Thursday, December 16, 2010

"अवकात"

"तुम्हारी  अवकात क्या है ? तुम्हारे अवकात का आदमी मेरे घर मुंशी मैनेजर होता है ! तुम जैसे की अवकात जानता हूँ ! अवकात में रहो ! तुम मेरी अवकात क्या समझोगे ? रुको , अपनी अवकात दिखाता हूँ ! देखो इस नीच को - अपनी अवकात दिखा दिया  " 

मालुम नहीं ऐसे कई शब्द कानों में गूंजते हैं !हमें अपनी अवकात से ज्यादा दूसरों की अवकात की ज्यादा चिंता रहती है ! समाज में थोडा कुछ बोलिए नहीं की लोग अपनी अवकात भूल आपकी अवकात नापने लगेंगे ! 

कंकडबाग में किराया के मकान में रहते थे ! पड़ोस वाले के बेटे मेरी उम्र के थे - उनका अपना मकान था ! एक दिन बालकोनी से बोल दिया - "किरायेदार हो , अवकात में रहो " ! आठवीं में पढता था ! बोला नीचे आओ ! वो तीन और मै अकेला ! जम के लड़ाई हुई ! बाबु जी छत से चिल्लाते रहे - मै कहाँ सुनने वाला था ! "उसने बात अवकात की थी - चोट बहुत गहरी लगी थी " ! आज भी वो तीनो भाई मेरे नाम से कांपते हैं ! आज उस मकान से मात्र कुछ सौ मीटर की दूरी पर् हमारा मकान है ! बाबु जी , सभी भाई का - एक साथ ! एक बार रास्ते में मिला - बोला देख लो मेरा अवकात - हम उस खानदान से नहीं आते हैं - जहाँ एक भाई गाँव में खुरपी लेकर 'सोहनी' कर रहा है और दूसरा पटना में मकान पर् मकान बना रहा है ! मै जान बुझ कर उसे अपनी अवकात से ज्यादा बोला था ! बाद में मुझे खुद बहुत बुरा लगा पर् उसकी दी हुई चोट बहुत गहरी थी ! शायद यही एक कारण है की - मै किसी भी किरायेदार को बहुत ही इज्जत करता हूँ ! 

बहुत कम लोग ऐसे होते हैं - जो ताउम्र एक ही रफ़्तार  से आगे बढते हैं ! बाकी की जिंदगी में बहुत उतार और चढाव होता है ! जब किसी की जिंदगी उतर पर्  हो हमें 'अवकात' वाली शब्दों से बचना चाहिए ! कल किसी ने नहीं देखा है ! "गोली" से भी खतरनाक "बोली" होती है ! आदमी नहीं भूलता ! कब किस पर् भगवान मेहरबान हो जाए - कोई नहीं जानता :) 

एम्  टेक करने के बाद मै पटना के एक प्राईवेट कॉलेज में पढाने गया ! उस कॉलेज के चेयरमैन साहब जब तब मुझे मेरी अवकात दिखा देते :) मुझे समझ में नहीं आया ! बाद में पता चला की कॉलेज के संस्थापक और चेयरमैन साहब के पिता जी मेरे ससुर जी के साथ बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पढते थे - तब शायद मेरे ससुर जी की औकात ज्यादा रही होगी ! जिस दिन मुझे यह पता चला - मैंने उसी वक्त 'नौकरी' को छोड़ा और नॉएडा का ट्रेन पकड़ लिया ! फिर , गया उनसे मिलने :) बंद कमरे में - मै बोला और इस बार उनको सुनना पड़ा ! 

कंकडबाग में हमारे एक पारिवारीक मित्र और हमारे काफी शुभचिंतक बच्चों के एक डॉक्टर हैं ! मेरे और मेरे पिता जी के उम्र के बीच के हैं ! मै उनकी बहुत इज्जत करता हूँ और वो भी मेरी ! कुछ साल पहले - बिहार के बाहुबली लोग उनको थोडा तंग करने लगे ! वो कुछ बर्दाश्त किये ! फिर एक दिन एक बाहुबली को बोला - "डॉक्टर समझ मेरी अवकात मत नाप - जिंदगी के किसी भी परीक्षा में अपने क्लास में 'सेकण्ड' नहीं किया - जिस दिन तुम्हारे धंधे में उतर जाऊंगा - वहाँ फिर मै ही फर्स्ट करूँगा " ! अब बेचारा 'बाहुबली' जो मेरे भी मित्र थे   - एकदम से सहम गए :) मैंने उनको बोला - 'बाहुबली जी , किसी सज्जन पुरुष का अवकात मत नापिए - फेरा में पड़ जाईयेगा " ! 

अभय जी बी पी एस सी परीक्षा में अवल्ल आये - बिहार सरकार में डी एस पी बने ! बात 2006 की है -  उनकी माता जी बीमार थीं और तारा हॉस्पीटल में भरती थीं ! मुझे 'देवेश भैया' का फोन आया - अभय जी से मिल लो ! मै जब तारा हॉस्पीटल पहुंचा तो वहाँ की सेकुरीटी देख मेरा दीमाग खराब हो गया ! काले काले ड्रेस में कमांडो ! कई जिप्सी ! और अभय जी एक कमरे में अपनी माता जी के साथ अकेले बैठे ! पता चला की इतनी सेकुरीटी - बिहार के डी जी पी के पास भी नहीं है ! मामला मैंने अभय जी से खुद पूछा - बोले की 'सिवान का डी एस पी हूँ - 1989 में बहाल हुआ - आज तक फिल्ड पोस्टिंग नहीं हुई - शायद एक खास जाती के होने के कारण - खैर जेल में शहाबुद्दीन को जम के पीटा " ! वो भी एकदम सिनेमा स्टाईल में - जब पीटा तब उसके लोग भी आगे आये - उसने सबको मना कर दिया - और जब मेरे तरफ से लोग आगे आये तो मैंने मना कर दिया - और जी भर उसको पीटा ! 

जी , यही है अवकात ! 

दालान ब्लॉग लोकप्रिय हो रहा है :)) और भी लेखक इससे जुड सकते हैं ! मेरी "अवकात " मत नापियेगा ..मै एक शिक्षक हूँ ...आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता :))

रंजन ऋतुराज - इंदिरापुरम !

9 comments:

sadhana said...

जी , मेरी अवकात कुछ भी नहीं है ..फिलहाल कंकड़ बाग में एक किराये की मकान की तलाश है ...मिलेगा क्या ?? जो हमारी अवकात न पूछे ...बहुत ही सुन्दर अनुभव ...!!

Shankar said...

भैया सच कहूँ तो मजा आ गया| अब और क्या कहूँ, इच्छुक लेखकों को आपने आमंत्रण दिया ये बहुत ही स्वर्णिम अवसर है| लेकिन बात फिर वही अवकात की आ जाती है, इसलिए ..... रहने दीजिये

ghosh51 said...

My name is Ashok Ghosh and Ghosh family name is used only by Bengalis.Is nam ke karan aksar Bihar me log mujhe aukat dikskne ka chesta karte hai.Unke thothe me anguli dal kar batana padta ha ki meri bhi kuch aukat hai or mai bhi Bihar me jamin jotwata hu.Ranjan ji ne kaphi achhi lekh likhi hai aukat par.Aj kal ke jamane me log khud aukat wale ho na ho ,dusro ki aukat turant nap dete hai.

Gaurav Singh said...

Ranjan Da.. You keep surprising me. Good one and narrated as if I can see them happening God bless you..:))

SANJAY KUMAR said...

Ranjanji,

Aukat to aapki manani chahiye, jinhone Shabuddin ki patayi wali baat khule aam blog me likh diya.

PD said...

"डॉक्टर समझ मेरी अवकात मत नाप - जिंदगी के किसी भी परीक्षा में अपने क्लास में 'सेकण्ड' नहीं किया - जिस दिन तुम्हारे धंधे में उतर जाऊंगा - वहाँ फिर मै ही फर्स्ट करूँगा " !

गजब्बे का डायलोग है जी ई त.. घोंट के पी गए हैं.. का जाने, कहिया काम आ जाए.. :)

हमनी के त एतना अवकात नईखे बा कि रौवा के बिलोग में लिखीं.. जहिया होगा तब हम अपने बिलोग नै संवारेंगे? बोलिए बोलिए!! :)

Apart from Joke - जब सच में लगेगा कि आपके जितना थोड़ा भी लिखने लगे हैं उस दिन आपको मेल करते हैं दालान से जुड़ने के लिए.. :)

Manindra Kumar said...

its really goood one... aftr a long time once again it reminds me my Bihar days.... nice one... pls keep it up..

अमित said...

रंजन जी बहुत ही प्रवाहपूर्ण है औकात आधारित आपकी रचना. शुभकामनाएं

om prakash said...

ek sajjan apne gaon me bank khulwane ke liye aaye. Maine samjhaya ki aapke gaon me bank kholne ka potential nahi hai so sorry. wo ekdam se ukhadh kar bole ke aapki aukat kya hai. bank bhi khulwa lenge aur aapke aisa manager bhi rakh lenge. maine bhi kaha ki accha package dijiyega to hum bhi taiyar hain manager banne ke liye.