Friday, August 13, 2010

शुक्रिया दोस्तों ....

तीन साल से 'ब्लॉग' लिख रहा हूँ ! जो दिल में आया - बस लिख दिया ! कुछ भी सोचा नहीं ! कई 'पोस्ट' लिखते वक्त आँखों से आंसू भी आये - कई में इतनी हंसी आयी की 'हाथों' से चाय गिरते गिरते बचा ! कई 'पोस्ट' बहुत बकवास तो कई दिल के बहुत ही करीब ! कई तो गुस्से में लिखे हुए हैं !

याद है - पोस्ट लिखते ही सबसे पहले 'सर्वेश भाई' को बताता था - बंगलोर में रहते हैं ! वो तुरंत 'ब्लोग्वानी' में  'वोट' दे दिया करते :) कभी उनका मूड हुआ तो "बूथ छाप" दिया करते और मेरा 'पोस्ट' "स्टार" हो जाता और ढेर सारे लोग आ कर पढते ! :) अगर "संजय भैया " ऑनलाईन हुए तो वो भी "वोट" दे दिया करते ! फिर मै अपने ब्लॉग का खुद से प्रचार करता ! सर्वेश भाई और संजय भैया तो यहाँ मेंबर भी हैं - "दालान" उनका कर्ज़दार है और रहेगा !!

इधर "फेसबुक" में मेंबर बना ! देखते देखते कई अन्जान लोगों से परिचय गया ! "पत्रकारों" को बहुत इज्जत देता हूँ सो बहुत सारे पत्रकार दोस्त बन गए पर वो मेरा "ब्लॉग" नज़रंदाज़ करते हैं - खैर , यह उनकी अपनी मजबूरी है ! पर , फेसबुक पर कई लोग यूँ ही टकरा गए और अच्छे दोस्त बन गए - "गप्पी हूँ" सो दोस्त तो बनेंगे ही ! दोस्ती की क़द्र करता हूँ - पर ये सोशल नेटवर्किंग साईट पर "विश्वास" जल्द नहीं बनता - पर जो कुछ भी विश्वास बना या बनाया - उसकी 'क़द्र' करूँगा - विश्वास कीजिए :)  हाल में ही किसी ने कहा - आपका 'ब्लॉग' नहीं आया तो उनके कहने पर 'फैशन' पर लिख दिया ! १-२ दिन गायब रहने पर लोग पूछते भी है - आप कहाँ हैं ? मालूम नहीं ये कैसा 'बंधन' है ?  अहमद भाई हमेशा कहते हैं - कोई उपन्यास लिखो या ब्लॉग को प्रिंट करवाओ - पैसा मै दूँगा :) उनसे कभी नहीं मिला हूँ - जब भी दिल्ली आने का होता है - पूछते हैं - कुछ तुम्हारे लिए लाना है ?? कई लोग मिले ....
इधर मई से कॉलेज में थोडा काम कम हो गया था सो समय पूरा था - जम के फेसबुक का मजा लिया ! "मेरा गाँव - मेरा देस"  सीरीज शुरू किया - लोगों ने पसंद किया ! कई तरह के कम्मेंट लोगों ने व्यक्तिगत ढंग से मुझे दिया - एक ने कहा 'मै "मासूम सामंत" की तरह लिखता हूँ और हूँ भी :)
"मेरा गाँव - मेरा देस" के पहले पोस्ट पर 'फेसबुक' पर विनोद दुआ साहब का कम्मेंट आया - "आप बढ़िया लिखते हैं - लिखते रहिये " ! यह एक सपना की तरह था ! आम इंसान हूँ - जिस पत्रकार को बचपन से देखता सुनता आया - वो अगर कुछ मेरे जैसे आदमी को जिसका पेशा यह सब नहीं है - कुछ कहे तो सचमुच बहुत बढ़िया लगा ! अगर फेसबुक नहीं होता तो शायद ऐसे लोग से कभी मिल नहीं पाता !
आज सुबह एक दोस्त ने कहा 'दिल खोल' कर लिखता हूँ ! अछ्छा लगा ! साहित्य को दसवीं के बाद कभी पढ़ा नहीं - पर यह समझ कैसे पैदा हो गयी - पता नहीं ! घर में वैसा माहौल नहीं था - हाँ ननिहाल में था ! पर जब से थोड़ी बहुत समझ आयी - तब से ननिहाल नहीं गया ! माँ ने हिंदी और संगीत की पढाई की है पर उनसे हिंदी कभी नहीं सीखा ! हाँ , बचपन में "डा० वचन देव कुमार' की निबंध भाष्कर ही पढता था ! याद है कुछ महीने - पटना आया तो मकान मलिक मलिक के छत पर एक बड़ा सा ट्रंक था - जिसमे हिंदी की कई उपन्यास रखे हुए थे - सब के सब २-३ महीने में ही चट  कर गया ! शिवानी - अमृता प्रीतम , ओशो और ना जाने कितने लोग ! मुंशी प्रेमचंद को बहुत कम पढ़ा हूँ पर 'फणीश्वर नाथ रेणु' पसंदीदा रहे पर वो भी आठवीं - नौवीं तक ही ! बंगलौर में नौकरी कर रहा था तब 'आचार्य चतुरसेन ' की उपन्यासों से मुलाकात हो गयी ! अब हाल के दिनों में फिर से एक बार ढेर सारे हिंदी ऊपन्यास खरीद लाया हूँ ! पढ़ना है :)

पर मेरे लिखने का सारा श्रेय "श्री संजीव कुमार रॉय" को जाता है - जिनसे यूँ ही इन्टरनेट पर टकरा गया और वो मेरा लिखा हुआ कुछ पढ़े फिर मुझे हमेशा प्रोत्शाहित किये ! उनसे भी कभी नहीं मिला - पर ७-८ साल से परिचय है - फेसबुक पर हर रोज मुझे पढते हैं :) मैंने उनका नाम 'जतिन दीवान' रखा हुआ है ;) पहले वो 'सिंगापूर' में थे जहाँ उन्होंने 'BIJHAR GROUP' बनाया - अब वो अपनी बहुत बड़ी कंपनी के 'ग्लोबल मैनेजर' बनके Bay Area , SFO , CA चले गए हैं ! भैया , जब भी कुछ लिखता हूँ - आपको याद जरुर करता हूँ :) , कैसे हैं ?

शायद आने वाले सोमवार से थोडा कम समय मिले पर अदा कदा 'ब्लॉग' लिखना जारी रहेगा - अभी तो बहुत सारी यादें लिखनी हैं :)

चलिए ..एक गीत सुनते हैं और स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं और देखते हैं - लाल किला के प्राचीर से 'मनमोहन सिंह' क्या बोलते हैं :)







रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !

4 comments:

Arbind Jha said...

logo ka kaam kaehna kahne dijiye bhaiya.. aap bus Uhe likhtae rahiye... sach mae bhaiya aap apna book publish kijiye bahut acha response rahega...

Udan Tashtari said...

बढ़िया है..याद करते रहें, लिखते रहें..शुभकामनाएँ.

Shankar said...

हमेशा की तरह, दिल से लिखा हुआ पोस्ट. यही एक बात है जिसने मुझे पिछले ३ साल से आपके दालान से जोड़कर रखा है.

ठीक है आपके दालान पर चाय-पानी नहीं मिलती, लेकिन दिल को जो निराली तसल्ली मिलती है, वो अद्भुत है.

स्वतंत्रता दिवस की ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ
शंकर

Ahmad Rasheed said...

Bhaut Badhiya Mukhiya jee. Main to aapke lekhan shaili ka shuru din se hi qayal raha hon or aapko hamesha protsahan karta raha hon ki aap lekhen or usko publish karwayen taki yeh or bhi logon ko aapki lekhan kala ka pata chale.