Thursday, October 6, 2016

नवरात्र और मेरा अनुभव ...:))

हम लोग मूलतः एक किसान परिवार से आते हैं ! गाँव - शहर दोनों जगह रहना हुआ है ! बाबा राजनीति में सक्रीय थे ! मेरे बचपन का बहुत बड़ा हिस्सा गाँव में बिता है ! बाबा हर दोपहर नहाने के बाद दुर्गापाठ करते थे और दुर्गा को अगरबत्ती दिखाते थे ! दुर्गा का प्रथम प्रभाव वहीँ से शुरू हुआ ! दुर्गा पूजा के दौरान - कलश स्थापना होती थी , ब्राह्मण देवता आते थे ! नौ दिन पाठ और नवमी को हवन ! बस ! थोडा बहुत दशहरा के दिन मेला शेला !
मैं बारहवीं में था ! अचानक मुझे दुर्गा पाठ की सूझी ! मैंने अपने कमरे में नवरात्र के दौरान ही दुर्गा पाठ शुरू कर दिया ! सच बोलता हूँ - तीसरे दिन ऐसा लगा की जैसे मैंने अपने से बहुत ज्यादा भारी कोई तलवार उठा ली है जो मुझसे नहीं उठ रहा है ! और चौथे दिन आते आते मैंने पूजा बंद कर दी ! मेरी हिम्मत नहीं रही ! ऐसा लगा की मेरे अन्दर अब कोई शक्ति नहीं रही - कोई मेरी सारी शक्ति निचोड़ लिया है ! अफ़सोस हुआ - लेकिन मै आगे नहीं कर पाया !
फिर आगे के सालों में नवरात्र मेरे लिए कोई मायने नहीं रखा ! गाँव की परंपरा अब शहर में भी आ गयी - गाँव से ब्राह्मण देवता पटना आते और कलश स्थापना होती ! कभी मै रहता तो कभी नहीं रहता !
इसी बीच नॉएडा शिफ्ट हुआ ! और वहां की कालीवाडी मंदिर में जाने लगा ! कुछ ऐसा संयोग हुआ की जितने साल वहां गया - जिस वक़्त पहुंचा ठीक उसी वक़्त वहां आरती होते रहती थी ! उस धूप आरती के बीच साक्षात् दंडवत के बाद जब मै जमीन से उठता - मेरी नज़र उस दुर्गा प्रतिमा पर पड़ती थी - उस वक़्त मुझे उनकी ओर एक जबरदस्त खिंचाव होता ! एक जबरदस्त आकर्षण ! ना तो माँ रूप में  , ना बहन , ना बेटी और ना ही पत्नी के रूप में ! फिर बात ख़त्म और अगला साल पूजा आ जाता ! फिर से वही भावना ! 
बारहवीं में ही मुझे अपने पुरे जीवन का एक आभास हुआ की मेरा आने वाला पचास साल कैसा होगा - एकदम धुंधला आभास ! इस आभास से यह हुआ की - जीवन कई उतार चढ़ाव से गुजरा , परिवार बेचैन हुआ लेकिन मेरे अन्दर कोई बेचैनी नहीं हुई ! जीवन की बड़ी से बड़ी खाई को उस वक़्त के हिसाब से बड़े ही मैच्युरेटी से संभाला ! 
लेकिन २०१२ में कुछ ऐसा हुआ की मै अचानक से उस नवरात्र दुर्गा में तल्लीन हो गया ! ना तो कोई पूजा आती थी , ना ही कोई मंत्र और ना ही कोई तंत्र ! बहुत सोचा - सोचने के बाद यही समझ में आया की - सारा खेल मन का ही है - क्यों न मन को ही एकाग्र कर दो ! पुरे नौ दिन मन को एकाग्र कर दिया ! अब बात दूसरी आई - शक्ति के किस रूप की आराधना - वह पहले से निर्णय ले चूका था - वह था - रचनात्मक रूप ! कहते हैं - देवी बलि मांगती है ! यह बात क्लियर थी ! बारहवीं में देख चूका था ! वह एक साक्षात अनुभव था ! तब मै कमज़ोर था , नाबालिग़ था ! इस बार जबरदस्त निश्चय था ! हुआ - मेरे इर्द गिर्द उसी नवरात्र कुछ हुआ - जिसका वर्णन मैंने उस वक़्त के सबसे करीबी मित्र को बताया ! उसे मै दाल भात का कौर लगता था तो शायद उसने मेरी बातों को मेरा झूठ समझ इनकार कर दिया !
क्या खेल है - एकाग्रता का ...गजब ! नवमी आते आते खुद के चेहरे पर मोहित हो गया ! कोई पूजा पाठ नहीं किया - बस एक ख़ास जगह मन को एकाग्र कर दिया ! पूजा का प्लैटफॉर्म फेसबुक को बना दिया ! और क्रियेटिविटी इस कदर बढ़ी ...हालांकि उसके बीज पहले से मौजूद थे ...पर जैसे किसी ने उन बीजों को पानी खाद देकर पौधा बना दिया !
अगले साल फ़रवरी में माँ का देहांत हुआ ! एक बहुत बड़ा निर्णय लिया - पटना वापस लौटने का ! लोगों ने अपने अपने समझ से इसकी व्याख्या की ! मुझे अन्दर से कोई फर्क नहीं पडा !
इस साल भी दुर्गापूजा आया ! मै अपने इंदिरापुरम आवास पर - अकेले ! ना किसी से मिलना और और ना ही कोई अन्य काम ! फिर वही मन के एकाग्रता का खेल ! वही ढंग ! लेकिन इस बार दुर्गा के लिए इन्तेंसिटी बहुत बढ़ गयी ! और उसी नवरात्र मेरे मन में राजनीति में जाने का ख्याल आया - देवी की कृपा - कहीं कोई रुकावट नहीं हुई - हर एक स्टेप के बाद दरवाजा खुद ब खुद खुलने लगा ...नवरात्र ख़त्म होते ही पटना गया और विधिवत राजनीति ज्वाइन किया ! सब देवी की कृपा थी !
एक बात - इन नौ दिनों मेरे इर्द गिर्द से लेकर अन्दर तक कुछ न कुछ ऐसा होता रहा जिसके चलते मन को और एकाग्र करने की तमन्ना जागी ! उन कारकों की चर्चा नहीं कर सकता - बस समझ लीजिये - जैसे आप पूजा पर बैठे हों और असुर शक्ति आपको दिक्कत पैदा कर रही हों ! फिर नौवें दिन - जो चमक और ओजस्व चेहरे पर और वाणी में आती है - इसका वर्णन तो वही कर सकता है - जिसने देखा या सुना और बहुत समझा ! लेकिन इसका असर मैंने दूसरों पर देखा ..:))
एक गलती अगले साल हुई ! मै देवघर गया ! वह १०० किलोमीटर की यात्रा मेरे लिए अत्यंत कष्टदायक हुई ! कुछ ऐसा हुआ की पुरे रास्ता मै लगभग मानसिक रूप से व्यथित रहा ! शिव में कोई आकर्षण नज़र नहीं आया !
राजनीति को त्यागने का निर्णय लिया - श्री नितीश कुमार के साथ चार घंटे की लम्बी अकेली में वार्ता और सुनहरा अवसर - मैंने बहुत ही शांत मन से त्यागा ! मै समझ चूका था - राजनीति बहुत बड़ी शक्ति है और मै इसके भार को वहन करने को तैयार नहीं हूँ ! कुछ ऐसा ही एहसास - बारहवीं में हुआ था ! तब मैंने अपनी आधी अधूरी तपस्या किसी और को देकर - उठ गया था !
शक्ति के किसी भी रूप को उठाने के जब तक आप स्वयं में तैयार नहीं हों - नहीं उठायें वर्ना आप उस भार के निचे दब के ख़त्म हो जायेंगे ! यह बात शुरू से क्लियर थी !
पिछले साल - पटना में ही था - कलश स्थापना और नवमी ! कुछ कुछ होता रहा !
इस साल फ़रवरी में - एक मोड़ आया - पत्नी के लगातार जिद के बाद बनारस गया ! काशी विश्वनाथ के दर्शन हेतु ! पत्नी वहां काशी विश्वनाथ मंदिर गृह में - अन्दर ही अचानक से फूट फूट कर रोने लगी ! कभी इस कदर उनको रोते हुए नहीं देखा ! फिर उन्होंने रुद्राक्ष का माला ख़रीदा और पहना दिया ! होटल में मैंने पूछा - आप इस कदर क्यों रो रही थी ? उन्होंने कहा - ऐसा लगा जैसे मै अपने पिता से मिली ! शादी के ठीक पहले वो इसी काशी विश्वनाथ मंदिर में गयी थी - उस वक़्त वो मेरे दिए हुए कपड़ों में थी ! इस बार वो मेरे साथ थी ! १९ साल बाद ! इस बीच मेरे सास ससुर गुजर चुके थे !
मार्च में मैंने शिव आराधना शुरू कर दी और शक्ति के प्रति जो जिस रूप में आशक्त था - वह आकर्षण भी कम होने लगा !
मै चैत नवरात्र में पूजा नहीं करता लेकिन इस बार किसी ने कह दिया - कुछ लिखो ! मैंने लिखा ! जो समझ में आया ! तभी कुछ एह्साह हुआ ! उसी दौरान एक बहुत ही पुराना मित्र जो किसी कष्ट में था - उसने अपने कष्ट को बताया - हालाकि उसका कष्ट मुझे डेढ़ साल से पता था लेकिन नवरात्र - फिर से उसने चर्चा की और मेरे मुंह से निकला - जाओ  सब ठीक हो जाएगा ! अगले ही दिन सकरात्मक जबाब आया ! तभी यह लगा - पांच बार लगातार पूजा के बाद अब उठने का समय आ गया है !
आप किसी भी तरह की शक्ति की उपासना करते हैं ! तपस्या करते हैं ! एक दिन या नौ दिन या आजीवन ! लेकिन उस तप का फल - किसी और को देना होता है ! यह सच है ! उस तप का फल आप खुद खाने लगे उसी दिन से शक्ति  क्षीण होने लगती है ! यहीं लालच को रोकना होता है ! और इंसान यहीं फंसता है ! हो सकता है - तप का फल किसी और के लिए रखा , और मिला किसी और को ! लेकिन जिसे जो तप देना होता है - आप दे चुके होते हैं ! आपको कुछ न कुछ बलि चढ़ाना होता है ! आप खुद के लिए कभी नहीं माँगते !
इस बार नवरात्र के पहले मैंने एक महिला ज्योतिष से बात किया - खुल कर ! उसको सारी घटना बताई ! उसने कहा - दुर्गा को प्रेमिका के रूप में पूजते हो , पत्नी शिव को उन्हें पिता रूप में और क्योंकि पत्नी ने पूजा की  तो तुम भी छः महिना से शिव को पिता रूप में जप ! यह गड़बड़ झाला है - फंस जाओगे ! माँ के रूप में पूजो ! अब यह कैसे संभव की जिसे आप कभी प्रेमिका रूप में पूजे - उसे फिर से माँ रूप में ? उस ज्योतिष ने कुछ जबाब नहीं दिया  लेकिन मैं चुपके से शिव को प्रणाम कर - नवरात्र शुरू कर दिया ! गड़बड़ झाला तो चूका था ! प्रायश्चित का समय है .... :))
लेकिन ये जप और तप वाली बात क्रिस्टल क्लियर हो गयी ! बिलकुल गंगोत्री की तरह साफ़ !
अगर आप इसे व्यापक तौर पर सोचें तो - आपके किसी भी तरह के जप / तप का फल जब तक दूसरों को नहीं मिले - वह आराधना सफल नहीं होती ! वह विज्ञान हो , कला हो , राजनीति हो - कहीं भी !
एक बात और समझ में आई - शक्ति आती है और शक्ति जाती है ! रूप बदलते रहती है ! उदाहरण के लिए - बचपन में आपकी मासूमियत ही आपकी शक्ति होती है , मासूमियत खोते हैं तब जवानी आती है और जब जवानी जाती है तब आप एक अलग शक्ति को समझते हैं ! यह क्रम है ! इसको समझना जरुरी है !
जीवन में एक ख़ास समय आता है - जब आपकी तमन्ना होती है - बाहरी दुनिया से अन्दर की दुनिया में जाते हैं फिर आप अन्दर की दुनिया से बाहर की दुनिया में आते हैं - हर तरह के अनुभव के साथ ...:)) मूलतः जीवन का सबसे बड़ी पूंजी यह अनुभव ही है !
लेकिन यह पूरा खेल - मन की एकाग्रता का ही है - जैसे आप एकाग्र होकर परीक्षा में बैठते हैं ....ख़ुशी तब होती है ...जितना सोचा उससे ज्यादा प्रश्न आपने हल किये ...तीन घंटा बिना सर उठाये ! असल तसल्ली वहीँ हैं ! रिजल्ट बहुत मायने नहीं रखता ...
यह पांचवीं बार शारदीय नवरात्र है ...देवी के उस रूप को प्रणाम ...जिस रूप की आराधना मैंने की थी !
विशेष अगले किस्तों में ..:))



@RR

1 comment:

Unknown said...

दुर्गा को प्रेमिका के रूप में स्वीकार कैसे करें। बताएं जरा।