा हुए तो - पता चला ..वो कोई और गा रहा था ..लता ..मुकेश ..! मन थोड़ा उदास हुआ ...कोई बात नहीं कर के शांत हो गए ..फिर पता चला ..म्यूजिक डाइरेक्टर भी होता है ..पोस्टर के नीचे ..किसी ने पढवा दिया ..कल्याण जी आनंद जी ..धत्त ...फिर ये हीरो - हीरोईन क्या होता है ..यार ! धाएँ - धाएँ गोली चला ...एम्पाला कार आपस में ...हम सिनेमा हौल में ..सीट पर ..सीधे ..चुकू मुकु ...! क्या मारिस है ...अमिताभ बच्चन ...शशी कपूर कभी पसंद नहीं ..खाली डोलते रहता था ..धत्त ! जाः...अब कोई पूछ दिया ...सिनेमा का डाइरेक्टर कौन था ...अब यार ये कौन पैदा ले लिया ..डाइरेक्टर :(( मूड ऑफ ...धीरे - धीरे ..मेरा हीरो छोटा लगने लगा ..हीरोईन कठपुतली लगने लगी ...कितना बढ़िया था ..हम सिनेमा हीरो - हीरोईन में नाम पर देखने जाते थे ...तब टक कुछ एडवांस दोस्त यार ...'सलीम जावेद' बोल दिए ...ओये ...चुप रह यार ...सिनेमा अमिताभ बच्चन के नाम पर देखने जाते हैं...सलीम जावेद के नाम पर नहीं ..हो गया बहस ...लगा उस दिन ..अपना कमीज् फटेगा या ..राजू का ! 
एक सिनेमा ..में ना जाने कितने ..नाम घुस आये ...मेरा हीरो ..उफ्फ्फ... प्लस टू में ही थे ...माधुरी दीक्षित ..एक दो तीन गाने आयीं ...फिर कोई एडवांस दोस्त बोल दिया ...सरोज खान ..कोरीओग्राफर है ...मन किया ..वहीँ दे उसको दो तबड़ाक ...तुम देखने गए थे ...गदहा ...फिल्मफेयर लाकर पटक दिया ..मेरे सामने :(( हम चुप हो गए ..हमेशा के लिए ! 
दक्षिण भारत के तेलगु / तमिल सिनेमा का चस्का लगा ...थिरुड़ा - थिरुडा ..जबरदस्त सिनेमा ...गाना ..कमाल ...अब फिर बहस हुआ ...कैमरा मैन ... :(( 
अब कोई सिनेमा देख के आईये ...तुरंत हल्ला हो जायेगा ...हौलीवुड का नक़ल है ...प्लीज़ यार ...अब चुप रहो ...मेरा हीरो ...देखो न ...कितना बौना हो गया ...:((
~ 4 October 2012 

एक इन्द्रधनुष....


आँगन से बारिश की बूंदा - बांदी की आवाज़ आने लगी। 
झाँक कर देखा तो मुंडेर से लटकते पीपल के पेड़ के पत्ते बारिश में झूम रहे थे। । 
मैं भाग कर बाहर गया। … 
काले घने बदल आसमान पे घिर आये थे। … उनके बीच कभी कभी कड़कड़ाती हुई बिजली। । 
मुसलाधार वर्षा। 
प्रकृति मानो धरती को सींच रही हो। 
मैं बारिश में खूब देर भीगा। … 
तब तक जब तक तन ही नहीं मन भी भीगा। .... 
मन ताज़गी से भर गया। … उन्मुक्त हो गया। .... चिंतामुक्त हुआ। । 
फिर। 
बादलों को चीरती हुई हलकी सी धुप निकली। 
पल में रंग बदलता आसमान। .... 
आसमान पे और मेरे मन पे अब एक इन्द्रधनुष सी खिंच गयी. …।
@......२१ जुलाई - २०१३ 

Thursday, September 25, 2014

आसमां जो पिघला कतरों में

ये आसमां जो पिघला कतरों में ..
नदी की धार बन बह चला ..
ये बादल जो उम़रा आँखों में ...
ये कहाँ बरसने जायें ....?

@......२१ मई - २०१३ 

ऐ आसमान....

ऐ आसमान कह दो अपने बादलों से ..
चाँद की हसरत को ..
यूँ ही बहुत देर रोका नहीं करते ...
ऐ आसमान कह दो अपने सितारों से ..
जिसे हसरत चाँद की ...
वो सितारों से अपना दामन नहीं भरते ..
@RR
~ ११ मार्च - २०१३ 

कभी पूछना चाँद से ....

कभी पूछना चाँद से
वो पिघलता क्यों है ...
कभी पूछना आसमान से
वो झुकता क्यों है ..
कभी पूछना गुलाब से
वो महकता क्यों है ...
कभी पूछना सूरज से
वो तपता क्यों है ...
कभी पूछना रात से
वो इतना जागता क्यों है ...
कभी पूछना अपने दिल से
उसमे बसता कौन है ..
कभी पूछना अपने ख्वाबों से
उसमे आता कौन है ...
कभी पूछना अपने खुदा से
वो रहता कहाँ है ... :))
~~ RR
१६ दिसंबर - २०१२ 

बर्ग - ए - गुल


तुमसे मिलना ..समुन्दर किनारे ...रेत पर ...उंगलीओं से कुछ लिखना ही तो था ....तुमसे मिलना ...बर्ग ए गुल पर ओस की बूंदों का चमकना ही तो था ...फिर क्यों नहीं समुन्दर की लहरें ...रेत को समेट लेती हैं ....फिर क्यों नहीं ...सूरज की गर्मी ..ओस की बूदों को सोख लेती हैं .....
~ RR 
( बर्ग - ए - गुल = फूल के पत्ते )
~ ११ दिसंबर , २०१३ 

"जो तेरा है ..वो मेरा है ....जो मेरा है ..वो तेरा है"


एयरटेल का एक प्रचार आ रहा है - "जो तेरा है ..वो मेरा है ....जो मेरा है ..वो तेरा है" ..मस्त है :)) ! अपना कॉलेज का दिन याद आ गया ...! कॉलेज में ...नया बाटा का जूता ...क्या हुआ रे ? संतोष पहन के चला गया ..अब हम क्या पहने 
? चप्पल ...पांच गाली ..शुद्ध - शुद्ध ! होस्टल रूम में देखा ..संतोष का नया 'टी शर्ट' ..नया आफ्टर शेव .....लगाओ ...चल दिए ...! पुरे लौबी में किसी ने शैम्पू खरीद लिया ...हो गया ! सीधे दोस्त के रूम में घुसो ...धडाक ..बिना पूछे ...उसके आलमीरा से शैम्पू / टूथपेस्ट / साबुन उठाओ और चल दो ...क्या मुहब्बत था ..लिखते वक़्त सबके चहरे याद आ रहे हैं ..नहा के लौटते वक़्त ..साबुन / शैम्पू / टूथपेस्ट ..किसी और को थमा देना ...जिसका था ..अब उसके कमरे में वो सब वापस नहीं लौटेगा ! घर से मेरा ड्राफ्ट नहीं आया अरे ..काहे उदास हो ..मेरा आया है ..न ! खिल गया चेहरा ..! होस्टल से कॉलेज निकलते वक़्त ...कॉपी / नोटबुक नहीं है ...उफ्फ्फ ...एक बार बगल वाले रूम में झाँक लो ...अरे बाबा ..ये मैकेनिकल का है ...धत्त ..चुप रह ..इसमे खाली पेज है ..न ..काफी है ! इलेक्ट्रोनिक्स का सब्जेक्ट ..मैकेनिकल के कॉपी में लिखा जा रहा है ...हा हा हा ...उफ्फ्फ ..क्या दिन थे ! कावासाकी बजाज आया था ..उनदिनों ...मोटरसाइकिल किसी और का ..घूम कोई रहा है ...और पीछे बैठा 'कोई और' है ..हा हा हा हां ...नया - नया वाक मैन ...साजन का कैसेट ...जो खरीद लिया ...अब क्या मजाल की वो कभी सुन पायेगा ..कैसेट किसके रूम में है ..अमेरिका का 'एफबीआई' भी नहीं खोज सकता ..हा हा हा हा ....शायद ..आप मेरी उम्र के हों...मेरे साथ आप भी मुस्कुरा रहे हों ...फिर हो जाए कुछ शुद्ध - शुद्ध श्लोक ..अपने उन मासूम दोस्तों के लिए ...जो अब 'बड़े' हो गए हैं ..लव यु ..ऑल ...:)) टेक केयर ! 
~ दालान , १७ सेप्टेम्बर , २०१२

हाफ पैंट ....:))


हाफ पैंट भी गजब का ड्रेस है - हम जैसे छोटे शहर से आये लोग इसको पहनते ही 'फुल्ल कॉन्फिडेंस' में आ जाते हैं ! कार भी स्टाईल से चलाने लगते हैं - क्या कहें ..हम ! आज कल ठेहुना तक वाला फैशन में है - यूनी सेक्स - दस पॉकेट तो होगा ही ! बाज़ार में गाड़ी पार्क किये - पार्किंग टिकट किस पॉकेट में रखे - पता नहीं  गाड़ी वापस लेते वक्त - कुत्ता की तरह सब पॉकेट खोजिये - हाँफते हुए - मालूम नहीं कहाँ गया ! बचपन में ब्लू चेक लूंगी लोगों को पहनते देखे थे - अब वैसा ही चेक वाला हाफ पैंट आ गया है ! 
बबलू दिल्ली आया था - कलक्टर बनने - मगध ट्रेन से आता था - जाता था ! स्टेशन पहुँचते ही हाफ पैंट और रात में भी नकली रेबैन और कान में वाक् मैन - मैडोना का कैसेट पहली दफा उसके पास ही देखे थे - बस देखते रह गए थे - बोला ..कभी आओ ..दिल्ली ..मुखर्जी नगर ..और बढ़िया बढ़िया गाना सुनायेंगे - कैसेट दिखायेंगे ! बाबु जी से बोले - हमहू जायेंगे - दिल्ली - हाफ पैंट में - मगध से ! मालूम नहीं क्या हुआ - बबलू को हाफ पैंट पहनते पहनते - किसी हाफ पैंट वाली से मुहब्बत हो गया - कलक्टरी गया तेल लेने - अब वो मोमो खाने लगा ! पटना आता था - मोमो के किस्से - हम समोसा ( सिंघाडा ) वाले उब गए थे सुनते सुनते ! सुने हैं - अब उसका अपना खुद का वहीँ कहीं 'मोमो का ठेला' लगता है - दोनों हाफ पैंट में ही मोमो बेचते हैं - लाल खूब तीखा चटनी के साथ ! 
वूडलैंड ने तो और कहर ढाया हुआ है - उसका हाफ पैंट में कॉन्फिडेंस तो बहुत है - लेकिन बुलेट से भी भारी - भादों में धो दीजिए तो कातिक में सूखेगा ! सब ठीक है - लेकिन जब चिम्पू भी उसको पहन लेता है - क्या कहें ...उसको देख ..चिम्पू का दो बरतुहार ( लडकी वाला - शादी हेतु ) भाग गया ! चिम्पू ..अब उसी हाफ पैंट में ...प्रगति मैदान में ...मेला के टाईम 'घुघनी - चिउरा' बेचता है ...हाथ में कलछुल लिए हुए ...!!!
~ २५ अगस्त २०१२ 

शिव ...

शिव सत्य हैं !
शिव सुन्दर है !
शिव शक्ती हैं !
शिव महेश हैं !
शिव नीलकंठ हैं !
शिव तिनेत्र हैं !
शिव भोले हैं !
शिव त्यागी हैं !
शिव कैलास हैं !
शिव काशी हैं !
शिव वैद्यनाथ हैं !
शिव हिम हैं !
शिव गंगा हैं !
शिव अनादि हैं !
शिव अनन्त हैं !
शिव विशाल हैं !
शिव नटराज हैं !
शिव ह्रदय हैं !
शिव कपूर गौरं हैं !
शिव रूद्र हैं !
शिव करुणा हैं !
शिव महामृत्युंजय हैं !
शिव अर्धनारीश्वर हैं !
शिव मिलन हैं !
शिव परमात्मा हैं !
शिव मेरी आत्मा हैं !
शिव मन में हैं ..... !!!
~ ११ अगस्त २०१३
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#. महाशिवरात्री - कुछ कुछ यूँ ही ...शिव के ध्यान में ...

मेरे गाँव में हम तीनो पट्टीदार के घर 'खपड़ा' वाले होते हैं - हालांकी एक चचेरे बाबा जो डॉक्टर थे - उन्होंने पांच छ साल पहले अपना 'पक्का' का घर बनवा लिया - मेरा घर आज भी 'खपड़ा' वाला है - उस घर में उत्तर पछिम कोना वाला रूम जो कभी दादी का होता था - वो हमें मिल गया ! उस रूम में एक बहुत ऊँचा और नक्कासी किया हुआ पलंग है ! एक ड्रेसिंग टेबुल ! दो तीन बढ़िया गद्दी वाला कुर्सी - और एक खूंटी - जिसके बगल में माँ पापा का एक पेयर फोटो , जो आज चौवालिस साल बाद माँ के नहीं रहने पर मैंने मंगवा लिया - पर उस फोटो को आज तक किसी ने छुआ तक नहीं - जब से टंगा - वहीँ रहा ! वहीं बगल में यदा कदा भगवान् के कैलेण्डर लगे होते थे - बचपन में - अक्सर पलंग से उन कैलेंडरों को देखा करता था - एक कैलेण्डर भगवान् विष्णु शेषनाग पर आराम फरमाते हुए और उनके पैर के पास लक्ष्मी - दुसरे कैलेण्डर में शिव पार्वती - ऐसे जैसे दोनों पेयर फोटो खिंचवाए हों ! धीरे धीरे - रोज देखते देखते शिव पार्वती वाला कैलेण्डर बढ़िया लगने लगा - विष्णु जी के पैर के पास लक्ष्मी को देख ऊपर से शेषनाग उतना बढ़िया नहीं लगता - चाईल्ड साइकोलोजी ..अब क्या कहा जाए ....दिमाग में घुस गया ..आजतक नहीं निकला ...पत्नी का हमेशा शिकायत ..आप 'हसबैंड' जैसा नहीं ..दोस्त जैसा रहते हैं ...अब हम उनको क्या समझाए ...हमको शेषनाग पर लेट ...आपको पैर के पास नहीं रखना ....मत दीजिये भाव ...जब ये फिलोसोप्फ़ी समझ में आयेगी ...तबतक देर 

थोडा बड़े हुए ...मुजफ्फरपुर में आज के दिन शिव की बारात गरीबनाथ मंदिर से निकलती थी - पापा से जिद कर के उनके साथ शिव का बरात देखने जाता था - सारे भुत वैताल उनके बाराती - मन में लगता था - कितने विशाल हैं - कोई भेद भाव नहीं ....:))
हमारे घर के समीप ही अरेराज एक जगह है - वहां हर महाशिवरात्री मेरे बाबा जाते थे - आज से करीब तेईस चौबीस साल पहले बाबा के साथ गया था - यह दिन ख़ास इसलिए बन गया - जब भी बाबा घर से बाहर निकलते - दादी उनके लिए पान लगा के दरवाजे पर - आज के दिन मेरे लिए भी पान बनाया गया था - शायद मेरे बड़े होने / परिपक्व होने की खुशी - हमदोनो बाबा - पोता मुह में पान दबाये और चल दिए 'शिव पर जल चढाने' ...:))
महाशिवरात्री के दिन ही एक बार हम कुछ दोस्त कलकत्ता से पटना लौट रहे थे - हावड़ा स्टेशन पर आपको थाली में 'भांग' बेचने वाले मिल जायेंगे - एक एक गोला सभी दोस्त दबा लिए - हावड़ा दानापुर ट्रेन में चढ़ गए - बाबा हो बाबा - आज तक याद है - बर्थ पर ऐसे लगा - जैसे हवा में उड़ रहे हैं - एक मित्र गीत गाने लगे - पूरा रात गीत ही गाते रहे - एक खिड़की के पास - हवा खाने लगा - पूरा रास्ता हवा खाया - टीटी कब आया - कब गया - किसी को कुछ नहीं पता - अगली सुबह सबने कसम खाया - अब जीवन में भांग नहीं ...हा हा हा !
अब शिव कैसे होंगे दिखने में - कह नहीं सकता - पर उनके जितने भी चित्र ..चित्रकारों ने बनाया ...उनके चहरे पर एक शांत भाव ..कोई छल नहीं ...पार्वती के लिए बराबर का दर्ज़ा ...जैसे इंसानों का अपना अपना व्यक्तित्व ..वैसे भगवान् लोग भी ....समुद्र मंथन हुआ ....विष कौन पिएगा ....शिव ! ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं हूँ ...विष्णु के सभी अवतार को पढ़ा..सांसारिक मिडिया में ..विष्णु के अवतार छाए रहे - पर शिव के अवतार पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई है ...! एक और बात है ...शिव भोले हैं ...जो थोड़ा आगे पीछे किया ...उसपर प्रसन्न ...दे दिए ..भरदम वरदान ...अब दानव / इंसान ..वरदान पाकर पगला गए ....रावण और भस्मासुर की कहानी तो जुबान जुबान पर है ....
कुल मिला कर ...
...."सत्यम शिवम् सुन्दरम" ....
~ १० मार्च २०१३ 

कृष्णा ...ओ..कृष्णा .....

कृष्णा ...ओ..कृष्णा .....
कहाँ एक और तुम्हारा प्रेम का अति.......तुम्हारा रास ..कहाँ दूसरी और ...युद्ध का अति ...तुम्हारा महाभारत .....एकतरफ राधा की मटकी फोड देना ...तो दूसरी ओर द्रौपदी की लाज की रक्षा ... ...सुदामा का भी ख्याल .. कृष्णा ...ओ कृष्णा .......कहाँ एक और ..नटखट माखन चुराता ...कहाँ दूसरी और गीता से जीवन दर्शन ...महाभारत के बाद तूम 'गाधारी' का श्राप भी लेते हो ...
.कृष्णा ..ओ कृष्णा ..तुम सम्पूर्ण हो ...
.......कृष्णा ..ओ कृष्णा .....
~ 9 August 2012 

मन का दुःख

मन का सुख ...मन जाने और ये सारी दुनिया जाने ...
मन का दुःख ...मन जाने या फिर मेरा खुदा जाने ...
~ RR
30 July 2014 

दुःख में शब्द बोलते हैं....

दुःख में शब्द बोलते हैं ...दर्द शब्दों में बाहर आसानी से निकल आपको थोडा राहत पहुंचाते है ...ईश्वर हमेशा आपको दुःख में नहीं रखता ...कभी कभी खुशी भी देता है ...अत्यधिक खुशी में आपके शब्द कहीं अटक जाते हैं ...आपको छोड़ भाग खड़े होते हैं और जाते वक़्त कहते हैं - अभी रहो अपने खुशी के साथ ......शायद आप उस अनुभूती को काफी देर तक खुद के दिल में रखना चाहते हैं ...जीवन में कुछ पल ऐसे भी होते हैं ..उन पलों को सहेज ..किसी संदूक में बंद कर ...सागर की किसी गहराई में फेंक देना चाहिए ...जहाँ जमाने की बुरी नज़र न पड़े ....चश्म - ए - बद्दूर ....:))
~ 3 March - 2013 

प्रेमपत्र ....

एक प्रेमपत्र ....
...................................
तुम्हे याद है ...तुम पहली दफा विदेश जा रहे थे ...मै तुमसे मिलने एअरपोर्ट पर आयी थी ...भागती हुई ...तुम ट्रॉली के साथ खड़े मेरे इंतज़ार में ...कितने हैंडसम लग रहे तुम ...ब्लैक गॉगल्स - बैगनी स्ट्रिप की शर्ट और एक इंग्लिश जैकेट में ...कुछ भी तो हम दोनों बात नहीं किये थे ...मै तुम्हारे आँखों में झांकना चाहती थी ..शायद तुम समझ गए थे ...तुमने गॉगल्स को ऊपर कर बालों में फंसा लिया था ...कितनी झांकती तुम्हारे आँखों में ...एक सच्चाई देखनी थी ...तुम्हारी नज़रों में ...कहते हैं ..न ...मर्द की नज़रें झूठी नहीं होती ...उस सच्चाई को देख मेरी नज़रें झुक गयीं ...तुम भी अब टर्मिनल की तरफ देखने लगे ...मेरे पास कुछ नहीं था ..देने को ...मैंने तुम्हे गुलाबों का एक गुलदस्ता दिया था ...वो गुलाबी फूलों का गुलदस्ता ...एअरपोर्ट के पास वाली रेडलाईट से खरीदी थी ...कैब में उसे बिलकुल अपने सीने से चिपका के रखा था ...यह सोच शायद मेरी खुद की खुशबू उन गुलाबों में कैद हो जायेगी ...जब तुम्हारे हाथों में थमाया ...तुमने बड़े प्रेम से उसे सीने से लगा ...थैंकयु कहा था ...फिर मुझे लगा ...फूल तो फूल हैं ...आज नहीं तो कल मुरझा जायेंगे ...बस बड़ी झिझक से ..अपने पर्स से ...वो रुमाल निकाल लिया ...जिसमे तुम्हारा नाम लिखा था ...बस ..एक झटके में तुम्हे दे दिया ...इसबार तुम थैंक यु नहीं बोले थे ...अब शायद एक पल और रुकना भी ..हमदोनो की आवाज़ भर्रा जाती ...तुम ट्रॉली लेकर आगे बढ़ गए ...मै भी एक झटके में मुड गयी ...फिर तुम्हे अन्दर जाते देखा ...शायद सीसे के उस तरफ से तुमने भी देखा होगा ...
फिर तुम्हारी चिठ्ठी आयी ...तुमने लिखा था ...रुमाल को आलमीरा के लॉकर में रख दिया हूँ ..अब ये रूमाल मेरे साथ ही इस दुनिया से जायेगा ...उस चिठ्ठी की ये लाईन हर रोज सुबह पढ़ती हूँ ...वो चिठ्ठी मेरी उंगलीओं के निशाँ से घिस चुकी है .....
मैंने भी तुम्हे चिठ्ठी लिखा था ...तुम्हारे शहर आना चाहती हूँ ...वो तुम्हारे शहर की ख़ूबसूरत नदी के किनारे ...तुम संग बैठ ...देर तक बातें करना चाहती हूँ...बाहों में बाहें डाल कर नहीं ..उंगलीओं को उंगलीओं से फंसा कर ...जैसे हम दोनों एक हैं लेकिन निगाहें उस नदी की तरफ ...फिर तुम्हारे कार में ..तुम्हारे बगल में बैठ ...कार तूम चला रहे और गीअर पर मेरे हाथ ....स्पर्श करना चाहती हूँ..मै तुम्हे ...तुम्हारे हाथों का मेरे हाथों से  ....तुम्हारे शहर को अपनी निगाहों से देखना चाहती हूँ ...
अब तुम बड़े आदमी बन गए हो ...वर्षों बाद ...अखबार में तुम्हारी नाम देख चौंक गयी ...लिखा है ...तुम यहाँ आ रहे हो ...अपने विषय पर कुछ बोलने ....वो तुम ही हो ..न ...
सुनो ....तुम्हारे हर जन्मदिन पर ...एक फूलों का गुलदस्ता अपने डाइनिंग टेबल पर रख देती हूँ ...यह सोच उसकी खुशबू तुमतक जरुर पहुँचती होगी ...और यही सोच मै खुश हो जाती हूँ ...
फिर से एअरपोर्ट पर आना होगा मुझे ...गुलाबी गुलाब के फुलदस्तों के साथ ...तुम्हे फिर से एक बार छोड़ जाने के लिए ...नहीं आना इसबार मुझे ....तुम्हे क्या पता ...किसी को विदा करने का दर्द....

सुनो ...तुम मुझे अब भी पसंद करते हो ..न ...

~ 27 April 2014

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...कल शाम तुम्हारा पत्र मिला ...कई बार पढ़ा ..पढ़ते पढ़ते सो गया ...अभी नींद खुली तो फिर से पढ़ रहा हूँ ...रविवार का दिन है और मेरे म्यूजिक सिस्टम पर तुम्हारा ही पसंदीदा गाना 'आफरीन - आफरीन' बज रहा है ... मेरे सामने तुम्हारी पसंदीदा दार्जिलिंग चाय बगैर चीनी रखी हुई है ...तुमने मेरी कई आदतें बदल डाली और अब तुम्हारी दी हुई आदतों में ही जीने की आदत हो गयी है ...:)) 

हाँ ...मै एक पेपर प्रेजेंट करने तुम्हारे देश आ रहा हूँ ...कितना दर्द होता है ...जब अपने देश को ही पराया जैसा महसूस करना ...तुम खुशनसीब हो जो इस दर्द से मरहूम हो ...यहाँ किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है ...दुनिया के बेहतरीन शहरों में से एक है ...सबकुछ है ...बस सिर्फ एक तुम ही नहीं हो ...
...ज़िंदगी के सफ़र में जिस मुकाम पर तुम मिली थी ....वो शायद मेरे लिए सबसे कमज़ोर समय था ...जिस गर्माहट से तुमने मेरा हाथ पकड़ा था ...आज इतने वर्षों बाद भी अपने हाथों में तुम्हारे हाथों की गर्माहट महसूस कर सकता हूँ ...कितनी उलझी हुई ज़िंदगी थी ...बड़े ही आराम से ..हर पल मेरा साथ निभाते हुए ..तुमने मुझे भंवर से निकाला था ....जैसे कोई माँ अपने सातवें महीने के बच्चे को रुई के फाहा में रखती है ...नज़र के सामने ! प्रेम किस किस रूप में आता है - कहना मुश्किल है ....
अब मै मजबूत हो गया हूँ ..." तुम्हे इंतज़ार करते हुए देखना ...दर्द देता है और अगर तुम इंतज़ार ना करो इसकी कल्पना और भी दर्द ...ऐसा लगता है जैसे एक भंवर से निकाल तुमने दुसरे भंवर में डाल दिया " ...पर ये प्यारा लगता है ...क्योंकी यहाँ एक असीम विश्वास है . 
तुम्हारी चाहतें भी अजीब अजीब सी होती हैं - जैसे मेरे इस शहर की नदी के किनारे मेरे संग बैठना - जब कभी इस नदी के किनारे से गुजरता हूँ - तुम याद आती हो - इसकी तेज़ प्रवाह तुम्हारे प्रेम को याद दिलाती है - जैसे उस नदी को जल्द से जल्द किसी सागर से मिलने की बेचैनी है ....
तुम्हे याद है ....तुमने मेरे जन्मदिन पर एक वैलेट दिया था ...वो आज भी मेरे जींस में पडा रहता है ...उसमे तुम्हारी एक तस्वीर भी है ....एकदम गुलाबी ...:)) घिस गया है पर बहुत लकी है ...उसमे पैसों की कोई कमी नहीं होती ...सच बोल रहा हूँ ...तुम्हे खुश करने के लिए नहीं ...
सुनो...क्या आज भी तुम मेरे दिए हुए स्कार्फ में अपने ओफ्फिस जाती हो ...क्या आज भी तुम्हारे हाथों में वो कंगन चमकता है ...क्या आज भी तुम्हारे मोबाईल का पासवर्ड मेरा जन्मदिन होता है....
सुनो ...तुम मुझे आज भी पसंद हो ...:)) पर ये बताओ ...वो तुम्हारा बुड्ढा बॉस आज भी डोरे डालता है ? ..हा हा हा हा हा ....गुस्साओ नहीं ...:)) तुम्हारे गुस्से से आज भी डर लगता है ...:))
लव यु ...सी यु इन इण्डिया ....
..............
~ 4 May 2014 

दिनकर जयन्ती

आज राष्ट्रकवी श्री रामधारी सिंह दिनकर की जयन्ती है - जिस कवी की रचनाओं की धूम पुरे विश्व में रही हो - उनपर मै क्या लिखूं या न लिखूं - सिवाय इसके की - उनकी शब्दों को ही दोहराऊँ - वीर रस में डूबे उनके शब्द तो हमेशा से हमारे आपके मन को एक शक्ती देते आये हैं - अनायास ही उनकी जयन्ती की पूर्व संध्या पर उनकी बेहतरीन रचना जिसके लिए उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला - "उर्वशी" को पढ़ा - बड़े इत्मीनान से सारी रात पढ़ा - 'पुरुरवा' और 'उर्वशी' के बीच के संवाद को - 'पुरुरवा' की विशालता को देख ...'उर्वशी' पूछ बैठती हैं - "कौन पुरुष ..तुम" ...यह एक वाक्य का संवाद अपने आप में एक नारी के मन को कह देता है ....अद्वितीय रचना ...जहाँ कल्पना भी रुक जाती है ...थक हार कर शब्दों के साथ बह जाती है ...और उस विशाल सागर में मिल जाती है ...कभी फुर्सत में पढ़ें ...'उर्वशी' ....:))
वहीं से कुछ ...दिनकर जी की श्रधान्जली में ....
पर, न जानें, बात क्या है !
इन्द्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है,
सिंह से बाँहें मिलाकर खेल सकता है,
फूल के आगे वही असहाय हो जाता ,
शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता.
विद्ध हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से
जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से.
.........
"रूप की आराधना का मार्ग
आलिंगन नहीं तो और क्या है?
स्नेह का सौन्दर्य को उपहार
रस-चुम्बन नहीं तो और क्या है?"
सिर्फ शब्दों के हेर फेर कर देने से कविता नहीं बन जाती - किसी भी कविता में अपनी कल्पना को उसके हद से भी आगे ले जाना पड़ता है - शब्दों से एक चित्र बनानी पड़ती हैं - और उसे अपने जीवन दर्शन से सजाना पड़ता है ...जो भी देखे मंत्रमुग्ध हो जाए ....
फिर से एक बार फिर ....इस महान साहित्यकार को नमन !
~~ दालान
23 September - 2013 

नारी की करुणा .....

नारी का नारीत्व उसके करुणा में है और मर्द की मर्दानगी उसके जुबान में है ! दोनों अपने अपने इसी गुण के कारण ही अपनी जंग जीतते या हारते हैं - राजा दशरथ ने कैकेयी को वचन दे दिया - प्रिय पुत्र को वनवास पर भेज दिया - सीता भिक्षुक वेश में राक्षस के लिए अपनी करुणा रोक नहीं पायी - फिर बाकी का रामलीला लिखा गया ! 
महाभारत में कौरवों का अपनी जुबान से फिसलने के कारण कुरुक्षेत्र में आज तक का सबसे बड़ा युद्ध लड़ा गया ! आसान नहीं होता है अपनी जुबान का खुद से रक्षा करना - कभी कभी खून सुख जाता है और फिर जब आप अपने ही शब्दों की रक्षा करने में सफल होते हैं - दुनिया को क्या दिखाना - खुद आपका अपना मन आपका अभिनन्दन करता है - यहीं आपको शांती मिलती है ! 
सृष्टी ने नारी को जननी बनाया - यह करुणा यहीं से आया - किसी के रोकने से यह करुणा नहीं रुकने वाला - वो माँ है - जनम देना उसके स्वभाव में है और जन्म तभी देगी जब वो करुणा में भींगी खडी होगी ! 
हां ...अब कोई पुरुष किसी नारी के करुणा को भाव नहीं दे ...कोई नारी किसी पुरुष के जुबान को अहमियत न दे ...फिर मुश्किल है ...:)) 
अब उलटफेर कर के भी आशा नहीं कीजिए ...एक पुरुष से करुणा का आशा मत कीजिए और एक नारी से जुबान - वो जो बोले चुप चाप सह लीजिये - फिर देखिये - आप उसके करुणा में बह के प्रेम के किस अथाह सागर में जायेंगे - कितना भी डूबेंगे ...कम ही लगेगा ...:))

~ १० मई - २०१३ 

स्त्री - पुरुष

अमरीकी लेखक ..रॉबर्ट जॉर्डन लिखते हैं - "पुरुष भूल तो जाते हैं पर कभी माफ़ नहीं कर पाते - वहीँ महिलायें माफ़ तो कर देती हैं पर भूल नहीं पातीं" ...:)) यहीं से शुरू होता है ...पुरुष और महिला का आपस का द्वंध ...पुरुष कहता है - जब मै सबकुछ भूल सकता हूँ ..फिर तुम क्यों नहीं ...महिला पलट कर जबाब देती हैं - जब मै सबकुछ माफ़ कर सकती हूँ फिर तुम क्यों नहीं ...:)) 
दोनों का मूल स्वभाव अलग है ...फिर भी एक जिद है ...वो मेरे जैसा क्यों नहीं ...पुरुष उस महिला को आदरणीय बनाना चाहता है ....जो उसकी गलतीओं को माफ़ कर दे ...जो अपने अतीत को भूल कर मुझमे समा जाए ...वहीँ दूसरी ओर महिला कहती है - पूजा उसी की करूंगी ...जो मेरी गलतीओं को माफ़ कर दे ...वही विशाल ...! 
द्वन्द जारी है ...महिला का मन समुन्दर ...न जाने तह में क्या क्या छिपा ...पुरुष की जिद ...समुन्दर में सिर्फ मै ही रहूँ ...वश चले ..पुरे समुन्दर को सोख ले ...जिद में पी जाये ...खाली कर दे समुन्दर और उसमे खुद समा जाए ...महिला की जिद ..पुरुष के ह्रदय को चीर दे ...इतना छोटा कर दे ..जिसमे उसके अलावा कोई और न समा पाए ...:))
बस खेल महिला के 'मन' का और पुरुष के 'ह्रदय' का - महिला कहे ...मन में बहुत कुछ पर ह्रदय में सिर्फ तुम ही हो ...पुरुष कहे ...मन में सिर्फ तुम ही तुम ...पर ह्रदय में बहुत कुछ ...
पुरुष महिला के मन में सिर्फ खुद को देखने को बेकरार ...वहीं दूसरी ओर महिला पुरुष के ह्रदय में सिर्फ और सिर्फ खुद को देखने को बेक़रार ...
यह खेल सदिओं पुराना है ...और यह खेल सदिओं तक चलेगा ...:)) 
पर मेडिकल साईंस कहता है - दोनों में मेल / फिमेल का हारमोन - अर्धनारीश्वर का कांसेप्ट - थोडा तुम मेरी तरह सोचो - थोडा हम तुम्हारी तरह सोचें - ...देखो ..आगे सफ़र सुहाना है ..:))


~ ४ मार्च २०१४ 

दुर्गापूजा - २०१३

धर्म एक विशुद्ध फिलोसोफी है - जीवन को जीने का आधार ! जीवन में मजबूत और कमज़ोर दोनों तरह के समय आते हैं - मजबूत इंसान वही है जो इन दोनों समय में धर्म को जीवन दर्शन समझ खुद को मजबूत बनाए रखे ! 
ईश्वर तो एक ही है - यह सत्य है ! आम इंसानों के वश का बात नहीं जो बिना आकार वाले एक सत्य को स्वीकार कर सके ! जब यह सत्य आप स्वीकार कर लेंगे - कई चीज़ों से ऊपर उठ सकते हैं - मसलन लिंग / जाति इत्यादी ! 
पर जीना तो हमें इस धरती पर ही एक आम इंसान के रूप में है - फिर हमें एक 'जीवन दर्शन' चाहिए ! यहाँ धर्म हमें सहारा देता है ! 
इस नवरात्र हम शक्ति की पूजा करते हैं - शक्ति के हर रूप की पूजा करते हैं - जहाँ कहीं भी हमें शक्ति का आभास हुआ - उसको हमने पूज दिया ! और यह प्रक्रिया सिर्फ एक दिन की नहीं है - हज़ारों साल से चली आ रही इस प्रक्रिया में हम आप जैसे लोग कुछ न कुछ जोड़ते चले आ रहे हैं ! 
दरअसल यह पूजा 'स्त्री के स्वाभिमान' की होती है - प्रकृती ने पुरुष को बलशाली बनाया - उसको भक्षक बनाया - उसको रक्षक भी बनाया - फिर 'स्त्री के स्वाभिमान' की रक्षा का कर्तव्य / धर्म भी उसका ही है ! महिषासुर भक्षक प्रवृती को दर्शाता है - वहीं वो सारे देव जिन्होंने 'दुर्गा' को सजाया - वह एक रक्षक प्रवृती को दिखाता है ! 
पर पुरुष तो बलशाली है - अहंकारी है - स्त्री को पुजेगा - उसके स्वाभिमान की रक्षा भी करेगा - पर ...किस रूप में ..:)) ? कौन से रूप के आगे वो नतमस्तक होगा ? ...जब स्त्री उसके जीवन में एक माँ के रूप में आती है ....बात यहाँ कोख की नहीं है ...कहते हैं ..न ...एक पत्नी / प्रेमिका को अपने पुरुष के लिए वो सारे रूप दिखाने होते है ...और अंत में माँ के रूप में भी ..आकर ...पुरुष को हमेशा के लिए झुका देना होता है ...और जब तक अहंकार नतमस्तक नहीं हुआ ...पूजा तो शुरू ही नहीं हुई ....:))
~ दुर्गापूजा - २०१३ 

गुलज़ार से मुलाक़ात

कल्पनाओं के शिखर पर एक अबोध तमन्ना बैठी होती है - उसकी अबोधता को देख ईश्वर उसे अपने गोद में बैठाते हैं - फिर वो तमन्ना एक दिन हकीकत बन बैठती है...:)) 

आज का दिन बेहतरीन रहा - कल देर रात तक जागने के बाद - सुबह नींद ही खुली 'रविश' की आवाज़ से - नहाते धोते ...थोड़ी देर हो ही गयी ..झटपट भागा ...रविश स्टेज पर बैठे थे ..वहीं से हाथ हिलाया ..मै भी सबसे पिछली कतार में बैठ गया ...तब तक एक आवाज़ आयी "आप दालानवाले हैं ..न " - एक तस्वीर खिंचवानी है आपके साथ ...ये थे आभाश भूषण - दालान को चाहने वाले ...फिर वो दोनों पति पत्नी मेरे साथ फोटो खिंचवाए - बेहद सज्जन और उन्दोनो ने बताया - दालान पर दी गयी सुचना कारण ही वो दोनों यहाँ आये ..:))
रविश का सत्र ख़त्म होने के साथ - उनका दूसरा सत्र शुरू होने वाला था - इसमे कोई दो राय नहीं - रविश काफी लोकप्रिय हैं - कई नौजवान उनके साथ फोटो खिंचवाने को बेताब थे - मेरी वेश भूषा देख - उनके प्रशंसक भी "दालान" वाले समझ गए ..:)) बढ़िया लगा ...
रविश के दुसरे सत्र के ठीक पहले आये - "गुलज़ार" ..झटपट भागा - दोनों हाथ से उनके पैर छू कर आशीर्वाद लिया - आभास भूषण समझ गए - उन्होंने बाद में गुलज़ार के साथ मेरी कुछ तस्वीरें लीं ..गुलज़ार के साथ थे - ओम थानवी जी - मै क्या बोलता - भाव विभोर था - बस एक लाईन सुना पाया - "सारी रात मेरे शब्द जलते रहे - वो पत्थर से मोम बनते रहे..:)) गुलज़ार के ठीक पीछे बैठ - रविश का दूसरा सत्र - जिसके वो बादशाह जाने जाते हैं - नोस्टैल्जिया ..मेरा भी पसंदीदा ...उनके साथ थे - अंग्रेज़ी और डेनिश के लेखक - "तबिश खैर" - ताबिश सभी भाषा प्रयोग कर रहे थे - रविश अपनी हिंदी और भोजपुरी ...रविश बोलते बोलते - "छठ पूजा की यादों" पर बोलना शुरू कर दिए - डर था - कहीं फिर से वो मेरा नाम न बोल बैठें ..:)) रविश संभले - शुक्रगुज़ार रहता हूँ - हर ऐसे समाचार पत्र के लेख में वो मेरा नाम ठूंस ही देते हैं ...
रविश को लोग घेरे हुए थे - मैंने बोला - रविश ..मैंने पटना म्यूजियम नहीं देखा है ...और आज आप मेरे गाईड बन के ..मुझे घुमाएं .. रविश तैयार हुए ..हम दोनों अकेले निकल पड़े ...घूम कर लौटे तो ...पवन कार्टूनिस्ट और उनकी पत्नी रश्मी दोनों रविश को अपने कार्टून का एक बेहद बढ़िया गिफ्ट ...इसी बीच ..टेलेग्राफ़ के रोविंग एडिटर 'संकर्षण ठाकुर' मिल गए - बोले ..रंजन ..मेरी भी किताब का आज लोकार्पण है - आप आईये - संकर्षण बेहद आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक हैं - अपने साथ वालों से परिचय कराने लगे - रंजन को पढने से ज्यादा सुनने में मजा आता है ...:))
फिर हम और रविश संकर्षण ठाकुर के किताब जो नितीश कुमार के ऊपर छपी है ...के लोकार्पण में चले गए - ढेर सारी गप्प - व्यक्तिगत बातें ...वहां से निकले तो ...रविश के साथ पटना का सैर ...फिलोसोफी ...फिलोसोफी और फिलोसोफी ...ढेर सारी गाईडलाईन ...दोनों तरफ से ...:))
~ १५ फरवरी २०१४

बाबाधाम यात्रा

बाबाधाम यात्रा : 
ईश्वर का कोई रूप नहीं - हर धर्म से ऊपर की वो अदृश्य शक्ती है - जिसे इस धरती का हर एक कण समझता है - इंसान आया - परिवार बना - समाज का गठन हुआ होगा - फिर धर्म बना होगा - आकार के जिद में जिस हर चीज़ में इंसान को आनंद महसूस हुआ होगा - इंसान उस रूप में भगवान् की रचना कर दिया - ग्रंथों में लिख दिया - यह प्रोसेस हजारों साल पुराना है - आगे हज़ारों साल तक चलेगा ! 
हर एक धर्म में भगवान् तक पहुँचने / दर्शन के लिए कुछ मील लम्बे पैदल यात्रा का प्रचलन है - हज यात्रा है - बाबाधाम है - वैष्णो देवी - केरला में अयेप्पा मंदिर - कैलाश मानसरोवर / अमरनाथ इत्यादी ! इसका कुछ अध्यातिक और दार्शनिक महत्व रहा होगा - तभी ऐसी यात्राएँ सैकड़ों साल से प्रचलन में है ! 
मैंने कल ही करीब 110 किलोमीटर की लम्बी बिहार में सुल्तानगंज से देवघर की यात्रा की ! बहुत कुछ महसूस किया - लिखना चाहूँगा ! आपमें से कई लोगों को यह अनुभव रहा होगा ! 
जल उठाने के बाद - हम करीब चालीस लोग एक साथ चल पड़े - बस कुछ कदमों के बाद - हम सब में दूरी बनने लगी - कोई तेज़ रफ़्तार से तो कोई धीमी रफ़्तार से ! जिसकी रफ़्तार आपके बराबर है - आप उसके साथ ! "शरीर थकने लगता है - मन उत्साहित रहता है " ! कुछ और किलोमीटर चलने के बाद - आपका मन भी थकने लगता है - जब मन थोड़ा भी थकता है - शरीर तेज़ी से आपके मनोबल को नीचे करता है " - यहीं से असल खेल शुरू होता है - अब आप बिलकुल अकेले हो जाते हैं - मन कहीं एक ऐसी जगह केन्द्रित हो जाता है - जहाँ या तो आपको अत्यंत सुख मिल रहा होता है या दुःख ! पहला अनुभव - हज़ारों लोग आपके साथ पर आप एकदम अकेले ! दूसरी रात - दम टूटने लगा - पुरी टीम दो घंटे पहले ही किसी धर्मशाला में - अब बस तीन किलोमीटर और जाना है - पर एक कदम भी चलना मुश्किल ! 
हर रोज मात्र तीन घंटे ही नींद - किसी धर्मशाला में - एक प्लास्टिक बिछा के - बिना तकिये ! मै बुरी तरह अन्दर से हिल चुका था - एक पूरा दिन अपनी यात्रा गाडी से किया और एक धर्मशाला में अकेले दिन भर रुका ! कई मंथन और विचार ! फिर अगले दिन अकेले - पर पिछले दिन के "सिख" के साथ - कल के अनुभव को जो सिखा उसके बल पर अगला दिन ! 
खैर सोमवार को सुबह के प्रथम दर्शनार्थी होने का अवसर मिला - बिहार सरकार के कुछ एक मंत्री भी साथ में थे - पर अनुभव बेमिशाल था ! अंतिम चरण में बहुत कुछ समझ में आया - क्यों हर ऐसी लम्बी यात्रा में कुछ शब्द दोहराने को बोला जाता है - जैसे "बोल बम" - ऐसी जोर से बोले गए शब्द - आपके मन को केन्द्रित करते हैं ! 
दरअसल "मन ही ईश्वर" है - सारा खेल यहीं होता है - सारा दुःख या सुख यहीं विराजमान होता है - सारा आनंद और कष्ट यहीं होते हैं ! 
बहुत कुछ लिखा जा सकता है - नहीं लिख रहा हूँ - कुछ अनुभव बेहद व्यक्तिगत होते हैं और उनका सम्मान करना चाहिए ! 
मै कुछ माँगने या कुछ मन्नत पूरा होने के कारण नहीं गया था - अकेले में खूब एन्जॉय भी किया - कहीं घोड़े पर सवार फोटो खिंचवाया तो कभी पैरों में मरहम पट्टी - किसी दिन...दिन भर भूखा रहा तो किसी दिन सिर्फ मैंगो ड्रिंक्स ! 110 किलोमीटर की यात्रा में - करीब 75-80 किलोमीटर पैदल और बाकी कार में ...बहुत कुछ लिखने को था ...नहीं लिख रहा हूँ ...फिर कभी ..:))
~ २९ जुलाई २०१४ 

सजगता ....

ईश्वर को हर एक इंसान महसूस करता है - जैसे एक क्लासरूम में बैठे ढेर सारे विद्यार्थी - जो विद्यार्थी जितना सजग होगा - उसे शिक्षक की बातें उतनी ही समझ में आयेंगी ! यहाँ ईश्वर एक शिक्षक है ! कई बार या अक्सर शिक्षक कठिन सवाल - सजग और तेज तर्रार विद्याथी से ही पूछता है - कई बार यह इंटेंशन रहता है - पुरे क्लास को बताना - देखो ... यह कठिन सवाल इस विद्याथी से पूछा और इसने सही सही जबाब दिया - यहाँ गौरव दोनों को होती है - शिक्षक और विद्याथी दोनों को ! पर याद रहे - परीक्षा में हर विद्याथी बैठेगा ..:)) सवालों से मत डरिये ....थोड़ी सजगता बढाईये ....
~ २९ मई २०१४ 

मजबूत मन ....

ईश्वर ने धरती पर जन्म दिया है - फिर सम्बन्ध तो बनेंगे ही ! हर तरह के सम्बन्ध - हर वजन के सम्बन्ध - हर तरह के सम्बन्ध - इंसान का इंसान के साथ सम्बन्ध -इंसान का समाज के साथ सम्बन्ध - इंसान का प्रकृती से सम्बन्ध - इंसान का ईश्वर से भी सम्बन्ध ! कहीं कोई दिक्कत नहीं है ! 
दिक्कत तब होती है - जब हमें उस सम्बन्ध में 'ज़लील' किया जाता है - हमारी पवित्र भावनाओं को आगे रख हमारा 'हाथ मरोड़ा' जाता है ! बड़ी मुश्किल के वो क्षण होते हैं - उन्ही मुश्किल क्षणों में - हमारा मन न जाने कहाँ से एक मजबूती लेकर आता है - मुझे नहीं लगता - द्रौपदी के लिए कृष्ण आये होंगे - द्रौपदी ने कृष्ण को पुकारा होगा - कृष्ण ताकत का प्रतीक बन के - द्रौपदी के मन में समा गए होंगे - वही मजबूत मन - महाभारत दिखा दिया ...
कमज़ोर वो बाहें नहीं होती - जिसे आप मरोड़ रहे होते हैं - कमज़ोर वो मन होता है ! कमज़ोर वो इंसान नहीं होता - जिसे आप 'ज़लील' कर रहे होते हैं - कमज़ोर उसका वक्त होता है ! 
जिस दिन उसका मन मजबूत हो गया - जिस दिन उसका भी वक़्त आ गया - आप कहाँ होंगे ? 
कभी सोचियेगा ...:))

~ १६ दिसंबर २०१३ 

ईश्वर ....

..तो कल बात हो रही थी ..ईश्वर के आकार की ...
हम ईश्वर को कब जोर से याद करते हैं या पुकारते हैं ..संभवतः 'अत्यंत खुशी या पीड़ा में' ...जब हमें 'अत्यंत' खुशी मिलती है ..हम ईश्वर को याद करते हैं ..आँखें बंद कर के उनको धन्यवाद देते हैं ...या फिर जब 'अत्यंत' पीड़ा में हों ..ईश्वर को पुकारते हैं ..एकदम दिल से ...दोनों हालात में ...हम किसी आकार को याद / पुकारते नहीं हैं ...बस उस अदृश्य शक्ती को ...हम कोई मंत्रोचारण नहीं करते हैं ...बहुत कम बार ऐसा होता है ...गौरतलब है ...बात मैंने 'अत्यंत पीड़ा' की है और अत्यंत पीड़ा या खुशी दोनों का सम्बन्ध सीधे दिल से है ! इंसान कमज़ोर होता है - जब उसे अत्यंत खुशी मिलती है - उसे लगता है - शायद वो उसका हकदार नहीं है - तब वो ईश्वर को धन्यवाद देता है - जब उसे अत्यंत पीड़ा होती है - उसे लगता है - हे ईश्वर ..मैंने क्या किया ..जो तूने मेरे साथ ऐसा किया ..अब आओ मुझे संभालो ..ईश्वर आता है या नहीं ..पर ऐसे ही किसी दूसरी दुःख की पीड़ा में आप उसे उतनी जोर से नहीं पुकारते हैं ..ईश्वर आया और आपको दुःख सहने की शक्ती दे गया ...
फिर ईश्वर का यह आकार कहाँ से आया - जहाँ तक मै समझता हूँ - भारतवर्ष का ईतिहास बहुत पुराना रहा है - और जब ईन्सान ईश्वर को खोज नहीं पाया - फिर वो आकार देने लगा होगा - "दरअसल जहाँ आनंद है - वहीँ ईश्वर है " - शायद यही कारण रहा होगा - जहाँ कहीं भी किसी को आनंद की अनुभूती हुई - उसने उसी चीज़ को 'ईश्वर' का आकार दे दिया - और दिल को आनंद कहीं भी मिल सकता है - तभी तो चौरासी करोड़ देवी देवता बना दिए गए .. :)) "प्रेम में भी परम आनंद मिलता है - तभी तो उसको पूजा कहते हैं " ! 
मैंने अपने व्यक्तिगत जीवन में कभी भी किसी अवतार की पूजा नहीं की है ...शायद यही कारण है ..खुद के जीवन दर्शन में ...खुद को धर्म से ऊपर रखा हूँ ...अब जन्म एक हिन्दू परिवार में हुआ है ...कुछ तो मानना होगा ..."ब्रह्मा - विष्णु - महेश - सरस्वती - लक्ष्मी - दुर्गा " - बात ख़त्म ! अवतारों की पूजा क्यों - जब भगवान् भी इंसान रूप में आ गए - फिर तो वो भी मेरे जैसे ही हो गए - बचपन से यही सिखाया गया - गाँव / पट्टीदार में दूसरों के दरवाजे पर मत जाओ - भले वो तुमसे कितना भी बड़ा क्यों न हो - सामाजिक हैसियत तो बराबर ही है ..:)) 
जब खुद को उस परात्मा से 'कनेक्ट' करना ही है - फिर वाया - मार्फ़त क्यों - दालान पर बहुत पहले ही मैंने एक कहानी का उल्लेख किया था - कैसे कुछ अबोध लोग गलत मंत्रोचारण करते हुए भी 'शक्ती' को पा लेते हैं और कुछ लोग आजीवन मंत्र ही पढ़ते है - कुछ नहीं होता ! 
जब सारा खेल 'पवित्र मन' का ही है - फिर सारा ध्यान उस पर ही क्यों नहीं - क्यों नहीं 'मन का योग' - जब सारी खुशी वहीँ से मिलनी है - पर इंसान कमज़ोर - करे भी तो क्या करे - खुद से कितना रास्ता तलाशे - कोई बना बनाया हुआ रास्ता मिल जाए और वो झट पट दौड़ पड़े ....:))
~ 25 September 2013 

Wednesday, September 24, 2014

सावन में भींगे शब्द ....

सावन का ...हर पहर...हर पल...कुछ भींगा भींगा सा रहता है...कल के भींगे ख्वाब आज भी भींगे हुए हैं ...सूख जाएँ तो इन्हें पहन लूँ ...फिर से भींग जायेंगे ...कुछ बूँदें मेरी कलम की स्याही में जा मिले हैं ...अब सारे शब्द भी कुछ भींगे - भींगे से दिखते हैं ...फुर्सत में पढना ...मेरे कुछ भींगे शब्द ....
~ RR
१८ अगस्त २०१३ 

बादलों से घिरा आसमां......

बादलों से घिरा आसमां भी तो कभी जी भर भींगने को तरसता होगा ...
सावन में मेरी धरती की हरियाली को देख थोडा तो जरुर जलता होगा ...:)) 
~ RR
1 August 2013 

तेरा साथ निभाएंगे ....

बादलों का क्या ..
थोड़ी सी तपिश में
पिघल जायेंगे
बरस जायेंगे
ओझल हो जायेंगे
हम तो सूरज हैं
हर रोज नज़र आयेंगे
जीवन के हर मौसम में
तेरा साथ निभाएंगे
~ RR
10 June 2013 

कज़िन .....

बचपन बड़ा सुहाना होता है ! अपना घर हो या ननिहाल - ढेर सारे हमउम्र कजिन - लड़ाई झगडा - खेल कूद - उठा पटक ! कुछ कजिन बहुत करीब होते थे - ऐसा लगता जैसे इनके बिना जीवन की कल्पना बेकार - पर हमउम्र - कभी न कभी - कुछ हो ही जाता - मुह फुलाने से लेकर - फैटा फैटी तक ! 
कभी कभी मेरी भी गलती होती थी - यहाँ 'माँ' का रोल बड़ा सुन्दर - किसी भी हाल में - मुझे बोलतीं - जाईये ..रंजू ..माफी मांग लीजिये - माफी मांग लेने से आप छोटे नहीं हो जाईयेगा - शुरू में एक झिझक होती थी - फिर माँ की बात सही लगी ! मै चुपके से अपने कजिन के पास जाता और कान पकड़ माफी मांग लेता - क्या भोलापन उम्र था - सेकेण्ड तो लम्बा होता है - सेकेण्ड से सौवें हिस्से में माफी मिल जाती - फिर से उठापटक - हुडदंग ! मालूम नहीं हम कब बड़े हो गए - लोगों से 'माफी' मिलना बंद हो गया - वो सारे भोले रिश्ते को अहंकार ने दीमक की तरह खा लिया !

११ अक्टूबर - २०१२ 

.........माँ.......

कश्मीरी आया होगा - शाल बेचने ! माँ, चाची , मामी , फुआ , पड़ोस वाली आंटी लोग सब लोग उसको घेर के बैठ गए होंगे ! उसके गठरी की एक - एक शाल को देख रहे होंगे ! माँ भी दो शाल ली होगी - सस्ता ! पश्मीना कभी देखा नहीं - ख़रीदा नहीं - छुआ नहीं - ओढा नहीं ! पूछने पर् बोलेगा - पचास हज़ार से शुरू ही होता है ! पश्मीना के नाम पर् 'पश्मीना मिक्स' कोई दो तीन हज़ार में बेच जायेगा ! इस् बार छुट्टी में घर जाऊंगा तो माँ वो शाल मुझे दिखाएंगी - फिर बातों बातों में नानी का जिक्र आएगा - कहेंगी - नानी पश्मीना रखती थी - सोना के फ्रेम वाला चश्मा के साथ - नानी की एक तस्वीर माँ के अलमीरा में रखी हुई है - पश्मीना शाल ओढ़े हुए - उसी चश्मा के साथ - मै बचपन में हँसता था - माँ , ब्लैक एंड व्हाईट फोटो में ..चश्मा सोना का है या लोहा है - कैसे पता चलता है ..... ! सिर्फ बाप दादा का ही क्यों - मेरे इस खून में - माँ , नाना नानी भी तो बसते हैं - सब कुछ बिखर गया है - धत्त ..खून भी कभी बिखरता है ? वो तो रगो में दौड़ता है या फिर .....ब्लीड करता है ! 
अरे.....हाँ ....कश्मीरी फिर अगले साल ...नए शाल के साथ आएगा ! :))
~ ५ दिसंबर २०१२