Thursday, September 25, 2014

प्रेमपत्र ....

एक प्रेमपत्र ....
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तुम्हे याद है ...तुम पहली दफा विदेश जा रहे थे ...मै तुमसे मिलने एअरपोर्ट पर आयी थी ...भागती हुई ...तुम ट्रॉली के साथ खड़े मेरे इंतज़ार में ...कितने हैंडसम लग रहे तुम ...ब्लैक गॉगल्स - बैगनी स्ट्रिप की शर्ट और एक इंग्लिश जैकेट में ...कुछ भी तो हम दोनों बात नहीं किये थे ...मै तुम्हारे आँखों में झांकना चाहती थी ..शायद तुम समझ गए थे ...तुमने गॉगल्स को ऊपर कर बालों में फंसा लिया था ...कितनी झांकती तुम्हारे आँखों में ...एक सच्चाई देखनी थी ...तुम्हारी नज़रों में ...कहते हैं ..न ...मर्द की नज़रें झूठी नहीं होती ...उस सच्चाई को देख मेरी नज़रें झुक गयीं ...तुम भी अब टर्मिनल की तरफ देखने लगे ...मेरे पास कुछ नहीं था ..देने को ...मैंने तुम्हे गुलाबों का एक गुलदस्ता दिया था ...वो गुलाबी फूलों का गुलदस्ता ...एअरपोर्ट के पास वाली रेडलाईट से खरीदी थी ...कैब में उसे बिलकुल अपने सीने से चिपका के रखा था ...यह सोच शायद मेरी खुद की खुशबू उन गुलाबों में कैद हो जायेगी ...जब तुम्हारे हाथों में थमाया ...तुमने बड़े प्रेम से उसे सीने से लगा ...थैंकयु कहा था ...फिर मुझे लगा ...फूल तो फूल हैं ...आज नहीं तो कल मुरझा जायेंगे ...बस बड़ी झिझक से ..अपने पर्स से ...वो रुमाल निकाल लिया ...जिसमे तुम्हारा नाम लिखा था ...बस ..एक झटके में तुम्हे दे दिया ...इसबार तुम थैंक यु नहीं बोले थे ...अब शायद एक पल और रुकना भी ..हमदोनो की आवाज़ भर्रा जाती ...तुम ट्रॉली लेकर आगे बढ़ गए ...मै भी एक झटके में मुड गयी ...फिर तुम्हे अन्दर जाते देखा ...शायद सीसे के उस तरफ से तुमने भी देखा होगा ...
फिर तुम्हारी चिठ्ठी आयी ...तुमने लिखा था ...रुमाल को आलमीरा के लॉकर में रख दिया हूँ ..अब ये रूमाल मेरे साथ ही इस दुनिया से जायेगा ...उस चिठ्ठी की ये लाईन हर रोज सुबह पढ़ती हूँ ...वो चिठ्ठी मेरी उंगलीओं के निशाँ से घिस चुकी है .....
मैंने भी तुम्हे चिठ्ठी लिखा था ...तुम्हारे शहर आना चाहती हूँ ...वो तुम्हारे शहर की ख़ूबसूरत नदी के किनारे ...तुम संग बैठ ...देर तक बातें करना चाहती हूँ...बाहों में बाहें डाल कर नहीं ..उंगलीओं को उंगलीओं से फंसा कर ...जैसे हम दोनों एक हैं लेकिन निगाहें उस नदी की तरफ ...फिर तुम्हारे कार में ..तुम्हारे बगल में बैठ ...कार तूम चला रहे और गीअर पर मेरे हाथ ....स्पर्श करना चाहती हूँ..मै तुम्हे ...तुम्हारे हाथों का मेरे हाथों से  ....तुम्हारे शहर को अपनी निगाहों से देखना चाहती हूँ ...
अब तुम बड़े आदमी बन गए हो ...वर्षों बाद ...अखबार में तुम्हारी नाम देख चौंक गयी ...लिखा है ...तुम यहाँ आ रहे हो ...अपने विषय पर कुछ बोलने ....वो तुम ही हो ..न ...
सुनो ....तुम्हारे हर जन्मदिन पर ...एक फूलों का गुलदस्ता अपने डाइनिंग टेबल पर रख देती हूँ ...यह सोच उसकी खुशबू तुमतक जरुर पहुँचती होगी ...और यही सोच मै खुश हो जाती हूँ ...
फिर से एअरपोर्ट पर आना होगा मुझे ...गुलाबी गुलाब के फुलदस्तों के साथ ...तुम्हे फिर से एक बार छोड़ जाने के लिए ...नहीं आना इसबार मुझे ....तुम्हे क्या पता ...किसी को विदा करने का दर्द....

सुनो ...तुम मुझे अब भी पसंद करते हो ..न ...

~ 27 April 2014

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...कल शाम तुम्हारा पत्र मिला ...कई बार पढ़ा ..पढ़ते पढ़ते सो गया ...अभी नींद खुली तो फिर से पढ़ रहा हूँ ...रविवार का दिन है और मेरे म्यूजिक सिस्टम पर तुम्हारा ही पसंदीदा गाना 'आफरीन - आफरीन' बज रहा है ... मेरे सामने तुम्हारी पसंदीदा दार्जिलिंग चाय बगैर चीनी रखी हुई है ...तुमने मेरी कई आदतें बदल डाली और अब तुम्हारी दी हुई आदतों में ही जीने की आदत हो गयी है ...:)) 

हाँ ...मै एक पेपर प्रेजेंट करने तुम्हारे देश आ रहा हूँ ...कितना दर्द होता है ...जब अपने देश को ही पराया जैसा महसूस करना ...तुम खुशनसीब हो जो इस दर्द से मरहूम हो ...यहाँ किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है ...दुनिया के बेहतरीन शहरों में से एक है ...सबकुछ है ...बस सिर्फ एक तुम ही नहीं हो ...
...ज़िंदगी के सफ़र में जिस मुकाम पर तुम मिली थी ....वो शायद मेरे लिए सबसे कमज़ोर समय था ...जिस गर्माहट से तुमने मेरा हाथ पकड़ा था ...आज इतने वर्षों बाद भी अपने हाथों में तुम्हारे हाथों की गर्माहट महसूस कर सकता हूँ ...कितनी उलझी हुई ज़िंदगी थी ...बड़े ही आराम से ..हर पल मेरा साथ निभाते हुए ..तुमने मुझे भंवर से निकाला था ....जैसे कोई माँ अपने सातवें महीने के बच्चे को रुई के फाहा में रखती है ...नज़र के सामने ! प्रेम किस किस रूप में आता है - कहना मुश्किल है ....
अब मै मजबूत हो गया हूँ ..." तुम्हे इंतज़ार करते हुए देखना ...दर्द देता है और अगर तुम इंतज़ार ना करो इसकी कल्पना और भी दर्द ...ऐसा लगता है जैसे एक भंवर से निकाल तुमने दुसरे भंवर में डाल दिया " ...पर ये प्यारा लगता है ...क्योंकी यहाँ एक असीम विश्वास है . 
तुम्हारी चाहतें भी अजीब अजीब सी होती हैं - जैसे मेरे इस शहर की नदी के किनारे मेरे संग बैठना - जब कभी इस नदी के किनारे से गुजरता हूँ - तुम याद आती हो - इसकी तेज़ प्रवाह तुम्हारे प्रेम को याद दिलाती है - जैसे उस नदी को जल्द से जल्द किसी सागर से मिलने की बेचैनी है ....
तुम्हे याद है ....तुमने मेरे जन्मदिन पर एक वैलेट दिया था ...वो आज भी मेरे जींस में पडा रहता है ...उसमे तुम्हारी एक तस्वीर भी है ....एकदम गुलाबी ...:)) घिस गया है पर बहुत लकी है ...उसमे पैसों की कोई कमी नहीं होती ...सच बोल रहा हूँ ...तुम्हे खुश करने के लिए नहीं ...
सुनो...क्या आज भी तुम मेरे दिए हुए स्कार्फ में अपने ओफ्फिस जाती हो ...क्या आज भी तुम्हारे हाथों में वो कंगन चमकता है ...क्या आज भी तुम्हारे मोबाईल का पासवर्ड मेरा जन्मदिन होता है....
सुनो ...तुम मुझे आज भी पसंद हो ...:)) पर ये बताओ ...वो तुम्हारा बुड्ढा बॉस आज भी डोरे डालता है ? ..हा हा हा हा हा ....गुस्साओ नहीं ...:)) तुम्हारे गुस्से से आज भी डर लगता है ...:))
लव यु ...सी यु इन इण्डिया ....
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~ 4 May 2014 

दिनकर जयन्ती

आज राष्ट्रकवी श्री रामधारी सिंह दिनकर की जयन्ती है - जिस कवी की रचनाओं की धूम पुरे विश्व में रही हो - उनपर मै क्या लिखूं या न लिखूं - सिवाय इसके की - उनकी शब्दों को ही दोहराऊँ - वीर रस में डूबे उनके शब्द तो हमेशा से हमारे आपके मन को एक शक्ती देते आये हैं - अनायास ही उनकी जयन्ती की पूर्व संध्या पर उनकी बेहतरीन रचना जिसके लिए उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला - "उर्वशी" को पढ़ा - बड़े इत्मीनान से सारी रात पढ़ा - 'पुरुरवा' और 'उर्वशी' के बीच के संवाद को - 'पुरुरवा' की विशालता को देख ...'उर्वशी' पूछ बैठती हैं - "कौन पुरुष ..तुम" ...यह एक वाक्य का संवाद अपने आप में एक नारी के मन को कह देता है ....अद्वितीय रचना ...जहाँ कल्पना भी रुक जाती है ...थक हार कर शब्दों के साथ बह जाती है ...और उस विशाल सागर में मिल जाती है ...कभी फुर्सत में पढ़ें ...'उर्वशी' ....:))
वहीं से कुछ ...दिनकर जी की श्रधान्जली में ....
पर, न जानें, बात क्या है !
इन्द्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है,
सिंह से बाँहें मिलाकर खेल सकता है,
फूल के आगे वही असहाय हो जाता ,
शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता.
विद्ध हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से
जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से.
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"रूप की आराधना का मार्ग
आलिंगन नहीं तो और क्या है?
स्नेह का सौन्दर्य को उपहार
रस-चुम्बन नहीं तो और क्या है?"
सिर्फ शब्दों के हेर फेर कर देने से कविता नहीं बन जाती - किसी भी कविता में अपनी कल्पना को उसके हद से भी आगे ले जाना पड़ता है - शब्दों से एक चित्र बनानी पड़ती हैं - और उसे अपने जीवन दर्शन से सजाना पड़ता है ...जो भी देखे मंत्रमुग्ध हो जाए ....
फिर से एक बार फिर ....इस महान साहित्यकार को नमन !
~~ दालान
23 September - 2013 

नारी की करुणा .....

नारी का नारीत्व उसके करुणा में है और मर्द की मर्दानगी उसके जुबान में है ! दोनों अपने अपने इसी गुण के कारण ही अपनी जंग जीतते या हारते हैं - राजा दशरथ ने कैकेयी को वचन दे दिया - प्रिय पुत्र को वनवास पर भेज दिया - सीता भिक्षुक वेश में राक्षस के लिए अपनी करुणा रोक नहीं पायी - फिर बाकी का रामलीला लिखा गया ! 
महाभारत में कौरवों का अपनी जुबान से फिसलने के कारण कुरुक्षेत्र में आज तक का सबसे बड़ा युद्ध लड़ा गया ! आसान नहीं होता है अपनी जुबान का खुद से रक्षा करना - कभी कभी खून सुख जाता है और फिर जब आप अपने ही शब्दों की रक्षा करने में सफल होते हैं - दुनिया को क्या दिखाना - खुद आपका अपना मन आपका अभिनन्दन करता है - यहीं आपको शांती मिलती है ! 
सृष्टी ने नारी को जननी बनाया - यह करुणा यहीं से आया - किसी के रोकने से यह करुणा नहीं रुकने वाला - वो माँ है - जनम देना उसके स्वभाव में है और जन्म तभी देगी जब वो करुणा में भींगी खडी होगी ! 
हां ...अब कोई पुरुष किसी नारी के करुणा को भाव नहीं दे ...कोई नारी किसी पुरुष के जुबान को अहमियत न दे ...फिर मुश्किल है ...:)) 
अब उलटफेर कर के भी आशा नहीं कीजिए ...एक पुरुष से करुणा का आशा मत कीजिए और एक नारी से जुबान - वो जो बोले चुप चाप सह लीजिये - फिर देखिये - आप उसके करुणा में बह के प्रेम के किस अथाह सागर में जायेंगे - कितना भी डूबेंगे ...कम ही लगेगा ...:))

~ १० मई - २०१३ 

स्त्री - पुरुष

अमरीकी लेखक ..रॉबर्ट जॉर्डन लिखते हैं - "पुरुष भूल तो जाते हैं पर कभी माफ़ नहीं कर पाते - वहीँ महिलायें माफ़ तो कर देती हैं पर भूल नहीं पातीं" ...:)) यहीं से शुरू होता है ...पुरुष और महिला का आपस का द्वंध ...पुरुष कहता है - जब मै सबकुछ भूल सकता हूँ ..फिर तुम क्यों नहीं ...महिला पलट कर जबाब देती हैं - जब मै सबकुछ माफ़ कर सकती हूँ फिर तुम क्यों नहीं ...:)) 
दोनों का मूल स्वभाव अलग है ...फिर भी एक जिद है ...वो मेरे जैसा क्यों नहीं ...पुरुष उस महिला को आदरणीय बनाना चाहता है ....जो उसकी गलतीओं को माफ़ कर दे ...जो अपने अतीत को भूल कर मुझमे समा जाए ...वहीँ दूसरी ओर महिला कहती है - पूजा उसी की करूंगी ...जो मेरी गलतीओं को माफ़ कर दे ...वही विशाल ...! 
द्वन्द जारी है ...महिला का मन समुन्दर ...न जाने तह में क्या क्या छिपा ...पुरुष की जिद ...समुन्दर में सिर्फ मै ही रहूँ ...वश चले ..पुरे समुन्दर को सोख ले ...जिद में पी जाये ...खाली कर दे समुन्दर और उसमे खुद समा जाए ...महिला की जिद ..पुरुष के ह्रदय को चीर दे ...इतना छोटा कर दे ..जिसमे उसके अलावा कोई और न समा पाए ...:))
बस खेल महिला के 'मन' का और पुरुष के 'ह्रदय' का - महिला कहे ...मन में बहुत कुछ पर ह्रदय में सिर्फ तुम ही हो ...पुरुष कहे ...मन में सिर्फ तुम ही तुम ...पर ह्रदय में बहुत कुछ ...
पुरुष महिला के मन में सिर्फ खुद को देखने को बेकरार ...वहीं दूसरी ओर महिला पुरुष के ह्रदय में सिर्फ और सिर्फ खुद को देखने को बेक़रार ...
यह खेल सदिओं पुराना है ...और यह खेल सदिओं तक चलेगा ...:)) 
पर मेडिकल साईंस कहता है - दोनों में मेल / फिमेल का हारमोन - अर्धनारीश्वर का कांसेप्ट - थोडा तुम मेरी तरह सोचो - थोडा हम तुम्हारी तरह सोचें - ...देखो ..आगे सफ़र सुहाना है ..:))


~ ४ मार्च २०१४ 

दुर्गापूजा - २०१३

धर्म एक विशुद्ध फिलोसोफी है - जीवन को जीने का आधार ! जीवन में मजबूत और कमज़ोर दोनों तरह के समय आते हैं - मजबूत इंसान वही है जो इन दोनों समय में धर्म को जीवन दर्शन समझ खुद को मजबूत बनाए रखे ! 
ईश्वर तो एक ही है - यह सत्य है ! आम इंसानों के वश का बात नहीं जो बिना आकार वाले एक सत्य को स्वीकार कर सके ! जब यह सत्य आप स्वीकार कर लेंगे - कई चीज़ों से ऊपर उठ सकते हैं - मसलन लिंग / जाति इत्यादी ! 
पर जीना तो हमें इस धरती पर ही एक आम इंसान के रूप में है - फिर हमें एक 'जीवन दर्शन' चाहिए ! यहाँ धर्म हमें सहारा देता है ! 
इस नवरात्र हम शक्ति की पूजा करते हैं - शक्ति के हर रूप की पूजा करते हैं - जहाँ कहीं भी हमें शक्ति का आभास हुआ - उसको हमने पूज दिया ! और यह प्रक्रिया सिर्फ एक दिन की नहीं है - हज़ारों साल से चली आ रही इस प्रक्रिया में हम आप जैसे लोग कुछ न कुछ जोड़ते चले आ रहे हैं ! 
दरअसल यह पूजा 'स्त्री के स्वाभिमान' की होती है - प्रकृती ने पुरुष को बलशाली बनाया - उसको भक्षक बनाया - उसको रक्षक भी बनाया - फिर 'स्त्री के स्वाभिमान' की रक्षा का कर्तव्य / धर्म भी उसका ही है ! महिषासुर भक्षक प्रवृती को दर्शाता है - वहीं वो सारे देव जिन्होंने 'दुर्गा' को सजाया - वह एक रक्षक प्रवृती को दिखाता है ! 
पर पुरुष तो बलशाली है - अहंकारी है - स्त्री को पुजेगा - उसके स्वाभिमान की रक्षा भी करेगा - पर ...किस रूप में ..:)) ? कौन से रूप के आगे वो नतमस्तक होगा ? ...जब स्त्री उसके जीवन में एक माँ के रूप में आती है ....बात यहाँ कोख की नहीं है ...कहते हैं ..न ...एक पत्नी / प्रेमिका को अपने पुरुष के लिए वो सारे रूप दिखाने होते है ...और अंत में माँ के रूप में भी ..आकर ...पुरुष को हमेशा के लिए झुका देना होता है ...और जब तक अहंकार नतमस्तक नहीं हुआ ...पूजा तो शुरू ही नहीं हुई ....:))
~ दुर्गापूजा - २०१३ 

गुलज़ार से मुलाक़ात

कल्पनाओं के शिखर पर एक अबोध तमन्ना बैठी होती है - उसकी अबोधता को देख ईश्वर उसे अपने गोद में बैठाते हैं - फिर वो तमन्ना एक दिन हकीकत बन बैठती है...:)) 

आज का दिन बेहतरीन रहा - कल देर रात तक जागने के बाद - सुबह नींद ही खुली 'रविश' की आवाज़ से - नहाते धोते ...थोड़ी देर हो ही गयी ..झटपट भागा ...रविश स्टेज पर बैठे थे ..वहीं से हाथ हिलाया ..मै भी सबसे पिछली कतार में बैठ गया ...तब तक एक आवाज़ आयी "आप दालानवाले हैं ..न " - एक तस्वीर खिंचवानी है आपके साथ ...ये थे आभाश भूषण - दालान को चाहने वाले ...फिर वो दोनों पति पत्नी मेरे साथ फोटो खिंचवाए - बेहद सज्जन और उन्दोनो ने बताया - दालान पर दी गयी सुचना कारण ही वो दोनों यहाँ आये ..:))
रविश का सत्र ख़त्म होने के साथ - उनका दूसरा सत्र शुरू होने वाला था - इसमे कोई दो राय नहीं - रविश काफी लोकप्रिय हैं - कई नौजवान उनके साथ फोटो खिंचवाने को बेताब थे - मेरी वेश भूषा देख - उनके प्रशंसक भी "दालान" वाले समझ गए ..:)) बढ़िया लगा ...
रविश के दुसरे सत्र के ठीक पहले आये - "गुलज़ार" ..झटपट भागा - दोनों हाथ से उनके पैर छू कर आशीर्वाद लिया - आभास भूषण समझ गए - उन्होंने बाद में गुलज़ार के साथ मेरी कुछ तस्वीरें लीं ..गुलज़ार के साथ थे - ओम थानवी जी - मै क्या बोलता - भाव विभोर था - बस एक लाईन सुना पाया - "सारी रात मेरे शब्द जलते रहे - वो पत्थर से मोम बनते रहे..:)) गुलज़ार के ठीक पीछे बैठ - रविश का दूसरा सत्र - जिसके वो बादशाह जाने जाते हैं - नोस्टैल्जिया ..मेरा भी पसंदीदा ...उनके साथ थे - अंग्रेज़ी और डेनिश के लेखक - "तबिश खैर" - ताबिश सभी भाषा प्रयोग कर रहे थे - रविश अपनी हिंदी और भोजपुरी ...रविश बोलते बोलते - "छठ पूजा की यादों" पर बोलना शुरू कर दिए - डर था - कहीं फिर से वो मेरा नाम न बोल बैठें ..:)) रविश संभले - शुक्रगुज़ार रहता हूँ - हर ऐसे समाचार पत्र के लेख में वो मेरा नाम ठूंस ही देते हैं ...
रविश को लोग घेरे हुए थे - मैंने बोला - रविश ..मैंने पटना म्यूजियम नहीं देखा है ...और आज आप मेरे गाईड बन के ..मुझे घुमाएं .. रविश तैयार हुए ..हम दोनों अकेले निकल पड़े ...घूम कर लौटे तो ...पवन कार्टूनिस्ट और उनकी पत्नी रश्मी दोनों रविश को अपने कार्टून का एक बेहद बढ़िया गिफ्ट ...इसी बीच ..टेलेग्राफ़ के रोविंग एडिटर 'संकर्षण ठाकुर' मिल गए - बोले ..रंजन ..मेरी भी किताब का आज लोकार्पण है - आप आईये - संकर्षण बेहद आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक हैं - अपने साथ वालों से परिचय कराने लगे - रंजन को पढने से ज्यादा सुनने में मजा आता है ...:))
फिर हम और रविश संकर्षण ठाकुर के किताब जो नितीश कुमार के ऊपर छपी है ...के लोकार्पण में चले गए - ढेर सारी गप्प - व्यक्तिगत बातें ...वहां से निकले तो ...रविश के साथ पटना का सैर ...फिलोसोफी ...फिलोसोफी और फिलोसोफी ...ढेर सारी गाईडलाईन ...दोनों तरफ से ...:))
~ १५ फरवरी २०१४

बाबाधाम यात्रा

बाबाधाम यात्रा : 
ईश्वर का कोई रूप नहीं - हर धर्म से ऊपर की वो अदृश्य शक्ती है - जिसे इस धरती का हर एक कण समझता है - इंसान आया - परिवार बना - समाज का गठन हुआ होगा - फिर धर्म बना होगा - आकार के जिद में जिस हर चीज़ में इंसान को आनंद महसूस हुआ होगा - इंसान उस रूप में भगवान् की रचना कर दिया - ग्रंथों में लिख दिया - यह प्रोसेस हजारों साल पुराना है - आगे हज़ारों साल तक चलेगा ! 
हर एक धर्म में भगवान् तक पहुँचने / दर्शन के लिए कुछ मील लम्बे पैदल यात्रा का प्रचलन है - हज यात्रा है - बाबाधाम है - वैष्णो देवी - केरला में अयेप्पा मंदिर - कैलाश मानसरोवर / अमरनाथ इत्यादी ! इसका कुछ अध्यातिक और दार्शनिक महत्व रहा होगा - तभी ऐसी यात्राएँ सैकड़ों साल से प्रचलन में है ! 
मैंने कल ही करीब 110 किलोमीटर की लम्बी बिहार में सुल्तानगंज से देवघर की यात्रा की ! बहुत कुछ महसूस किया - लिखना चाहूँगा ! आपमें से कई लोगों को यह अनुभव रहा होगा ! 
जल उठाने के बाद - हम करीब चालीस लोग एक साथ चल पड़े - बस कुछ कदमों के बाद - हम सब में दूरी बनने लगी - कोई तेज़ रफ़्तार से तो कोई धीमी रफ़्तार से ! जिसकी रफ़्तार आपके बराबर है - आप उसके साथ ! "शरीर थकने लगता है - मन उत्साहित रहता है " ! कुछ और किलोमीटर चलने के बाद - आपका मन भी थकने लगता है - जब मन थोड़ा भी थकता है - शरीर तेज़ी से आपके मनोबल को नीचे करता है " - यहीं से असल खेल शुरू होता है - अब आप बिलकुल अकेले हो जाते हैं - मन कहीं एक ऐसी जगह केन्द्रित हो जाता है - जहाँ या तो आपको अत्यंत सुख मिल रहा होता है या दुःख ! पहला अनुभव - हज़ारों लोग आपके साथ पर आप एकदम अकेले ! दूसरी रात - दम टूटने लगा - पुरी टीम दो घंटे पहले ही किसी धर्मशाला में - अब बस तीन किलोमीटर और जाना है - पर एक कदम भी चलना मुश्किल ! 
हर रोज मात्र तीन घंटे ही नींद - किसी धर्मशाला में - एक प्लास्टिक बिछा के - बिना तकिये ! मै बुरी तरह अन्दर से हिल चुका था - एक पूरा दिन अपनी यात्रा गाडी से किया और एक धर्मशाला में अकेले दिन भर रुका ! कई मंथन और विचार ! फिर अगले दिन अकेले - पर पिछले दिन के "सिख" के साथ - कल के अनुभव को जो सिखा उसके बल पर अगला दिन ! 
खैर सोमवार को सुबह के प्रथम दर्शनार्थी होने का अवसर मिला - बिहार सरकार के कुछ एक मंत्री भी साथ में थे - पर अनुभव बेमिशाल था ! अंतिम चरण में बहुत कुछ समझ में आया - क्यों हर ऐसी लम्बी यात्रा में कुछ शब्द दोहराने को बोला जाता है - जैसे "बोल बम" - ऐसी जोर से बोले गए शब्द - आपके मन को केन्द्रित करते हैं ! 
दरअसल "मन ही ईश्वर" है - सारा खेल यहीं होता है - सारा दुःख या सुख यहीं विराजमान होता है - सारा आनंद और कष्ट यहीं होते हैं ! 
बहुत कुछ लिखा जा सकता है - नहीं लिख रहा हूँ - कुछ अनुभव बेहद व्यक्तिगत होते हैं और उनका सम्मान करना चाहिए ! 
मै कुछ माँगने या कुछ मन्नत पूरा होने के कारण नहीं गया था - अकेले में खूब एन्जॉय भी किया - कहीं घोड़े पर सवार फोटो खिंचवाया तो कभी पैरों में मरहम पट्टी - किसी दिन...दिन भर भूखा रहा तो किसी दिन सिर्फ मैंगो ड्रिंक्स ! 110 किलोमीटर की यात्रा में - करीब 75-80 किलोमीटर पैदल और बाकी कार में ...बहुत कुछ लिखने को था ...नहीं लिख रहा हूँ ...फिर कभी ..:))
~ २९ जुलाई २०१४ 

सजगता ....

ईश्वर को हर एक इंसान महसूस करता है - जैसे एक क्लासरूम में बैठे ढेर सारे विद्यार्थी - जो विद्यार्थी जितना सजग होगा - उसे शिक्षक की बातें उतनी ही समझ में आयेंगी ! यहाँ ईश्वर एक शिक्षक है ! कई बार या अक्सर शिक्षक कठिन सवाल - सजग और तेज तर्रार विद्याथी से ही पूछता है - कई बार यह इंटेंशन रहता है - पुरे क्लास को बताना - देखो ... यह कठिन सवाल इस विद्याथी से पूछा और इसने सही सही जबाब दिया - यहाँ गौरव दोनों को होती है - शिक्षक और विद्याथी दोनों को ! पर याद रहे - परीक्षा में हर विद्याथी बैठेगा ..:)) सवालों से मत डरिये ....थोड़ी सजगता बढाईये ....
~ २९ मई २०१४ 

मजबूत मन ....

ईश्वर ने धरती पर जन्म दिया है - फिर सम्बन्ध तो बनेंगे ही ! हर तरह के सम्बन्ध - हर वजन के सम्बन्ध - हर तरह के सम्बन्ध - इंसान का इंसान के साथ सम्बन्ध -इंसान का समाज के साथ सम्बन्ध - इंसान का प्रकृती से सम्बन्ध - इंसान का ईश्वर से भी सम्बन्ध ! कहीं कोई दिक्कत नहीं है ! 
दिक्कत तब होती है - जब हमें उस सम्बन्ध में 'ज़लील' किया जाता है - हमारी पवित्र भावनाओं को आगे रख हमारा 'हाथ मरोड़ा' जाता है ! बड़ी मुश्किल के वो क्षण होते हैं - उन्ही मुश्किल क्षणों में - हमारा मन न जाने कहाँ से एक मजबूती लेकर आता है - मुझे नहीं लगता - द्रौपदी के लिए कृष्ण आये होंगे - द्रौपदी ने कृष्ण को पुकारा होगा - कृष्ण ताकत का प्रतीक बन के - द्रौपदी के मन में समा गए होंगे - वही मजबूत मन - महाभारत दिखा दिया ...
कमज़ोर वो बाहें नहीं होती - जिसे आप मरोड़ रहे होते हैं - कमज़ोर वो मन होता है ! कमज़ोर वो इंसान नहीं होता - जिसे आप 'ज़लील' कर रहे होते हैं - कमज़ोर उसका वक्त होता है ! 
जिस दिन उसका मन मजबूत हो गया - जिस दिन उसका भी वक़्त आ गया - आप कहाँ होंगे ? 
कभी सोचियेगा ...:))

~ १६ दिसंबर २०१३ 

ईश्वर ....

..तो कल बात हो रही थी ..ईश्वर के आकार की ...
हम ईश्वर को कब जोर से याद करते हैं या पुकारते हैं ..संभवतः 'अत्यंत खुशी या पीड़ा में' ...जब हमें 'अत्यंत' खुशी मिलती है ..हम ईश्वर को याद करते हैं ..आँखें बंद कर के उनको धन्यवाद देते हैं ...या फिर जब 'अत्यंत' पीड़ा में हों ..ईश्वर को पुकारते हैं ..एकदम दिल से ...दोनों हालात में ...हम किसी आकार को याद / पुकारते नहीं हैं ...बस उस अदृश्य शक्ती को ...हम कोई मंत्रोचारण नहीं करते हैं ...बहुत कम बार ऐसा होता है ...गौरतलब है ...बात मैंने 'अत्यंत पीड़ा' की है और अत्यंत पीड़ा या खुशी दोनों का सम्बन्ध सीधे दिल से है ! इंसान कमज़ोर होता है - जब उसे अत्यंत खुशी मिलती है - उसे लगता है - शायद वो उसका हकदार नहीं है - तब वो ईश्वर को धन्यवाद देता है - जब उसे अत्यंत पीड़ा होती है - उसे लगता है - हे ईश्वर ..मैंने क्या किया ..जो तूने मेरे साथ ऐसा किया ..अब आओ मुझे संभालो ..ईश्वर आता है या नहीं ..पर ऐसे ही किसी दूसरी दुःख की पीड़ा में आप उसे उतनी जोर से नहीं पुकारते हैं ..ईश्वर आया और आपको दुःख सहने की शक्ती दे गया ...
फिर ईश्वर का यह आकार कहाँ से आया - जहाँ तक मै समझता हूँ - भारतवर्ष का ईतिहास बहुत पुराना रहा है - और जब ईन्सान ईश्वर को खोज नहीं पाया - फिर वो आकार देने लगा होगा - "दरअसल जहाँ आनंद है - वहीँ ईश्वर है " - शायद यही कारण रहा होगा - जहाँ कहीं भी किसी को आनंद की अनुभूती हुई - उसने उसी चीज़ को 'ईश्वर' का आकार दे दिया - और दिल को आनंद कहीं भी मिल सकता है - तभी तो चौरासी करोड़ देवी देवता बना दिए गए .. :)) "प्रेम में भी परम आनंद मिलता है - तभी तो उसको पूजा कहते हैं " ! 
मैंने अपने व्यक्तिगत जीवन में कभी भी किसी अवतार की पूजा नहीं की है ...शायद यही कारण है ..खुद के जीवन दर्शन में ...खुद को धर्म से ऊपर रखा हूँ ...अब जन्म एक हिन्दू परिवार में हुआ है ...कुछ तो मानना होगा ..."ब्रह्मा - विष्णु - महेश - सरस्वती - लक्ष्मी - दुर्गा " - बात ख़त्म ! अवतारों की पूजा क्यों - जब भगवान् भी इंसान रूप में आ गए - फिर तो वो भी मेरे जैसे ही हो गए - बचपन से यही सिखाया गया - गाँव / पट्टीदार में दूसरों के दरवाजे पर मत जाओ - भले वो तुमसे कितना भी बड़ा क्यों न हो - सामाजिक हैसियत तो बराबर ही है ..:)) 
जब खुद को उस परात्मा से 'कनेक्ट' करना ही है - फिर वाया - मार्फ़त क्यों - दालान पर बहुत पहले ही मैंने एक कहानी का उल्लेख किया था - कैसे कुछ अबोध लोग गलत मंत्रोचारण करते हुए भी 'शक्ती' को पा लेते हैं और कुछ लोग आजीवन मंत्र ही पढ़ते है - कुछ नहीं होता ! 
जब सारा खेल 'पवित्र मन' का ही है - फिर सारा ध्यान उस पर ही क्यों नहीं - क्यों नहीं 'मन का योग' - जब सारी खुशी वहीँ से मिलनी है - पर इंसान कमज़ोर - करे भी तो क्या करे - खुद से कितना रास्ता तलाशे - कोई बना बनाया हुआ रास्ता मिल जाए और वो झट पट दौड़ पड़े ....:))
~ 25 September 2013 

Wednesday, September 24, 2014

सावन में भींगे शब्द ....

सावन का ...हर पहर...हर पल...कुछ भींगा भींगा सा रहता है...कल के भींगे ख्वाब आज भी भींगे हुए हैं ...सूख जाएँ तो इन्हें पहन लूँ ...फिर से भींग जायेंगे ...कुछ बूँदें मेरी कलम की स्याही में जा मिले हैं ...अब सारे शब्द भी कुछ भींगे - भींगे से दिखते हैं ...फुर्सत में पढना ...मेरे कुछ भींगे शब्द ....
~ RR
१८ अगस्त २०१३ 

बादलों से घिरा आसमां......

बादलों से घिरा आसमां भी तो कभी जी भर भींगने को तरसता होगा ...
सावन में मेरी धरती की हरियाली को देख थोडा तो जरुर जलता होगा ...:)) 
~ RR
1 August 2013 

तेरा साथ निभाएंगे ....

बादलों का क्या ..
थोड़ी सी तपिश में
पिघल जायेंगे
बरस जायेंगे
ओझल हो जायेंगे
हम तो सूरज हैं
हर रोज नज़र आयेंगे
जीवन के हर मौसम में
तेरा साथ निभाएंगे
~ RR
10 June 2013 

कज़िन .....

बचपन बड़ा सुहाना होता है ! अपना घर हो या ननिहाल - ढेर सारे हमउम्र कजिन - लड़ाई झगडा - खेल कूद - उठा पटक ! कुछ कजिन बहुत करीब होते थे - ऐसा लगता जैसे इनके बिना जीवन की कल्पना बेकार - पर हमउम्र - कभी न कभी - कुछ हो ही जाता - मुह फुलाने से लेकर - फैटा फैटी तक ! 
कभी कभी मेरी भी गलती होती थी - यहाँ 'माँ' का रोल बड़ा सुन्दर - किसी भी हाल में - मुझे बोलतीं - जाईये ..रंजू ..माफी मांग लीजिये - माफी मांग लेने से आप छोटे नहीं हो जाईयेगा - शुरू में एक झिझक होती थी - फिर माँ की बात सही लगी ! मै चुपके से अपने कजिन के पास जाता और कान पकड़ माफी मांग लेता - क्या भोलापन उम्र था - सेकेण्ड तो लम्बा होता है - सेकेण्ड से सौवें हिस्से में माफी मिल जाती - फिर से उठापटक - हुडदंग ! मालूम नहीं हम कब बड़े हो गए - लोगों से 'माफी' मिलना बंद हो गया - वो सारे भोले रिश्ते को अहंकार ने दीमक की तरह खा लिया !

११ अक्टूबर - २०१२ 

.........माँ.......

कश्मीरी आया होगा - शाल बेचने ! माँ, चाची , मामी , फुआ , पड़ोस वाली आंटी लोग सब लोग उसको घेर के बैठ गए होंगे ! उसके गठरी की एक - एक शाल को देख रहे होंगे ! माँ भी दो शाल ली होगी - सस्ता ! पश्मीना कभी देखा नहीं - ख़रीदा नहीं - छुआ नहीं - ओढा नहीं ! पूछने पर् बोलेगा - पचास हज़ार से शुरू ही होता है ! पश्मीना के नाम पर् 'पश्मीना मिक्स' कोई दो तीन हज़ार में बेच जायेगा ! इस् बार छुट्टी में घर जाऊंगा तो माँ वो शाल मुझे दिखाएंगी - फिर बातों बातों में नानी का जिक्र आएगा - कहेंगी - नानी पश्मीना रखती थी - सोना के फ्रेम वाला चश्मा के साथ - नानी की एक तस्वीर माँ के अलमीरा में रखी हुई है - पश्मीना शाल ओढ़े हुए - उसी चश्मा के साथ - मै बचपन में हँसता था - माँ , ब्लैक एंड व्हाईट फोटो में ..चश्मा सोना का है या लोहा है - कैसे पता चलता है ..... ! सिर्फ बाप दादा का ही क्यों - मेरे इस खून में - माँ , नाना नानी भी तो बसते हैं - सब कुछ बिखर गया है - धत्त ..खून भी कभी बिखरता है ? वो तो रगो में दौड़ता है या फिर .....ब्लीड करता है ! 
अरे.....हाँ ....कश्मीरी फिर अगले साल ...नए शाल के साथ आएगा ! :))
~ ५ दिसंबर २०१२ 

Tuesday, September 23, 2014

यूँ ही ....

कभी कभी फेसबुक को थैंक्स बोलने का मन करता है ..कई कारण है ..उनमे से एक ख़ास है ..एक प्लेटफॉर्म का मिलना और जो मन में आया ...लिखते रहना ..पिछले एक सवा साल में खूब लिखा ..जी भर लिखा ...पर अपनी परिधी को कभी लांघने की कोशिश नहीं की ...शब्द से भारी भरकम कुछ नहीं होते ...कठोर शब्दों के दबाब में इंसान दम तोड़ देता है और शब्दों के सहारे इंसान चाँद तक पहुँच सकता है ! 
आभारी हूँ ..वैसे सारे मित्रों का ..जिन्होंने 'दालान' को सिर्फ लाईक ही नहीं किया ...बल्की अपने कमेन्ट / मैसेज और स्नेह से मुझे एक दिशा निर्देशित भी करते रहे ! 
अब जैसे जैसे परिपक्वता बढ़ती जा रही है ..एक अनजान सा जिम्मेदारी एवं दबाब भी है ..अब लोग शब्दों पर गौर फरमाने लगे हैं ..मै कोई हिंदी का विद्वान् नहीं हूँ ...भाषा भी बहुत कमज़ोर है ..पर साहित्य किसी से कम भी नहीं ..शब्द बेहद मामूली हैं पर भावनाओं में इस कदर डूबे होते हैं ..किसी के भी दिल को छू सकते हैं ...:)) इस बात का फक्र है ...:))
~ १५ मई २०१३
मोती के माला की तरह ज़िन्दगी होती है ..कई तमन्नाओं के साथ एक सूत्र में पिरोई हुई ..ये ज़िंदगी ...आहिस्ता आहिस्ता ..एक एक मोती को चुन ...उससे एक माला बनाना ही ज़िंदगी है ...कुछ तमन्नाएँ भगौलिक होती हैं ..कुछ बेहद आंतरिक ..बहुत तमन्ना थी ...जो कुछ लिखता हूँ ...वो अंग्रेज़ी में कैसी दिखेगी ...भाषा नहीं लिखता ...भावनाएँ लिखता हूँ ..और आँखों की जुबान हो या दिल की जुबान ..हर भाषा में एक जैसी ही दिखनी चाहिए ...फिर भी मन तो बच्चा है ...एक तमन्ना छलक गयी ...कैसा दिखता हूँ....उन आखों में ...अंग्रेज़ी वालों के सूट बूट में ...अनुवाद पसंद नहीं ...अनुवाद में लेखनी की आत्मा गायब हो जाती है ...बस कोई सजा से ..संवार दे ...अंग्रेज़ी में ..जो मेरे पास नहीं है ..वो खुद से थोडा जोड़ दे ...पर लेखनी की भाव वही हो ...
इन्ही तमन्नाओं के साथ ....बस यूँ ही ...एक ब्लॉग / पेज ...अंग्रेज़ी में भी ...किसी को हक से बोला ...ये रहा मेरा हिंदी ....जरा अंग्रेज़ी में कर दिखाओ ...उधर से धडाक आया ..ऐसे दिखते हो ..अंग्रेज़ी में ...:)) कोई एहसान नहीं ..ना उसका ना मेरा ..:)) 
हां ...इस अनुवाद के साथ एक टिप्पणी भी आयी - "तुम इतने ओरिजिनल और प्योर लिखते हो ...आसान नहीं है ..अनुवाद" ...:)) बढ़िया लगा ...प्रसंशा कब.. किसे बुरी लगी है ...हा हा हा ...
धीरे धीरे एक दो और अनुवादक जुड़ेंगे ..."दालान" भी सूट - बूट - हैट में दिखेगा ...:))

दिल ....

जब दिल की स्याही में ....कलम डूबेगा ....मालूम नहीं ....क्या क्या लिखेगा ...कभी तेरे अफ़साने तो ....कभी अपने अफ़साने ...कुछ तुम भी पढोगे ...कुछ हम भी लिखेंगे ...यादों के सफर में ...कभी तुम तनहा ..कभी हम अकेले ...जब दिल की स्याही में ....कलम डूबेगा ....मालूम नहीं ....क्या क्या लिखेगा ...कभी तेरे अफ़साने तो ....कभी अपने अफ़साने....
~ दालान
~ २८ अगस्त २०१२ 

ऋतुराज वसंत .....

ऋतुराज वसंत कब से मौसम के दरवाजे पर खट खट कर रहा है ..और ये शरद है ....जो जाने का नाम ही नहीं ले रहा ..अरे भाई निकलो भी ..जाओ भी ..अब अगले साल आना ..इस बार अपनी औकात से ज्यादा रह लिए ..हद हाल है ..अरे ..इसको कोई समझाता क्यों नहीं है ?  देखो तो ..कितना प्यारा वसंत ...बेचारा झिझक में कब से खड़ा है ..कुछ दिन इसको भी रहने दो ..गर्मी आयेगी ..इसको बेइज्जत कर के भगा देगी ...चुप चाप निकल जायेगा ..बोलो ..कभी कुछ बोला इसने ? उधर गर्मी इसका हक़ मारती है ..इधर तुम ..! शरद ..अब तुम अजीब सी हरकतें कर रहे हो ...बालकोनी में बैठ ..वर्षा से चुपके चुपके ...हद है..यार ..खुद को कुछ दिन और रोकने का बहाना ..
वसंत ..तुम भी तो यार ..इतने कमज़ोर से ...अरे यार ..तुमसा कोई नहीं ..किप फेथ इन योरसेल्फ ..यु आर द बेस्ट ...ये मै नहीं ..सारी दुनिया कहती है ...चलो ...अब आ भी जाओ ...कमओन यार ...स्माईल प्लीज़ .... :))
@RR

~ 4 Feb - 2013 

मन ....

मन की बातें - मन ही जाने - मन पवित्र - मन अपवित्र - मन साफ़ - मन गन्दा - मन हैवान - मन भगवान् - मन शुद्ध - मन अशुद्ध - मन में शक्ती - मन में भक्ती - मन से प्रेम - मन से घृणा - मन से दुलार - मन से फटकार - मन में सब कुछ - मन में कुछ नहीं ....
ये मन क्या है ...दिल / दिमाग / आत्मा ...ये है ..क्या ? कभी ये इतना चंचल ...सागर के तूफ़ान जैसा तो कभी झील के पानी सा शांत ...कभी ये मेरे वश में ...कभी इसके वश में हम ...मन में विचार - मन में सुविचार - मन में कुविचार ...मन की बातों को जुबान मिल जाए ..जीवन में भूकंप आ जाए ...जुबान न मिले ...अन्दर भूकंप आ जाए ...मन से मानो तो पत्थर भी देवता ...मन से ना मानो तो देवता भी पत्थर ...मन..मन..रे मन ...मन में छुपा ...मन से बाहर ...मन में तुम ...मन में हम ....
जो है ..मन से योगी ...वही है ..असल योगी ...मन को बाँध दिया ...जगत बंध गया ...मन खुला रहा गया ...जीवन को ही चर गया ...मन से अर्पण किया - मन से समर्पण किया - कोयला भी हीरा बन गया ...मन वहीँ बस गया ...जहाँ उसको सुकून मिल गया ...
@RR
~ 29 November 2013
दुनिया में सबसे आज़ाद क्या है - आपका 'मन' ! क्या क्या सोचता है और क्या क्या नहीं सोचता है  कहाँ नहीं जाता है और कहीं नहीं रुकता है ! जहाँ आप नहीं जा सकते - आपका आज़ाद मन क्षण में चला जाता है - है कोई जो रोक सके .. :)) कौन बाँध पाया है ..इस मन को - कौन रोक पाया है - इस मन को ! 
मन से राजा - मन से दरिद्र - मन से अपना - मन से पराया - मन से दुश्मन - मन से साथी - मन से नफरत - मन से श्रद्धा ! 
ऐसा लगता है ...जब सब कुछ ...ये मन ही है ...फिर बाकी क्या है ?? :))) 
~ RR
~ २९ सेप्टेम्बर - २०१२ 


कभी कभी एक लम्बी छुट्टी पर जाने को मन करता है ...कहीं किसी पहाड़ पर ...एक रूम वाले गेस्ट हाउस में ...जिसकी खिड़की एक हरे भरे पहाड़ की तरफ खुलती हो ...बारिश का मौसम हो ...और मेरे संग कोई न हो ! एक कमरा ...जिसमे सैकड़ों हिंदी साहित्य और जीवन दर्शन की किताबें ...कमरे में एक तरफ एक खूब ऊँचा ...पलंग ...पलंग में सालों भर लटका हुआ एक मच्छरदानी ....एक तरफ महोगनी की रीडिंग टेबल और कुर्सी ....और एक रामू काका टाईप खानसामा ...जो हर शाम शुद्ध भोजन दें ! 
एक देर सुबह हो ....इतनी देर हो ...जब तक तीन कप चाय ठंडी न हो जाए ....फिर बालकोनी में बैठ ...खूब देर तक पहाड़ों की हरियाली को ताकना ....गर्म चाय के बड़े प्याली को दोंनो हाथ से पकड़ ...कई घंटे पहाड़ों को देखना ...वो हरे भरे पहाड़ और उनके पेड़ जो हलके बारिश की फुहार में भींगे खड़े हैं .....
@RR
20 April 2013 

इश्क .....

....बहुत दबंग होता है ..इश्क ...दरवाजा बंद कर दोगे ...रोशनदान से घुस आएगा ....नहीं घुसने दोगे ....चौखट पर सातों जनम गुजार देगा ...बेहतर है ...उस इश्क को इज्जत के साथ ..अन्दर आने दो ...महसूस करो ....चुप चाप बैठा रहेगा ...कभी कुछ मांगे तो पूछना ...तुम तो इश्क हो ...और इश्क को क्या चाहिए ...या तो सबकुछ या फिर कुछ नहीं ...:)))
वर्ना ...दिल्लगी का ..कोई पहर नहीं होता ...@RR
24 September - 2014
इश्क एक ख़ूबसूरत एहसास है ! मन एक शांत झील की तरह है – तुम्हारी खुबसूरत निगाहें उस पत्थर की तरह हैं जो झील में जाते ही ‘इश्क’ की तरंग पैदा करती है – मै झील के किनारे से उन तरगों को देख खुश हो जाता हूँ – फिर वो तरंग खुद ब खुद शांत हो जाती है – फिर झील के दूसरे किनारे से किसी और ने एक पत्थर फेंक दिया ..ये क्या हुआ ..कह कर झील से दूर चला जाता हूँ .....बहुत दूर ..उस पर्वत पर् ..जहाँ से कोई झील नज़र ना आये ....
@RR
21 फरवरी - २०१४
'इश्क की चाशनी' में डूबे रहते हो ..
ए अजनबी ..बोलो..तुम कौन हो ..
कभी जाने तो कभी अनजाने लगते हो ..
ए अजनबी ..बोलो..तुम कौन हो ..
@RR
१० मार्च - २०१२

Monday, September 22, 2014

आओ ...शब्दों का एक चौपड हो जाए....

आओ ...शब्दों का एक चौपड हो जाए ...कुछ शब्द तुम फेंको ..कुछ मैं फेंकता हूँ ....कुछ बाज़ी तुम हारो ...कुछ मैं हारता हूँ ....कुछ मेरे शब्द.... तुम्हारे जुबान से ...कुछ तुम्हारे शब्द ..मेरी जुबान से...इन शब्दों से बनते रिश्ते को.... सुबह हम पूजे तो ....शाम तुम पूजो ...आओ ...शब्दों का एक चौपड हो जाए...कब सुबह आये ..कब शाम आये ....जो भी आये ..इन शब्दों में लिपटा आये ...आओ ...शब्दों का एक चौपड हो जाए ...इस बार ना तुम हारो ..ना मैं ...ना तुम जीतो ..ना मैं ...
~ दालान
३१ दिसंबर २०१४ 

बरसता तो भादों है ..:))

सावन तो बस मिजाज़ बनाता है - बरसता तो भादों है ..:)) हाँ..मेरे शहर पटना में आज सुबह से ही बारिश हो रही है ..जबरदस्त ...:)) सुबह सुबह वो हलके भींगे अखबार ....बालकोनी के किसी कोने में पड़े ...फिर उन्हें बिछावन पर पसार ...पंखे में सुखा ...पढना ...गाँव से 'मन्टू' आया है ...हर एक घंटे पर बढ़िया दार्जिलिंग चाय बना के दे जा रहा है ....! बच्चे स्कूल नहीं जाना चाह रहे थे ...ठेल ठाल के स्कूल बस पर बैठा दिया ...इस दिलासा के साथ ...स्कूल में बहुत कम बच्चे आयेंगे और जब तुम इस बारिश में भी स्कूल जाओगे ...बढ़िया लगेगा ...दोस्तों से ढेर सारे गप्प का समय मिलेगा ...:))
बारिश भी अलग अलग तरह की होती है ....कई बार आप पलंग पर लेट ...खिड़की से बरसती बूंदों को देखना पसंद करते हैं ...कई बार साईकिल से बारिश में निकल घूमना पसंद करेंगे ...तो कई बार अपने कार से ...तेज रफ़्तार से चल रही वाइपर और आप थोड़े आगे की तरफ झुके ...कई बार आप अपनी बाईक पर ...अकेले या दुकेले ...बारिश की तीखी बूंदों से अपने चेहरे को बचाते ....पीछे बैठी प्रेमिका के दुपट्टे से आप दोनों खुद को समटते ...:)) कई बार अपने बालकोनी के झुलुआ पर बैठे ....एकटक बरसती बूंदों को देखते ....
बारिश तो बारिश ही है ....जैसा आपका मिजाज़ ...बारिश का वैसा मजा ...:))

~ १२ अगस्त २०१४ 

तेरे बड़े ओसारे में .................

बारिश की बूंदों में ....एक छतरी के निचे ....आज फिर तेरी गली - घर का एक चक्कर लगा आया हूँ ...तेरे बड़े ओसारे में रखी ...उस भींगी अकेली कुर्सी पर ...पल भर के लिए अपनी रूह को बैठा आया हूँ ...कुछ तो तुमने भी महसूस किया होगा ...मै फिर से सरेआम भींग आया हूँ ...
~ RR

बारिशों का मौसम.....

आइये मेरे पटना में - बारिशों का मौसम है ..:)) जबरदस्त बारिश हो रही है - मेरे पटना में ...
छाता ....पहले लकड़ी वाला छाता होता था ...जैसा छाता वैसा उस इंसान का हैसियत ...कलकत्ता से छाता आता था ...एक फेमस ब्रांड होता था ...नाम भूल रहा हूँ ...स्प्रिंग एकदम हार्ड ...सब अजिन कजिन उस छाता को खोलने का प्रयास ...किसी का उंगली 'चिपा' गया ...बाकी सब फरार ..:)) फिर आया ..स्टील वाला छाता ...नेपाल से ...बटन वाला....कोई गेस्ट अगर वैसा छाता के साथ आ गया ...इतना न उसका बटन 'पुट-पुटाते' थे ...जैसे ही बटन दबाते वो छाता खुलता ...चेहरे पर एक विजयी मुस्कान ...:)) फिर उसको बंद करो ...फिर बटन दबाओ ...फिर उस छाते को गीली जमीन में उल्टा कर के धंसा देना ...लगता था ..जैसे वहां कोई किला फतह कर लिए ..:)) फिर आया 'लेडिज छाता' फोल्ड वाला ...लाल - नीला - अलग अलग रंग वाला ....घर में छाता नहीं मिल रहा ...कोई हाथ में 'लेडिज छाता' थमा दिया ...बहुत बेइज्जती जैसा लगता था ....हूँ...रोड पर लेडिज छाता लेकर जायेंगे ...हुंह ...कोई देखेगा तो क्या बोलेगा ...हा हा हा हा ...अब वो फोल्ड हो जाने वाला छाता काला मिलने लगा ...यूनिसेक्स हो गया ...एक ही छाता सब लोग यूज करने लगे ...
सीढीघर में ...रेलिंग के सहारे खडा वो छाता ...बूँद - बूँद टपक रहा ..वो छाता ...कोई आया है ...मेरे गाँव से ...

~ १३ अगस्त २०१२ 

..................

तेरी खिड़की से ....देर शाम ....वो जो आधा चाँद दिखता है ....क्या वो तेरी तरह पिघलता भी है ...
~ RR
आज की रात...घुल जाएगा ...वो मीठा मीठा सा चाँद....नमकीन समंदर के साथ ....:)) 
~ RR
किसी रात .....एक रात के साथ ....जाग के देखो ....सुनो ...क्या क्या कहती है ...वो रात ...सारी रात ....
~ RR
२५ अगस्त २०१४
ख्वाब एक आसमां हैं ...
ख्वाब मुठ्ठी में चंद सितारे हैं ...
ख्वाब एक चाँद हैं ...
ख्वाब चेहरे पे फ़ैली चांदनी है ...
ख्वाब एक गुलाब है ...
ख्वाब महकता बाग़ है ...
ख्वाब एक रात है ...
ख्वाब बेफिक्र नींद है ...
~ RR
२८ अगस्त २०१४

दिन का चाँद ....:))

बहते ख्वाब भी कहीं रुक से जाते हैं - थोड़ी देर के लिए ही सही - तेरी आखों में डूब जाते हैं - थर्राते होठों से कुछ निकल पड़ते हैं - रात का इंतज़ार कौन करे ..चाँद भी कभी कभी दिन के नीले आसमां में निकल आता है ...
फिर ...फिजाओं में.. ..कुछ गुलाबी ख्वाब तेरी खुशबू से महक जाते हैं ....:))
~ २५ दिसंबर २०१३ 

पिघलता चाँद .....

नीले आसमां का वो नीला नीला सा प्यारा चाँद... 
सावन पूनम की रात वो कुछ गीला गीला सा चाँद ...
बादलों के संग पुरी रात बूँद बूँद पिघलता वो चाँद ...
सावन पूनम की रात झूले पर संग बैठा वो मेरा चाँद ....:)) 
~ RR

चाँद यूँ खिला ....:))

सुबह होते ही चाँद ओझल हो जाता है ..और सूरज दिन भर खुद की आग में जलता है ....थक - हार ...चाँद के इंतज़ार में ...हर रोज सूरज ..हर शाम ढल जाता है ...
फिर ..रात में ..चाँद ..हर रात सूरज के इंतज़ार में ..निकलता है ...चाँद है ...वो भी थकने लगता है...पर धीरे धीरे..थोडा थोड़ा हर रोज मध्यम ...फिर अमावस्या की रात ओझल ...फिर हिम्मत बाँध ..अगले दिन ..चुपके चुपके ...थोडा ..थोड़ा ..फिर पूनम की रात ...सज धज के ...अपने सूरज के इंतज़ार है ...सूना है ..लोग कहते हैं ...वर्ष के वर्ष बीत गए ...ना वो थका ..ना ये हारा ...सलाम है ...@RR 5 November - 2012 

ए मेरे चाँद ...
ए मेरे फागुन के चाँद ...
आ ..अब धरती पर उतर आ ...
आ.. तेरे गोरे गालों पर थोडा अबीर लगा दूँ ...
आ.. तेरे नीले आसमां को और गहरा कर दूँ .
~ 16 March 2014 



आज पूनम की रात है ..सुना है चाँद हमसे बेहद करीब है ..उसे कुछ कहना है .हमें भी तो कुछ सुनना है ..आज की रात ना हम सोयेंगे ...ना ही हमारा चाँद सोयेगा ..सारी रात एक दूसरे को देखते रह जायेंगे ..मालूम नहीं फिर कब मुलाकात हो ...आज पूनम की रात है ..सुना है चाँद हमसे बेहद करीब है ..उसे कुछ कहना है .हमें भी तो कुछ सुनना है ..
@RR 
31 अगस्त 2012 

गुलज़ार .....

" सब कहते हैं ....मैंने अस्सी वसंत देखे हैं ...कोई ये नहीं कहता - मैंने अस्सी पतझड़ भी देखे हैं ....सभी कहते हैं ....मैंने अस्सी सावन देखे हैं ....कोई ये भी तो कह दो - मैंने अस्सी जेठ की दुपहरिया भी देखा है ....हाँ ..मैंने देखा है ....वसंत के बहार को ...खिलखिलाते फूलों को ....पर मैंने उन्ही फूलों के पत्तों को झरते भी देखा है .....हाँ ...मैंने सावन को बरसते देखा है ....पर उसके पहले की प्यासी जल रही धरती को भी देखा है " 
~ इन्ही शब्दों के साथ "गुलज़ार साहब" को उनके जन्मदिन पर दालान और पाठकों की तरफ से शुभकामनाएं ....:))
१८ अगस्त - २०१४ 

जेठ में बारिश .....

सावन की बारिश क्या बुझाती और बरस के कैसी आग लगाती है - इसकी चर्चा सावान में - पर ये जो तपती जेठ की बारिश जब आती है - किस कदर बरसती है - बस ये धरती ही समझे ....कितना भी बरसे ...कम ही बरसे ...
~ RR
27 May 2012 

आज सावन गिरा ...

आज सावन गिरा ...क्या गिरा ..खूब गिरा ...खूब भींगा ...दिलभर - मनभर - जीभर !
मन नहीं माना तब बेटा का साइकिल निकाल सड़क पर् निकल पड़ा ...वर्षों पहले खुद के साइकिल पर् इसी तरह भींगा था ...
मन तब भी वही था ..मन आज भी वही है :)) 
मालूम नहीं बारिश की पहली फुहार इतनी अच्छी क्यूँ लगती है ...मिट्टी की खुशबू जो आती है ...बेचैन और तपती धरती ...सूरज के घमंड को तोडता बादल ....सचमुच मजा आ गया :))
~ RR
6 जुलाई - २०१२ 

शिव का महिना ....

ये जो सावन का महिना है ..न ...शिव का है...शिव के भोले रूप का ...उस आदिगुरु का ...उस महान योगी का ...उस त्यागी का ...
ये जो सावन का महिना है ..न ...भींगा भींगा सा है ...गरजते बादलों का ...बादलों के बीच छुपे चाँद का ...बरसती बूंदों का ...खेतों की हरियाली का ...प्यासी धरती का 
ये जो सावन का महिना है ..न ...मधुर गीतों का है ...झूलों का ...फुहारों का ...मोर के नृत्य का ...प्रकृती का ....:))
मेरा वश चले तो ....साल की शुरुआत ही 'सावन' से हो ....क्यों 'दालान' पर मेरा वश तो चल सकता है ..न ...फिर ...
भींगे - भींगे से ...शब्दों के साथ ....'सावन' की शुभकामनाएँ ...:))
~ RR
१३ जुलाई - २०१४ 

भींगे शब्द ......

सावन का ...हर पहर...हर पल...कुछ भींगा भींगा सा रहता है...कल के भींगे ख्वाब आज भी भींगे हुए हैं ...सूख जाएँ तो इन्हें पहन लूँ ...फिर से भींग जायेंगे ...कुछ बूँदें मेरी कलम की स्याही में जा मिले हैं ...अब सारे शब्द भी कुछ भींगे - भींगे से दिखते हैं ...फुर्सत में पढना ...मेरे कुछ भींगे शब्द ....
~ RR
१८ अगस्त , २०१३ 

सावन के शब्द ......भींगे शब्द ...

तुम्हे पता होगा .... सावन में मेरे शब्द भींग जाते हैं ...हल्की फुहार में भी ...इनको टंगनी पर सुखने को मत डालना ...किसी कठोर क्लिप से इनको चांप मत देना ...कितना भी सुखाओगे ...हलके गीले रह ही जायेंगे ...सावन के शब्द वैसे ही अच्छे लगते हैं ...हलके गीले ....थोड़े वजन में ....
~RR
२९ जुलाई - २०१३ 

शब्दों का गज़रा ....:))

सुबह तड़के ...पौ फटने से भी पहले ...सूरज की पहली किरण के साथ ...शब्दों की बाग़ से ...तेरे लिए कुछ शब्द अपनी टोकरी में ले आता हूँ ...वो ओस की बूंदों में भींगे शब्द ...चमेली चंपा सी खुशबू लिए शब्द ...गुलाब से महकते शब्द ...इत्र की खुशबू को लपेटे वो मासूम शब्द ...तुम भी तो मेरे शब्दों की टोकरी के सामने ही बैठ जाते हो ..कहते हो ..अपने शब्दों का एक गजरा बना दो ..मेरे बालों में सजा दो ...चंपा - चमेली की खुशबू लिए मेरे शब्दों का गजरा ...मन कब भरता है ...अंत में कह ही देते हो ...ये शब्दों की टोकरी ..मुझे दे दो ...दाम क्या लोगे मुझे बता दो ..मै निःशब्द ...मन ही मन कहता हूँ ...कब किसी ने पुरी टोकरी इतने हक़ से माँगा ...दुनिया तो एक गजरे में ही खुश हो जाती है ....ये हक़ ही दाम है ...
कभी आना मेरे शब्दों के बाग़ में ...:))
~ RR
4 September , 2013 

Thursday, September 18, 2014

जोगी .....

गाँव में दोपहर के समय या शाम को 'जोगी' आते थे - भीख माँगते हुए - सारंगी बजाते हुए - बिरहा के गीत गाते हुए - गेरुआ कुरता , गेरुआ मुरेठा और बढ़ी हुई दाढ़ी - उम्र तीस से कम ! उनके गीत को सुन डर जाता था - दरवाजे ( दुआर ) से भाग आँगन में दादी की आंचल में छुप जाता था - फिर जंगला ( खिडकी ) से उनको चुपके चुपके देखना ! जब वो चले जाते - हम चचेरे भाई - बहन उनके बारे में चर्चा करते - कहते थे - ये 'जोगी' बारह साल की उम्र में घर छोड़ - अगले बारह साल सारंगी बजाते हुए - भीख माँगते हुए काटते थे - देस बिदेस घुमते हुए - अंतिम साल वो अपनी माँ से भीख माँगने पहुंचते थे - कहते हैं - जब 'माँ' बिना पहचाने उस 'जोगी' पुत्र को भीख दे दे ..जोगी की जोग सफल मानी जाती थी ! 
कई बार 'माँ' पहचान जाती थी फिर .....कितना दर्द है ...! 
जीवन के कई रंग हैं ....मालूम नहीं यह कैसा रंग है ....ऐसा लग् रहा है ..दरवाजे पर् अभी अभी कोई जोगी आया है ..अपनी सारंगी बजाते हुए ...बिरहा के गीत गाते हुए ....

Wednesday, September 17, 2014

निर्णय


आईक्यू के एक ख़ास बैंडविथ में - करोड़ों लोग होते हैं पर सामाजिक पटल पर उनके जीवन में बहुत अंतर होता है - उसकी एक ख़ास वजह होती है - 'निर्णय' ! जीवन एक सफ़र है और यह एक ऐसा सफ़र होता है - जिसमे 'मंजिल' नाम की कोई चीज़ नहीं होती - जहाँ तक जैसे पहुंचे - वही आपकी मंजिल हो जाती है ! पर हर चार कदम पर एक चौराहा होता है और उस चौराहे से किधर मुड़ना है - वहीँ आपका 'निर्णय' निर्धारीत करता है आप किधर की ओर रुख कर रहे हैं ! कई बार एक छोटी सी निर्णय आपके पुरे ज़िंदगी को बदल देती है - ये निर्णय सिर्फ इंसान को ही नहीं बड़े से बड़े संगठन से लेकर समूह तक को प्रभावित करती है ! 
एक उदहारण देता हूँ - अज़ीम प्रेम जी खाने वाले तेल के व्यापार से थे - एक निर्णय लिया - मुझे आईटी में जाना है - विप्रो को दुनिया जान गयी - अम्बानी ने लेट कर दिया - एअरटेल कहाँ से कहाँ पहुँच गयी ! इंसान वही है - उसकी आतंरिक मेरिट भी वही है - उसकी क्षमता भी वही है - बस एक निर्णय उसे आसमां तक पहुंचा सकता है - अगर बात सामाजिक पटल की हो तो ! 
कई बार निर्णय लेते वक़्त 'स्टेकहोल्डर' का भी ध्यान रखना होता है - इंसान कभी अकेला नहीं होता - यह एक भ्रम है की वो अकेला है और उसकी ज़िंदगी सिर्फ उसी की है - कई और लोग उसकी ज़िंदगी से जुड़े होते हैं - जितना बड़ा व्यक्तित्व उतने ज्यादा स्टेकहोल्डर - कई निर्णय में सबका ध्यान रखना होता है - कई बार बिना कुछ सोचे समझे निर्णय ले लिया जाता है - जो होगा देखा जायेगा - इसके लिए अन्दर से बहुत हिम्मत चाहिए होता है - ऐसे ही निर्णय में - हमें कई बार किसी ख़ास की जरुरत होती है - जो हमें बस यह दिलासा दे सके - जाओ आगे बढ़ो - तुम्हारा निर्णय सही है ! 
कई बार हमें अपने निर्णय के सकरात्मक और नकरात्मक दोनों के अंत तक सोच कर रखना चाहिए - सिर्फ एक पक्ष सोच लेने से - बाद में दिक्कत हो सकती है ! निर्णय और उसके फल में सिर्फ आप नहीं शामिल होते हैं - उसमे कई और लोग भी शामिल होते हैं - वो आपको मदद भी पहुंचा सकते हैं या फिर आपको कमज़ोर भी कर सकते है ! 
पर किसी भी हाल में ...निर्णय लेते रहिये ...ज़िंदगी आगे बढ़ते रहने का ही नाम है ...:))

अहंकार

अहंकार तुम्हारा शस्त्र है
उसके बगैर जीना व्यर्थ है ...
शस्त्र के साथ हर जगह नहीं ...
इसके बगैर भी हर जगह नहीं ....
अहंकार अग्रज के साथ नहीं ....
कुचल दिए जाओगे ...
अहंकार अनुज के साथ नहीं ...
घृणा के पात्र बन जाओगे ....
अहंकार प्रेम में नहीं ...
दफ़न हो जाओगे ....
अहंकार गुरु के साथ नहीं ...
कफ़न में लिपट जाओगे ....
आत्म सम्मान पर जब चोट लगे ...
सब भूल जाओ ...
अहंकार को कवच बना
खुद को जलाओ ...
मानव ही धरती को रौंदता है ...
है हिम्मत तो शेर भी डरता है ...
यह जीवन बार बार नहीं आता है ...
है हाथ में लगाम तो आसमान भी झुकता है ...
जीवन अगर युद्ध है ...
तुम्हारा अहंकार ही वो अश्व है ...
जब अश्व पर चाबूक लगेगा ...
हवा के संग बातें करेगा ....
जीने की कला सिखाएगा ....
कुचले हुए आत्म सम्मान को उठाएगा ....
कहाँ शस्त्र उठाना है ....
कहाँ शस्त्र गिराना है .....
यही सिखना जीवन है .....
प्रेम और युद्ध दोनों के बगैर जीवन अधूरा है ....
~ RR

मटन की खुशबू

छोटे शहरों की छोटी गलीओं के किसी घर से किरासिन तेल वाले स्टोव पर कूकर के सीटी के साथ पक रहे "मीट / मटन" की खुशबू के आगे दुनिया की सारी खुशबू फेल है ...वहीँ उस संकरी गली में खड़े होकर ...आँख बंद करके ...एक लम्बी सांस और खड़े गरम मसाला में पक रहे 'मीट / मटन' की सारी खुशबू ...एकदम से दिल में घुस जाता है ...और उसके बाद जो बेचैनी होती है ...मत पूछिए ...हा ..हा...हा...हा ...
"मीट / मटन" की खुशबू आयी ??? ...:))

हिंदी किसके कन्धों पर ?

हिंदी की जिम्मेदारी किन कन्धों पर होनी चाहिए - यह महत्वपूर्ण है ! सबसे ऊपर हैं - हिंदी के पत्र पत्रिका और पत्रकार - ये वो हैं जिन्हें हम हर रोज सुनते पढ़ते हैं - हिंदी को आकर्षक बनाने की जिम्मेदारी इन कन्धों पर है - जब तक यह आकर्षक नहीं बनेगी तब तक यह जन मानस को अपील नहीं करेगी और समाज हमेशा अपनी खूबी और गन्दगी दोनों ऊँचे तबके से लेता है - "बहाव हमेशा ऊपर से निचे होता है "- हिंदी को समाज के उस तबके में अपनी पैठ बढानी होगी ! कई बेहतरीन पत्रिका बिलकुल नीरस हो चुकी हैं - कालिदास / दिनकर / निराला / जयशंकर प्रसाद को लोग हर रोज नहीं पढ़ते हैं -
दूसरी बात - साहित्य / सिनेमा इत्यादी हमेशा काल को दर्शाता है - आज के दौर के बच्चों को प्रेमचंद के किस्से की कल्पना में ढालने में बहुत दिक्कत होगी - जुम्मन शेख जैसे पात्र जब तक उनके आँख के सामने नहीं आयेंगे - वो कहानी का मर्म नहीं समझ पाएंगे - समाज का एक बड़ा तबका शहरों और विदेशों में पल बढ़ रहा है - यह वही तबका है जो हर चीज़ों का मापदंड निर्धारीत करता है - दुसरे भी उसी को फौलो करते हैं - निराला / दिनकर इत्यादी के अलावा भी कई साहित्यकार हैं जिन्हें पढ़ा जाता है - उनको जमाने के हिसाब से अपनी कथाएं लिखनी होंगी ..लिखी भी जा रही हैं ...पर मौलिकता के चक्कर में वो कभी कभी गंदी भी दिखने लगती हैं ....
कई बार समाज लिड करता है - कई बार समाज को दिशा दिखानी पड़ती है - हिंदी अखबारों के पत्रकारों के लिए यह बहुत आसान है - पर दुःख है - अंग्रेज़ी की नक़ल में वो बड़े बेढंगे दिखते हैं और तब एक दर्द होता है ! जो बढ़िया लेख हैं - समाज में जो कुछ असल में हो रहा है वो सब उसी रूप और रंग में हिंदी में भी नज़र आनी चाहिए !
हाँ ...पढने वालों को भी अपनी परीपक्वता बढानी होगी ...और मेरा यह मानना है ...परिपक्वता पढ़ते पढ़ते बढ़ जायेगी ....

Monday, February 10, 2014

सरस्वती वंदना

हे वीणावादिनि....
तुम तो देवी हो ..न ...हम एक इंसान हैं ..
तुम पूर्ण हो ...हम अपूर्ण हैं ...
तुम तृप्त हो ...हम अतृप्त हैं ...
तुम ज्ञान की सागर हो ...हम जन्मो के प्यासे हैं ...
तुम तो देवी हो ..न ..
याचना नहीं आती हमें ...आराधना आती है ...
स्तुती नहीं आती हमें ...पूजा आती है ...
कुछ भी नहीं ..फिर भी चाहत बेशुमार है ..
जुबान नहीं ...पर एक निर्मल मन है ...
शब्द नहीं ...पर भावविभोर एक प्रेम हैं ..
तुम तो देवी हो ..न ...
हे वीणावादिनि ...अब तो वर दे ...
अब नज़र उठाओ ...
अपने ज्ञान से मेरे मन को भर दे ...
हे वीणावादिनि ...अब वर दे ...
अपने संगीत और सरिता से ...
इस जीवन में एक वसंत दे ...
तुम तो देवी हो ..न ..
हे वीणावादिनि ...अब वर दे ... 



रंजन ऋतुराज 

हे ..ऋतुराज ...


हे ऋतुराज वसंत ...
कौन दिशा आते हो ...
शिशिर के घमंड को तोड़...
किस रंग में हमें रंग जाते हो ...
हे ऋतुराज वसंत ...
तेरे आने की खबर हमें कौन दे जाता है ...
खेतों में लहलहाते सरसों के फूल ...
या कोयल की मधुर बोल ...
"हे ऋतुराज वसंत ...
तुम्हारे इंतज़ार में ...ठिठुरती धरती भी ...
तेरे आगमन से...थोडा इठलाती है ...
परागों के यौवन को देख ...'प्रकृती' भौरों में समा जाती है ..."
~  
रंजन ऋतुराज