Tuesday, March 25, 2008

वेतन आयोग !

बाबु जी को ५०० मिलाता था ! एकदम मस्त जिंदगी था ! रिक्शा अपना सवारी था ! सप्ताह मे २ दिन आलू दम और दू दिन मीट - भात भी बन जाता था ! शाम को हम लोग खेल कूद भी कर लेते थे ! सैकील से स्कूल भी चले जाते थे ! मौका मिला त बाबु जी के "लेम्ब्रेटा" पर लटक भी जाते थे ! साल मे दू बार कपडा - लत्ता भी खरीदा जाता था ! पाकिट मे चार आना और गप्प हांकते स्कूल पहुँच जाते थे ! जो दोस्त यार सैकील या स्कूटर रखता था - वह अपना समाज से अलग हो जाता था ! लंच मे चार अन्ना मे आलू चौप वाला चाट खा कर जो आनंद मिलाता था वह शायद डोमिनो पिज्जा मे नही मिलाता है ! होली मे पटना के सब्जी बागः से रु ३५/- वाला कुरता मे जो मजा था वह मॉल से खरीदा हुआ दीजैनदार कुरता मे नही है !
सब कुछ , जी हाँ , सब कुछ बाबु जी के ५०० मे ही हो जाता था - वह भी मजे से ! अब त कुत्ता बिल्ली , गदहा - बैल सबको कई हज़ार मे वेतन मिलता है - फ़िर भी सब बेचैन है ! ई , आला दर्जा का "सरकारी बाबु " सब का माथा ख़राब हो जाएगा - इतना तनखाह मिलने के बाद - क्या ये लोग "घूस" कमाना बंद कर देगा ? हमको टू नही लगता है :( !
साला समाज भी अजीब है - अगर आप "सरकरी बाबु " है और घूस के पैसा से पटना के पाटलिपुत्र मे एक कित्ता माकन नही है या फ़िर दिल्ली - नॉएडा मे २-३ थो फ्लैट नही है टू "समाज" से इज्जत की बात छोडिये - आपके बेटा - बेटी का बियाह होना मुश्किल हो जाएगा ! "बाबु" का मतलब ही लोग समझता है की - झाड़ के पैसा !
फ़िर दोषी कौन हुआ ? समाज जो आप पर दबाब बनाता है ! सरकारी नौकरी नही लगा त - प्राइवेट मी नौकरी कर ली - और प्राइवेट मी भी नही टीक पाये त बिजिनेस - अब बिजिनेस वाले को दोनों हाथ लूटते देख बेचारा सरकारी वाला क्या करेगा ?
अब त खबरिया वालों को भी भरपूर पैसा मिलने लगा है - अधिकतर टू वही लोग है - जो पटना - भोपाल- बनारस से दिल्ली आए थे कलक्टर बनने के लिए और सरकारी मी चपरासी भी नही बन पाये - हिन्दी - अंग्रेज़ी थोड़े अछ्छी थी सो "पत्रकार" बन गए - अब हज़ार की कौन पूछे - लाख मी पैसा कमा रहे हैं -
कहने का मतलब जब समाज का बौधिक रूप से कमज़ोर तबका भी लाख - करोड़ का बात कर रहा है टू सरकारी कर्मचारी को कुछ मिल ही गया टू इतना हंगामा क्यों ?
वैसे त आप लोग मुंशी प्रेमचंद की कहानी "नमक का दरोगा" टू पढ़ा ही होगा ! :)
रंजन ऋतुराज सिंह , नॉएडा

4 comments:

Ahmad Rasheed said...

Bhaut koob likhe hain mukhiyajee. ek dam dil ki baat jo man ko chu jaye. "Jane kahan gaye woh din" is ka title yeh hona chahiye tha. Is tankha brahotri ka boojh kis pe jayega? hum pe aap pe or aaish karenge kaun?
Keep it. It should be publish in leading news papers as well.

Best wishes and regards,
Yours brother,
Ahmad Rasheed ( Saudi Arabia)

Vikas said...

बहुत मस्त लिखें है. सवाल सही है का इन लोंग उपर का मलाई काटना बंद कर देगा? हमको तो नही लगता.

Ritesh said...

kuccho kuccho likh dete hai.corruption hai, to kewal govt servant karta hai ka. unko support kaun karta hai? pura businessman corrupt hai, tabhi wo bhi corrupt hone pe majboor ho jate hai.
media wale kam hai ka. jhoota prasiddhi ke liye kaha tak gir sakte hai.. iska udaharan ta haale me tha (teacher sting operation, etc etc, hote rahta hai). kucch news channel to news ko itna commercialize bana diye hai ki din bhar ekke newswa dikhate rahte hai, aur to aur itna negative way me news dikhate hai ki aadmi pagal ho jaye. waise ek baat sahi kaha aapne "media me jyadatar wahi log aate hai jo other good professions me qualify nahi kar pate hai." iska asar aajkal ke news pe dikhne lagaa hai, logo ke aakrosh ko bharkane(aag me ghee dalne) ka kaam karne lage hai. DD news chaneel se koi accha news channel nahi raha ab.

rashmi singh said...

kya batau kitna mazaa aaya padhkar par haa ek baat patliputra mein ab makaan lena mushkil hai par jab mere babujee ne banaya tha,us waqt sarkaari naukari walo ko patliputra cooperative society se zameen milee thee!par haa ab sapnaa hai! bahut khoob likha hai:)