Wednesday, December 8, 2010

"बिहारी प्राईड - भाग चार "

दो साल पहले की बात है - अचानक से एक ई-मेल आता है - "रँजन जी , अपने गाँव में एक इंजीनियरींग कॉलेज खोलना चाहता हूँ , आप किस तरह से मुझ से जुड सकते हैं " ! ये मेल था - "चंद्रकांत जी " का ! करीब १८-१९ साल पहले की एक घटना याद आ गयी ! उस वक्त बाबु जी के साथ 'तारा हॉस्पीटल' में बैठा था - तब तक 'चंद्रकांत' आते हैं - अपने टेस्टीमोनीयल्स पर् "ऐयटेस्ट" करवाने ! बहुत ही हल्की परिचय हुई थी - उस वक्त ! उनका सेलेक्शन तत्कालीन बिहार के सबसे बढ़िया इंजीनीयरिंग कॉलेज में हुआ था - सिंदरी ! बेहद शर्मीला और ग्रामीण परिवेश की एक झलक ! वो हमारे गाँव के ठीक बगल वाले गाँव के रहने वाले थे ! बीच बीच में उनके बारे में पता चलता रहा ! सिंदरी के बाद वो आई आई टी - मुंबई गए और फिर शादी विवाह और जर्मनी ! खांटी 'इलेक्ट्रिकल इंजिनीयर' हैं ! एक कोशिश उन्होंने 'आई टी सेकटर' में भी की जहाँ वो सन २००१ के हादसे के शिकार हुए ! 

उनका ई-मेल आने के बाद मेरी उत्सुकता बढ़ी और मैंने उनको हरसंभव मदद का वचन दिया ! उनके प्लान काफी क्लेअर थे ! वो एक जिद पर् अड़े थे - जो कुछ भी करूँगा - अपने गाँव में ! उनके गाँव में लोग उत्सुक होने लगे ! धीरे - धीरे माहौल बनने लगा ! उनके पिता जी जो शिक्षक हैं - उन्होंने गाँव को भरोसे में लिया ! 'चंद्रकांत' का प्लान इंजीनियरिंग कॉलेज का था - उनके साथ उनके कई दोस्त भी थे - सभी के सभी सिंदरी वाले - किसी के पिता 'बड़े अफसर' नहीं थे - कोई  आरा का तो कोई मुंगेर का - सभी को 'चंद्रकांत' में असीम विश्वास ! उनकी टीम में मै ही एक अकेला अलग सा था ! बात होते होते - थोडा और करीब आये तो मैंने उन्हें 'स्कूल' खोलने का सलाह दिया क्योंकी इंजीनियरिंग कॉलेज खोलना इतना आसान नहीं था वो भी पटना से १५० किलोमीटर दूर एक गाँव में ! मै बंगलौर भी गया - चंद्रकांत से मिलने ! १८-१९ साल बाद पहली मुलाक़ात थी - बदल चुके थे ! अपनी कहानी सुनाई - कहते गए - जर्मनी में था - अचानक बेहोश हो गया - हॉस्पीटल गया तो पता चला की 'मधुमेह' है वो भी बहुत सीरियस ! हॉस्पिटल में २ महीना भर्ती कर दिया ! पत्नी अकेली ! एक छोटी बेटी ! माँ-बाबु जी गाँव में ! किसी के पास पासपोर्ट नहीं ! माँ बाबु जी हर रोज रोते थे - कहाँ जाते - किससे कहते - कहाँ आते ? "चंद्रकांत" तुरंत भारत लौट आये और बंगलौर में एक ज़मीन लेकर एक कोठी बनवाई ! फिर भी यहाँ उनका मन नहीं लगता था - फिर अचानक उन्होंने एक डिसीजन लिया - अपनी सारी कमाई अपने गाँव में लगाने की ! गाँव का कई दौरा किया - लोगों का विश्वास जीता और फिर दोस्तों की एक टीम बनाई ! 

फिर वो नितीश के प्रिय 'राघवन' से टाईम लिये  ! मुझे भी बोला आप भी चलिए पटना - मै भी गया ! राघवन के साथ , अशोक सिन्हा जी और संदीप पुण्डरीक थे ! मेरी थोड़ी जिद थी - पटना के आस पास ही खोलने की ! हम सभी इस आशा में थे की सरकार 'चंद्रकांत' को जमीन बाज़ार रेट पर् दे देगी ! संदीप पुण्डरीक के पास जमीन भी थी ! और सूबह में जो मूल्य बताया गया  वो मूल्य बिलकुल 'चंद्रकांत' के फेवर में थे ! सुबह की मुलाकात के बाद - शाम को अशोक सिन्हा जी अपने पास बुलाये - वहाँ जब हम सभी पहुंचे तब तक 'संदीप' जमीन की कीमत चार गुना बढ़ा चुके थे ! हम सभी एकदम 'शौक' में आ गए ! मेरे साथ मेरे बहनोई जी भी थे ! मै 'अशोक सिन्हा' जी की बेबसी समझ रहा था ! और मेरे दीमाग में यही ख्याल आया की 'काश , मै नालंदा का होता ' ! :) खैर अगले दिन हम बिहटा इत्यादी भी घुमे ! शाम को चंद्रकांत अपने गाँव गए और वो अपनी टीम के साथ मीटिंग करने के बाद बोले - वो अपने गाँव में ही स्कूल खोलेंगे ! अब मेरे पास 'कंसल्टेंसी' देने को नहीं रहा ...और उनकी अपनी टीम बीजी हो गयी ! मै बस यहीं से बैठे - शुभकामनायें ही दे सकता था ! 

उन्होंने अपने गाँव में करीब २५ एकड जमीन लिया ! स्कूल बनाया ! और अब स्कूल तेजी से चल रहा है ! जो जमीन उन्होंने लिया - उसकी कीमत ही करीब पांच गुना हो चुकी है ! "चंद्रकांत" इंटरनेट पर् बैठ 'मुखिया जी ' की तरह 'बिहारी प्राईड' नहीं लिखते हैं ! वो पटना के किसी बड़े अफसर के बेटे नहीं हैं ! वो सेंट माइकेल और दिल्ली के मॉडर्न स्कूल से नहीं पढ़े ! वो ..अपनी कहानी शान से सुनाते हैं - कहते हैं - एक वक्त ऐसा था की बाबु जी मुझे 'एयरफ़ोर्स' में बहाल होने को जोर दे रहे थे - आज वो देश दुनिया घूम अपनी जिंदगी की सारी कमाई अपने गाँव में लगा दिए ! वो अभी चालीस भी पार नहीं किये हैं ! कई 'पेटेंट' उनके नाम से है ! बेहद रईस के तरह  बंगलौर में रहते हैं ! उनके किस्से किसी अखबार में नहीं छपते हैं ! वो 'इलीट' नहीं हैं ! पर् एक जज्बात है - मिटटी के क़र्ज़ को लौटाने का ! यह काम आसान नहीं था ! 

ऐसे कई लोग आपके - हमारे इर्द गिर्द हैं - जिनके जज्बे को सलाम कर हम कई और को प्रेरित कर सकते हैं !! 

अगर आपके पास ऐसी कोई कहानी हो तो मुझे ई-मेल करें - mukhiya.jee@gmail.com 


रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !

11 comments:

Krishna said...

बेहद प्रेरणा दायक लगा आपका ये पोस्ट. शायद समाज में और भी हों उन जैसे जो अपने गांव और अपनी मिटटी से जुड़ने में गौरव की अनुभूति करते हों अगर मिलें तो हम सब के साथ शेयर जरूर कीजियेगा. चन्द्र कान्त जी को ढेर सारा शाधुवाद और आपको भी बधाई इस व्यक्तित्व के बारे में हमें बताने के लिए. लिखत रहिये हार्दिक शुभ कामनाएं

Sarvesh said...

मैं इस पोस्ट का इंतज़ार कर रहा था. चंद्रकांत जी एक जज्बा से लगे और उन्होने इसे कर दिखाया. जब भी उनसे मुलाक़ात होती है वो प्रोत्साहित करते हैं की आप लोग भी कुछ कीजिये. सबसे बड़ी बात वो कहते हैं की हम St. Bora स्कूल से पास कर के सब कर रहे हैं. :-). Hats of to Chandtrkant for his vision and approach and making it to reality.

ghosh51 said...

Wonderful story-Inspiring for all of us - Congratulations to Chandrakant Ji.

ravishndtv said...

dil se badhaayee..is school ke liye kuchh bhi kar sakaa..to karunga...kyaa baat hai..

ratnakar said...

bada badhiya laga. zamini sachchai bhi hai aur unrok prerna bhi!

Amit YDF Indian said...

Chandrakant h ko der sari badhi sir aur aapko bahut bahut dhanyawad
Ye log ham jaise engineering student ke prernesarot hai . Kya mai chandrakant g ka email id jan sakta hu
I want contact to him please

bhardwaj_sk said...

बहुत ही प्रेरक ... ranjan ji चंद्रकांत जी के जज्बे को सलाम ..

Raj said...

Mukhiyajee,

Chandrakant jee se milna Chahunga, milne ki surat likh den.

School to hum bhi chalane ki koshish kar rahen hai, par muskilen badhti hi Ja rahin hain.
Chandrakant jee ke pas jarror kuch Nuska hoga. Is Ummid ke sath.

Raj Singh

केवल राम said...

नमस्कार
बहुत अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर ....यह पोस्ट बहुत बढ़िया है ...शुक्रिया

Pankaj said...

mai apki bhawnao salute karta hu thanx

KESHAW PANDEY said...

Chandrakant Babu ke is mahantam karya ke liye sadhuvad! vakai ye mati ke laal hain aur unme sachhi jajbat hain. Ye unke mahan karya ka prasad hain ki mujh jaise dinhin ko bhi apne bete ko unke school "Chaitanya Gurukul" me padhane ka avasar prapt hoga.

Is sambandh me Chandrakant Babu se vigat divas emailachar hua tha.

Ranjan Babu aap ke Bhaook aur prernadai bate aur kahaniya padhkar man babhut khush hota hain. Bahut achha kam aap bhi kar rahe ho.

Apke suchna ke liye bata doo ki main vigat teen char din se aapka blog roj visit karta hoon.

Ranjan Babu