Sunday, August 30, 2015

भूमि अधिग्रण बिल



‪#‎भूमि‬ पार्ट - एक 
मै एक ऐसे कूल / खानदान / परिवार / जाति / समाज से आता हूँ - जहाँ आप हार्वर्ड से भी पढ़ के आयें - अगर लड़की वाले आपकी शादी के लिए आये तो - कहीं न कहीं से एक प्रश्न जरुर उठेगा - "लड़का के हिस्से कितना जमीन है ? " ..:)) क्योंकी यही एक ठोस है बाकी सब तरल है ! ठीक वैसे ही - शादी के बाद हर लड़की का वजूद उसके स्त्री धन से लगाया जाता है - कितना तोला / भर सोना उसके हिस्से है ! विपती पूछ कर नहीं आती और विपत्ती में जो ठोस है वही काम देता है ...:)) 
आज ही टाईम्स ऑफ़ इण्डिया की खबर है - देश के 'अल्ट्रा धनीक' लोग अपने अधिकतम पैसे 'रियल स्टेट' में ही लगाते हैं ! एक मित्र जो अफ्रीकन देशों के जानकार हैं - कहने लगे - इन्डियन कंपनी अब अफ्रीका में लाखों एकड़ जमीन खरीद रही हैं ! 
आपकी कोर्पोरेट / सरकारी नौकरी आप तक ही है - बैंक में रखा पैसा कब फुर्र से उड़ जाए कोई ठीक नहीं - लेकिन जो जमीन जायदाद है वह पीढी दर पीढी चलती है क्योंकी उसे इवोपोरेट होने में समय लगता है ! 
सब कुछ बढ़ रहा है बस जमीन जितनी इस धरती के जन्म के समय थी - उतनी ही जमीन आज भी है ! वो ना घट रहा है ना ही बढ़ रहा है ! दिक्कत किसी को भी नहीं है - बड़े किसान जमीन छोड़ बड़े शहर में सुख सुविधा भोग रहे हैं - छोटे किसान का पेट नहीं भर रहा - दिक्कत मंझोले किसानो को है ! 
सरकार का कौन सा मंत्री / अफसर किसके हाथ बिका हुआ अहै - कहना मुश्किल हो जाता है या वो कुंठीत है - इसमे फंस जाते हैं - बेचारे मंझोले किसान ! 
उदहारण - सन १९९६ में बंगलौर में इंटरनेशनल एअरपोर्ट के नाम पर किसाओं की जमीन अधिगृहित की गयी - रातों रात किसान अरबपति बन गए - बड़ी गाडी से से एमजी रोड में घुमने लगे - जो कल तक हल चलाता था वो मर्सिडीज में घुमने लगा - जिसे सही से पैजामा पहनने का ढंग नहीं वो अपनी गाडी में अल्ट्रा मॉडर्न लड़की लोग को घुमाने लगा - ताकत उस लिक्विड पैसे में थी ! पैसा लिक्विड होता है - गैस फॉर्म में उड़ गया ! कई किसानो के घर भुखमरी की नौबत आ गयी - सारी जमीन "गुजराती" बिजनेस मैन के हाथों में जा चुकी थी - जहाँ आने वाले समय में बड़े होटल खुलने वाले थे - जहाँ वो किसान और उनके बच्चे प्लेट धोने की तैयारी में ...कई रात भूखे पेट सो रहे थे ...जमीन भी गया - पैसा भी गया ...
क्रमशः ...

‪#‎भूमि‬ - पार्ट दो : उत्पल पाठक / पत्रकार 
रंजन जी आज दालान में भूमि पर लिखे हैं , हमेशा की तरह बहुत लोगो की कहानी एक कहानी में समेट कर , मुंशी प्रेमचंद जी भी भूमि के आगे पीछे जोड़ कर बहुत कुछ लिख गये , उनके घीसू , होरी , अमीना के बीच भूमि और उसका विवाद , उसका प्रेम और भूमि से उपजा प्रतिवाद भी उनकी लेखनी से बाहर आता रहा, डा राही मासूम रज़ा साहब भी अपनी आत्मकथा "आधा गाँव" में मुहर्रम के इर्द गिर्द घूमती कहानियों के साथ भूमि और उसके प्रभाव बताते नहीं थकते , नीम का पेड़ में भी बुधीराम की गरीबी और सुखराम के अमीर हो जाने के बाद तक भी ज़ामिन मियाँ और सामिन मियाँ की भूमि कथानक के इर्द गिर्द घूमती रही और न कहानियों ने ही अंत तक उस नीम के पेड़ को ज़मीन में गाड़ कर रखा।

खैर , भूमि सिर्फ शब्द नहीं , बल्कि सम्पदा का स्वरुप और आभिजात्य वर्ग में बैठने का लाइसेंस भी , आपको भले ही आपके सामान्य कपड़ो , गाड़ियों के माध्यम से कम आँका जाय, लेकिन अगर आपने ये बताया कि आपके पास गाँव में भूमि है तो आपकी इज़्ज़त बढ़ जाएगी, और शहर में भूमि होना तो रेगिस्तान में नखलिस्तान होने के मानिंद है , लेकिन भूमि को लेकर कुछ शाश्वत सत्य भी हैं जिनका न कोई विकल्प है और न ही उत्तर , दर असल ये भूमि हमारे समाज में आत्ममुग्धता और आत्म प्रवंचना का सबसे बड़ा उदहारण है , और ख़ास तौर पर पैतृक भूमि और जिन्हे आज भी अपनी भूमि का मिथ्या आकर्षण प्रभावित करता हो , और जिन्हे ये लगता हो कि एक दिन आप उसका इस्तेमाल कर पायेंगे , ठीक उसी तरह जैसे आपके बाप दादा बाप दादा नौकरी करते रहते कर लेते थे तो कृपा करके इस आत्मप्रवंचना से बाहर आ जाईये, और फिर भी आप उस भूमि से जुड़े रहना हैं तो यकीन कर लीजिये कि आपकी ज़िंदगी अब सिर्फ चंद बीघे ज़मीन को बचाने में ही बीतेगी।
तहसील , दीवानी , कचहरी और न जाने क्या क्या , मध्यम वर्गीय मानसिकता के बीच इन सब को ढो कर ही जीना अब आपकी नियति है . और अब बाजार के और समाज के दबाव में आप सब में इतनी हिम्मत भी नहीं बची कि आप सूबेदार पान सिंह तोमर जैसे बागी बन जायेंगे, और मुआफ कीजियेगा बन कर भी क्या उखाड़ लेंगे ? कोशिश भी मत करियेगा, अंत में तो मौत ही मिलेगी लेकिन उसके पहले छीछालेदर हो चुकी होगी, राय मशवरे के लिये संगी साथी खोज रहे तो भी मत खोजिये क्यूंकि सबका जवाब यही होगा, बेचो और आगे बढ़ो , सब कुछ अजीब और अनमना सा लगता है , बेसाख्ता बस सब कुछ होते हुए देखते रहिये .. मान सम्मान प्रतिष्ठा सब सामाजिक लोलुपता सरीखी बातें हैं।
आप सरकारी नौकरी में हों या प्राइवेट , आप निज प्रदेश में हो या परदेस में , सह प्रांतीय हों या परप्रांतीय , लेकिन आपके पास यदि भूमि है तो आपके पास पट्टीदार भी हैं , गोतिया भी , भाई भी भौजाई भी और साथ में तहसील है , मुक़दमा है , ख़ारिजा है , खसरा है , खतौनी भी है , आप बचा पाएं तो बचा लें लेकिन बचने बचाने की लालच में बहुत कुछ हाथ से निकल जायेगा और एक अवस्था के बाद भूमि का उपयोग आप भी न कर पाएंगे। और जिसे इस बात का दुःख है कि काश हम पुलिस में होते या काश हम किसी सरकारी विभाग में होते या डाक्टर इंजीनीयर होते तो हमारा काम आसानी से हो जाता तो अपने मन से वहम निकाल दीजिये क्यूंकि भूमि के चक्कर में सिपाही से लेकर साहब तक और मोहर्रिर से लेकर कलक्टर तक परेशान है , गोतिया पट्टीदार के लिए आप साहब नहीं , वो आपका सब कुछ जानते हैं और आप अपनी नौकरी बचाने के लिये मर्यादा में रह कर ही लड़ाई लड़ पाएंगे।
छुट्टी मिलती नहीं , मिलती है तो पैरवी होती नहीं , हड़ताल , शोक में बंदी , और तीज त्यौहार के बीच कभी तहसीलदार , कभी कानूनगो , कभी एसडीएम के कमरों की ख़ाक छानिये और चूँकि आप शहर में नौकरी करते हैं लिहाजा आपकी फीस में एक शून्य बढ़ा के लिया जाना अनिवार्य है , और आपकी इस हालत पे किसी को कोई तरस नहीं, बड़े बड़े पैरोकार भी जब अपने गाँव गिरांव में किसी से सुनते हैं कि अमुक की जमीने नहीं बची या हाथ से निकल गयी तो बड़े बड़े तुर्रम खान खुद के लिए बस ये कहते हैं कि "लज्जा करो" .
अब आप ठहरे सामाजिक और पारिवारिक प्राणी , सो इच्छाएँ कई और भी थी जो आपके परिवार के लोगों की थी, पिता की थी , पूर्वजों की थी जो पूरी नहीं हुईं, कई और सपने थे , वे तमाम अधूरे सपनों के साथ भी आपके पूर्वज जीने को तैयार थे क्यूंकि आशावाद चरम पर था , अब नतीजे नहीं मिले उन्हें चंद और साल बीत गये , उलाहना सुनिए और शेषनाग बन कर पृथ्वी अपने सर पर उठा लीजिये।

दरअसल ये भूमि एक रहस्यमय से तिलिस्म में आपको बाँध कर रख देती हैं और उस तिलिस्म के अन्धकार में सिर्फ रोने की आवाजें सुनायी देती हैं , विलाप , रुदन क्रंदन , केश खोल कर शून्य में अपलक निहारती हुयी विधवा माओं के चेहरे, पथराई आँखों से कागज़ और दस्तावेज सहेजती हुयी बहनें , बीबियाँ और बेटियां और उन सबके बीच अकेला एकाकी खड़ा हुआ वो पुरुष। वही जिसे बहुत कुछ करना था , वही जिससे लोगों ने न जाने कितने अरमान पाले थे वो पुरुष सिर्फ अंतरद्वंद और अवसाद के बीच अनाथ, निराश्रित और विपन्न होकर गति को प्राप्त करता है।

सड़कों पर पसरा सन्नाटा हो भीड़ भाड़ , त्योहारों का वो एक विचित्र सा उत्साह हो , शादी विवाह की धूम हो हर किसी की मृत्यु पर हुआ जमावड़ा , लेकिन भूमि की चर्चा बगैर वो अधूरा है , और जब वो भूमि हाथ से जाती है तो जाते जाते अचानक सब कुछ से मोह होने होने लगता है, कोई यह भी नहीं समझ पाता कि इस मोह से उठकर निर्मोही बनना ही पड़ेगा, लेकिन भूमि पीछा नहीं छोड़ती , आने वाले भयावह भविष्य को सोच कर ही आपकी मज्जा तक में कम्पन होने लगता है , उससे ज्यादा डर आपको उसके बाद के समय से है। अब तक जो भी हाथ से गया या छीन लिया गया उसका दुःख रह रह कर आता था , लेकिन अगर आप वाकई भूमि के लिये दिन रात सोचते और मंथन करते हैं तो छठी इन्द्रीय का इतना ज्यादा विकसित हो जाना भी कष्टकारी है कि आपको पहले से सब पता चलने लगे कि आगे क्या होने वाला है ?
वो जो स्व-अर्जित था , वो जो मिला था , वो जो पुश्तैनी था , वो भी जो विरासत का हिस्सा था , जो अपनी पसंद का था , जो अपना था और इस जैसा बहुत कुछ एक एक करके चला जायेगा। रह जायेगा तो सिर्फ एक प्रामाणिक स्वाधिकार एकाकीपन से , और इससे कहीं ज्यादा विह्वल होगा आपके आश्रितों का चेहरा , चाह के भी उनके मुंह से सवाल नहीं निकलेंगे , जो निकलेंगे वो भी अजीब से होंगे , और आप झल्ला कर जवाब भी नहीं दे पायेंगे , बस उनसे मुँह छिपाकर कहीं शून्य में देखते हुए जवाब देने की चेष्टा करिये , और फिर उनको फुसलाने के लिए मिथ्या आश्वासन भी दीजिये ।
लेकिन वो सब भी जानते हैं कि जवाब सारे गलत होंगे। बावजूद इसके, उनके सबके सामने आप रो नहीं सकते, नहीं तो उनके आँसू कौन पोछेगा और उनको झूठा ढाँढस कौन बँधायेगा। भूमि आपको सिर्फ अकेलापन देती है एक ऐसा अकेलापन जिसका सिर्फ आस पास के लोगों से दूर हो जाने से मतलब नहीं है , अकेला होना मतलब शायद सजीव निर्जीव सबसे एक साथ या अचानक अलग हो जाने का भी नाम है।
भूमि की कहानियां इस बार सिर्फ कमासुत बाबू टाइप लोगो के लिए , अभी किसानों और मजदूरों की भूमि की कहानियाँ बाकी हैं , वो अगली बार लेकिन तब तक सुमित्रानंदन पन्त जी ने यह पंक्तियाँ लिख छोडी हैं जो शायद ऐसे ही एकतरफा भूमि प्रेमियों के लिए ही बनी हैं।
कुटिल कंकडों की कर्कश रज घिस घिस कर सारे तन में 
किस निर्मम निर्दयी ने मुझे बाँधा है इस बंधन में 
फांसी सी है पडी गले में नीचे गिरता जाता हूँ
बार बार इस महाकूप में इधर उधर टकराता हूँ 
ऊपर नीचे तम ही तम है बंधन है अवलम्ब यहाँ 
यह भी नहीं समझ में आता गिरकर मैं जा रहा कहाँ ?
काँप रहा हूँ , विवश करूँ क्या ? नहीं दीखता एक उपाय 
ये क्या ये तो श्याम नीर है डूबा अब डूबा मैं हाय 
चला जा रहा हूँ ऊपर अब परिपूरित गौरव लेकर 
क्या उऋण हो सकूँगा मैं ? ये नवजीवन भी देकर

#‎भूमि‬ : पार्ट थ्री 
कल रात विनोवा भावे के भूदान आन्दोलन के बारे में पढ़ा ! उस दौर में भी गैर सरकारी ढंग से लाखों एकड़ जमीन गरीबों के बीच बांटी गयी ! खुद मेरे गाँव में कई छोटे 'टोले' बसा दिए गए ! चीन से युद्ध के समय नेहरु के अपील के बाद कई गाँव के किसानों की महिलायें अपना स्त्री धन सरकार को दीं ! आसान नहीं होता है किसी महिला के लिए अपना सोना / जेवर दे देना ! लोगों ने दिया ! सिर्फ अपील पर दिया - बगैर कोई कानून के दिया ! 
राष्ट्र विकास में कुछ भी देना - लोग प्राण तक देश के लिए दे देते हैं - फिर जमीन जायदाद कोई बड़ी बात नहीं - दिक्कत तब होती है जब आपकी रोटी कोई खुद के पेट के वास्ते के लिए ले ले और उस रोटी को किसी और के हाथों बेच दे ! 
भय तो है - हर किसान का बेटा आईआईटी पढ़ कोई स्टार्टअप कंपनी बना कर - करोड़ों नहीं कमा लेता है - कई किसान के बेटे अपने बाप दादा की तरह अपने खेतों पर ही निर्भर होते हैं और तब जब उनकी खेत विकास के नाम पर ले ली जाए और उसका फायदा कोई 'बिजनेस ग्रुप' ले - इंसान छटपटा के बेमौत मर जाएगा ! 
बात किसी पार्टी की नहीं है - किसी दल की नहीं है - बात किसानों के अधिकार की है ! कई सवाल हैं - बड़े बिल्डर पोंटी चड्ढा ग्रुप जैसे - जहाँ कहीं भी रोड बनाते हैं - रोड के दोनों तरफ की जमीन पहले खरीद लेते हैं - फिर सड़क बना कर - उसी किसान को बीस गुनी कीमत में दुबारा बेचते हैं - पंजाब के हर एक शहर के हर एक बाईपास की यही कहानी है ! 
यह पुरी प्रक्रिया मानव स्वभाव से भी जुडी है ! 
हर इंसान मजबूत नहीं होता - वो कहीं न कहीं फिसल जाता है - फिसलने वाले से बड़ा गुनाह उसका है जो लालच पैदा करवाता है - यह एक पूरा गेम है ! जमीन जब एक बार निकल जाती है - फिर दुबारा नहीं हो पाती ! 
हर क्षेत्र में विकास हुआ - सिवाय एग्रीकल्चर सेक्टर के ! हरित क्रांती पंजाब हरियाणा से बाहर नहीं निकल पाई - जबकी सबसे उर्वरक जमीन - यूपी से बिहार - गंगा बेसिन की है ! 
राष्ट्र विकास सर्वोपरि है - लेकिन हमारे मुह के निवाला को निकाल अपने पसंदीदा के मुह में दे देना - गुनाह है ! 
क्रमशः ...

‪#‎भूमि‬ - पार्ट फोर - दर्द ए जमीं 
दिलीप त्यागी नाम है उसका ! मुझसे दो साल छोटा होगा ! लम्बा चौड़ा कद - बड़ा ललाट - सर हमेशा झुका ! पेशे से ड्राईवर ! बेहद ईमानदार ! कड़क आवाज़ ! 
दिल्ली - नॉएडा - इंदिरापुरम से सटे 'मकनपुर' गाँव का रहने वाला ! 2004 से उसे जानता हूँ - बेहद करीबी मित्रों की कार चलाता है - कभी ऑडी तो कभी बीएमडब्लू ! मेरे अपार्टमेंट्स के नीचे मिल जाता है - कहो त्यागी क्या हाल ...मुस्कुराता है 
smile emoticon
 थोडा डिप्रेशन में रहता है ! एक दिन इंदिरापुरम की कहानी कहने लगा ! हाथों में रुमाल थे - बोला - सर जी ...जहाँ आप खड़े हो ...जहाँ आपका फ़्लैट है ...जहाँ मै आपके दोस्तों की करोड़ों की कार पार्क करता हूँ - वहां कभी मेरी 60 बीघे जमीन होती थी - "सरकार ने ले ली " ! ये पूरा हज़ार एकड़ का इंदिरापुरम हम त्यागीओं का था - सरकार ले ली ! कुछ पैसे थमा दी - कहाँ गया वो पैसा - पता ही नहीं चला ! चार भाई - अब हम सभी उन्ही बिल्डर के बड़ी कार को चलाते हैं - जिनके महल हमारे खेतों में है - सर जी - ये जमीन हमारी है ! 
पुरे नॉएडा - ग्रेटर नॉएडा - गाज़ियाबाद के डेढ़ सौ गाँव के हर एक परिवार की यही कहानी है ! ग्रेटरनॉएडा में सरकार रु 320 प्रती वर्ग मीटर किसानो से लेती थी ! करीब दस प्रतिशत किसान ही उबार पाए - नब्बे प्रतिशत कहीं के नहीं रहे - उनका कोई नेता बना भी तो उन्हें उलटा ठगते चला ! 
यह कहानी हर उस गाँव की है - जो शहर से नज़दीक है ! हर दर्द हर एक किसान की है जिसका गाँव शहर से नजदीक है ! उनके भविष्य के साथ कोई सुरक्षा नहीं है ! 
सरकार क्या कर सकती थी - उस विकास में उनकी भागेदारी बढ़ा सकती थी - मसलन - नॉएडा / ग्रेटर नॉएडा / गाज़ियाबाद में बने फ्लैटों में - उनको कुछ हिस्सा दे सकती थी ! अब जब सरकार खुद व्यापारी बन जाए - फिर कुछ नहीं हो सकता ! रु 320 प्रतीवर्ग मीटर जमीन खरीद आप बिल्डर को रु 10,000 /- प्रती वर्गमीटर बेच रहे हैं...यह कहाँ का इन्साफ है ...और यह कहानी सिर्फ किसी ख़ास दल की नहीं है ...यह कहानी हर सरकार की है ...दल बदल जाता है ...लेकिन दुर्भाग्यवश तंत्र वही रह जाता है ...
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मिडिल क्लास क्यों आवाज़ उठाये ...बड़ी मुश्किल से तो वो ...कुछ पढ़ लिख ...अपने माँ पिता जी को गाँव में ही छोड़ ...बड़ी शहर में आया है ...अब यहाँ कौन झंझट मोले ...कल उसका भी बेटा / बेटी उसको झंझट समझ उसी फ़्लैट में सड़ने को छोड़ देगा ...
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क्रमशः ...


#‎भूमि‬ - पार्ट फाईव - राघव वर्मा - दालान से 
ट्रेजडी-ड्रामा बहुत है भूमिअधिग्रहण सीरीज के लेखन में.. समाधान तो दिख ही नहीं रहा है.. 
दिल्ली एनसीआर में सबसे ज्यादा प्रवासी--अध्यापकों/विद्यार्थियों/श्रमिकों/परिवारों/नौकरीपेशा/व्यावसायिकों में बिहारियों-पूर्वी उप्र के लोगों की रही है.. आजादी के आसपास के दिनों में कोलकाता जब वाणिज्यिक केंद्र हुआ करता था तब बड़ा प्रवास कोलकाता हुआ करता था.. पुराने भोजपुरी गानों के बोल में आपको प्रमाण भी मिल जाएगा.. साठ-सत्तर के दशकों के बाद से सब दिल्ली में ही खपने लगे.. एक गौरवशाली भारत के इतिहास के केंद्र 'बिहार' के मूल-निवासियों ने अपना खेत छोड़ दिया.. अब वो स्थायी निवासी दिल्ली के होते गये.. कभी मैंने किसी सरकार को जनसँख्या पलायन को रोकने के स्थायी उपाय पर चर्चा करते नहीं सुना है .. शायद ये भी एक सामाजिक-कारक हों
गलती से मैं जिस कोलकाता की बात कर रहा हूँ,वहां के लोग भी पढने-नौकरी के लिए दिल्ली-मुंबई शिफ्ट होते गये.. समस्या वहीँ है.. जड़ वहीँ है कि इतने बृहद पैमाने पर जनसँख्या दूसरे केंद्र पर शिफ्ट होते ही जा रहे हैं.. एक नगर उठ के दूसरे जगह बस रहा है.. समस्या सामाजिक है.. मुंबई में जब राज ठाकरे/बाल ठाकरे भड़कते हैं तो हम इतने घटिया लोग बन जाते हैं कि दोष अपने-अपने राज्य में नीति-निर्माता पर भी न दे पाते हैं.. कोलकाता-पटना-इलाहबाद-काशी कभी भारत के शिक्षण-केंद्र हुआ करते थे.. पूरी फिल्म इंडस्ट्री कोलकाता में बसी हुई थी..अकेले कोलकाता में ४०० छोटे-मंझौले कारखाने होते थे.. गंगा किनारे स्ट्रैंड रोड के साथ-साथ चलते चलते लुप्त 'सभ्यता' दिखेंगी .. एक बंदरगाह/एक रेलवे हब/एक एअरपोर्ट वाला कोलकाता अब बर्बाद है तो पटना को कौन पूछे..

‪#‎भूमि‬ - पार्ट सिक्स - अधिग्रहण 
मुजफ्फरपुर को उत्तर बिहार का राजधानी कहा जाता है ! 1977 में जोर्ज फर्नांडिस यहाँ से चुनाव जीते और वो मुजफ्फरपुर के विकास की सोचे - बिहार का पहला दूरदर्शन केंद्र / कांटी थर्मल पावर और शहर से बिलकुल सटे 'बेला इंडस्ट्रियल' ! बेला एक गाँव था जो शहर से बहुत सटे हुए था - किसानो की जमीन दखल कर ली गयी - छोटे छोटे कल कारखाने खुल गए - एक बहुत बड़ा सरकारी ड्रग कंपनी भी खुला ! व्यापारी बैंक से लोन / सरकार से मदद लेकर - उस इलाके में अपनी फैक्ट्री बना लिए ! फैक्ट्री कितना दिन चला नहीं पता - पूरा इंडस्ट्रियल बेल्ट बीमार घोषित हो गया - उजड़े हुए फैक्ट्री की शक्ल में पूरा इलाका ! अब वापस जमीन मालिक को भी नहीं मिल सकता था और ना ही फैक्ट्री चल सकता था ! सैकड़ों एकड़ बेशकीमती ज़मीन यूँ ही बर्बाद होते नज़र आयी ! तीस साल बाद - नितीश आये तो उस जमीन पर गिद्ध नज़र से - बड़े व्यापारी घुस आये - नाम नहीं लूंगा - लोगों के इगो को हर्ट होता है 
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Priyadarshan Sharma भी लिखते हैं कैसे 'मोकामा' में करीब तीन सौ एकड़ जमीन यूँ ही अधिगृहित होकर बेकार पडी है ! और ऐसी कहानी हर एक शहर की है ! मुंबई का ही हाल देखिये - कपड़ा मिल से ज्यादा कीमती - वहां की बंद पडी मिलों के जमीन की कीमत हो चुकी है ! कई हज़ार करोड़ में जमीन बिक रही है ! 
एक उदहारण देता हूँ - सरकार किसान से विकास के नाम पर जमीन लेती है - मसलन किसी बड़े ग्रुप को हॉस्पिटल खोलने के नाम पर - मुफ्त में जमीन दे दी जाती है ! फिर वर्षों बाद - हॉस्पिटल बिजनेस से ज्यादा कीमत उस जमीन की हो जाती है - दिल्ली के 'एस्कोर्ट हॉस्पिटल' का 'फोर्टिस हॉस्पिटल' के साथ विलय की कहानी पुरानी नहीं हुई है - कई हज़ार करोड़ के सौदे में - सबसे ज्यादा कीमत - जमीन की थी ! 
यही हाल स्कूल / कॉलेज के जमीन के साथ है - व्यापारी सरकार से अपनी नजदीकी का फायदा उठा जमीन ले लेते हैं फिर कुछ वर्षों के बाद जमीन की कीमत बढ़ते ही उसका सौदा कर दिया जाता है ! 
विकास के नाम पर जमीन लेना उचित है - लेकिन उसका समुचित हिस्सेदारी भी किसानो को मिलनी चाहिए - सिर्फ हाथ में कुछ लिक्विड पैसे थमा देना - यह गलत है ...
क्रमशः .....

‪#‎भूमि‬ : पार्ट सेवेन - भ्रम 
बड़े किसानो को लेकर पचास के दसक में लिखी गयी किताबें आज भी पढी जा रही हैं - यह गलत है - पचास साठ साल में बहुत कुछ बदल चुका है और पिछले बीस साल में तो बहुत कुछ - पर 'भ्रम' वही है - जिसके पास जमीन वही राजा है - पर जमीन कितनो के पास बची है ? उदहारण के तौर पर - आज से साठ साल पहले - अगर मेरे परदादा के पास सौ एकड़ जमीन थी तो आज मेरे हिस्से दस एकड़ भी नहीं है ! और बिहार जैसे पिछड़े राज्य में - दस एकड़ जमीन जोतने वाले की आर्थीक स्थिती एक चपरासी से भी बदतर है ! 
जो पहले के बड़े किसान थे - या तो वो धोती कुरता छोड़ - पैन्ट / बुशर्ट पहन नौकरी में चले गए या फिर बिलकुल बर्बाद हो चुके है - बर्बादी की असल वजह है - आर्थीक स्थिती में कमजोरी और जीवन शैली में कोई बदलाव नहीं ! इसलिए पचास की दसक की वामपंथी किताबों को पढ़ - इस मजबूत मुद्दे से मुह मत मोड़िए ! 
अब असल किसान कौन है - वो लोग हैं जिनके पास दस एकड़ से भी कम जमीन है - वो कोई बड़े ज़मींदार जाति से नहीं हैं - एक उदहारण देता हूँ - नॉएडा / ग्रेटर नॉएडा / गाज़ियाबाद के एक सौ पचास गाँव के अधिग्रहण में करीब सौ गाँव सिर्फ 'ब्राह्मण बहुल' गाँव है - अखबार और टीवी के ब्राह्मण पत्रकार 'भ्रम' में चुप रह गए - जाट / गुर्जर / त्यागी के जमीन की लूट हो रही है - हम क्यों आवाज़ उठायें - जबकी कहानी दूसरी है ..:)) 
अब बिहार में कोई भूमिहार / राजपूत / अवधिया खेती नहीं करता - अब खेती करते हैं यादव / कुशवाहा जैसी जाति - जो खुद से खेती कर रहे हैं - भूमिहार / राजपूत अपने दो हज़ार के फ़्लैट में मेट्रो में जा बसा है या फिर किसी पिछड़ी जाति के राजनेता का लठैत बना हुआ है - खेत पर झांकने भी नहीं जा रहा - उसे बस थोड़ा मोह है अगर वो मेरी उम्र का है - वरना नौजवान है तो उसके बाप दादा की खेत कहाँ है उसे वो भी नहीं पता ! पढ़ लिख गया तो मल्टीनेशनल का लठैत बन गया वरना बिहार में लालू / नितीश इत्यादी के यहाँ जी हुजुरी में लगा हुआ है - उनको अपना देवता समझ दो वक़्त की रोटी में लगा हुआ है और यह सत्य है की वो अपनी अगली पीढी को किसी भी हाल में जमीन से जोड़ के नहीं देखना चाहता ! 
इसलिए इस मुद्दे को जाति के भ्रम से मत जोड़ें ! यह मुद्दा बिलकुल ही वैसे किसानो से जुड़ा हुआ है जो खुद खेती कर रहे हैं - जिनके पास एक एकड़ से पांच एकड़ तक जमीन है - वो मध्य पिछड़ी जाति हैं - जिनका राज भी है - जिनके पास ताज भी है - जो खुद शिकार भी हैं और जो शिकारी भी हैं ...
और जो मुर्ख है - वो पचास की दसक की वामपंथी इतिहासकारों की किताबें पढ़ - भ्रम में चुप हैं ...:)) 
क्रमशः ...
‪#‎भूमि‬ - पार्ट दस 
बंगलौर में एक बेहतरीन आईटी कंपनी है - माईंडट्री टेक्नोलोजी - हमारे जमाने के विप्रो के ग्रुप प्रेसिडेंट - अशोक सूटा ने इस कंपनी को जन्म दिया ! इस कंपनी का जन्म - इनफ़ोसिस का नक़ल था ! सुब्रतो बागची इसी कम्पनी के कर्ता धरता है ! उन्होंने कुछ साल पहले एक किताब लिखी - उसमे एक सर्वे दिखाया और कहा - " आईटी सेक्टर के लगभग एक तिहाई स्किल वर्कर किसान परिवारों से आते हैं " ! 
अभी मेरे इस सीरिज को लगभग पांच सौ से ऊपर लोगों से शेयर किया और हज़ारों के वाल तक पहुंचा ! मैंने थोड़ा ध्यान से देखा - आखिर ये कौन लोग हैं जो इस कदर मेरे पोस्ट को शेयर किये - क्योंकी जिनसे उम्मीद थी - वो लोग तो मेरे पीछे में मुझपर थूकते हुए नज़र आये ..हा हा हा ...एक मित्र से बात हो रही थी - कैसी बिम्बडना है - जिसे आवाज उठानी चाहिए - जिसकी पहचान ही 'खेती / भूमि' रही हो - जिसकी पिछली सारी वजूद ही 'खेती / भूमि' रही हो - वो ही मुझे देख मुह बिचका रहा है - हा हा हा ...इसलिए मैंने एक पोस्ट में लिखा था - पचास की दसक की इतिहास की किताबों को पढ़ कर समाज या किसी जाति का विश्लेषण नहीं कीजिए .. 
smile emoticon
 
फिर भी हज़ारों लोगों ने मेरे लिखे हुए को पढ़ा - पांच सौ से ऊपर शेयर - यूँ ही नहीं था ! उनलोगों को गौर किया - उत्तर भारत के सभी प्रांत के लोग - सभी जाति के लोग - संभवतः वैसे लोग जिनकी पिछली पीढी अभी भी किसान है - जिन्होंने बचपन में खेतों को देखा है - वो सारे लोग अभी भी खेतों के प्रती अपनी भावना रखे हुए हैं - उनका जाति / क्षेत्र से कोई मतलब नहीं ! 
एक जाति के अन्दर ही अलग अलग क्लास है - मसलन कोई ब्राह्मण जो कभी पुजारी / पुरोहीत नहीं रहा हो - उसका संस्कार अलग है - वो खेतों पर आश्रित परिवार है - उसके अन्दर क्षत्रिय का गुण है - वो राजनीति या तत्काल लाभ की वजह से भले ब्राह्मणवाद कर रहा हो पर वो 'स्तुतीगान' कर के अपना जीवन यापन नहीं करेगा - उसे माँगने में लाज आएगा ! 
जो एक मजबूत दलित परिवार से है - जिसके यहाँ पीढी से खेती बारी होती आयी है - उसका कोई भेई सभ्यता / संस्कार / सोच किसी क्षत्रिय / ब्राह्मण से अलग नहीं होगा ! जो क्षत्रिय नौकरी पर आश्रित है - उसके आन बाण शान में कमी आयेगी ही आयेगी ! 
पूरा खेल - वर्ग / क्लास का है ! कहीं भी जाति नहीं है ! अब देखना है - अपने खेतों को लूटते देख - अब यह आधे किसान और आधे नौकरी वाले 'वर्ग' ..किस तरह से रिएक्ट करते है...हवा तो उठ गयी है ...
smile emoticon
 
देश अम्बानी / अदानी के अलावा कई और लोगों का है ....क्या समझे फूफा जी ...:))



‪#‎भूमि‬ - पार्ट - ग्यारह 
एक बार अमरीका की एक कंपनी में - बचपन के दो दोस्त एक साथ काम कर रहे थे - एक उस कंपनी का सीईओ और दूसरा उसी कंपनी में चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर ! CTO के दिमाग में एक प्रोजेक्ट आया - क्यों न उस कंपनी का वेयरहाउस को पूरा हाई फाई बना दिया जाए - सब कुछ कंप्यूटर से संचालित - छोटे छोटे कार जो कंप्यूटर से चलते और सामान को खुद ही उठा कर एक जगह से दुसरे जगह करने वाले और हॉलीवुड की सिनेमा की तरह बहुत कुछ ! 
CEO ने तुरंत हामी भर दी ! काम शुरू हुआ ! प्रोजेक्ट बहुत बड़ा था ! और बिलकुल अपने आप में अनोखा ! धीरे धीरे प्रोजेक्ट अपने आप में इतना बड़ा हो गया की वो कंपनी के टर्नओवर के कई गुणा हो गया और एक दिन उस आइडिया / प्रोजेक्ट के चक्कर में पुरी कंपनी ही ध्वस्त हो गयी ! 
दोस्ती / हित कुटुंब को फायदा पहुंचाने में - देश भी डूब जाता है ! रेलवे कॉरिडोर बनेगा - प्राईवेट पार्टनरशिप के तहत - बड़ी कंपनी को प्रोजेक्ट मिलेगा इसी बीच मौसम के मार से किसान मरते रहेंगे ! 
पिछली सरकार गलत थी - इस चक्कर में आप भी गलती मत कीजिए - किसान की ज़मीन आप नहर बनाने / कुएं खोदने / गाँव में पंचायत भवन इत्यादी में उसी उत्साह से लेते तो 'शक' नहीं पैदा होता ..."मै" सिर्फ पिछली सरकारों को गाली देने के लिए बल्की उनकी गलती को सुधारने के लिए आया हूँ और एक ऐसा वातावरण के लिए आया हूँ - जहाँ समाज के सभी लोग सुख चैन से रह सकें ...तब न हुई ...विशाल बहुमत की विशालता ..
smile emoticon
 

@RR

2 comments:

Avinash singh said...

हम लोग जिस परिवार से आते है ,उनके लिए उनकी खेती ही माई-बाप है ।खेती ही इज्जत है।आपने बिलकुल सही चित्रण किया है।
सरकारे बदल जाती है तंत्र वही रहता है।

Deepak Kumar said...

बहुत नीक लगाल, अहां के ई पोस्ट पढ़ के, बहुत बहुत धन्यवाद अहां के...

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