Friday, August 10, 2007

स्टेटस सिम्बल पार्ट-२

४। लोन :- गाँव का दिन याद है ! बैंक का जीप आते ही गाँव के कई बाबा और चाचा लोग खेत मे छुप जाते थे , जो पकडा जाता था , उसके क़मर ( डांड ) मे रस्सी बाँध के सिपाही ले जाते थे ! बाद मे हमे पता चलता था कि बैंक का कर्जा नही लौटाया है ! कर्ज़ लेकर घी पीने वालों को बहुत ही बुरी नज़र से हम सभी देखते थे ! बाबा कहते हैं कि कई जमींदार कर्ज़ के चक्कर मे रोड़ पर आ गए ! अब सब कुछ उलटा हो गया है ! आज कल कोई अपना तनखाह नही बताता है लेकिन यह जरूर बताता है कि उसने ३० लाख लोन लेकर दिल्ली मे एक फ़्लैट लिया है ! आप समझदार हैं तो समझ लीजिये कि "लोन" ही उसकी हैशियत है ! क्या गाडी क्या मकान , सब कुछ लोन पर मिल जायेगा , एश कीजिये और अपना भाव उंचा रखिये ! "यही पल है , कर ले तू , पुरी आरजू " !

राकेश वा के घर गए थे ! घर कि सजावट देख दंग रह गए ! क्या नही था घर मे ! बस ३० के उमर मे सब कुछ था उसके पास ! हम ता दीन हीन कि तरह थोडा संकुचाये हुये उसके बडे वाले सोफा कि बड़ी seat पर ठीक से बैठ भी नही पाए ! हम ता सिर्फ अपना थूक पर थूक घोंट रहे थे ! घर लौते वक़्त रास्ता भर हम डिप्रेशन मे थे ! मुझे क्या मालूम कि एक लोन सामाजिक स्तर मे ईतना बदलाव ला सकता है !
कई रात नींद नही आये ! बीबी सलाह दी कि हम लोग भी कुछ लोन ले ही लें ! कब तक इस डिप्रेशन के शिकार रहेंगे ! बहुत सोच समझ के लोन से एक कार ले ही लिया ! फिर हम सभी राकेश वा के घर गए ! इस बार उसके सोफा मे धम्म से जा कर बैठे ! राकेश वा कि बीबी भी हमको एक आदर भरी नज़र से देख रही थी , जो पिछली बार नही था ! मेरी बीबी और बच्चे भी अब कोन्फिदेंस मे बात चीत कर रहे थे ! ऐसा लगा कि सब कुछ बदल गया है ! ससुराल के चचेरे - ममरे साला-साली भी अब हमको दू पैसा का आदमी समझाने लगे !

क्रमशः

रंजन ऋतुराज सिंह , नौएडा

3 comments:

Ajit Chouhan said...

The real truth :)

Ahmad Rasheed said...

Mukhiya jee sab se pehle yeh bataiye yeh sab vishay aapko kahan se milta hai? Bhooot khoob likhe hain lekin aaisa lagta hai ki aap aajkal Akta kapoor ke serial se bahut prerit hain sab kuch serial me likh rahe hain kya baat hai? Pora lekh ek sath prakashit karen. Dosra main aapko ek baat khata hon aap sahyed galat field me chale gaye hain aapko sahitya me jana chhiye tha engineer kyon ban gaye. apni in sab lekh ka sankalan zarror publish karwayen.
Dhanyawad.
aapka bhai,
Ahmad Rasheed

Arbind Jha said...

Kiya baat hai sir ji... pehlaye jo bura tha ab acha hone laga hai... chaliye loan sae he sahi bhabhi ji ko confidence toe aaya...........