Saturday, April 5, 2008

कम्बल ओढ़ के हम घी पी रहें है या पानी ?

मैं बिहार मे पैदा हुआ दिल्ली मे प्रगतिशील पत्रकार कहलाता हूँ . सर नेम को झटक कर जाति से अपने परहेज की मात्रा मापी जाने लायक बना लिया है . शुरू से ही दुबे ,चौबे, झा ,मिश्रा ,तिवारी ,त्रिपाठी , सिंह , शर्मा , चौहान जैसे सरनेम नेम से विलीन हो गुप्त आचरण मे समाहित हो , चाहता रहा .और मिलीमीटर से भी कोई मेरे ब्रह्मनत्व को माप न पाये इसके लिए मैं सरनेम पासवान, राम , बाल्मीकि, बैठा , प्रसाद ,मंडल, महतो आदि सरनेम नेम से न जुदा हो , इसका हिमायती रहा हूँ. खोज-खोजकर इनको दोस्त बनाता हूँ सो स्वाभाविक क्रिया के तहत साथ उठना बैठना खाना पीना सब चलता रहता है . इनकी आवाज़ उठाते रहने से ताली , खाली नही जाती.और अपनी धर्मनिरपेक्षता का क्या कहना ? हम तो अपने पत्रकारिता धर्म को भी ठेंगा दिखाते रहते हैं , क्या मजाल की इंसानियत का धर्म मेरे से नज़र मिलाये . ब्राह्मण और हिंदू होने के वावजूद मैंने जनेऊ से लेकर 'शिखा 'तक उखाड़ लेने का पक्षधर रहा . शंकर महादेव को "शंकर महादेवेन " से ज्यादा भाव कभी न दिया . अयोध्या के बानर सेना वाले सीताराम को ४ विदेशी कुत्ता पालनहार श्री सीताराम येचुरी से अधिक महत्व न देने का प्रमाण पत्र मेरी जेब मे ही रहता है . हिंदू पूजा पद्धति के ख़िलाफ़ समूचा देश मे, पर बंगाल के ज्योति बाबू की काली पूजा को मुस्लिम के नवाज के समकक्ष ही रखा .
मेरे टाइप के लोगों को "मोदी" मे "मद" और "बुद्धदेव" मे "मध"[शहद ] नज़र आता है .प्रगतिशीलता के नए मापदंड [-अपने "शील" को प्रगति देकर यानी चलायमान रख कर विरोधियों की प्रगति को येन केन प्रकारेण "सील" करना ] पर बिल्कुल खरा उतरने को आतुर एक पत्रकार ही तो हूँ . " रेड लेबल " के पत्रकार कहलाने के लिए क्या-क्या न किया कथित उच्चे कुल मे जन्म लेकर , अपने कुल सहित समस्त उच्चे कुल को गालियों और गोलियों से रौदता रहा रौदवाता रहा .इस तरह सामाजिक न्याय दिलाने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया .पत्रकार की कोई जाति नही होती ,धर्म नही होता उपर्युक्त बातों से साफ हो गया होगा . अब पत्रकारिता की कोई सीमा नही होती इसको भी साफ कर ही दूँ .मैं बिहारी बिहार से चला .मात्र १८-२० घंटे की यात्रा ने बिहार को भुला देने मे मेरी मदद की . दिल्ली से दूर तक देख पाने की शक्ति मिली . नक्शे पर समूचा हिंदुस्तान क्या चीन, रूस देखता रहा .चीनी रूसी लेखक के अलावा अपने टाईप के धर्मनिरपेक्ष के धर्म गुरुओं का किताब चाटते रहे .अध्ययनशील रहने की बीमारी से ग्रषित हो जाने के कारण आंखों की नजदीकी नजर जाती रही दुरी का विस्तार मेरी सीमा का विस्तार करता गया . बंगाल की करतूत हमे तबतक नही दिखाई देती जबतक की वहाँ कांग्रेस या भाजपा न आए . मोदी को देख सकता हूँ पर उसकी अच्छाई धुधला दिखता है , और उसकी बुराई थोड़ा सा भी दिखे तो परिमार्जन विद्या से पहाड़ मे परिणत कर देने मे ज्यादा टाइम नही लगाता . और बिहार का क्या जहाँ सांप्रदायिक ताकत से मिलकर सरकार चलाने वाला नीतिश को पहले सड़कछाप मुख्यमंत्री बता दिया गया है . बाढ़, सूखा ,अतिवृष्टि का दंश झेलता चार बीघे जमीन वाले को माओवादी के धमकी भरे पत्र को प्रेम-पत्र से ज्यादा कुछ मैं नही समझता . जातिवाद का जहर कम न पड़े इसका प्रयास हमे जारी रखना है अपनी खोजी पत्रकारिता के तहत .क्योंकि इधर मैंने देखा है उच्च जाति ने छुआछूत को छू भी नही रहा . पढे लिखे साफ सुथरे दलित ,अर्धदलित के साथ आम सवर्ण भी घुलनशील होता जा रहा है , ठीक मेरी तरह . ये सर्वाधिक चिंता का विषय है मेरी और मेरी विचारधाराओं के लिये . ख़ुद को मैंने कई बार मार कर खबरों का खुदा बनने की कोशिश की .गिनिए कितनी मौत मरा हूँ ,कितनी बार अपने आपको मिटाया हूँ . अपने सरनेम को मिटाया , अपनी जाति मिटाई , अपना हिंदू धर्म मिटाया , अपना प्रान्तवाद मिटाया . फ़िर ये कुछ सामंतवादी लोग मेरे धर्म और निरपेक्षता मे फासला कायम करना चाहते हैं .कितनी ग़लत बात है ? है कि नही ? अरे साहेब इसीलिय सलमा आगा के दुःख के बराबर मेरा भी दुःख है ."ख़ुद को भी हमने मिटा डाला मगर , फांसले जो दरमिया से रह गए ." खैर कम्बल ओढ़ के हम घी पी रहें है या पानी ? ये हमारे साथी को पता चलेगा तभिये न दुरी बढायेगा .अभिये से बुरबक की तरह तनावोचित बिहेवियर सर्वथा अनुचित है .

6 comments:

बेनाम said...
This comment has been removed by the author.
मधुसूदन चौधरी said...

अरे आप तो बहुत-बहुत कुर्बानी दे दिए हैं.ऐसे में आपका नाम कुर्बान खान सही रहेगा.सर, नेम ठीक लगा कि नाही? सरनेम त्याग दिए तो का हुआ?...नेम तो नया ग्रहण कर ही सकते हैं. वैसे नेम पसंद नहीं आने पर बताईयेगा. कोई और नेम ढूंढ देंगे.

और सीताराम कहते रहिये. सब ठीक होगा. मतलब आपके मुताबिक होगा सबकुछ. जाति प्रथा चलेगी. जब तक आप चाहेंगे, चलेगी. आपने अपना सरनेम कुर्बान कर दिया त का हुआ, दूसरा लोग त नहीं किया न. देखिये केतना हेल्प किया दूसरा लोग आपका. ऊ लोग भी चेंज कर लेता त आपका त दुकाने बंद हो जाता. धर्मनिरपेक्ष गुरुओं का किताब चाट लिए हों त शर्मनिरपेक्ष गुरुओं का चाटना शुरू कीजिये. धर्म चटा जायेगा त एक दिन शर्म भी चटा जायेगा. मोदी का मद को देखकर अभी तक त कुछ कर नहीं सके. शायद आप ही मोदी का हराने गुजरात गए रहे. लेकिन सुना कि वो नहीं हारे. अब पाँच साल इंतजार कीजिये. चैनल वाला चाहेगा त फिर मौका मिलेगा. और अगली बार एक साल पाहिले से ही डेरा जमाईयेगा गुजरात में. देखिये, फिर कुछ उखड़ता है कि नाही. और बिहार का सड़क छाप मुख्यमंत्री का कुछ करने का पिलान बनाईये. आ नाहीं त ऊ फिर से सड़क पर अपना छाप छोड़कर मुख्यमंत्री बन जायेंगे. माओवादियों का प्रेमपत्र अपने चैनलवा पर देखाईयेगा.

मार्क्स आपका रक्षा करेंगे.

Sarvesh said...

Ye ghee peene ka adhunika tarika mujhe bahut bhaya. Ees lekhani ke dwara kambal odhane waalo ko khud ke andar jhakane ka mauka diya gaya hai. Pseudo secularism kewal dikhane ke liye hota hai. Aksar patrakar dalil dete hain kee hum samaj ka har baat oozagar karne ka thika nahin liye hain. Hum kewal wahi dikhayenge, jo mujhe personal gain pahuchayega. Ek lekh me hee aapne sab ko oozagar kar diya. Aise hee ye jaat ke bal par oopar oothe patrakaro ka pardafas karte rahiye. I think this is 360 degree feedback for them as TV doesn't receive our feedbacks.

राम एन कुमार said...

हम जब बच्चे थे और स्कूल मे थे तब जातिवाद के पक्के विरोधी थे. अपने जाट से बाहर वालो की हमेश हेल्प करने की कोशिश करते थे ताकि कोई यह न कहे की सवर्ण है इसी लिए दुसरे जाती वालो से दूर रहता है. फिर भी हाय रे किस्मत लोग कह ही देते थे. लाख कोशिश किए की जाती की दुनिया से बाहर आ जाए..दुनिया ने आने न दिया..तब तो बालमन था..अब तो परिपक्वा हो चुका है और जाती-धर्म सब अच्छी तरह से समझ मे आता है. कही जाओ तो लोग आपकी जाती जरुर पूछते है. मैंने सरनेम कुमार रखा है तो लोग फैमिली का सरनेम पूछते है..वाह रे दुनिया. अभी मैं बम्बई मे था एक लड़की से मिला जिसका सरनेम भंडारे था. उसने पूछा बिहार के हो. यू बिलोंग टू लालू'स लैंड. वह बिहारी जात से ज्यादा लालू से नफ़रत हो गई. आख़िर क्या किया लालू ने. वहा बम्बई मे भी जातिवाद है लेकिन बिहार की तरह जहर घुला हुआ नही है.
चार जात भूमिहार ब्रह्मण, मैथिल ब्रह्मण, राजपूत और कायास्थो ने बिहार मी जमींदारी कायम रखी. बाद मी यादव, कुर्मी और पासवान शामिल हो गए. बाकि गए तेल लेने. किसी को मतलब है क्या..

Chiranjiv said...

Wah!! Kambal ke bhitar kee baat jaan kar khushi aur dukh dono hua. Aise aise log bhi hote hain. Mujhe sabse achha laga jab aapne comparision egg to egg kiya. Modi vs Basu. Really its unfortunate to hear such things from such reputed jaurnalists. Can someone arrange the email IDs of editors specially Pranav Ray so that we should inform them.

Jitendra said...

This is one of the finest blog I have read in Hindi. I am watching the discussion on Jaati on various blogs. Many blogs looks sycophant and they are just writing to make one person happy i.e. Ravish. I read, Mohalla, naisadak, rejectmaal, bla bla. They are just making noise with same copy paste from Ravish. No data, no factuals.
This blog has come out with a lot of facts with incidences, numbers, examples which apears real.
Thanks Mr. Sanjay Sharma for uncovering the guys inside blanket.
Kudos to you folks/