Saturday, September 25, 2010

लाईफ इन अ मेट्रो - पार्ट वन

फाईनल सेमेस्टर का परीक्षा के बाद हम 'पटना' में जम गए थे ! दोस्त लोग नौकरी में जाने लगे - फोन आने लगे ! हम सोचे जब सब 'नौकरी' कर रहे हैं - फिर हमें भी कर लेना चाहिए ! :)

'अमित' को बंगलौर में नौकरी लगी थी ! फोन किया - बोला 'आ जाओ' ! हम भी ट्रेन पकड़ लिए ! उनदिनो 'मोबाईल' नहीं होता था ! बंगलौर पहुंचा तो पता चला की वो 'दूसरे शहर ' गया हुआ है दीदी से मिलने ! अब मै क्या करूँ ? सोचा "नौकरी" करने आया हूँ - अंदाज़ फ़िल्मी होना चाहिए ! पूरी रात 'मजेस्टिक बस स्टेशन' पर् गुजार दिया ! अगली सुबह 'अमित' से मुलाकात हुई ! उसको कंपनी वालों ने 'मल्लेश्वरम' चौक पर् एक कमरा दिया हुआ था ! जम गए 'कमरा' में ! 'अमित' को हमारे बैच वाले 'दादा' कहते हैं ! 'दादा' को मेरी नौकरी की टेंशन थी - मैंने उसको समझाया - नौकरी बड़ी चीज़ नहीं है - नौकरी में मन लगना बड़ी चीज़ है ! पटना से चलते वक्त - बाबु जी ने बाटा का किंगस्ट्रीट जूता खरीद कर दिया था - १० ही दिन में वो बेचारा दम तोड़ दिया ! खैर अगले एक दो सप्ताह में ही नौकरी लग गयी ! एक आई आई एम अलुम्नी की छोटी सी कंपनी थी !

हर सुबह 'नहाने' का झंझट होता था ! जब तक मै सो कर उठता - 'दादा' नहा धो कर 'तैयार' :) अब जब वो अपने ओफ्फिस की तरफ निकलता तब मै 'अखबार' पढता - फिर चाय - फिर नहा धो कर लेट लतीफ़ ! शाम को लगभग हम दोनों एक ही समय में पहुँचते ! फिर साथ में 'दूकान' में एक कप चाय को दो भाग में करके  पीते ! जिस जगह हम रहते थे - वहाँ काफी व्यस्त सड़क थी ! उसको 'मल्लेश्वरम सर्किल' कहते थे ! देर रात तक भीड़ भाड़ ! एक मैग्जीन की दूकान होती थी - वहाँ से आठ आना में मैग्जीन को रात भर पढने के लिए लाते थे ! :) The Week की लत वहीँ लगी थी !

रात को खाने का हमलोगों ने बढ़िया ट्रिक निकाला था ! एक अंडा के दूकान से चार उबला अंडा खरीद , फिर एक रेस्तरां से छह रुपईया में एक प्लेट चावल और चिकन की करी :) कुल १२ -१३ रुपईया में दम भर खाना :) दरअसल 'दादा' ने रेस्तरां के किचेन वाले को 'फिट' कर रखा था :) वो एक प्लेट चावल की जगह दो प्लेट दे देता था और चिकन करी मुफ्त में :) हम इतने बेचारा शक्ल में होते की - कोई भी कुछ भी दे सकता था :) एक शनीवार दादा 'ब्रिगेड' लेकर गया - बोला 'देखो' यही है "दुनिया" ! फिर क्या 'दादा' के "विजय सुपर " पर् चढ हम रोज "दुनिया" देखने जाने लगे ! :) फिर , शनीवार देर रात ! क्या 'दुनिया थी' :) "जन्नत लगता था" ! कई दोस्त जो वहाँ विदेशी कंपनी में काम करते थे - वहीँ मिलते ! जो जितना 'कमाता' वो उतना ही बड़ा 'कंजूस' :)

मेरे लिए 'अन्जान' लोगों से दोस्ती थोड़ी मुश्किल थी - पर् 'दादा' सब से कर लेता था ! हम जिस मकान में रहते थे - उसका नाम था "रतन महल" ! हम जैसे ही वहाँ रहते थे ! दादा वहाँ बहुतों से दोस्ती कर लिया ! एक और टीम था - उडिया का - "सुबुध्धी" - ISRO में वैज्ञानिक था ! अब टीम बड़ी हो गयी - रात में साथ खाना खाने वालों का ! हम और दादा अब 'चावल और अंडा' वाला धंधा बंद कर दिए थे - हम सभी अब नए ठीकाने खोज लिए - "आन्ध्र स्टाईल" रेस्तरां ! इसी बीच हम भी एक 'बजाज चेतक स्कूटर' खरीद लिए !

तब तक 'तविंदर सिंह' पहुँच गया ! लंबा चौड़ा 'जम्मू का सरदार' ! उसको भी नौकरी लग गयी :) हम तीनो एक साथ "दादा" के कमरे में रहने लगे ! एक दिन 'दादा' बोला - भाई - ये रूम मेरी कंपनी का है - अब तुम दोनों अलग कमरा ले लो ! हम और तविंदर दोनों ने एक कमरा उसी 'रतन महल' में ले लिया ! तविंदर सरदार था - दिल बहुत बड़ा और 'बहस करने में उतना ही माहीर ! रात भर बहस करता था ! और कमरे में मै पलंग पर् सोता और वो नीचे ! कभी शिकायत नहीं किया ! अब वो कंगारू स्टेपलर का इंटरनेशनल हेड है :) नॉएडा आया था तो मिला था :) फेसबुक पर् भी है :)

तविंदर के आने से एक फायदा हुआ - हम सभी अलसूर रोड पर् एक गुरुद्वारा में हर रविवार 'लंगर' खाने जाने लगे :) बहुत मजा आता था ! पूरा एक टीम ! तविंदर देर रात अपनी पगड़ी को हम सभी से सीधा करवाता था :) फिर सुबह में उसकी पगड़ी बांधो !

एक छोटी सी घटना याद है - के आर सर्किल के पास बंगलौर का सबसे बढ़िया 'इंजिनिअरिंग कॉलेज' है - वेश्वेश्वरैया जी के नाम पर् ! वहाँ से गुजर रहा था ! पोस्टर देखा - वहाँ 'मिलेनियम ग्रुप' का रॉक शो होने वाला था ! मै कॉलेज के अंदर घुसा गया ! अभी नया नया खुद भी कॉलेज से पास किया था तो झिझक नहीं हुई ! वहाँ के विद्यार्थीओं के कल्चरल सेक्रेटी से मिला और बोला - "मुझे अवसर दोगे , मिल्लेनियम ग्रुप के साथ ? " वो बहुत देर तक हंसा फिर बोला - ओके , आ जाना कल :) अब , कल के लिए कपडे नहीं थे :) जिस कपडे में 'इंटरविउ' देता फिरता था - उसमे ही पहुँच गया - सफ़ेद शर्ट - काला पैंट और लाल टाई ;) "दादा" भी साथ में था ! जबरदस्त स्टेज और क्रावूड ...मस्त !! ;) पचास हज़ार वाट के स्पीकर्स :) बेहद ख़ूबसूरत लड़कियां - हर लिबास में ! दक्षिण भारत के सभी बढ़िया इन्जीनिअरिंग कॉलेज के एक से बढ़कर एक लडके - लडकी आये थे ! "दादा" को किस किया और फांद गया - स्टेज पर् - खुद का लिखा 'गाना' - सब झूम गए ! स्टेज से नीचे उतरा तो 'दादा' बोला - क्या बोला ....आज तक कानो में सुरक्षित हैं :) फिर क्या था ...दादा थोडा दूर खड़ा था और मै जिंदगी में पहली दफा इतनी सारी हसीनाओं के बीच अकेला खडा था :) किसी ने कहा 'दम चलेगा ? " हा हा हा ... ....उफ्फ्फ्फ़ ..वैसे पल फिर कभी नहीं आये ...और सिर्फ 'दादा' ही इसका गवाह बन सका ! दोस्त है - बड़ा भाई जैसा भी ! इंदिरापुरम में ही रहता है :) विप्रो में बहुत बड़ा अधिकारी बन गया है ! मेरी एक डायरी भी उसके पास सुरक्षित है ;) !
कुछ महीनो के बाद दादा कलकत्ता चला गया ! वहीँ उसको नौकरी मिल गयी ! तविंदर अपने ढेर सारे सामान को मेरे पास छोड़ ..जम्मू वापस चला गया ! मै काफी अकेला हो गया ! मै अपनी पुरानी कंपनी छोड़ 'दादा' वाली कंपनी में चला गया ! 'सिंगापूर' की कंप्यूटर नेटवर्किंग कंपनी थी - मालिक 'I I Sc ' से पास था - 'वैज्ञानिक' जैसा ! बहुत पढ़ना पड़ता था - वहाँ ! तनखाह मुहमांगी जैसी थी - पर् 'मन' बिलकुल नहीं लगता था ...बिलकुल भी नहीं ..!

क्रमशः !!!


रंजन ऋतुराज सिंह - इंदिरापुरम !


9 comments:

drpawansharma said...

आपके अनुभवों के बारे में पढ़ कर मैं आज से बीस साल पहले की ज़िंदगी में चला गया। दस साल का था मैं जब पहली बार बैंगलोर गया था। पीण्या, बैंगलौर में छोटे कारखानों का बड़ा गढ़। २५२ नं की बस जो दिन में बस पांच बार चलती थी, उसपे सवार हो हम एतवार को मैजेस्टिक घूमने जाते थे। वापस लौटते यशवंतपुर रुक कर सब्जियां खरीदते थे। सालों भर एक चादर की सर्दी।
लिखने को बहुत कुछ है। आप हिंदी प्रेमी हैं और मैं बहुत छोटा। पूर्णविराम की अपेक्षा एक्सकलेमेशन मार्क का अत्यधिक प्रयोग आपकी लेखनी को बिगाड़ता है। आशा है आप खयाल रखेंगे।

Shankar said...

Before leaving my comment, I'd like to apologize for posting it in English.I don't have Hindi support and I don't want to abuse my mother tongue by using transliteration.

Well, every post of Daalaan seems to be related to my own life, feelings and situations that I faced in life. In fact this is the real beauty and significance of Daalaan.

This post too reminded me of my days. After leaving a well paid and relaxing job at NIIT Ranchi, I left for Delhi with my ambitions. But had to face lots of difficulties. Thanks to DTC for the daily buss pass facility.

Friends are always a treasure, who help during tough times. I also can't forget my days of struggle in Delhi and the pain that I felt when I decided to leave Delhi finally was unbearable. I hope to see other colors of Life In A Metro ASAP.

Ranjan Bhaiya, are you listening? We want it to be an instant blockbuster like Dabang, not like the movie title u selected.

रंजन said...

पवन जी ,

मै हिंदी प्रेमी नहीं हूँ - पहले भी कई बार कह चूका हूँ - भाषा कमज़ोर है - साहित्य से रूचि है ! आपकी बातों पर् गौर करूँगा :)

गजेन्द्र सिंह said...

अच्छी रचना .........

पढ़िए और मुस्कुराइए :-
क्या आप भी थर्मस इस्तेमाल करते है ?

Krishna said...

बहुत ही सुन्दर लिखा है रंजनजी आपने,अपने संस्मरण को पुस्तक रूप में संकलित करके प्रकाशित करने का मन बनाएँ, मैंने पहले भी कहा है फिर कहता हूँ बहुत लोकप्रिय पुस्तक बनेगी, हमारी अग्रिम शुभ कामनाएं :)

Jai said...

@ रंजन जी

पहली बार आपका ब्लौग पढ़ा। भाषा के बारे में आपके पूर्व के व्यक्तव्य से अवगत नहीं था। क्षमाप्रार्थी हूं।

पवन शर्मा

brajmohan said...

रंजन जी,
पहले भी कई बार आपका ब्लॉग पढ़ चुका हूँ. शायद इस बार थोडा विलम्ब हुआ पढ़ने में.
अच्छा लिखते हैं, मैं साल २००० में चला गया जब नया-नया स्नातक में दाखिला लेकर पटना के अशोक राजपथ के चक्कर काटा करता था.

:)

रंजन said...

धन्यवाद ब्रजमोहन जी !

मै पत्रकार नहीं हूँ ! फिर भी 'सोच' पत्रकारिता वाली है ! भाषा थोड़ी नहीं - कुछ ज्यादा ही कमज़ोर है :) फिर भी कोशिश में लगा रहता हूँ :)

रंजन said...

शंकर भाई !

मुझे पता है आप मेरी सभी पोस्ट पढ़ चुके हैं :)भावुकता आप में कूट कूट कर भरा हुआ है :(
कंट्रोल कीजिए :)