Sunday, August 1, 2010

मेरा गांव - मेरा देस- मेरे दोस्त - भाग १०

आज कई दोस्त याद आये ! गांव से लेकर दिल्ली तक ! 
बचपन में 'गोतिया / पट्टीदार' के भाई - चाचा जो हमउम्र थे उनसे बड़ा ही लगाव था ! उनमे 'पुरुषोत्तम भाई ' खास थे ! अगर पास में एक भी बिस्किट हो तो पुरुषोत्तम भाई से बाँट कर ही खाता था ! उनके पिता जी उछ विद्यालय में शिक्षक थे और साथ ही साथ कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ! स्नातक के बाद पुरुषोत्तम भाई ने दिल्ली में कल कारखाना खोला था पर पिता के अचानक देहांत के बाद वो वापस बिहार चले गए ! अभी भी वहाँ वो अपनी क्षमता के हिसाब से एक उद्दमी हैं और एक शिक्षक भी ! सपरिवार छपरा में रहते हैं ! अब पुरुषोत्तम भाई से शादी विवाह में ही मिलना होता है ! स्नेह और प्रेम आज भी है - एक आदर भी ! मुझसे १-२ महीने के बड़े होंगे और दिखने में  बेहद स्मार्ट :) 

सर गणेश दत्त पाटलिपुत्र हाई स्कूल में नामांकन के बाद - बेंच पर हम ४ जाने थे ! वहीँ दोस्ती हुई 'मृत्युंजय' और 'दीपक अग्रवाल' से ! मृत्युंजय थोडा पढ़ाकू टाईप था पर 'तेज' मै ही कहलाता था ! दीपक अग्रवाल बहुत ही तीक्ष्ण बुध्धी का था - आज वो बहुत ही बड़ा 'लोहा' का व्यापारी हो गया है ! दस साल पहले मुलाकात हुई थी - मालूम नहीं कहाँ है ? :(  मृत्युंजय डॉक्टर बन गया - घस्सू :)) सुना है विदेश में है ! कई साल तक हमदोनो में बात चीत बंद रही - हाल में ही मुलाकात हुई थी - मै ठहरा मुहफट - बोल दिया - 'डागडर बाबु' जैसा नहीं लग रहे हो :)) बहुत मेहनती ! 

डॉक्टर कॉलोनी - कंकडबाग में रहता था - वहीँ सामने पत्रकार नगर में एक दोस्त होता था - प्रमोद ! बहुत शरीफ ! हर शाम हम दोनों मिलते थे ! वो अपने चाचा के यहाँ रहता था ! भूरी आँखें वाला प्रमोद ! बड़ा भोला था !  पैसे की तंगी होती थी - पर कभी नहीं माँगा ! मैट्रीक के बाद हम नालंदा मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर कॉलोनी चले गए और विज्ञानं मेरा विषय हो गया और वो आर्ट्स ले लिया ! १८-१९ साल हो गए उससे मिले - मालूम नहीं कहाँ है ? शायद उसके पिता जी नहीं रहे ! 

पटना आने के बाद की एक घटना  याद है - जिस घटना ने मुझे "दीपक कुमार " से जोड़ दिया ! स्कूल के एक शिक्षक होते थे - राजेंद्र बाबु ! बहुत टेढ़े और बेवजह के सिद्धांतवादी ! खैर , हम उनके यहाँ पढने गए ! वहीँ दीपक से मुलाकात हुई ! पढने के दौरान हमदोनो ने कुछ ऐसी 'बदमाशी' की - 'राजेंद्र बाबु ' को हम दोनों को - तडीपार करना पड़ा ! वैसे तो दीपक दूसरे सेक्शन में था ! धीरे धीरे हम दोनों बहुत ही गहरे दोस्त हो गए ! बिलकुल भाई की तरह ! स्कूल के बाद - + २ के ज़माने में हम दोनों की जोड़ी बहुत फेमस हुई ! मेरे सारे रिश्तेदार उसको पहचानने लगे और लगभग सभी पारिवारिक मित्र  भी ! हम दोनों दिखने में भी एक जैसे थे - कई लोग कन्फ्यूज भी कर जाते ! मै जितना आलसी वो उतना ही फुर्तीला ! 'स्पीड' उसे पसंद थी ! तेज इतना की किसी के पल्ले न पड़े ! उसका छोटा भाई था 'प्रकाश कुमार' - हमारे स्कूल का टॉपर - एक बैच जूनियर ! दोनों भाई झगड़ते और जिधर मै जाता उसका पाला भारी हो जाता ! हमारे घर का हर सदस्य उसको मुझ से कम महत्त्व नहीं देता ! 

उसकी सगाई के दिन मै इतना भावुक हो गया था की - खुशी से आँखों से सावन भादो निकलने लगे ! अब वो 'रांची' में बहुत ही बड़ा व्यापारी हो गया है ! उसका छोटा भाई भी ! दीपक का छोटा भाई मेरा हमउम्र है - साल में एक दिन फोन करता है - मेरे जन्मदिन पर ! दीपक को जब जरुरत पडती है तब - बड़े हक से बोलता है ! हाल में ही मेरे 'पिता जी ' रांची गए थे - रेलवे स्टेशन पर न जाने कितनी गाडीओं से स्वागत किया ! बाबु जी कह रहे थे बहुत बड़ा और आलिशान कोठी जिसमे कई करोड के लकड़ी लगे हैं ! दिल्ली जब भी फुर्सत में आता है - मेरे यहाँ ठहरता है ! जिंदगी में बहुत 'रिस्क' लिया शायद मै नहीं ले  सकता था ! हाल में ही हम दोनों एक साथ एक ही रंग के टी शर्ट ख़रीदे और खूब घुमे :) उम्र में बड़ा है - एक दो साल सो - मेरे घर में उसको वैसा ही आदर भव मिलता है - मुझे हंसी भी आती  है :) 

क्योंकी मै दोस्ती को बहुत ही ज्यादा क़द्र करता हूँ - कभी हल्का सा भी ठेस पहुँचने पर 'बौखला' जाता हूँ - याद है - किसी कारणवश - मै गुस्सा में था - +२ का समय था - दीपक पर हाथ उठा दिया - बाए हाथ से - बीच वाली उंगली टूट गयी और शायद आज तक टूटी हुई है - हर सुबह दीपक को याद करता हूँ :) वो भी मेरे जैसा ही 'शानी' है - पर मुझसे पिटता रहा ! "

कॉलेज में भी  कई दोस्त हुए ! मुझे छोड़ लगभग सभी 'कंपनी' में काम करते हैं ! 'डॉलर' से भरे पड़े हैं ! मिलते हैं  तो 'नयी गाड़ी - नया मकान - नयी घड़ी ' के सिवा कोई और बात नहीं होती ! साल में छः महीने अमरीका - एरोप रहते हैं ! हमसे कम ही पढ़े लिखे हैं ;) अधिकतर तो आस पास ही रहते हैं - पर अब मिलना जुलना थोडा कम सा है ! शिकायत करो तो - कहेंगे - कंपनी ने गदहा बना दिया है ! हाँ , बच्चों के जन्मदिन पर मुलाकात होती है - जहाँ अधिकतर मै ही छाया रहता हूँ ! बहुत सारे - फेसबुक पर भी है - पर मेरे प्रोफाईल पर डर से या जलन से कुछ नहीं लिखते ;) बहुत सारे विदेश में जा बसे ! 

हाँ , जब हम सब अकेले होते हैं तो .....गर्मी की छुट्टी या बड़ा दिन में तो ....जम के मुलाकात होती है :)) 

खुशी होती है ..पुराने पन्नों को झांकने में - सभी दोस्त 'खुशमय' जिंदगी बसर कर रहे हैं - और क्या चाहिए ? 

कुछ नए मित्र भी बने हैं - पर जो दोस्त जितना पुराना ..उतना ही कीमती ...... 

रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

8 comments:

Virus said...

Aisa kyon hota hai ki aapka blog padhte padhte Bhopal se Bihar chala jata hun?

Wo beete din yaad aane lagte hain, senti hone ke baad sochta hun, ab aapka Mera Gaon, Mer desh nahi padhunga...

Lekin ... Dil To Bachha Hai Jee, manta hi nahi

Happy Friendship Day

PD said...

पूरे दिल से लिखे हैं आप.. दिमाग लगाकर नहीं.. इसलिए बहुत अच्छा लगा.. दो मिनट के बदले दस मिनट लगाकर जा रहे हैं.. :)

rashmee said...

Itna sajjev chitran ki bas Premchand ki yaad aati hai padhne ke baad.Achcha hua aap Gadha banne se bach gaye...writting freternity ko loss ho jaata.Bus itna hi kahungi likhte rahen....

madhu said...

आप बहुत अच्छा लिखते हैं सरल शब्दों में उन जाने पहचाने से चरित्रों को कुछ इस प्रकार से प्रस्तुत करना की वो आप के साथ हमारे भी अपने हो जाते है, ये आप के लेखन की एक विशेषता है |आप को पढ़ते हुए ये नहीं लगता की हम कुछ पढ़ रहे है वरन ऐसा लगता है की हम एक यात्रा पर निकले हुए है ..और पढने के घंटों बाद तक लगता है की हम अभी अभी कहीं से लौट कर आये है ..उन गलियों से उन शहरों से जहाँ आप अपने लिखने के माध्यम से हमें ले गये थे ...लगता है की हम वास्तविक रूप से उन लोगों से मिल कर आयें हैं जिन का वर्णन आप ने अपने लेखन में किया...अभी इसी अंक को पढ़ कर लगा की आपने व्यक्तिगत रूप से दीपक जी या उन के भाई प्रकाश जी से मिलवाया है...दूसरी आप के लेखन की विशेषता ये है की उस में सम्पूर्ण बिहार की संस्कृति की झलक मिलती है...अपने नाते रिश्तेदारों को याद रखना, उन के सुख दुःख में शामिल होना और खासतौर पर प्रेम और अपनापन रखना...हाँ कभी कभी आप कुछ जयादा ही बिहारी हो जाते है इतने की लगने लगता है की बिहार भारत का हिस्सा नहीं वरन भारत से अलग कोई और देश है .......बस इतना ध्यान जरूर रखें की पहले हम भारतीय हैं फिर बिहारी या मद्रासी या तमिल तेलुगु उया उत्तर प्रदेशी.....बधाई है आप को आप के लेखन केलिए...

Arbind Jha said...

bahut khoob bhaiya....

Abhishek Sharan said...

Padhne mein itna mashgool ho gaya ki metro se ja raha tha... Station hi chhoot gaya.. Wapis ana pada.... Sahi likhte ho aap... Apne des ki yaad aa jati hai...

sonu said...

itna majaa harry potter ki book padh k v nhi aata hai jitna aapke lekho ko padh kar aata hai, do din se padh rha hu aur store me customer ho ya na ho padh hi rha hu sales man jab tokte hai tabhi screen change hota hai nhi to bs.................

jeta jain said...

apne originality banye rakhi hai padh kar achcha laga danavad