एक प्रेमपत्र ....
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तुम्हे याद है ...तुम पहली दफा विदेश जा रहे थे ...मै तुमसे मिलने एअरपोर्ट पर आयी थी ...भागती हुई ...तुम ट्रॉली के साथ खड़े मेरे इंतज़ार में ...कितने हैंडसम लग रहे तुम ...ब्लैक गॉगल्स - बैगनी स्ट्रिप की शर्ट और एक इंग्लिश जैकेट में ...कुछ भी तो हम दोनों बात नहीं किये थे ...मै तुम्हारे आँखों में झांकना चाहती थी ..शायद तुम समझ गए थे ...तुमने गॉगल्स को ऊपर कर बालों में फंसा लिया था ...कितनी झांकती तुम्हारे आँखों में ...एक सच्चाई देखनी थी ...तुम्हारी नज़रों में ...कहते हैं ..न ...मर्द की नज़रें झूठी नहीं होती ...उस सच्चाई को देख मेरी नज़रें झुक गयीं ...तुम भी अब टर्मिनल की तरफ देखने लगे ...मेरे पास कुछ नहीं था ..देने को ...मैंने तुम्हे गुलाबों का एक गुलदस्ता दिया था ...वो गुलाबी फूलों का गुलदस्ता ...एअरपोर्ट के पास वाली रेडलाईट से खरीदी थी ...कैब में उसे बिलकुल अपने सीने से चिपका के रखा था ...यह सोच शायद मेरी खुद की खुशबू उन गुलाबों में कैद हो जायेगी ...जब तुम्हारे हाथों में थमाया ...तुमने बड़े प्रेम से उसे सीने से लगा ...थैंकयु कहा था ...फिर मुझे लगा ...फूल तो फूल हैं ...आज नहीं तो कल मुरझा जायेंगे ...बस बड़ी झिझक से ..अपने पर्स से ...वो रुमाल निकाल लिया ...जिसमे तुम्हारा नाम लिखा था ...बस ..एक झटके में तुम्हे दे दिया ...इसबार तुम थैंक यु नहीं बोले थे ...अब शायद एक पल और रुकना भी ..हमदोनो की आवाज़ भर्रा जाती ...तुम ट्रॉली लेकर आगे बढ़ गए ...मै भी एक झटके में मुड गयी ...फिर तुम्हे अन्दर जाते देखा ...शायद सीसे के उस तरफ से तुमने भी देखा होगा ...
फिर तुम्हारी चिठ्ठी आयी ...तुमने लिखा था ...रुमाल को आलमीरा के लॉकर में रख दिया हूँ ..अब ये रूमाल मेरे साथ ही इस दुनिया से जायेगा ...उस चिठ्ठी की ये लाईन हर रोज सुबह पढ़ती हूँ ...वो चिठ्ठी मेरी उंगलीओं के निशाँ से घिस चुकी है .....
मैंने भी तुम्हे चिठ्ठी लिखा था ...तुम्हारे शहर आना चाहती हूँ ...वो तुम्हारे शहर की ख़ूबसूरत नदी के किनारे ...तुम संग बैठ ...देर तक बातें करना चाहती हूँ...बाहों में बाहें डाल कर नहीं ..उंगलीओं को उंगलीओं से फंसा कर ...जैसे हम दोनों एक हैं लेकिन निगाहें उस नदी की तरफ ...फिर तुम्हारे कार में ..तुम्हारे बगल में बैठ ...कार तूम चला रहे और गीअर पर मेरे हाथ ....स्पर्श करना चाहती हूँ..मै तुम्हे ...तुम्हारे हाथों का मेरे हाथों से ....तुम्हारे शहर को अपनी निगाहों से देखना चाहती हूँ ...
अब तुम बड़े आदमी बन गए हो ...वर्षों बाद ...अखबार में तुम्हारी नाम देख चौंक गयी ...लिखा है ...तुम यहाँ आ रहे हो ...अपने विषय पर कुछ बोलने ....वो तुम ही हो ..न ...
सुनो ....तुम्हारे हर जन्मदिन पर ...एक फूलों का गुलदस्ता अपने डाइनिंग टेबल पर रख देती हूँ ...यह सोच उसकी खुशबू तुमतक जरुर पहुँचती होगी ...और यही सोच मै खुश हो जाती हूँ ...
फिर से एअरपोर्ट पर आना होगा मुझे ...गुलाबी गुलाब के फुलदस्तों के साथ ...तुम्हे फिर से एक बार छोड़ जाने के लिए ...नहीं आना इसबार मुझे ....तुम्हे क्या पता ...किसी को विदा करने का दर्द....
सुनो ...तुम मुझे अब भी पसंद करते हो ..न ...
~ 27 April 2014
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...कल शाम तुम्हारा पत्र मिला ...कई बार पढ़ा ..पढ़ते पढ़ते सो गया ...अभी नींद खुली तो फिर से पढ़ रहा हूँ ...रविवार का दिन है और मेरे म्यूजिक सिस्टम पर तुम्हारा ही पसंदीदा गाना 'आफरीन - आफरीन' बज रहा है ... मेरे सामने तुम्हारी पसंदीदा दार्जिलिंग चाय बगैर चीनी रखी हुई है ...तुमने मेरी कई आदतें बदल डाली और अब तुम्हारी दी हुई आदतों में ही जीने की आदत हो गयी है ...:))
हाँ ...मै एक पेपर प्रेजेंट करने तुम्हारे देश आ रहा हूँ ...कितना दर्द होता है ...जब अपने देश को ही पराया जैसा महसूस करना ...तुम खुशनसीब हो जो इस दर्द से मरहूम हो ...यहाँ किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है ...दुनिया के बेहतरीन शहरों में से एक है ...सबकुछ है ...बस सिर्फ एक तुम ही नहीं हो ...
...ज़िंदगी के सफ़र में जिस मुकाम पर तुम मिली थी ....वो शायद मेरे लिए सबसे कमज़ोर समय था ...जिस गर्माहट से तुमने मेरा हाथ पकड़ा था ...आज इतने वर्षों बाद भी अपने हाथों में तुम्हारे हाथों की गर्माहट महसूस कर सकता हूँ ...कितनी उलझी हुई ज़िंदगी थी ...बड़े ही आराम से ..हर पल मेरा साथ निभाते हुए ..तुमने मुझे भंवर से निकाला था ....जैसे कोई माँ अपने सातवें महीने के बच्चे को रुई के फाहा में रखती है ...नज़र के सामने ! प्रेम किस किस रूप में आता है - कहना मुश्किल है ....
अब मै मजबूत हो गया हूँ ..." तुम्हे इंतज़ार करते हुए देखना ...दर्द देता है और अगर तुम इंतज़ार ना करो इसकी कल्पना और भी दर्द ...ऐसा लगता है जैसे एक भंवर से निकाल तुमने दुसरे भंवर में डाल दिया " ...पर ये प्यारा लगता है ...क्योंकी यहाँ एक असीम विश्वास है .
तुम्हारी चाहतें भी अजीब अजीब सी होती हैं - जैसे मेरे इस शहर की नदी के किनारे मेरे संग बैठना - जब कभी इस नदी के किनारे से गुजरता हूँ - तुम याद आती हो - इसकी तेज़ प्रवाह तुम्हारे प्रेम को याद दिलाती है - जैसे उस नदी को जल्द से जल्द किसी सागर से मिलने की बेचैनी है ....
तुम्हे याद है ....तुमने मेरे जन्मदिन पर एक वैलेट दिया था ...वो आज भी मेरे जींस में पडा रहता है ...उसमे तुम्हारी एक तस्वीर भी है ....एकदम गुलाबी ...:)) घिस गया है पर बहुत लकी है ...उसमे पैसों की कोई कमी नहीं होती ...सच बोल रहा हूँ ...तुम्हे खुश करने के लिए नहीं ...
सुनो...क्या आज भी तुम मेरे दिए हुए स्कार्फ में अपने ओफ्फिस जाती हो ...क्या आज भी तुम्हारे हाथों में वो कंगन चमकता है ...क्या आज भी तुम्हारे मोबाईल का पासवर्ड मेरा जन्मदिन होता है....
सुनो ...तुम मुझे आज भी पसंद हो ...:)) पर ये बताओ ...वो तुम्हारा बुड्ढा बॉस आज भी डोरे डालता है ? ..हा हा हा हा हा ....गुस्साओ नहीं ...:)) तुम्हारे गुस्से से आज भी डर लगता है ...:))
लव यु ...सी यु इन इण्डिया ....
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~ 4 May 2014

