Saturday, May 29, 2010

मेरा गाँव - मेरा देस - ( मेरा पटना ) - भाग ३

सातवीं की परीक्षा 'जिला स्कूल - मुजफ्फरपुर ' से पास कर लिया ! परबाबा से लेकर मुझ तक हम चार पीढ़ी इस स्कूल में पढ़ लिए :) गौरव की बात है , न ! वार्षिक परीक्षा चल रही थी - तभी बाबु जी का ट्रांसफर 'मुजफ्फरपुर' से 'पटना' हो गया ! नाना जी , बड़े बाबा के पास आये थे - मै खेल रहा था - बड़े बाबा से पूछा - नाना जी क्यों जल्द आ कर चले गए - बड़े बाबा ने पूछा - वो इजाजत लेने आये थे - मैंने पूछा - कैसी इजाजत ? , बड़े बाबा बोले - जब तक तुम्हारे 'पिता जी ' अपनी गृहस्थी' पटना में बसा नहीं लेते - तब तक हम सभी 'ननिहाल वाले पटना डेरा में रह सकते हैं' !

पटना हम पहले भी जाते थे ! पटना होकर ही ननिहाल जाना होता था ! गंगा बिहार को दो भाग में बांटती है ! हम 'गंगा पार' के थे - ये अक्सर विवाद का विषय होता - कौन 'गंगा पार का :) इधर वाले के लिए हम 'गंगा पार' वाले - उधर वाले के लिए 'मगध' गंगा पार :) खैर !

हम स्टीमर से पटना आते थे ! महेन्द्रू घाट पर उतर कर 'रिक्शा' से 'कदम कुआं' जाना - बड़ा ही आनंददायक होता था ! गाँधी मैदान के चारो तरफ से घुमते - रिजर्व बैंक का बिल्डिंग - सब कुछ बड़ा बडा लगता था ! 'हम लोग एक छोटे शहर पर उत्तर बिहार की राजधानी 'मुजफ्फरपुर' से पटना आते थे - तो ये पटना हम लोगों के लिए किसी 'विदेश' से कम नहीं होता ! 

माँ - बाबु जी और छोटी बहन सब पटना आ गए - नाना जी के डेरा में ! बड़ी कोठी पर बड़ी संकरी गली !  बाबा को लाल बत्ती वाली 'अम्बैस्डर' मिली थी - संकरी गली के कारण वो अपने 'ठस' से समधियाना तक गाड़ी में पहुँच नहीं पाते - थोडा दुःख मुझे भी होता ! एक महीने बाद मै भी पटना आ गया था !

पटना आने पर मेरी मुलाकात हुई - इंडिया टूडे से ! मामा लोग दिल्ली में 'कुछ' पढते थे वो पटना आते तो हाथ में 'इंडिया टूडे' होती ! फिर शाम को 'दिल्ली' वाला टाइम्स ऑफ इंडिया ! खैर , पटना लौटने पर सब से बड़ी दिक्कत हुई - मेरे किसी स्कूल में अड्मिशन की ! बाबु जी तो खुद बहुत अनजान थे - नाना जी ने बोला - मै कोशिश करता हूँ - बाबु जी को ऐसा लगा की कोई लौटरी लग गयी - मालूम नहीं 'नाना जी ' ने कहाँ कहाँ और किस - किस से 'चिठ्ठी ' लिखवाई और मेरा एक स्कूल में अड्मिशन हो गया ! मोहल्ले के कई दोस्त साथ साथ स्कूल जाने लगे - रास्ते भर 'कपिल देव वस्  गावस्कर ' बहस होते जाती ! रास्ता में जन संपर्क विभाग का एक कार्यालय होता था - मै वहाँ कुछ देर रुक - हिंदी अखबार पढता था - दोस्त मुझ से चीढ़ते थे :) पटना आ कर - पहली दफा ऐसा लगा - हम जैसे बहुत लोग हैं और हमारी 'अवकात' कुछ नहीं है - ये एक एहसास ऐसा था - जो काफी दिन तक मुझे परेशान किया करता था - कोई भाव देने को तैयार नहीं और हम बिना भाव जीने के आदी नहीं थे :)

नाना जी के यहाँ बिना लहसुन - प्याज वाला खाना बनता और हम दोनों 'बाप बेटा ' पक्के मांसाहारी :) कितने दिन तक बर्दास्त करते - एक शाम बाबु जी ने मुझे अपने पास बुलाया और बोला - जल्द तैयार हो जाओ - एक मित्र के यहाँ जाना है - मै कुछ बोलता तब ताक वो बोले - हम और तुम जायेंगे सिर्फ - घर में कोई कुछ पूछे तो बोल देना - पापा के दोस्त के यहाँ जाना है ! बाबु जी ने रिक्शा लिया और हम दोनों चल पड़े - रिक्शा एक साधारण से 'होटल' ( रेस्टोरेंट) के सामने रुका - हम आ चुके थे - पटना के मशहूर 'महंगू होटल' में ! दोनों 'बाप - बेटा' जी भर खाए - सब कुछ ! 'गोली - बगेरी - मटन दो पयज़ा ' और न जाने क्या क्या :) मै बहुत खुश था ! खुशी बर्दास्त नहीं हुई - एक दो मामू जान को बता ही दिया - फिर वो सभी बाबु जी से मजाक शुरू कर दिए !

नाना जी के यहाँ कुल छह महीने ही रहे ! बाबु जी बड़े ही 'स्वाभिमानी' हैं - हर रोज शाम मकान खोजने निकल पड़ते !  मुजफ्फरपुर में बाबु जी काफी बढ़िया प्रैक्टिस हो चुकी थी और पटना एक मुश्किल शहर था ! पर बाबू जी प्रयास में लगे थे ! कंकडबाग के 'डॉक्टर कॉलोनी' में डेरा मिल गया - हम सभी बड़े खुश थे !

....जारी है ....





रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

4 comments:

Sarvesh said...

Bahut khub!! Lajawab likha hai aapne!!

माधव said...

nice

kumar said...

bahut badhiya sir ji maza aa gaya.

सतीश चंद्र सत्यार्थी said...

मजेदार संस्मरण है सर....
अगले का इंतज़ार है.....