Sunday, February 6, 2011

मेरा गाँव - मेरा देस - मेरा स्कूल

हम कितना स्कूल में पढ़े - ये खुद हमको नहीं पता है :(  कभी हम स्कूल को रिजेक्ट किये तो कभी स्कूल हमको रिजेक्ट किया ;)  खैर , सातवीं क्लास मैंने अपने खानदानी स्कूल  "जिला स्कूल - मुजफ्फरपुर" से पास किया ! ये  स्कूल कई मायनों में मेरे परिवार के लिये महतवपूर्ण है - परबाबा से लेकर मुझ तक - चार पीढ़ी इस स्कूल में पढ़े  और इसके ठीक बगल में 'चैपमैन गर्ल्स स्कूल' था जिसमे फुआ दादी और फुआ तीनो बहन ! तीन खूब बड़े बड़े मैदान , अंग्रेजों के द्वारा बनवाया हुआ विशाल स्कूल , स्कूल के अंदर ही शिक्षकों का बड़ा बड़ा क्वार्टर ..क्या नहीं था ! सबसे विशेष यह था की - वहाँ के प्रिंसिपल 'जयदेव झा' ! वो बाबु जी  को पढ़ा चुके थे - अब मै उनका विद्यार्थी था ! न जाने कितने ऐसे शिक्षक थे - जो बाबु जी सभी भाईओं को पढ़ा चुके थे और अब मै उन सब शिक्षकों का विद्यार्थी था ! स्नेह मिलता ! कई किस्से हैं ..कभी बाद में सुनाऊँगा :)) 

 अभी सातवीं का  वार्षिक परीक्षा देने ही वाला था की बाबु जी का ट्रांसफर 'पटना' हो गया ! हम मुजफ्फरपुर में ही रुक गए - फिर टी सी लेकर  पटना आ गए ! हम सभी उन दिनों - नाना जी के साथ 'सलीम अहरा - गली नंबर  एक " ( उमा टाकीज के ठीक पीछे ) रहते थे ! पटना हम लोगों के लिये किसी भी विदेश से कम नहीं था ! बड़ा और लगभग सौ साल पुराना मकान था ! खूब चौडा चौड़ा बरामदा ! मामू जान लोगों के पीछे - पीछे ही समय कटता था ! अब मेरा 'एडमिशन' कहाँ हो - यह नाना जी का हेडक था ;) नाना जी कहीं से किसी से "चिठ्ठी" लिखवा कर लाये - फिर एक दिन मै पहुँच गया - " सर गणेश दत्त पाटलिपुत्र हाई स्कूल " , कदम कुआं ! जहाँ मै भव्य 'जिला स्कूल' से आया था वहीँ ये स्कूल का कैम्पस छोटा था ! मन में अभी भी 'नेतरहाट' था - एक क्लास जूनियर ही सही - वहीँ निकल जाना चाहिए ! बहुत लोग बोले - बिहार बोर्ड में "नेतरहाट" के बाद "सर गणेश दत्त पाटलीपुत्र " ही आता है ! फलाना बाबु का बेटा - चिलाना बाबु का पोता - तरह तरह के उदाहरण दिए गए ! खैर 'आठवीं' में एक सेक्शन में जगह मिल गया ! 

पहला दिन स्कूल जाने के लिये 'रिक्शा का भाड़ा' मिला ! हम भी रिक्शा खोज उस पर् बैठ गए ! शाम को लौटे तो पता चला की पड़ोस में रहने वाले के पुत्र महोदय भी मेरे क्लास लेकिन दूसरे सेक्शन में हैं - कल से उन सब के साथ ही जाना है ! नाना जी के पड़ोसी थे - पटना / बिहार के शराब के सबसे बड़े विक्रेता 'शालीग्राम प्रसाद' ! बहुत पैसा पर् हम सभी का गजब का इज्जत ! अगले दिन से "बबलू" के साथ जाने लगा ! एक नियम था - मकान के कैम्पस से निकल कर रोड पर्  खडा होना - फिर देखता की उधर से कई लडके आ रहे हैं - फिर एक झुण्ड बन् गया ...और झुण्ड चल दिया ..जगत नारायण रोड :)) रास्ता में 'जन संपर्क विभाग' का एक ऑफिस था  - जहाँ मै थोड़ी देर के लिये 'हिन्दी अखबार' पढ़ने के लिये रुकता था ...हाल में वहाँ गया था - कुछ नहीं था :( "बबलू " चिल्लाता - अखबार पढता है ..हुंह ..नेता बनना है ..का ?? :))

रिक्शा की जगह - पैदल जाने में मजा आने लगा ! रास्ता भर तरह - तरह 'बहस' और स्कूल पहुँचते सब अपने अपने क्लास में ! मेरे बेंच पर् थे - मृत्युंजय कुमार  , दीपक अगरवाल , एक था कोचर और चौथा था - एक वर्मा - नाम भूल रहा हूँ :( श्रीकांत बाबु क्लास शिक्षक थे ! यहाँ फीस का जमाना नहीं था - पर् जो जितना दिन ऐबसेंट रहता - उतना दिन का - प्रती दिन शायद दस पैसा के हिसाब से जमा करना होता था ! पहले ही महीने - श्रीकान्त बाबु ने मुझे यह अवसर दिया की मै ही वो पैसा सर के बगल में बैठ कर जमा करूँ - यह बात उन विद्यार्थीओं को नहीं पचा जो मुझसे पहले से इस स्कूल में थे ! अगले महीने से मै दरकिनार कर दिया गया :( 

खैर ..दो तीन महीना के बाद ही हम लोग 'डोक्टोर्स कॉलोनी ' कंकडबाग आ गए !क्या मजाल की कोई  दूसरा स्कूल वाला कुछ बोल दे ..मेरे मकान में ही 'आनंद मोहन' भैया रहते थे - गजब का स्नेह ! ठीक सामने - बलदेव बाबु का मकान था - जो उन  दिनों वाईस प्रिंसिपल होते थे ! शाम को उनके यहाँ मेरे बैच के कई लडके पढ़ने आते ! उनका खुद का बहुत ही बड़ा मकान था !

अब कंकडबाग से स्कुल जाने के लिये 'हीरो' का नया साईकील खरीदाया ...पहला दिन साईकील से स्कुल गए ...कोई घंटी चुरा लिया :( दोस्तों की जिद से ..अब हम सभी पैदल जाने लगे ! सचिवालय कॉलोनी से मृत्युंजय , पत्रकार नगर से प्रमोद और भी एक दो क्लास जूनियर सब आने लगे ...हम लोग 'राजेंद्र नगर' गुमटी पार कर के          जाने लगे ..तब 'राजेंद्र नगर ओवरब्रिज' बन् रहा था ! वहाँ नीचे ....जुआ वाला सब ठेला पर् जुआ दिखाता ...ताश के तीन पत्ते का हेर फेर ...कई दोस्त जिनको लंच के नाम पर् कुछ पैसा घर से मिलता था ..वो रास्ते में ही इस 'जुआ' में गंवा देते ...हा हा हा हा हा ! हम सब उसका हाथ पकड़ के खिंच के वापस ले जाते ...वैशाली सिनेमा के ठीक सामने से होते हुए ..शेखर सुमन के घर होते हुए ...लोहानीपुर से एक पतली गली से होते हुए स्कुल ....लोहानीपुर पहुंचते ही हम सब ठिठक जाते ....कंकडबाग वाला लड़का सब एक दम से सावधान की मुद्रा में ! मेरे क्लास में 'इन्द्रजीत - दिग्विजय' ..एक से एक हीरो ! अब मालूम सब कहाँ हैं :(

घींच घांच के आठवीं पास किया ! नौवीं में बद्री बाबु क्लास टीचर थे - अंग्रेज़ी पढ़ाते - सैमसंग एंड डेलीला ....डी डी राय ..जो पुरे पटना के सबसे मशहूर शिक्षक थे - वो गणित पढ़ाते - एक दिन 'दिग्विजय' हत्थे चढ गया - हो गया धुनाई .....हा हा हा हा ....महिला शिक्षक बहुत ही कम ...! एक दू नेता टाईप शिक्षक भी ! प्रिंसिपल थे - रामाशीष बाबु - जबरदस्त - भारी भरकम शारीर - अपने कमरे से अगर निकल गए तो - फिर क्या - जो जहाँ है - वो वहीँ रुक गया ! पर् उनसे भी ज्यादा शक्तिशाली - हमारे स्कुल का गेटकीपर - लंच के ठीक बाद - जब वो शहंशाह स्टाईल में गेट का सिक्कड़ घुमाता ....हीरो टाईप लड़का लोग का होश ठिकाने आ जाता ! क्या मजाल कि कोई लडका गेट से निकल जाए ! प्रिंसिपल सर के कमरे में "ट्रॉफी" भरा होता था ! बोर्ड  लगा होता - बोर्ड पर् तेज विद्यार्थी का नाम - राजीव कुमार सेठ - बिहार बोर्ड - प्रथम - फलाना - बिहार बोर्ड - तृतीय ..चिलाना - बिहार बोर्ड - नौवां स्थान !

नौवां में ही था - युवा दिवस के शुभ कार्यक्रम के लिये - मोईनउल हक स्टेडियम में - हमें कुछ प्रैक्टिस करने जाना था - अपने क्लास से मै सेलेक्ट हुआ - स्कूल से नौवीं और दशमी के ढेर सारे लडके - वहाँ एक दिन प्रैक्टिस के दौरान मेरे स्कूल के किसी दसवें वाले ने किसी 'अंग्रेज़ी' स्कूल की लडकी पर् सीटी मार दी - अगले दिन - हुआ मार - हा हा हा हा हा ....अब सर गणेश दत्त पाटलिपुत्रा का विद्यार्थी कहाँ रुकने वाले थे ...जबरदस्त हंगामा ! कार्यक्रम रोकना पड़ा ! कहानी शुरू हुआ - लोयला में एक बार सेंटर पड़ा - लोयला में डी डी राय पर् कुछ कमेन्ट हुआ ...लगा की ...लोयला में आग लगा देंगे ! ये क्रेज था - डी डी राय का !

वचनदेव कुमार का बृहत् निबंध भाष्कर जुबान पर् था ! एक घटना याद है - आठवीं का नौमही परीक्षा दे रहा था - वर्मा प्रेस से लाल हरा नीला - प्रश्नपत्र आता था ! हिन्दी का परीक्षा था - बगल में नौवां का एक विद्यार्थी बैठा था - इंदिरा गाँधी पर् निबंध लिखने को आया था - हम अपना परीक्षा छोड़ - अपने सीनियर को पुरा  निबंध लिखने में मदद की !

क्लास में अंदर - एक लडका था - राकेश - काला सा - क्या लिखता था ..एकदम मोती जैसा अक्षर और गजब का लैंग्युज सेंस - उससे जलन होती :) एक बेंच पर् हम सभी - फिक्स थे ! महीनो आपस में बात चीत नहीं होता - इगो क्लैश ! एक क्लास छूटता और दूसरे शिक्षक के आने के बीच - पुरा स्कुल ..बरामदा में :) इस वक्त आप किसी को खोज नहीं सकते ! छुट्टी के समय - जिस रफ़्तार से हम सीढियां फांदते ...उफ्फ़ ...! लौटते वक्त ..रास्ता  भर .."कपिलदेव बनाम गावस्कर" ...एक दिन गेट पर् एक सरदार विद्यार्थी .. ..तिवारी पर् मुक्का चला दिया ..तिवारी का जबड़ा टूट गया ....उफ्फ़ ...अगर आज ऐसा होता तो ..अखबार और टीवी में तिवारी हीरो बन् जाता ! गेट पर् छुट्टी के ठीक बाद सभी क्लास के हीरो भाई लोग ..एक साथ जमा होता था ...हा हा हा ...यूँ कहिये ..लोहानीपुर का सब विद्यार्थी हीरो ही होता था !

दसवीं में 'डी डी राय' हमारे क्लास टीचर बने ! बहुत ही गर्व की बात थी - हमारे लिये ! इसी  साल  उनका आवाज़ जाने लगा ...और बाद में पता चला की उनको "कैसर" हो गया ! पटना प्रसिध्ध इस टीचर के हम अंतिम बैच थे ! आज भी उनकी याद आती है ....मन करता है ..उनके नाम पर् एक स्कॉलरशिप शुरू करूँ .....

बहुत यादें हैं ....क्या लिखूं और क्या न लिखूं ....सभी शिक्षक को नमन ....सीनियर को नमस्ते ......बैचमेट को .." का रे ? कहाँ हो आज कल ? " ......जूनियर को ....."और भाई ...सब ठीक न .." :))

आपको एक बात बताता हूँ ....इस स्कुल का अलग संस्कार होता था .....पुरे भारत में उच्च शिक्षा का कोई ऐसा संस्थान नहीं है ...जहाँ यहाँ के विद्यार्थी नहीं पाए जाते होंगे ...अगर आप उन्हें पहचानना चाहते हैं तो जो भी आदमी पटना का हो ..थोडा टेढा हो ..आप "सूंघ" के बता देंगे की - वो "सर गणेश दत्त पाटलिपुत्रा" का अलुम्नी है ....

चलिए ....कुछ आपको याद हो तो लिखिए ...कमेन्ट में ...मै अगले  पोस्ट में आपके कमेन्ट डालूँगा :))


हाँ , बीस फरवरी को हम सभी नेशनल स्पोर्ट्स क्लब ऑफ इंडिया , प्रगति मैदान के ठीक सामने , नई दिल्ली में "री उनीयन" / गेट टूगेदर / मीट ..जो कहिये ..मना रहे हैं ....जबरदस्त ढंग से ....

रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !

4 comments:

apconindia said...

rituraj ji pura school najar sey gujar gaya...lovely wrting,bahut dino baad itna jabardast likha hua padha...maan gaye ustaad..

Ravish_IITG said...

bahut badhiya laga....

bhale hum patna ke nhi hue ...par darbhanga me apne school ka bhi pura rekha kheech diye aap >>> ab college aur job me aisi lyf kahan >>>

aur likhte rahiye... hum pratiksha karenge aapke aise sundar yadon ke lekhani ka >>

SANJU said...

बहुत अच्छा लगा पढ़ कर.आप की लेखनी वाकई काबिलेतारीफ़ है;पढ़ने के क्रम मे एकदम से लगा कि मै स्कूल के दिनो को अपने अन्दर समाते जा रहा हू.........ओर जब पुरा पढ़ लिया तो एक माऊसी सी हुई-काश ये लेख कभी खत्म ही न होता,जैसे एक सुखद सपना का अन्त निन्द k अनयास खुल जाने से होता है...........और मन को बहलाने के लिये यहि मान के संतोष कर लेना पड़ता है कि कभी फिर इसी तरह का सुखद सपना देखने का सौजन्य शायद प्राप्त हो ही जायेगा....................Waiting eagerly for your next write-up about the good old days spent in the school................

Ajit Singh said...

Are ranjan apne Sinha sir ko kyun bhool gaye...maine to unko kabhi padate nahi paaya....unka class mai aana aur bolna "sab log kitab kholkar pado" aur khud puri class neend lena aur kisi nae unke neend mai khalal daali to bus uski khair nahi.....D D Roy ke naam pe Scholarship gr8 Idea...hum unse hi tution padte the..hume yaad hai unke aawaz ka dhire-dhire jaana...bachha log,kya jee balak..ye unka patent word tha...

yaar tumne to bahut kuchh yaaden sanjoye rakha hai..mai bhi usi section mai tha lekin zindgi ke thapedo no yaado ko dhundhla sa kar diya hai bhia : (