Tuesday, September 9, 2008

नीतिश भैया, सुनीता मर गयी


नंदू भैया (नंदकिशोर यादव, स्वास्थ्य मंत्री), सुनीता मर गयी। गणेश यादव ka sab kuchh loot gaya । कोसी क्षेत्र के पीएमसीएच में दो-तीन दिन की यंत्रणा के बाद सोमवार को अंतत: उसकी मौत हो गई। असह्य प्रसवपीड़ा से गुजरती उस सुनीता और वैसी अनेक बाढ़पीडि़त महिलाओं की ही नहीं, हजारों बीमारों की दुर्दशा से मैंने आपको आगाह किया था। पता नहीं, आपने ध्यान दिया भी कि नहीं? दुखद यह है कि वह सबको बताकर मरी; सबके सामने मरी। उसकी कोख में पड़े बच्चे का हाथ बाहर निकल गया था। मैंने शुक्रवार की रात करीब पौने एक बजे सुनीता को भारी कदमों से लेबर रूम की तरफ बढ़ते देखा था। पति गणेश यादव उसका हाथ थामे था। ब्लीडिंग से सुनीता की साड़ी लाल थी। आज ये खून सूखे हुए दिख रहे थे। भैया, मैंने आपको बताया था कि क्यों यह दंपति इस खौफ में से मर रहा है कि निर्वश न हो जायें। दरअसल उनके दो बच्चे वेगवती कोसी की नई धार में बह गये और आज आपकी व्यवस्था ने कोख वाले शिशु को जन्म ही नहीं लेने दिया। गणेश-सुनीता मजरूहा (त्रिवेणीगंज) से आये थे। आपके अस्पताल पहुंचने में सुनीता को पैदल लंबी दूरी तय करनी पड़ी। इससे पहले त्रिवेणीगंज अस्पताल में कई दिनों रहना पड़ा था। भैया, आपके सदर अस्पताल के डाक्टरों-नर्सो ने उसकी समुचित देखभाल नहीं की। खून चढ़ाने के नाम पर उसे प्राइवेट क्लीनिक भेज दिया। क्लीनिक वाले ने खून चढ़ाने के बाद फिर उसे अस्पताल भगा दिया। और इस सदर अस्पताल ने उसे फिर त्रिवेणीगंज भगा दिया। इस भागमभाग में सुनीता के पति गणेश ने भी उसका साथ छोड़ दिया, भाग गया। उसे लग गया था कि सुनीता नहीं बचेगी। आज सुनीता की मां दुलैर देवी उसे लेकर फिर सदर अस्पताल आयी। शाम चार बजे के करीब उसकी मौत हो गयी। उसकी लाश फर्श पर पड़ी थी। पिछले हफ्ते भर के दौरान उसे बेड तक नहीं मिला। अस्पताल बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष मंजीत कुमार सिंह दोषी डाक्टरों पर हत्या का मुकदमा चलाने की बात कहते हैं। भैया मैं फिर दोहरा रहा हूं-मौत के मुहाने पर खड़ी सुनीता देवी जैसी जिंदगियों की कमी नहीं है। सुनीता बस एक प्रतीक थी। यह बीमार इलाका और खासकर आपका यह अस्पताल आपके अस्तित्व को खुली चुनौती दे रहा है। इस अस्पताल को फौरन अस्पताल बनाइये, वरना यह सैकड़ों मौतों का कारण बन आपको, आपकी सरकार को बदनाम करायेगा। आप जैसे रहनुमाओं से जनता का भरोसा टूट जायेगा। अगर वाकई आप कोसी के आसन्न खतरों से जनता को बचाना चाहते हैं, लोगों को मेगा शिविर में रखना चाहते हैं, तो अपनी व्यवस्था को भरोसेमंद बनाइये। और सुनीताओं को मरने नहीं दीजिये। भइया, आप जानते हैं कि इस अस्पताल में सामान्य दिनों में भी सहरसा, सुपौल, मधेपुरा के लोग इलाज को आते हैं। प्रलय ने तो बीमारों की तादाद में कई सौ गुना की वृद्धि की है। आपके विद्वान अफसरों को भी इस बात से इनकार नहीं होगा कि यह संख्या और बढ़ेगी। जरा आप भी देखिये, वाकई कोसी के पीएमसीएच में इस लायक तैयारी है? सुनीता आपके दावों और उसकी शर्मनाक जमीनी हकीकत बता गयी। क्या उसकी मौत के जिम्मेदार चिह्नित होंगे; सजायाफ्ता होंगे? बहरहाल, नंदू भैया! एक और उदाहरण सुन-जान लीजिये। मुझे इसी अस्पताल में ऐसी ही एक टिमटमाती जिंदगी दिखी। यह है-पवन कुमार ठाकुर का 16 दिन का बच्चा। पवन सुपौल के रहने वाले हैं। वे अपने बच्चे को गोद में बिठा उसके नाक में आक्सीजन की पाइप लगाये हुए दिखे। ये क्या हो रहा है? भइया, आपकी नर्से कहां हैं? पवन की पच्ी अपने बच्चे को ऐसे निहारती रहती है, मानों उसके एक-एक रोएं को अपनी आंख में बसा लेना चाहती है, ताकि कल को कुछ हो जाये तो सब कुछ याद रहे। इस तरह की याद बड़ी खतरनाक होती है भैया। कुछ जल्दी कीजिये न! बहुत लोग मरने वाले हैं। आपकी सरकार को मेगा श्मशान घाट व कब्रिस्तान बनाना पड़ सकता है।
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साभार : दैनिक जागरण , पटना
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मुख्यमंत्री जी -
क्या गुनाह है इन हजारों "गणेश यादव" जैसे लोगों का ? यह पीडा आप तक क्यों नही पहुंचती है ?
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रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडा

4 comments:

Nasiruddin said...

शर्म हमें शायद अब भी नहीं आएगी
बाढ़ग्रस्त इलाकों की चिकित्सा व्यवस्था में छेद ही छेद हैं
अगर मौका मिले तो इस पोस्‍ट को www.dhaiakhar.blogspot.com पर देखें

seema gupta said...

" very painful, after reading this post tears are in my eyes.... why we are so helpless as this point of time????"

Regards

संगीता पुरी said...

इस आलेख को पढ़ते हुए आंसू निकल पड़े। जिनके हाथ में शक्ति नहीं होती , वे ही शायद दूसरों की तकलीफों को समझते हैं। शक्ति आने पर सिर्फ अपनी शक्ति को आर बढ़ाने पर ध्यान संकेन्द्रण बढ़ जाता है।

Sarvesh said...

somehow I am getting a feal that Nitish is not doing what he could have done in such a major disaster or Pralay of country. He could have been the face of whole relief and rehabiliation. But his silence is demotivating people. He missed the chance to get recorded in good book of history. Still people remember the Rajendra Babu and Sribabu's effort during famine and earthquake of Bihar. I am really confused. Is media not bringing up his statements or efforts?